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Wednesday, November 9, 2016

कार्तिक पूर्णिमा स्नान और काशी की देवदीपावली


DevDeepawali at Panchganga ghat, Kashi
* स्वामी पद्मनाभम
कार्तिक पूर्णिमा को कार्तिकी भी कहते हैं। कार्तिकी को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्यने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। इस दिन अगर भरणी या कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 
इस बार यानि साल 2016 में यह कार्तिक पूर्णिमा १४ नवम्बर, सोमवार को संध्या ४:२७ बजे तक भरणी नक्षत्र, तदोपरान्त कृतिका नक्षत्र एवं विशाखाका सूर्य है। कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र का योग होनेसे यह (महाकार्तिकी) अतिशय पुण्यदायी हो गयी है। यथा- " आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित्। महती सा तिथिर्ज्ञेया स्नानदानेषु चोत्तमा "-॥यमस्मृति॥
कहा जाता है कि इस योग में जो कार्तिकेयका दर्शन करता है वो सात जन्म तक धनाढ्य और वेद-पारग ब्राह्मण होता है। यथा-
"कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः कुर्यात् स्वामिदर्शन्म्। सप्त जन्म भवेद् विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः" ॥ काशीखंड॥

साथ ही साथ यह द्रष्टव्य है कि सूर्य विशाखा नक्षत्र पर (६ नवम्बर प्रातः ०७:३२ बजे से) हैं अतः पद्मक योग की भी सृष्टि हो रही है, जो पुष्कर तीर्थ में दुर्लभ माना गया है। यथा-
"विशाखासु यदा भानुः कित्तिकासु च चन्द्रमाः। स योगः पद्मको नाम पुष्करे त्वतिदुर्लभे"॥ पद्मपुराण॥

देव दीपावली की पौराणिक पृष्ठभूमि-
देवदीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से परिपूर्ण है। एक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने सभी को उत्पीडि़त करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध देवताओं की प्रार्थना पर किया, जिसके उल्लास में देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली। भार्गवार्चन दीपिकामें लिखा है-
कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः।
दृष्ट्वा प्रदीपं न च जन्मभागिनो भवन्ति नित्यं श्वपचा हि विप्राः॥

पौर्णमास्यां तु सन्ध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुरोत्सवः। दद्यात् पूर्वोक्त मन्त्रेण सुदीपांश्च सुरालये॥भविष्य.॥
 यह भी मान्यता है कि इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा (इन ६ कृत्तिकाओं) के पूजन से शिवजी की प्रसन्नता प्राप्त होती है और गंगा-स्नान से पूरे वर्ष गंगा-स्नानका लाभ मिलता है। फलतः काशी के घाटों पर ३३ कोटि देवताओं द्वारा भगवान् विष्णु का आराधन किया जाता है और फिर देव दीपावली मनायी जाती है।
एक अन्य कथानक के अनुसार राजर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को स्वर्ग पहुंचा दिया। देवतागण इससे उद्विग्न हो गए और त्रिशंकु को देवताओं ने स्वर्ग से भगा दिया। शापग्रस्त त्रिशंकु अधर में लटके रहे। स्वर्ग से निष्कासित त्रिशंकु को देखकर क्षुब्ध विश्वामित्र ने पृथ्वी-स्वर्ग आदि से मुक्त एक नई समूची सृष्टि की ही अपने तपोबल से रचना प्रारंभ कर दी यथा- कुश, मिट्टी, ऊँट, बकरी-भेड़, नारियल, कोहड़ा, सिंघाड़ा आदि। इसी क्रम में विश्वामित्र ने वर्तमान ब्रह्मा-विष्णु-महेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अभिमंत्रित कर उनमें प्राण फूंकना आरंभ किया। सारी सृष्टि हिल उठी। हर ओर हाहाकार मच गया। हाहाकार के बीच देवताओं ने राजर्षि विश्वामित्र की अभ्यर्थना की ,जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने नई सृष्टि की रचना का अपना संकल्प वापस ले लिया। देवताओं और ऋषि-मुनियों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल सभी जगह इस अवसर पर दीपावली मनाई गई। यही अवसर अब देवदीपावली के रूप में विख्यात है।
इसी तिथिमें सायंकाल विष्णुक्का मत्स्यावतार हुआ है:-
"वरान् दत्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः।
तस्यां दत्तंहुतं जप्तं तदक्षय्यफलं स्मृतम् "॥प.पु. कार्तिक माहात्म्य॥

