Tuesday, January 21, 2014

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''

             स्वामी रामानंदाचार्य की जयंती 23 जनवरी पर विशेष

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''
                                                                                                                     *डॉ.देवकुमार पुखराज
काशी (वाराणसी) के सुरम्य गंगा घाटों में पंच्चगंगा घाट का अपना एक विशिष्ट स्थान है, इसी घाट पर अवस्थित है श्रीमठ, जिसे मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के शीर्ष संत स्वामी रामानंद की तपः स्थली होने का गौरव प्राप्त है। उस रामानंद ने आज से सात सौ पंद्रह वर्ष पहले समाज-जीवन के विविध क्षेत्रों, विभिन्न मत-पंथ- संप्रदायों में व्याप्त वैमनस्यता और कटुता को दूर कर हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया। आचार्यपाद ने स्वतंत्र रूप से श्रीसंप्रदाय का प्रवर्तन किया। जिसे रामानंदी,रामावत अथवा वैरागी संप्रदाय भी कहते हैं।  उन्होंने बिखरते और नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला हैसर्वे प्रपत्तेधिकारिणो मताः
स्वामी श्रीरामानंद ने दलित, शोषित और उपेक्षित जातियों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर समाज में समरसता का अपू्र्व वातावरण निर्मित किया। आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने तारक राममंत्र का उपदेश पेड़ पर चढ़कर दिया था,ताकि  सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके। उन्होंने नारा दिया था-
"जाति-पाति पूछे न कोई , हरि को भजै सो हरि का होई "
ऐसा कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वर्ण के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया। चर्मकार जाति में जन्मे रैदास ( रविदास) और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं। युग प्रवर्त्तक स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति कही--सुनी जाती है, जिसके अनुसार-
"भक्ति द्रविड़ ऊपजी, लायो रामानंद,”  अर्थात भक्ति की धारा को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाने का श्रेय भी स्वामी रामानंद को ही जाता है।
उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेन नाई और पीपा नरेश जैसे जाति-पांति, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे, तो दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे। उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत, कालजयी महाकवि भी उत्पन्न हुए।
            स्वामी रामानंद को रामोपासना के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है। उन्होंने श्रीसंप्रदाय के विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपत्ति सिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का सूत्रपात किया। श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडक्षर( रां रामाय नमः) राममंत्र को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना। बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया। छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन किया। नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया। साथ-साथ सिद्धांतों के प्रचार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी। स्वामी रामानंद ने प्रस्थानत्रयी पर विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की। तत्व एवं आचारबोध की दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत के स्थान पर जन सामान्य के बीच प्रचलित हिन्दी अथवा अवधि भाषा को सर्वप्रथम अपनी रचना का माध्यम स्वामी रामानंद ने ही बनाया। इन कार्यों के चलते ही कई विद्वान उन्हें हिन्दी का पहला कवि भी कहते हैं।  
            ऐसे महान तपस्वी संत, परम विचारक, समन्वयी महात्मा का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्मतिथि को लेकर मतभेद होने के बावजूद रामानंद संप्रदाय में मान्यता है कि आद्य जगद्गुरू का प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित पुण्य सदन शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था। धार्मिक संस्कारों वाले पंडित शर्मा मे रामानंद को शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में गुरू राघवानंद के पास भेजा था। कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन कर प्रवीणता प्राप्त कर ली। गुरु राघवानंद और माता-पिता के दबाव के बावजूद उन्होंने गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने का संकल्प लिया। बाध्य होकर गुरुदेव ने स्वामी रामानंद को रामतारक मंत्र की दीक्षा प्रदान की। उन्होंने श्रीमठ की गुह्य साधनास्थली में प्रविष्ट हो राममंत्र का अनुष्ठान तथा अन्यान्य तांत्रिक साधनाओं का प्रयोग करते हुए घोर तपश्चर्या की। योगमार्ग की तमाम गुत्थियों को सुलझाते हुए अष्टांग योग की साधना पूर्ण की। दीर्घायुष्य प्राप्त करने के कारण जगद्गुरु राघवानंद ने अपने तेजस्वी और परमप्रिय शिष्य रामानंद को श्रीमठ की पावन पीठ पर अभिषिक्त कर दिया। अपने पहले संबोधन में ही जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने तथा परस्पर आत्मीयता एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार के बदौलत धर्म रक्षार्थ विराट संगठित शक्ति खड़ा करने का संकल्प व्यक्त किया। 
            श्रीसीताजी द्वारा पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत (राममय जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा रामभक्ति की पावन धारा को मध्यकाल में स्वामी श्रीरामानंदाचार्य ने अनुपम तीव्रता प्रदान की। उन्होंने क्रुर, विवेकशून्य, पूर्वाग्रही तथा असहिष्णु यवन शासकों के अत्याचारों का मुखर विरोध किया। शंखध्वनी कर अपनी यौगिक शक्ति से ऐसा माहौल बनाया कि तत्कालीन मुगल सम्राट तुगलक को कबीरदास के माध्यम से स्वामीजी के पास शरणागत होकर क्षमा याचना करनी पड़ी। उसे हिन्दुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध हटाने और जजियाकर को समाप्त करने का आदेश निर्गत करना पड़ा।
            मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ जैसी है उन्होंने अभूतपूर्व सामाजिक क्रांति का श्रीगणेश करके बड़ी जीवटता से समाज और संस्कृति की रक्षा की उन्हीं के चलते उत्तरभारत में तीर्थ क्षेत्रों की रक्षा और वहां सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना संभव हो सकी। उस युग की परिस्थितियों के अनुसार, वैरागी साधु समाज को अस्त्र-शस्र से सज्जित अनी के रूप में संगठित कर तीर्थ-व्रत की रक्षा के लिए, धर्म का सक्रिय मूर्तिमान स्वरूप खड़ा किया। तीर्थस्थानों से लेकर गांव-गांव में वैरागी साधुओं ने अखाड़े स्थापित किए। आज भी निर्वाणी, दिगम्बर और निर्मोही नामक तीन मूल अखाड़े और उसकी कई शाखाएं देश भर में सनातन धर्म की मूल पताका को लहरा रही हैं।  मूल्य ह्रास की इस विषम अवस्था में भी संपूर्ण संसार में रामानंद संप्रदाय के सर्वाधि मठ, मंदिर और संत-महात्मा हैंआज भी इस संप्रदाय के आश्रमों में संत-साधु और गृहस्थ की सेवा, रामगुणगान, अखंड श्रीरामना संकीर्तन व्यवस्थित हैं और सर्वत्र आध्यामिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं। इस संप्रदाय की व्यापकता का हिसाब इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वैष्णवों के बावन द्वारों में सर्वाधिक छत्तीस द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हैं। कुंभ मेले के दौरान रामानंदी साधुओं के विराट स्वरुप, इनकी उदारता और अन्नदान की परंपरा को कोई भी देख सकता है।
            युगप्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्यजी महाराज द्वारा प्रर्वतित मूल रामानंद संप्रदाय के अलावे इसकी शाखा, प्रशाखा और अवान्तर शाखाएं जैसे- रामस्नेही, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से सक्रिय हैं, जो इस संप्रदाय की मूलभावना की संवाहिका बनी हैं यह स्वामी रामानंद के ही व्यक्तित्व का प्रभाव था कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, शैव-वैष्णव विवाद, वर्ण-विद्वेष, मत-मतांतर का झगड़ा और परस्पर सामाजिक कटुता बहुत हद तक कम हो गई
             बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्य जी ने ही प्रारंभ किया था। इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था।
             काशी के परम पावन पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, आचार्यपाद द्वारा प्रवाहित श्रीराम प्रपत्ति की पावनधारा के मुख्यकेंद्र के रूप में प्रतिष्ठित होकर उसी ओजस्वी परंपरा का अनवरत प्रवर्तन कर रहा है। आज भी श्रीमठ आचार्यचरण की परिकल्पना के अनुरूप उनके द्वारा प्रज्ज्वलित दीप से जनमानस को आलोकित कर रहा है। यही वह दिव्यस्थल है, जहां विराजमान होकर स्वामीजी ने अपने परमप्रतापी शिष्यों के माध्यम से अपनी अनुग्रहशक्ति का उपयोग किया था रामानंदाचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्ध श्रीमठ, दुनिया भर में फैले श्रीराम भक्तों की श्रद्धा का अनुपम केन्द्र है और सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का एकमात्र मूल आचार्यपीठ अथवा दूसरे शब्दों में कहें को मुख्यालय है। श्रीमठ में अवस्थित रामानंदाचार्य जी की पावन चरणपादुका दुनियाभर में बिखरे रामानंदी संतों, तपस्वियों एवं अनुयायियों के बीच समादृत है।
             श्रीमठ के वर्तमान पीठासीन आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी भी स्वामी रामानंदाचार्च की प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं। इनका ज्ञान, वग्मिता और सबसे अच्छी नकी उदारता और संयोजन चेतना  को देखकर यह  कल्पना किया जा सकता है कि स्वामी रामानंद का व्यक्तित्व कैसा रहा होगा वर्तमान जगद्गुरू रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सत्प्रयासों का नतीजा है कि श्रीमठ से कभी अलग हो चुकी कबीरदासीय, रविदासीय, रामस्नेही, प्रभृति परंपराएं वैष्णवता के सूत्र में बंधकर श्रीमठ से एकरूपता स्थापित कर रही है कई परंपरावादी मठ -मंदिरों की इकाईयां श्रीमठ में विलीन हो रही हैं तीर्थराज प्रयाग के दारागंज स्थित आद्य जगद्गुरू रामनंदाचार्य का प्राकट्यधाम भी इनकी प्रेरणा से फिर भव्य स्वरूप में प्रकट हुआ है।