शरद् ऋतु को भगवान की महारासलीला का काल माना गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार शरद् पूर्णिमा की चाँदनी में श्रीकृष्ण का महारास संपन्न हुआ था। उसी का द्योतक यह आकाशदीप माना जाता है। दीपक पवित्रता और शुचिताका साक्षी माना गया है और इसी कारण से प्रत्येक पूजा कर्ममें प्रथमतः कर्म दीपक जलाया जाता है। अतः आकाशदीपदान निम्नलिखित मन्त्रोंसे करते हैं-
 दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च। नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम्॥

 भगवान् विष्णु, वामनावतारके पश्चात्, बलिके पाससे लौटकर अपने निवासस्थान वैकुण्ठको पधारे थे अतः देवताओंने प्रसन्नताके दीपक जलाये। उसी की स्मृतिमें आकाशदीपदान कर देवदीपावली मनायी जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाली दीपदान की परंपरा आकाशदीपों के माध्यम से काशी में अनूठे सांस्कृतिक वातावरण का द्योतक है। गंगा के किनारे घाटों पर और मंदिरों, भवनों की छतों पर आकाश की ओर उठती दीपों की लौ यानी आकाशदीप के माध्यम से देवाराधन और पितरों की अभ्यर्थना तथा मुक्ति-कामना की यह बनारसी पद्धति है।
शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीप-महोत्सव पहले केवल पंचगंगा (गंगा, सरस्‍वती, धुपापापा, यमुना और किरना के संगम)  की शोभा थी। आगे चलकर काशी के सभी घाटों की नयनाभिराम छवि का यह पावन अवसर बन गया।
परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम-देव दीपावली- धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई होलकर के प्रयत्नों से भी जुड़ा है। उन्होंने ही प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत 'हजारा दीपस्तंभ’  स्थापित किया था, जो इस परंपरा का साक्षी है। अब जो देवदीपावली प्रचलन में है, उसकी शुरुआत दो दशक पूर्व यहीं से हुई थी। पंचगंगा का यह 'हजारा दीपस्तंभ' देव दीपावली के दिन 1001 से अधिक दीपों की लौ से जगमगा उठता है और अभूतपूर्व दृश्य की सृष्टि करता है।

 इस विस्मयकारी दृश्य की संकल्पना की पृष्ठभूमि में पूर्व काशी नरेश स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह की प्रेरणा उल्लेखनीय थी। बाद में श्रीमठ पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने इस संकल्प को भव्य आयाम प्रदान किया।
हरिहरक्षेत्र का मेला-
कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है एक मेला जो बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर छपरा, जिले के सोनपुर में गंडक और गंगा के संगम तट लगता है। सोनपुर मेले को  विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहरनाथ की पूजा सोनपुर में होती थी, लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।


Friday, January 24, 2014

गुरु चरणों में चढ़ाये श्रद्धा के सुमन

आदि जगदगुरु रामानंदाचार्य की 715वीं जयंती पर 23 जनवरी,2013 को अनुयायियों ने पूजन अनुष्ठान किया। गीत संगीत गूंजे, नृत्य से भावांजलि दी और शोभायात्र भी निकाली। काशी स्थित रामानंद सम्प्रदाय की मूल आचार्य पीठ- श्रीमठ में पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने सुबह चरण पादुका पूजन किया। षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की गई। सम्पूर्ण वैदिक कर्मकांडों का संपादन पं. त्रिलोकीनाथ जेतली कराया। चारों वेदों की ऋचाओं का पारायण भी किया गया। शाम को गौरव मिश्र ने बधाई के गीत गाए। डा. ममता टंडन, रवि शंकर मिश्र व गौरव सौरव मिश्र ने कथक से गुरु वंदना के भाव सजाए। शिव व यशोदा पर आधारित नृत्य किया। तबला पर भोलानाथ मिश्र, हारमोनियम पर गौरव मिश्र, सितार पर ध्रुवनाथ मिश्र, सहनृत्य में सूफी व मांडवी ने साथ दिया। संयोजन विधान बाबा ने किया। दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन अर्थात 24 जनवरी को विशाल संत-सम्मेलन का आयोजन किया गया है। साथ ही वरिष्ठ पत्रकार आनंद मिश्र को समारोह में जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार भी दिया जाएगा।