              स्वामी रामानंद के द्वारा दी गई देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया। भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को प्राप्त न हो सकी। महाराष्ट्र के नाथपंथियों ने ज्ञानदेव के पिता विट्ठल पंत के गुरू के रूप में उन्हें पूजा, अद्वैत मतावलंबियों ने ज्योतिर्मठ के ब्रह्मचारी के रूप में उन्हें अपनाया। बाबरीपंथ के संतों ने अपने संप्रदाय के प्रवर्तक मानकर उनकी वंदना की और कबीर के गुरू तो वे थे ही, इसलिये कबीरपंथियों में उनका आदर स्वाभाविक है स्वामी रामानंदाचार्य  के व्यक्तित्व की इस व्यापकता का रहस्य- उनकी उदार और समन्वयकारी विचारधारा में निहित है निश्चय हीं उनके विराट व्यक्तित्व एवं व्यापक महत्ता के अनुरूप कतिपय आर्षग्रंथ एवं संत-साहित्य में उल्लेखित उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है। अगस्त संहिताकार ने लिखा है कि - रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले। अर्थात स्वयं श्रीराम ही पृथ्वी पर रामानंद के रुप में अवतार लिये। ऐसे महान तपस्वी, साधक और मानवता के परम उन्नायक को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
 -इति-