Friday, December 27, 2013

आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है- स्वामी रामनरेशाचार्य

डा. राधिका नागरथ महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए
हरिद्वार 21 सितंबर। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने कहा कि आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है। देश के सामने आज धर्म, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में चारों ओर संकट ही संकट दिखार्इ दे रहा है। हर क्षेत्र में गिरावट आर्इ है। पूरे देश में आज नैतिकता और चरित्र का पतन होता दिखाई दे रहा है।
वे कनखल में हरिगंगा सभागार में हरिद्वार के नागरिकों की ओर से जनअधिकार अभियान और गाँधी जागृति मिशन द्वारा आयोजित नागरिक अभिनन्दन समारोह में बोल रहे थे। यह अभिनन्दन समारोह स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज के चातुर्मास के समापन के अवसर पर आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि रामानंदा सम्प्रदाय ने सामाजिक जनजागरण के लिए सराहनीय कार्य किया। रामानंदाचार्य जी की वजह से समाज में फैली सामाजिक विषमताओं को दूर किया गया। उन्होंने कहा कि भक्त रैदास से बड़ा कोर्इ भक्त नहीं था। मीराबाई समेत क बड़े विद्वानों और संतों ने रैदास महाराज से दीक्षा ली। जो भारत की सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार प्राध्यापक डा. कमलकांत बुधकर ने कहा कि महाराज श्री ने चातुर्मास के माध्यम से वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा तीर्थनगरी हरिद्वार को ऊर्जावान बनाने का कार्य किया है। उन्होंने रामानंद सम्प्रदाय को सनातन धर्म की उच्च मर्यादाओं को साबित करते हुए जाति- पाति का भेद मिटाकर समाज को एक सूत्र में बांधने कार्य किया है।
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक सुधीर कुमार गुप्ता ने कहा कि महाराज श्री के हरिद्वार आगमन से ऐसा लग रहा है कि मानों शिव की नगरी में राम और शिव का मिलन हो रहा है। गुप्ता ने कहा कि राम शिव में और शिव राम में रमन करते है। कार्यक्रम की आयोजिका डा. राधिका नागरथ ने महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए कहा कि जिस तरह माँ गंगा अपने पावन जल से हमें शीतलता प्रदान करती है वैसे ही महाराज श्री के उपदेश हमें हमेशा शीतलता प्रदान करते रहेंगे। कार्यक्रम के संचालक पुरूषोतम शर्मा गांधीवादी ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय के निष्काम सिद्धि का मार्ग ही नहीं बलिक दरिद्रनारायण की सेवा के लिए लोक संग्रह का मार्ग भी तय करता है। उन्होंने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य वेदान्त एवं सनातन धर्म का आदर्श स्थापित कर रहे हैं। जनअधिकार अभियान के प्रदेश अध्यक्ष सुनील दत्त पांडेय ने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य ने चातुर्मास के दौरान बौद्धिक गोष्ठियां करवाकर देश की ज्वलन्त समस्याओं को समाज के सामने रखा और उनके निराकरण का रास्ता भी बताया। प्रेस क्लब के अध्यक्ष संजय आर्य ने कहा कि चातुर्मास संतों के लिए आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है। आज संत समाज में चातुर्मास की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। परन्तु स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने इस परम्परा को पुनस्र्थापित करने का एक सराहनीय कार्य किया है। कथावाचक पंडित जयप्रकाश कौशिक ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने देश की एकता और अखण्डता के लिए अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर डा. श्यामसुन्दर दास शास्त्री ने रामानंद सम्प्रदाय को सामाजिक एकता का प्रतीक बताया। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविधालय के कुलपति डा. महावीर अग्रवाल ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने जाति बंधनों को तोड़कर समाज को न दिशा दी। इस अवसर पर हरिद्वार नगर निगम के मेयर मनोज गर्ग, रामकुमार एडवोकेट, भगवत शरण अग्रवाल, इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन हरिद्वार के अध्यक्ष प्रभात कुमार, महामंत्री विनीत धीमान, प्रेस क्लब के महामंत्री रामचंद्र कन्नौजिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुदित अग्रवाल, सचिव विकास चौहान, दीपक नोटियाल, महावीर नेगी, शैलेन्द्र सिंह, ललितेंद्र नाथ, मनोज रावत, अम्बरीश कुमार, नीरज छाछर, अमित कुमार, महन्त महेन्द्र सिंह, महन्त शिवशंकर गिरि, महन्त भगवानदास, महन्त रघुवीरदास, भरत शर्मा, कोमल शर्मा आदि ने रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज का स्मृति चिन्ह भेंट कर और माला पहनाकर स्वागत किया। निर्मल संस्कृत महाविधालय के छात्रों ने स्वसितवाचन कर महाराज श्री का स्वागत किया।
(साभार एक्सप्रेस इंडियन)

Thursday, December 5, 2013

श्रीराम महायज्ञ का आमंत्रण पत्र

ऐतिहासिक और पौराणिक शहर बक्सर में सात दिसंबर से 15 दिसंबर,2013 तक होने जा रहे शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ के लिए प्रकाशित आमंत्रण पत्र आपकी सेवा में समर्पित है.