Friday, December 27, 2013

आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है- स्वामी रामनरेशाचार्य

डा. राधिका नागरथ महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए
हरिद्वार 21 सितंबर। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने कहा कि आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है। देश के सामने आज धर्म, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में चारों ओर संकट ही संकट दिखार्इ दे रहा है। हर क्षेत्र में गिरावट आर्इ है। पूरे देश में आज नैतिकता और चरित्र का पतन होता दिखाई दे रहा है।
वे कनखल में हरिगंगा सभागार में हरिद्वार के नागरिकों की ओर से जनअधिकार अभियान और गाँधी जागृति मिशन द्वारा आयोजित नागरिक अभिनन्दन समारोह में बोल रहे थे। यह अभिनन्दन समारोह स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज के चातुर्मास के समापन के अवसर पर आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि रामानंदा सम्प्रदाय ने सामाजिक जनजागरण के लिए सराहनीय कार्य किया। रामानंदाचार्य जी की वजह से समाज में फैली सामाजिक विषमताओं को दूर किया गया। उन्होंने कहा कि भक्त रैदास से बड़ा कोर्इ भक्त नहीं था। मीराबाई समेत क बड़े विद्वानों और संतों ने रैदास महाराज से दीक्षा ली। जो भारत की सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार प्राध्यापक डा. कमलकांत बुधकर ने कहा कि महाराज श्री ने चातुर्मास के माध्यम से वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा तीर्थनगरी हरिद्वार को ऊर्जावान बनाने का कार्य किया है। उन्होंने रामानंद सम्प्रदाय को सनातन धर्म की उच्च मर्यादाओं को साबित करते हुए जाति- पाति का भेद मिटाकर समाज को एक सूत्र में बांधने कार्य किया है।
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक सुधीर कुमार गुप्ता ने कहा कि महाराज श्री के हरिद्वार आगमन से ऐसा लग रहा है कि मानों शिव की नगरी में राम और शिव का मिलन हो रहा है। गुप्ता ने कहा कि राम शिव में और शिव राम में रमन करते है। कार्यक्रम की आयोजिका डा. राधिका नागरथ ने महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए कहा कि जिस तरह माँ गंगा अपने पावन जल से हमें शीतलता प्रदान करती है वैसे ही महाराज श्री के उपदेश हमें हमेशा शीतलता प्रदान करते रहेंगे। कार्यक्रम के संचालक पुरूषोतम शर्मा गांधीवादी ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय के निष्काम सिद्धि का मार्ग ही नहीं बलिक दरिद्रनारायण की सेवा के लिए लोक संग्रह का मार्ग भी तय करता है। उन्होंने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य वेदान्त एवं सनातन धर्म का आदर्श स्थापित कर रहे हैं। जनअधिकार अभियान के प्रदेश अध्यक्ष सुनील दत्त पांडेय ने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य ने चातुर्मास के दौरान बौद्धिक गोष्ठियां करवाकर देश की ज्वलन्त समस्याओं को समाज के सामने रखा और उनके निराकरण का रास्ता भी बताया। प्रेस क्लब के अध्यक्ष संजय आर्य ने कहा कि चातुर्मास संतों के लिए आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है। आज संत समाज में चातुर्मास की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। परन्तु स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने इस परम्परा को पुनस्र्थापित करने का एक सराहनीय कार्य किया है। कथावाचक पंडित जयप्रकाश कौशिक ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने देश की एकता और अखण्डता के लिए अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर डा. श्यामसुन्दर दास शास्त्री ने रामानंद सम्प्रदाय को सामाजिक एकता का प्रतीक बताया। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविधालय के कुलपति डा. महावीर अग्रवाल ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने जाति बंधनों को तोड़कर समाज को न दिशा दी। इस अवसर पर हरिद्वार नगर निगम के मेयर मनोज गर्ग, रामकुमार एडवोकेट, भगवत शरण अग्रवाल, इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन हरिद्वार के अध्यक्ष प्रभात कुमार, महामंत्री विनीत धीमान, प्रेस क्लब के महामंत्री रामचंद्र कन्नौजिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुदित अग्रवाल, सचिव विकास चौहान, दीपक नोटियाल, महावीर नेगी, शैलेन्द्र सिंह, ललितेंद्र नाथ, मनोज रावत, अम्बरीश कुमार, नीरज छाछर, अमित कुमार, महन्त महेन्द्र सिंह, महन्त शिवशंकर गिरि, महन्त भगवानदास, महन्त रघुवीरदास, भरत शर्मा, कोमल शर्मा आदि ने रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज का स्मृति चिन्ह भेंट कर और माला पहनाकर स्वागत किया। निर्मल संस्कृत महाविधालय के छात्रों ने स्वसितवाचन कर महाराज श्री का स्वागत किया।
(साभार एक्सप्रेस इंडियन)

Thursday, December 5, 2013

श्रीराम महायज्ञ का आमंत्रण पत्र

ऐतिहासिक और पौराणिक शहर बक्सर में सात दिसंबर से 15 दिसंबर,2013 तक होने जा रहे शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ के लिए प्रकाशित आमंत्रण पत्र आपकी सेवा में समर्पित है.

Sriram Yagya invitation card




Sriram Yagya Program

Wednesday, December 4, 2013

पापों के प्रायश्चित को आध्यात्म की शरण में बंदी





क्सर के चरित्रवन में आयोजित शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ स्थल पर ओपेन जेल के बंदी पापों के प्रायश्चित को श्रम दान में लगे हैं। आयोजन समिति के निर्देश पर वे कार्य कर रहे हैं। इनका कार्य पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। यज्ञ स्थल पर कार्य करने से बंदियों को आत्मिक शांति प्राप्त हो रही है। इस अाध्यात्मिक कार्य से जुड़कर वे अपने को स्वच्छ समाज के नागरिक के रुप में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। बंदियों की मानें तो सरकार के पहल से उन्हे मुक्त कारागार में रहने की आजादी मिली है। इसी से वे कैद में होते हुए भी सामाजिक परिवेश में अपने में हुए बदलाव को सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं । इस संबंध में अनिल सिंह एवं नारायण सिंह ने बताया कि बाहर कार्य करने के दौरान संतो का प्रवचन सुनने को मिला इससे हमारी बुद्धि में बदलाव हुआ है। यज्ञकार्य में श्रम करने में हमें काफी आनंद आ रहा है। इससे पहले किसी के चढ़ाने-बढ़ाने व जाने-अनजाने में जो अपराध हमलोगों ने किया है। वह माफी के काबिल नहीं था। हमलोग समाज व कानून दोनों के अपराधी थे। इस यज्ञ से हमें समाज के मुख्य धारा में जुड़ने का मौका मिला है। सभी हमें अपराधी के नजर से देख रहे थे। जिससे समाज हमें स्वीकार नही कर पा रहा था। ऐसे में आयोजक व सरकार के हमलोग अभारी है। श्रमदान करने वालों में ओम प्रकाश पासवान, मनोज पासवान, बिहारी महतो, महानंद यादव, गजलवा हलवाई, मुकुंददेव राउत व बड़ों बिल्दार आदि शामिल थे- सौजन्य- दैनिक जागरण,दिनांक- 5-12-2013