Sriram Yagya invitation card




Sriram Yagya Program

Wednesday, December 4, 2013

पापों के प्रायश्चित को आध्यात्म की शरण में बंदी





क्सर के चरित्रवन में आयोजित शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ स्थल पर ओपेन जेल के बंदी पापों के प्रायश्चित को श्रम दान में लगे हैं। आयोजन समिति के निर्देश पर वे कार्य कर रहे हैं। इनका कार्य पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। यज्ञ स्थल पर कार्य करने से बंदियों को आत्मिक शांति प्राप्त हो रही है। इस अाध्यात्मिक कार्य से जुड़कर वे अपने को स्वच्छ समाज के नागरिक के रुप में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। बंदियों की मानें तो सरकार के पहल से उन्हे मुक्त कारागार में रहने की आजादी मिली है। इसी से वे कैद में होते हुए भी सामाजिक परिवेश में अपने में हुए बदलाव को सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं । इस संबंध में अनिल सिंह एवं नारायण सिंह ने बताया कि बाहर कार्य करने के दौरान संतो का प्रवचन सुनने को मिला इससे हमारी बुद्धि में बदलाव हुआ है। यज्ञकार्य में श्रम करने में हमें काफी आनंद आ रहा है। इससे पहले किसी के चढ़ाने-बढ़ाने व जाने-अनजाने में जो अपराध हमलोगों ने किया है। वह माफी के काबिल नहीं था। हमलोग समाज व कानून दोनों के अपराधी थे। इस यज्ञ से हमें समाज के मुख्य धारा में जुड़ने का मौका मिला है। सभी हमें अपराधी के नजर से देख रहे थे। जिससे समाज हमें स्वीकार नही कर पा रहा था। ऐसे में आयोजक व सरकार के हमलोग अभारी है। श्रमदान करने वालों में ओम प्रकाश पासवान, मनोज पासवान, बिहारी महतो, महानंद यादव, गजलवा हलवाई, मुकुंददेव राउत व बड़ों बिल्दार आदि शामिल थे- सौजन्य- दैनिक जागरण,दिनांक- 5-12-2013

Wednesday, July 31, 2013

हरिद्वार में स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव आरंभ

पतित पावनी गंगा के तट पर देवभूमि हरिद्वार में इस वर्ष श्रीमठ, काशी के वर्तमान आचार्य एवम् जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का  'दिव्य चातुर्मास महोत्सव' श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। भूपतवाला स्थित निर्माणाधीन अद्वितीय श्रीराम मंदिर परिसर चातुर्मास महोत्सव की विविध प्रवृत्तियों का समायोजन किया जा रहा है। नित्य कार्यक्रमों के साथ ही सावन मास की प्रत्येक सोमवारी को भगवान भोलेनाथ का महाभिषेक पूर्ण-विधि विधान से संपन्न हो रहा है। जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे आत्मशुद्धि का पर्व बताया।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास में संत-महात्माओं को आत्मचिंतन का अवसर प्राप्त होता है। इसमें हमें सनातन धर्म की रक्षा को लेकर चिंतन करने के साथ व्यक्तिगत खामियों को दूर करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि संत का उद्देश्य सनातन धर्म एवं मानव कल्याण को गति देना है।
वैसे गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर ही देश भर से आए भक्तों की उपस्थिति में गुरु पूजन के साथ महोत्सव का आरंभ हो गया। 

Friday, June 14, 2013

अयोध्या में जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज की प्रेसवार्ता

श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज तीन दिवसीय श्रीराम रामानंद भावाभिसिक्त यात्रा के क्रम में वर्ष 2008 के मार्च महीने में अयोध्याजी पहुंचे थे। रामलला के दर्शन, सरयू जी  का पूजन और स्नान, विभिन्न संत-श्रीमहंतों द्वारा अभिनंदन और आश्रमों में पधरावणियों के बीच ही उन्होंने सम-समायिक राजनीतिक परिस्थियों और धार्मिक ज्वलंत विषयों पर अपनी बेबाक राय रखी। उसी का एक वीडियो क्लिप आप सबके लिए यहां पेश है।