श्रीराम महायज्ञ की तैयारी में जुटे बक्सर ओपेन कारा के कैदी

महर्षि विश्वमित्र की पावन तपोभूमि बक्सर में पतित-पावनी गंगा के तट पर होने जा रहे शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां अब अपने अंतिम चरण में है। सात मंजिले यज्ञशाला और मुख्य़ पंडाल का निर्माणकार्य लगभग पूरा हो गया है। सौ हवनकुंडों के निर्माण में भी कारीगर दिन-रात लगे हुए हैं।सबसे खास बात ये है कि यज्ञ की तैयारियों में बक्सर ओपेन जेल के दो दर्जन से ज्यादा कैदी भी लगे हैं जो विभिन्न अपराधों में सजायाफ्ता हैं। ऐसे कैदियों का मानना है कि धर्मकार्य में भाग लेने से उनके पाप कम होंगे और जीवन में शांति और सदभाव कायम होगा। जेल प्रशासन ने उन्हें पू्र्व के अपराधों के प्रायश्चित के लिए इस काम में लगाया है ताकि वे समाज जीवन की मुख्यधारा से अपने को जोड़ सकें।


Yagya Mandap
 महायज्ञ में सौ हवनकुंड बनेंगे जिसमें एक करोड़ आहुतियां दी जानी है। संत-महात्माओं के प्रवचन से पूरे नौ दिनों तक भक्ति की रसधारा मां गंगा के समानांतर बहने वाली है। इसके अलावे रामलीला और रासलीला की प्रसिद्ध मंडलियों की प्रस्तुति भी श्रद्धालुओं को देखने-सुनने को मिलेगी।


रामभक्ति की सगुण एवम् निर्गुण धारा के मूल पीठ और रामानंदी वैष्णवों के आचार्यपीठ-श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी के इस आयोजन में देश भर के जाने-माने संत-महात्मा और धर्माचार्य भाग लेेने वाले हैं।

Swami Ramnareshacharya in Buxar

 श्रीराम महायज्ञ के संकल्पक जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज स्वयं भी बक्सर पहुंच गये हैं। उनका कहना है कि इस यज्ञ से बक्सर सहित आसपास के इलाके में धार्मिक वातावरण बनेगा और आम लोगों में कृतज्ञता ज्ञापन का भाव बढ़ेगा जिसका आजकल भारी अभाव हो गया है। उन्होंने कहा कि यज्ञ में देवताओं और प्रकृति को आहुतियों के माध्यम से हम कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। जो भगवान वायु, आकाश और अग्नि के रुप में हमारी सहायता करते हैं और जीवन को आधार प्रदान करते हैं, हम उनके लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन इस यज्ञ के माध्यम से करते हैं।
Swami Ramnareshacharya near Yagya Mandap



Monday, December 2, 2013

बक्सर में परवान चढ़ी श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां

पौराणिक शहर बक्सर के चरित्रवन स्थित सोमेश्वर स्थान पर गंगा किनारे 7 दिसंबर से होने वाले शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां परवान पर है। इसके लिए वहां करीब सौ कारीगरों व स्वयं सेवकों के दल को तैनात किया गया है, जो दिन-रात निर्माण कार्य में जुटे हैं। इनके द्वारा काफी मेहनत-मशक्कत कर यज्ञशाला म् प्रवचन मंडप के अलावा अन्य कार्यो को अंतिम रूप दिया जा रहा है। यज्ञ स्थल पर रविवार को इसकी जानकारी देते हुए आयोजन समिति के अध्यक्ष आर के राय और सचिव राजवंश तिवारी ने बताया कि नौ दिवसीय श्रीराम महायज्ञ का शुभारंभ वाराणसी स्थित श्रीमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशचार्य जी महराज के सान्निध्य में 7 दिसंबर को भव्य कलश यात्र के साथ होगा। जिसका समापन समष्टि भंडारे के साथ 15 दिसंबर को होगा। उन्होंने बताया कि सौ कुंडीय महर्षि विश्वामित्र नामक यज्ञशाला का निर्माण चौदह कट्ठा भूमि पर कराया जा रहा है। यज्ञ मंडप पांच मंजिला बना है। यज्ञशाला के समीप ही वशिष्ठ मुनि के नाम पर विशाल सभागार बनाया जा रहा है। जिसमें संत समागम के अलावा रासलीला, रामलीला म् अन्य विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस मौके पर समिति के प्रवक्ता राकेश कुमार राय ‘कल्लू’, योगेश राय, सोमेश्वरनाथ मंदिर के महंत संजय दास, सिद्धनाथ राय, प्रमोद पांडेय, जितेन्द्र गिरी, प्रचार प्रभारी डा.रमेश कुमार, मनोज पांडेय, जितेन्द्र पांडेय, नंदू पांडेय, अनिल पांडेय, हरेन्द्र यादव व विजय तिवारी आदि लोग मौजूद थे
बक्सर की ऐतिहासिक धरती पर होने वाला ये अपने तरह का पहला यज्ञ है जिसमें देश के जाने-माने संत-महात्मा और धर्माचार्य सम्मिलित होंगे। प्रभु श्रीरा्म की शिक्षाभूमि पर इस बार रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ की ओर से ये आयोजन हो रहा है, जिसे लेकर इलाके में भारी उत्साह है।