Wednesday, June 12, 2013

बक्सर में श्रीमठ करेगा शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ

महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि बक्सर में एक विराट श्रीराम महायज्ञ करने का संकल्प जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने लिया। आगामी सात दिसम्बर से 15 दिसम्बर,2013 तक चलने वाले यज्ञ में देश भर से शीर्ष संत-महात्मा, श्रीमहंत, भजन गायक और सुख्यात लीला मंडली के कलाकार भाग लेंगे। कई शताब्दी बाद धर्मनगरी बक्सर में इस तरह का भव्य यज्ञ देखने और उसमें भाग लेने का सुअवसर सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त होगा। इस यज्ञ का नाम शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ होगा। इसमें सौ हवन कुंड बनेंगे जिसमें एक करोड़ आहुतियां डाली जाएंगी। सबसे बड़ी बात ये है कि यह यज्ञ उस पीठ की ओर से हो रहा है जिसे देश में रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का मूल आचार्यपीठ का गौरव हासिल है। यज्ञ के संकल्पक स्वयं वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज हैं, जो रामावत संप्रदाय के जगदगुरु हैं। यज्ञ को ऐतिहासिक स्वरुप देने के लिए महाराज श्री ने 11 जून को बक्सर का दौरा किया और वहां यज्ञ तैयारी समिति से जुड़े स्थानीय लोगों के साथ बैठक की। ईटीवी से बातचीत के दौरान महाराज श्री ने यज्ञ के स्वरुप और तैयारियों के बाबत जो जानकारी दी ,उसे उन्हीं की भाषा में यहां आप सुन सकते हैं।

Tuesday, June 11, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य ने किया अयोध्या में श्रीरामलला का दर्शन

रामभक्ति परंपरा के मूलपीठ,श्रीमठ,काशी के जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने पिछले दिनों अयोध्या में भगवान श्रीरामलला का दर्शन किया था। उसी का वीडियो क्लिप
 जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का इंदौर प्रेस क्लब में संबोधन

Sunday, June 9, 2013

उज्जैन में गुजराती सेन समाज के समारोह में स्वामी रामनरेशाचार्य




पिछले 3 जून को महाकाल की नगरी उज्जैन में गुजराती सेन समाज के समारोह में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज शामिल हुए। उनके कर कमलों द्वारा 8 एकड़ भूमि पर एक करोड़ की लागत से बनने वाले विधालय, छात्रावास और वृद्धाश्रम का शिलान्यास हुआ.। उसी समारोह का वीडियो यहां उपलब्ध है.

Friday, February 22, 2013

महाकुंभ में मना स्वामी रामनरेशाचार्य का जन्मदिन

प्रयाग महाकुंभ के दौरान यूं तो विविध प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान समायोजित हुए ,लेकिन श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन समारोह अपने आप में अनूठा और यादगार बन गया। जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन वसंत पंचमी (यानि 15 फरवरी ) के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरित

प्रयाग महाकुंभ के दौरान वसंत पंचमी के दिन (15 फरवरी,2013 को) दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर ,जो जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकटय स्थली के नाम से विख्यात है,में विशेष सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। इस मौके पर वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2013 का ये पुरस्कार हिन्दी,संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य के उदभट विद्वान और काशी निवासी प्रोफेसर प्रभुनाथ द्विवेदी को सौंपा गया। इस मौके पर राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा सहित बड़ी संख्या में संत,श्रीमहंत,विद्नान और श्रद्धालु मौजूद थे।
  जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन भी वसंत पंचमी के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

Wednesday, February 6, 2013

Guru Vandana in Bhojpuri

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
चरण पखरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आसन लगइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
भोगवा बनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
पनियां छनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आरती उतरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से।

Sunday, October 7, 2012

प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

जगदगु़रु महाराज की प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

भारत में रामभक्ति की अविरल धारा के जनक आचार्यश्री रामानंद जी के प्राकट्य धाम हरित माधव मंदिर, प्रयाग, इलाहाबाद में २ सितम्बर संध्या के समय अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका का लोकार्पण हुआ। रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ, वाराणसी के पीठाधीश्वर रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और देश के प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी ने के इस पुस्तिका का विमोचन किया। इस पावन अवसर पर दिल्ली से आए प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय भी मंच पर विराजमान थे।
श्रीमठ से अनेक
ग्रंथों का प्रकाशन हुआ है, किन्तु यह पुस्तिका या ग्रंथ इस मामले में एक शुरुआत है कि इसमें रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के प्रवचन संकलित हैं। प्रवचन समकालीन समस्याओं पर केन्द्रित हैं, इसमें रामभक्ति से लेकर हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण की वैज्ञानिक खोज पर भी विस्तृत चर्चा है। इस प्रवचन ग्रंथ से यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्म क्या है? आज की समस्याओं का समाधान क्या है? दु:ख क्यों होता है? सुख कैसे होगा? कन्या भ्रूण हत्या से लेकर आतंकवाद और प्रतिशोध जैसे विषय पर भी इसमें प्रवचन संकलित हैं। 
पुस्तिका विमोचन अवसर पर प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास, ज्ञानेश उपाध्याय, रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी। 

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा,‘तुलसीदास जी ने कहा है, निरंतर सुनिए, निरंतर गाइए और निरंतर स्मरण कीजिए, मैं भी निरंतर बोल रहा हूं, निरंतर सुन रहा हूं, निरंतर स्मरण कर रहा हूं, किन्तु लिखने या लिखवाने का अवसर नहीं आया। लिखने का काम अब ज्ञानेश जी ने किया है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं पुस्तिका को पढ़ रहा था, मेरे मन में बार-बार प्रश्न आ रहा था, क्या यह मैंने ही कहा था या ज्ञानेश जी को ही ज्ञान हो गया और उन्होंने लिख दिया। अब विश्वास नहीं होता, ये मेरे ही शब्द हैं। किन्तु ध्यान दीजिए, गीता बस एक बार श्री कृष्ण के मुख से निकली थी। ऐसा नहीं है कि जब कहा जाए, कृष्ण गीता सुनाने लगें, एक विशेष अवसर व प्रयोजन था, जब गीता अवतरित हुई।’
डॉ. जटाशंकर जी ने कहा, ‘धर्म प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि धार्मिक आचरण, दूसरों की सेवा, दया, करुणा से व्यक्ति के दु:ख कम होते हैं।’ उन्होंने पुस्तिका में प्रवचन में उल्लिखित महर्षि वेदव्यास जी के श्लोक - को विशेष रूप से याद किया। इस श्लोक में महर्षि वेदव्यास कह रहे हैं कि मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूं, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है, अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते? जटाशंकर जी ने कहा, ‘आज वास्तव में धर्म की पुकार को सुनने की आवश्यकता है। शास्त्र हमें समाधान बता सकते हैं, हमारे दु:ख दूर करने के उपाय बता सकते हैं।’
श्री बलदेवानंद सागर जी ने पुस्तिका के शीर्षक की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘बुरे आचरण के कारण ही दु:ख होता है। यह पुस्तिका एक पावन व प्रशंसनीय प्रयास है, पुस्तिका के माध्यम से रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के विचार मुद्रित अवस्था में लोगों तक पहुंचेंगे, जिससे समाज और देश का भला होगा।’ प्रस्तुत पुस्तिका में स्वामी रामनरेशाचार्य जी का परिचय लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय जी ने कहा, ‘रामानंद संप्रदाय अकेला ऐसा संप्रदाय है, जिसमें सभी जाति और धर्म के लोगों के लिए जगह है। यह देश के लिए एक अत्यंत उपयोगी संप्रदाय है। यह देश को एक सूत्र में पिरोने का काम कर सकता है।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह एक ऐसे सच्चे, सहज और प्रखर संत हैं, जिनसे देश को बहुत आशाएं हैं। देश में ऐसे संत बहुत कम हैं, जो वास्तव में देश और समाज के भले के लिए सोच रहे हैं।’
जयपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार व पुस्तिका के संयोजक व संपादन सेवक ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा, ‘आज के अत्यंत दुष्कर समय में महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी के रूप में एक सूर्य उगा हुआ है, हमें अपने-अपने दरवाजे-झरोखे खोल लेने चाहिए और उनके प्रवचन प्रकाश को अपने भीतर उतरने देना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यह पुस्तिका एक बड़े अभाव की छोटी पूर्ति है। यह एक सिलसिले की शुरुआत है, जो राम जी और जगदगुरु के आशीर्वाद से आगे निरंतर रहेगा।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी को समकालीन समाज और पत्रकारों के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए और लोकार्पण स्थल के निकट ही बह रही गंगा जी की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘जैसे गंगा मैया की तुलना केवल गंगा मैया से हो सकती है, जैसे सागर की तुलना केवल सागर से हो सकती है, जैसे राम जी की तुलना केवल राम जी से हो सकती है, ठीक उसी प्रकार महाराज जी (स्वामी रामनरेशाचार्य जी) की तुलना केवल महाराज जी से ही हो सकती है।’
दु:ख क्यों होता है? - पुस्तिका के निर्माण में पग-पग पर सहयोगी रहे संस्कृत के जयपुरवासी रामभक्त विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास ने लोकार्पण कार्यक्रम का अत्यंत कुशल व व्यापक बहुमुखी संचालन करके इस अवसर को ऐतिहासिक और पावन बना दिया। उन्होंने पुस्तिका के मुद्रक प्रिंट ओ लैंड के स्वामी श्री सत्यनारायण अग्रवाल की भी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह प्रयास था कि पुस्तिका ज्यादा मोटी या कीमती न हो, ऐसी हो कि सहजता से जन-जन तक पहुंचे और रामभक्ति का प्रसार हो।’ उन्होंने कहा, ‘रामभक्ति समाधान की संभावनाओं का अनंत आकाश है, जिसके माध्यम से हमारे सारे दु:ख दूर हो सकते हैं। यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है कि महाराज जी के आशीर्वाद से इंटरनेट पर आज एक ऐसा ब्लॉग है, जिसके माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के श्रीमुख से निकले पावन मार्गदर्शक शब्द पूरे संसार में प्रचार-प्रसार पा रहे हैं। रामभक्ति की यह यात्रा सतत रहनी चाहिए।’
वाराणसी सेआए विद्वान एवं श्रीमठ के प्रकाशन का दायित्व संभालने वाले डॉ. उदय प्रताप सिंह ने लोकार्पण के अवसर पर उपस्थित विद्वजनों, संतों और श्रद्धालुओं का आभार जताते हुए कहा, ‘पुस्तिका के रूप में एक अच्छा प्रयास सामने आया है, महाराज के प्रवचन प्रकाशित हुए हैं, यह दायित्व मेरा था, लेकिन मीडिया में होने के कारण ज्ञानेश उपाध्याय मुझसे इस मामले में आगे निकल गए हैं। उनको मेरी तरफ से बधाई है।’
लोकार्पण के अवसर पर हरित माधव मंदिर में बड़ी संख्या में संत, विद्वजन, भक्त और सेवक उपस्थित थे, सभी ने रामभक्ति धारा और पुस्तिका का आनंद लिया। लोकार्पण के उपरांत भव्य भंडारे का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित जनों ने प्रसाद पाया। कार्यक्रम स्थल के निकट ही ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका के लिए एक स्टॉल लगाई गई थी, जिस पर रखी सभी पुस्तिकाएं देखते-देखते बिक गईं। करीब ७८ पृष्ठ और २५ रुपये कीमत वाली पुस्तिका में श्री रामबहादुर राय द्वारा लिखित महाराज जी के परिचय के उपरांत महाराज जी के १३ प्रवचन अंश हैं और सबसे अंत में रामानंद संप्रदाय की मूल गद्दी वाराणसी में गंगा किनारे पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ पर लिखा गया एक फीचर है, जिसमें श्रीमठ के कल और आज के बारे में जाना जा सकता है। पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर महाराज जी का चित्र और पिछले कवर पृष्ठ पर महाराज जी की प्रिय प्रार्थना महाकवि जयदेव रचित मंगलगीतम - श्रितकमलाकुचमण्डल. . . भी मुद्रित है।
जय श्री राम