Wednesday, November 27, 2013

जगदगुरु ने लिया महायज्ञ की तैयारियों का जायजा

बक्सर के चरित्रवन स्थित सोमेश्वर स्थान पर 7 दिसंबर से शुरू होने वाले नौ दिवसीय शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां शुरू कर दी गई है। जिसके तहत यज्ञ मंडप व प्रवचन पंडाल आदि निर्माण का काम जोर पकड़ने लगा है। यज्ञ का आयोजन जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में हो रहा है। गुरुवार को श्री पीठ काशी से पधारे महाराज श्री ने तैयारियों का जायजा लिया तथा आयोजक मंडल को आवश्यक दिशा निर्देश दिया। गत 21 नवम्बर को बक्सर पधारे महाराज श्री ने कहा कि यज्ञ का उद्देश्य वैदिक सनातन धर्म के माध्यम से सामाजिक सद्भाव बनाते हुए जन कल्याण करना है। यज्ञ के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए स्वामी जी ने कहा कि वैदिक शास्त्रीय विधान के अनुसार एक सौ कुंडीय यज्ञ का ही महत्व है। उन्होंने बताया कि सभी कुंडों पर चार-चार जोड़े दंपति एक-एक आचार्य के निर्देशन में एक करोड़ आहूतियां देंगे। उन्होंने बताया कि वैदिक प्रवर विनायक मंगलेश्वर बादल ‘घनपाठी’ व दत्तात्रये नारायण रहाटे के आचार्यत्व में महायज्ञ संपन्न होगा। इस मौके पर समिति के अध्यक्ष आर.के.राय, उपाध्यक्ष प्रभु प्रसाद गुप्ता, सुरेन्द्र राय व दिनेश राय के अलावा सचिव राजवंश तिवारी, हरेन्द्र कुमार सिंह, मीडिया प्रभारी डा.रमेश कुमार, सह सचिव योगेश राय व चंद्रश्वेर पांडेय, कोषाध्यक्ष सत्येन्द्र पांडेय के अलावा जवाहर पासवान, काशीनाथ प्रसाद, संजय दास, रामव्रत सिंह, विभूति नारायण राय, शिव नायक सिंह, सिद्धनाथ राय, देव नारायण शर्मा, राजाराम शास्त्री, जितेन्द्र गिरी, भालचंद्र बादल, लाल दास, आचार्य फूलेन्द्र सिंह, प्रदीप पाठक व उपेन्द्र पाठक आदि मौजूद थे।

श्रीराम महायज्ञ में बहेगी भक्ति की धारा

बक्सर के चरित्रवन स्थित सोमेश्वर स्थान पर पावन गंगा के तट पर 7 दिसंबर से प्रस्तावित शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ में देश के दर्जनों विद्वान, धर्माचार्य और मठाधीश पहुंचेंगे और अपने श्रीमुख से ज्ञान की गंगा प्रवाहित करेंगे। साथ ही नौ दिवसीय धर्म के इस विराट आयोजन में शिरकत करते हुए वैदिक सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को बताएंगे।श्रीराम भक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ, पंचगंगा, काशी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में इस महायज्ञ का आयोजन किया गया है। जिसमें देश के कोने-कोने से संतोंतों तोोतों विद्वानो के आने की अनुमति मिल चुकी है। महायज्ञ आयोजन समिति के अध्यक्ष आर.के.राय, सचिव राजवंश तिवारी म् मीडिया प्रभारी डा.रमेश कुमार ने बताया कि यज्ञ के दौरान गोवर्धनपीठ, पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज, वृंदावन के मलूक पीठाधीश्वर द्वाराचार्य डा.राजेन्द्र दास जी महाराज, पंजाब के पिंडोरीधाम से रघुवीर दास जी महाराज, जोधपुर के स्वामी अचलानंद जी महाराज, मैहर के सिया शरण जी, सूरत (गुजरात) के जगन्नाथ दास, अयोध्या के दिगंबर अखाडा़ के श्रीमहंत सुरेश दास जी , स्वामी गयामनंद दास, वृंदावन के रामस्वरूप व महामंडलेश्वर बलरामदास, प्रेमदास जी महाराज, हरिद्वार के रामानंद आश्रम के महामंडलेश्वर श्रीभगवान दास समेत कई अन्य जाने-माने संत-महंतों के यज्ञ में पधारने स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।

Wednesday, July 31, 2013

हरिद्वार में स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव आरंभ

पतित पावनी गंगा के तट पर देवभूमि हरिद्वार में इस वर्ष श्रीमठ, काशी के वर्तमान आचार्य एवम् जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का  'दिव्य चातुर्मास महोत्सव' श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। भूपतवाला स्थित निर्माणाधीन अद्वितीय श्रीराम मंदिर परिसर चातुर्मास महोत्सव की विविध प्रवृत्तियों का समायोजन किया जा रहा है। नित्य कार्यक्रमों के साथ ही सावन मास की प्रत्येक सोमवारी को भगवान भोलेनाथ का महाभिषेक पूर्ण-विधि विधान से संपन्न हो रहा है। जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे आत्मशुद्धि का पर्व बताया।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास में संत-महात्माओं को आत्मचिंतन का अवसर प्राप्त होता है। इसमें हमें सनातन धर्म की रक्षा को लेकर चिंतन करने के साथ व्यक्तिगत खामियों को दूर करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि संत का उद्देश्य सनातन धर्म एवं मानव कल्याण को गति देना है।
वैसे गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर ही देश भर से आए भक्तों की उपस्थिति में गुरु पूजन के साथ महोत्सव का आरंभ हो गया। 

Saturday, July 13, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने किया हनुमान मंदिर का उदघाटन