Sunday, September 16, 2012

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी का चातुर्मास महोत्सव


जगदगुरु रामानन्दाचार्य पद पर प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज
के सान्निध्य में प्रयाग अर्थात इलाहाबाद में दिनांक ३ जुलाई २०१२ आषाढ़ पूर्णिमा से दिव्य चातुर्मास महोत्सव जारी है।इस दौरान कई तरह की मांगलिक प्रवृतियां समायोजित हो रही हैं। पूरे अनुष्ठान का विधिवत समापन ३० सितम्बर २०१२ को भाद्र पूर्णिमा के दिन होगा।
उल्लेखनीय है कि गंगा, यमुना के संगम की पावन धर्म नगरी प्रयाग आदि जगदगुरु रामानन्दाचार्य की जन्मस्थली है, अत: यहां जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के चातुर्मास का अति विशेष महत्व है। तीर्थराज प्रयाग के ठाकुर हरित माधव मंदिर, ४५/४२, मोरी दारागंज की पावन स्थली पर जिसे जगदगुरु रामानंदाचार्य जी की प्राकट्य स्थली के नाम से जाना जाता है,उसी पावन स्थान पर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज अपनी साधु-संत मंडली के साथ ९० दिनों तक विराजमान रहेंगे। इन नब्बे दिनों के दौरान अनेक धार्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से होंगे, तो कुछ विशेष व दुर्लभ धार्मिक आयोजन भी होंगे। हिन्दू संतों में चातुर्मास की परंपरा का एक तरह से लोप हो गया था, जिसे स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने एक तरह से पुनजीर्वित किया है, जिसे वे पूरे भक्ति, भाव निरंतर मनाते आ रहे हैं। इस दौरान वे संतों के साथ-साथ आम जनों को भी सहज उपलब्ध होते हैं, सुबह से देर रात तक भक्तों की शंकाओं का समाधान करते, उन्हें सच्ची रामभक्ति का मार्ग बताते जगदगुरु एक अदभुत, व्यापक व दुर्लभ छवि प्रस्तुत करते हैं। पिछले वर्ष आपने इन्दौर में चातुर्मास किया था और उसके पहले वर्ष सूरत में, वे भारत में घूम-घूमकर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रामभक्ति की अलख जगाते रहे हैं। उनके चातुर्मास में देश भर से विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान भी जुटते रहे हैं।इसी कड़ी में विद्वतजन गोष्ठी और धर्माचार्य सम्मेलन, दलित सम्मेलन सरीखे कार्यक्रम भी हुए। बीते 2 सितम्बर को पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय द्वारा लिखित और संपादित पुस्तक दुख क्यों होता है का लोकार्पण भी हुआ। लोकार्पण समारोह के दौरान देश के जाने-माने पत्रकार रामबहादुर राय और प्रसिद्ध समाचार वाचक डॉ. बलदेवानंद सागर की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। दिनांक 16 सितम्बर को प्रयाग के संगम तट पर महाराजश्री के सानिध्य में श्रीमठ परिवार की ओर से महाभंडारे का आयोजन किया गया। इस मौके पर भव्य आरती और पूजन भी हुआ। आचार्यश्री ने संगम तट पर तीर्थ पुरोहितों और नाविको को दान-दक्षिणा भी प्रदान किया। जगदगुरु को अपने बीच पाकर वे अपने को गौरवान्वित महसूस करते नजर आए.