भोजपुर जिले के सिकरहटा थाना के नोनाडीह मोड़ पर बने हनुमानजी के भव्य मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा आज दिनांक 14 जुलाई दिन रविवार को पूर्ण विदि-विधान और वैदिक रीति से संपन्न हुआ। वैरागी वैष्णव संप्रदाय (रामावत या श्रीसंप्रदाय) के प्रधान आचार्य और श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के कर कमलों द्वारा मंदिर के श्रीविग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस मौके पर दक्षिणी भोजपुर के पचासो गांवों से आए श्रद्धालु हजारों की संख्या में मौजूद थे।
स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन धर्म के देवताओं में हनुमान जी का स्थान अद्वितीय है। उन्हें प्रजा पालक प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त होने के चलते भक्त शिरोमणि का दर्जा हासिल हैं। वे भगवान के वरदान स्वरुप आज भी धरा धाम पर विराज रहे हैं और अपने भक्तों से निर्भयता का वरदान देते हैं।
चार दिनों तक चले प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान रामभक्ति परंपरा से जुड़े बड़ी संख्या में संतो-महंतों के दर्शन एवम पूजन का लाभ स्थानीय श्रद्धालुओं का प्राप्त हुआ। ये पहला मौका था जब दो दशक तक उग्रवाद और हिंसा से संतप्त रहे दक्षिण भोजपुर के इस अति पिछड़े  इलाके में जगदगुरु जैसे धर्माचार्य  का पदार्पण हुआ था।
प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव को गरिमा प्रदान करने में रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल के सदस्यों ने भी पूरी ताकत लगा दी थी। महाराजश्री को विदा देने के भक्त श्रद्धालुओं की आँखे नम हो गयी थी।
 महाराजश्री सुबह 10 बजे सड़क मार्ग से पटना के लिए रवाना हो गये। आज ही उन्हें वायुमार्ग से पटना से भाया दिल्ली सूरत पहुंचना है, जहां अगले कुछ दिनों तक वे विविध धार्मिक आयोजनों में शामिल होंगे।
 

Sunday, June 30, 2013

कलियुग के सुरदास, जिन्हें कंठस्थ है पूरा रामायण

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में दोनों आंखों की रोशनी खो चुके मदनदास को गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरित मानस, दोहावली, कवितावली, हनुमान बाहुक और विनय पत्रिका सहित हनुमान चालीसा पूरी तरह कंठस्थ हो गयी है। इसके साथ ही श्रीमद्भागवत गीता का प्रथम, द्वितीय और तृतीय अध्याय भी पूरी तरह याद हो गया है। इसे पूरा याद करने के बाद वह महाकवि सूरदास के महाकाव्य सूरसागर को पूरा याद करेंगे।

जौनपुर जिले की मडियाहूं तहसील एवं राम नगर विकास खण्ड के बलभद्रपुर गांव के निवासी श्रीराम मौर्य के पुत्र के रुप में वर्ष 1954 में मंगरु राम उर्फ मदनदास का जन्म हुआ था। मगरु राम जब लगभग तीन साल के थे तब उन्हें चेचक निकला और दोनों आंखों की रोशनी चली गयी। मंगरु राम के पिता श्री राम मौर्य की तबीयत भी उसी समय खराब हुई और वह दुनिया से चल बसे। पिता की मृत्यु के बाद उनका लालन-पालन चाचा ने किया। मंगरु राम ने 22 वर्ष की अवस्था में ही अपना मन भगवान के चरणों में लगा लिया और उसी समय से अपना नाम मंगरुराम से बदल कर मदनदास रख लिया अब ये मदनदास उर्फ सूरदास के नाम से जाने जाते हैं।

मदनदास उर्फ सूरदास ने बताया कि वर्ष 1975 में उन्होंने श्री रामचरित मानस को कंठस्थ करने की बात अपने मन में ठान ली थी यह काम बड़ा कठिन था मगर दृढ़ इच्छा शक्ति से संभव था। उन्होंने अपने गांव के एक बालक से कहा, तुम रामचरित मानस की चौपाई, दोहे तथा श्लोक कम से कम तीन बार पढ़ कर मुझे सुनाओ तो मैं उसे याद कर लूंगा।

पांच वर्ष के कठिन परिश्रम के पश्चात 1980 में इन्हें श्री रामचरित मानस सम्पूर्ण कंठस्थ हो गया। उन्होंने कहा कि श्री रामचरित मानस में कुल चार हजार छह सौ बाइस चौपाई, एक सौ अस्सी छन्द, एक हजार चौहत्तर दोहे तथा नौ श्लोक हैं। सूरदास को पूरी उम्मीद है कि अब वह जो भी धार्मिक ग्रंथ याद करना चाहेंगे उन्हें याद हो जाएगा।

इस समय वह श्रीमद्भागवत गीता याद करने में जुटे है अब तक उन्हें इसका प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय अध्याय पूरी तरह याद हो गया है। सूरदास ने दावा किया है कि दो वर्ष के अन्दर वह पूरी श्रीमद्भागवत गीता याद कर लेंगे और इसके बाद वह महाकवि सूरदास रचित महाकाव्य, सूर सागर को याद करेंगे। उन्होंने बताया कि इस समय वह जिले में स्थित अनेक विद्यालयों में जाते है और विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा के बारे में जानकारी देते है इसके बदले उन्हें कुछ धन मिल जाता है उसी से इनका भरण पोषण होता है।

चावल के दाने पर लिखी रामायण

जमशेदपुर के लाल का कमाल
प्रतिभाएं परिस्थितियों की मोहताज नहीं होतीं. कठिन से कठिन परिस्थितियों के बीच से भी वह उभर कर सामने आती हैं. अगर उचित अवसर और मंच मिले तो उनमें तेजी से निखार आता है. ऐसी ही प्रतिभा के धनी हैं, झारखंड के जमशेदपुर के कीताडीह निवासी 17 वर्षीय नवीन कुमार. ये चावल के दाने पर पेंटिंग बनाते हैं.

पेंटिंग बनाते समय ये किसी तरह के सिग्नीफिकेंट ग्लास का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि चिमटा के सहारे चावल के दाने को पकड़ कर अपनी पेंटिंग तैयार करते हैं. अब तक चावल के दाने पर उन्होंने रामायण, बाइबल, महाभारत व कुरान लिखा है. वे रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, भगत सिंह का पोट्रेट व भगवान गणोश की पेंटिंग बना चुके हैं.

चावल पेंटिंग में गहरी दिलचस्पी

पिछले चार सालों से आर्टिस्ट मानिक साव के निर्देशन में नवीन पेंटिंग सीख रहे हैं, लेकिन चावल में पेंटिंग बनाने की कला उनकी अपनी है. इसे उन्होंने अपनी कोशिश से उभारा है.

नवीन माइक्रो आर्टिस्ट बनना चाहते हैं. इनके पिता आदित्यपुर की एक कंपनी में प्राइवेट जॉब में हैं. नवीन को-ऑपरेटिव कॉलेज से इंटर की पढ़ाई कर रहे हैं. छोटा भाई कक्षा नौ में पढ़ता है. मां गृहिणी हैं.

नवीन के अनुसार घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है. हर महीने वे पेंटिंग में दो पोट्रेट बनाते हैं. उसमें काफी खर्च आता है. कलर भी बहुत महंगे आते हैं. प्रैक्टिस में ही इतने खर्च हो जाते हैं कि आगे अन्य चित्रकारों की तरह पेंटिंग की इच्छा होते हुए भी बना नहीं पाते. चावल के दाने में पेंटिंग बनाने में कम खर्च होता है और माइक्रो पेंटिंग भी हो जाती है.

Friday, June 14, 2013

अयोध्या में जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज की प्रेसवार्ता

श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज तीन दिवसीय श्रीराम रामानंद भावाभिसिक्त यात्रा के क्रम में वर्ष 2008 के मार्च महीने में अयोध्याजी पहुंचे थे। रामलला के दर्शन, सरयू जी  का पूजन और स्नान, विभिन्न संत-श्रीमहंतों द्वारा अभिनंदन और आश्रमों में पधरावणियों के बीच ही उन्होंने सम-समायिक राजनीतिक परिस्थियों और धार्मिक ज्वलंत विषयों पर अपनी बेबाक राय रखी। उसी का एक वीडियो क्लिप आप सबके लिए यहां पेश है।

Wednesday, June 12, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी का श्रीअयोध्या यात्रा

रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज, साल 2008 में तीन दिनों के लिए अयोध्याजी की यात्रा पर गये थे। अयोध्या में रामानंद संप्रदाय के संतो, श्रीमहंतों और अखाड़े के संतो ने अपने आचार्य का जोरदार स्वागत किया था। अयोध्या यात्रा के पहले दिन महाराजश्री ने सरयू स्नान और पूजन किया था। उसी श्रीराम रामानंद भावाभिसिक्त यात्रा के दौरान का एक वीडियो चित्र जो 30 मार्च,2008 को लिया गया था।

बक्सर में श्रीमठ करेगा शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ

महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि बक्सर में एक विराट श्रीराम महायज्ञ करने का संकल्प जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने लिया। आगामी सात दिसम्बर से 15 दिसम्बर,2013 तक चलने वाले यज्ञ में देश भर से शीर्ष संत-महात्मा, श्रीमहंत, भजन गायक और सुख्यात लीला मंडली के कलाकार भाग लेंगे। कई शताब्दी बाद धर्मनगरी बक्सर में इस तरह का भव्य यज्ञ देखने और उसमें भाग लेने का सुअवसर सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त होगा। इस यज्ञ का नाम शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ होगा। इसमें सौ हवन कुंड बनेंगे जिसमें एक करोड़ आहुतियां डाली जाएंगी। सबसे बड़ी बात ये है कि यह यज्ञ उस पीठ की ओर से हो रहा है जिसे देश में रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का मूल आचार्यपीठ का गौरव हासिल है। यज्ञ के संकल्पक स्वयं वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज हैं, जो रामावत संप्रदाय के जगदगुरु हैं। यज्ञ को ऐतिहासिक स्वरुप देने के लिए महाराज श्री ने 11 जून को बक्सर का दौरा किया और वहां यज्ञ तैयारी समिति से जुड़े स्थानीय लोगों के साथ बैठक की। ईटीवी से बातचीत के दौरान महाराज श्री ने यज्ञ के स्वरुप और तैयारियों के बाबत जो जानकारी दी ,उसे उन्हीं की भाषा में यहां आप सुन सकते हैं।

Tuesday, June 11, 2013

बक्सर में श्रीमठ की ओर से विराट श्रीराम महायज्ञ दिसम्बर में

महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि बक्सर में एक विराट श्रीराम महायज्ञ करने का संकल्प जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने लिया। आगामी सात दिसम्बर से 15 दिसम्बर,2013 तक चलने वाले यज्ञ में देश भर से शीर्ष संत-महात्मा, श्रीमहंत, भजन गायक और सुख्यात लीला मंडली के कलाकार भाग लेंगे। कई शताब्दी बाद धर्मनगरी बक्सर में इस तरह का भव्य यज्ञ देखने और उसमें भाग लेने का सुअवसर सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त होगा। इस यज्ञ का नाम शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ होगा। इसमें सौ हवन कुंड बनेंगे जिसमें एक करोड़ आहुतियां डाली जाएंगी। सबसे बड़ी बात ये है कि यह यज्ञ उस पीठ की ओर से हो रहा है जिसे देश में रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का मूल आचार्यपीठ का गौरव हासिल है। यज्ञ के संकल्पक स्वयं वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज हैं, जो रामावत संप्रदाय के जगदगुरु हैं। यज्ञ को ऐतिहासिक स्वरुप देने के लिए महाराज श्री ने 11 जून को बक्सर का दौरा किया और वहां यज्ञ तैयारी समिति से जुड़े स्थानीय लोगों के साथ बैठक की। ईटीवी से बातचीत के दौरान महाराज श्री ने यज्ञ के स्वरुप और तैयारियों के बाबत जो जानकारी दी ,उसे उन्हीं की भाषा में यहां आप सुन सकते हैं।

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज का अयोध्या प्रवास


रामभक्ति परंपरा के मूल पीठ, श्रीमठ,काशी के वर्तमान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज ने पिछले दिनों अयोध्याजी जाकर भगवान श्रीरामलला का दर्शन किया था,.उसी मौके का वीडियो क्लिप यहां प्रस्तुत है।

प्रेस क्लब इंदौर में महाराजश्री का संबोधन

Swami Ramnareshacharya ji Maharaj in Indore Press Club.