Sunday, January 22, 2012

स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज जन्मदिन जयपुर में..

रामानंद संप्रदाय के प्रमुख व देश की शास्त्र परंपरा के शिखर मनीषी जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज,श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी का पावन जन्मदिन महोत्सव इस बार जयपुर में समायोजित है। वसंत पंचमी के पावन सुअवसर पर आप सादर आमंत्रित हैं।

Sunday, January 15, 2012

रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरण समारोह के चित्र





डॉ.विवेकी राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी। जगदगुरु रामानंदाचार्य जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह का श्रीगणेश शनिवार को धर्माचार्यों के सानिध्य में हुआ। प्रथम दिन पियरी स्थित श्रीमठ की शाखा श्रीविहारम परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में हिंदी और भोजपुरी की स्वनामधन्य साहित्यकार डा. विवेकी राय को रामानंदाचार्य सम्मान से विभूषित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गई।

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य एवं गोपाल मंदिर के षष्ठपीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज के सानिध्य में साहित्यसेवी डा. विवेकी राय को सम्मानित किया गया। स्वामी रामनरेशाचार्य ने उनका तिलक कर एक लाख की राशि का चेक प्रदान किया तो श्याममनोहर महाराज ने उन्हें प्रशस्तिपत्र प्रदान किया।

जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कार्य करने वाले नगर के 22 साहित्यसेवियों का भी समारोह में अभिनंदन किया गया। इनमें प्रो. बलराम पांडेय, डा. राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डा. जितेंद्रनाथ मिश्र, डा. रणजीत सिंह, डा. जगदीश त्रिपाठी, डा. जगदीश प्रसाद मिश्र, परमानंद आनंद, प्रो. अरविंद पांडेय, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डा. पवनकुमार शास्त्री, डा. बलबीर सिंह, डा. समुन जैन, डा. ऋचा सिंह, बृजेश पांडेय के अलावा इटैलियन युवती दानिएला बेवीलाकुवा शामिल हैं। समारोह में संतद्वय के आशीर्वचन से पूर्व प्रो. युगेश्वर, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. बंशीधर त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए।समारोह का संचालन डा. यूपी सिंह ने किया।


साहित्यकार होने का अहंकार है मुझे
वाराणसी। मैं गरीब साहित्यकार हूं। मेरे पास कार नहीं है लेकिन साहित्यकार होने का अहंकार जरूर है। किंतु आज इस सभा में उस अहंकार को भी गाजीपुर में ही छोड़ कर आया हूं। यह बातें सम्मान से अभिभूत डा. विवेकी राय ने शनिवार को श्रीविहारम में आयोजित समारोह में कहीं। उन्होंने पुराने संस्मरण भी सुनाए। बताया, मुझे याद आता है दिल्ली का वह समारोह जब श्रीरामनरेशाचार्य महाराज के सानिध्य मेें समारोह हो रहा था। उनके आदेश पर पहले मुझे रामनामी ओढ़ाई गई। कुछ देर बाद ही रामनामी की जगह एक कीमती शाल ओढ़ा दी गई। मुझे लगा, शायद अभी मैं वैराग्य के योग्य नहीं हुआ हूं। पूरी तरह संसारी हूं इसलिए रामनामी लेकर शाल दी गई है। अब आप फिर मुझे माया सौंप रहे हैं। कम से कम अब तो मुझे राम नाम का महामंत्र दे ही दीजिए।