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य ने किया अयोध्या में श्रीरामलला का दर्शन

रामभक्ति परंपरा के मूलपीठ,श्रीमठ,काशी के जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने पिछले दिनों अयोध्या में भगवान श्रीरामलला का दर्शन किया था। उसी का वीडियो क्लिप
 जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का इंदौर प्रेस क्लब में संबोधन

Sunday, June 9, 2013

मंगलगीतम्

मंगलगीतम—-जय जय देव हरे
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श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे।।
दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे।। श्रित ..।।
कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे।। श्रित ..।।
मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे।। श्रित .. ।।
अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे।। श्रित .. ।।
जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे।। श्रित ..।।
अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे।। श्रित ..।।
तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव हरे। श्रित.. ।।
श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम्।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे।। श्रित .. ।।
(श्री जयदेव रचित आरती जो जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी को अत्यंत प्रिय है। विशेष पूजा के अवसर पर वे इसी आरती को बड़ी भक्ति भाव से गाते हैं।)

उज्जैन में गुजराती सेन समाज के समारोह में स्वामी रामनरेशाचार्य




पिछले 3 जून को महाकाल की नगरी उज्जैन में गुजराती सेन समाज के समारोह में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज शामिल हुए। उनके कर कमलों द्वारा 8 एकड़ भूमि पर एक करोड़ की लागत से बनने वाले विधालय, छात्रावास और वृद्धाश्रम का शिलान्यास हुआ.। उसी समारोह का वीडियो यहां उपलब्ध है.

बिहार के आठ दिवसीय प्रवास पर आरा पहुंचे स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य

बिहार की आठ दिवसीय धर्म यात्रा पर आरा पहुंचे जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा है कि देश में ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनना चाहिए जिसमें पूरे देश को एक साथ लेकर चलने की क्षमता हो। आरा में ईटीवी के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी से आरएसएस औऱ उसके दूसरे संगठन के लोग खुश नहीं है, इसीलिए उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में विलंब हो रहा है।
आरा प्रवास के दौरान महाराजश्री आज यानि 9 जून 2013 को भोजपुर जिले के शाहपुर और बिहियां के कई गांवों का दौरा किया। सबसे पहले वे गंगा तट पर बसे बहोरनपुर गांव में गये और भक्तों को आशीर्वाद दिया। फिर गौरा और बारा आदि गांवों में भी महाराजश्री के प्रवचन हुए। अगले दो दिनों तक स्वामी जी बक्सर जिले के कई गांवों में प्रवास करेंगे। दरअसल बक्सर में आगामी दिसम्बर माह में श्रीमठ की ओर से प्रस्तावित कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां भी शुरू हो गयी हैं। महाराज श्री अपने प्रवास के क्रम में श्रीराम महायज्ञ को लेकर भी भक्तों को निमंत्रित कर रहे हैं।

Monday, June 3, 2013

उज्जैन में गुजराती सेन समाज के छात्रावास-वृद्धाश्रम का भूमिपूजन सम्पन्न



Swami Ramnareshacharya in Ujjain

महाकाल की नगरी उज्जैन में 3 जून,2013 सोमवार को सुबह 10 बजे गढ़कालिका मंदिर के पास गुजराती-सेन समाज की भूमि पर छात्रावास एवं वृद्धाश्रम का भूमिपूजन किया गया। श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य और सेनाचार्य स्वामी अचलानंद जी महाराज की उपस्थिति में भूमि पूजन की रस्म विधि-विधान से पूर्ण हुई।
Swami Ramnareshacharya ,kashi
स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज ने खुद फावड़ा चलाकर निर्माण कार्य का श्रीगणेश किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पहले सेन समाज को महाकाल का आशीर्वाद मिला करता था अब उन्हें रहने के लिए आवास, बच्चों के लिए छात्रावास और बुढ़ापे में विश्राम के लिए मकान भी मिल रहा है। इससे समाज के लोगों का गौरव बढ़ेगा।

Swami Ramnareshacharya and Kailash Vijayvargia
स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज ने खुद फावड़ा चलाकर निर्माण कार्य का श्रीगणेश किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पहले सेन समाज को महाकाल का आशीर्वाद मिला करता था अब उन्हें रहने के लिए आवास, बच्चों के लिए छात्रावास और बुढ़ापे में विश्राम के लिए मकान भी मिल रहा है। इससे समाज के लोगों का गौरव बढ़ेगा।


Swami Ramnareshacharya and Kailash Vijayvargia
मप्र गुजराती-सेन समाज के अध्यक्ष नंदकिशोर वर्मा, ट्रस्ट अध्यक्ष अशोक राठौर व भरत भाटी ने बताया कि कार्यक्रम को जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज, काशी, सेनाचार्य स्वामी अचलानंदाचार्य महाराज, जोधपुर,मध्यप्रदेश के  उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, थावरचंद गेहलोत, खाद्य मंत्री पारस जैन, सांसद प्रेमचंद गुड्डू, डॉ. सत्यनारायण जटिया, विधायक सुदर्शन गुप्ता आदि ने संबोधित किया।करीब आठ एकड़ जमीन में एक करोड़ रुपये की लागत से हॉस्टल और वृद्धाश्रम बनेगा और 2016 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ से पहले इसका निर्माण पूरा हो जाने का दावा ट्रस्ट से जुड़े लोग कर रहे हैं।


Swami Ramnareshacharya ji Maharaj,Srimath,Kashi