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Wednesday, July 21, 2021

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव- 2021 जयपुर में

 

जयपुर में चातुर्मास महोत्सव गुरु पूर्णिमा से

डॉ. देवकुमार पुखराज

वाराणसी, 21 जुलाई।

रामभक्ति धारा को समर्पित रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दिव्य चातुर्मास महोत्सव इस वर्ष जयपुर में होना सुनिश्चित हुआ है। स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की साधना स्थली, काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ के वर्तमान आचार्य हैं, जिसे बैरागी वैष्णव संप्रदाय और सगुण एवम निर्गुण रामभक्ति परंपरा का मूल आचार्यपीठ माना जाता है। चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा यानि 24 जुलाई की पावन तिथि से होगा।

काशी के श्रीमठ पीठाधीश्वर प्रत्येक वर्ष नियम पूर्वक चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से देश के अलग-अलग स्थानों पर करते रहे हैं। सभी प्रमुख तीर्थों और महानगरों में स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास अनुष्ठान समायोजित हो चुके हैं। पिछले साल जबलपुर के जिलहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम में और उसके साल भर पहले यानि 2019 में माउंट आबू स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर प्रांगण में चातुर्मास व्रत का आयोजन हुआ था।

रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल, जयपुर के संयोजक गजानन अग्रवाल बताते हैं कि महाराजश्री जयपुर में तीसरी बार चातुर्मास करने जा रहे हैं। सन 2002 और 2009 में भी आचार्यश्री यहां चातुर्मास अनुष्ठान पूर्ण किये थे। यह तीसरा आयोजन है, जो सन 2021 में हो रहा है। 

जयपुर के बनीपार्क स्थित खण्डाका हाउस ( पीतल फैक्टरी के समीप) में चातुर्मास महापर्व का भव्य प्रारंभ गुरु पूर्णिमा की पावन तिथि से होगा। चातुर्मास्य महोत्सव के संयोजक नेमप्रकाश संतकुमार खण्डाका के मुताबिक सियारामजी की कृपा छाया और स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास महापर्व के दौरान प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान होगें। प्रातः काल महाराजश्री पोषडोपचार विधि से श्रीसीताराम जी का पूजन करते हैं। फिर देव-ऋर्षि पितृतर्पण का कार्य संपादित करते हैं। समष्टि हवन और फिर स्वाध्याय का क्रम नियमित रुप से चलता है। दोपहर में वैष्णवाराधन और विश्राम के पश्चात संध्या काल के कार्यक्रम होते हैं। जिसमें आगंतुक संत-महंत अपने प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं। फिर महाराजश्री का आशीर्वचन स्वरुप प्रवचन होता है।

जयपुर चातुर्मास समिति के प्रमुख स्तंभ पुष्कर उपाध्याय के मुताबिक स्वामीजी का जयपुर में 23 जुलाई 2021 को शुभागमन हो रहा है। 24 जुलाई, 2021 को प्रातः 9 बजे से सर्वावतारी श्रीरामलला जी के पूजन व पंचमहायज्ञ के उपरांत गुरुपूर्णिमा महोत्सव का शुभ कार्यक्रम प्रारंभ होगा। गुरुपूजन के पश्चात महाराजश्री के आशीर्वाद स्वरुप प्रसादी की भी व्यवस्था है।


 

डॉ. शास्त्री कोसलेन्द्र दास के अनुसार चातुर्मास काल में सावन की प्रत्येक सोमवारी को भगवान शिव का रुद्राभिषेक के अलावे गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, संत सम्मेलन, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंद महोत्सव, विनायक चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व और महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। चातुर्मास के दौरान बीच-बीच में राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और विराट भंडारे का आयोजन होते रहता है। पूरे दो महीने तक अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन से भी पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है।

श्रीमठ, काशी से जुड़े उपेन्द्र मिश्र ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा 24 जुलाई से लेकर भाद्र पूर्णिमा 20 सितम्बर, 2021 तक चलने वाले चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान देश भर से सद्गृहस्थ भक्त, संत-श्रीमहंत और महामंडलेश्वर पधारेंगे। कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की हर गाईडलाइंस खासकर साफ-सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष प्रबंध रखा जाएगा। खण्डाका हाउस की विशालता, भव्यता, समुचित संसाधन और आवास की पर्याप्त सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए ही इस स्थान का चयन चातुर्मास महोत्सव के लिए किया गया है। परिसर का वातावरण कोरोना को दूर रखने में सहायक होगा, ऐसा व्यवस्थापकों का मानना है।

 

महाराजश्री स्वयं भी इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों खासकर भंडारे और प्रवचनों के दौरान अनावश्यक भीडभाड़ न हो। उनकी ओर से विशाल परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग सहित कोरोना काल की जरुरी पाबंदियों का पालन अनिवार्य रुप से करने का निर्देश संतों- भक्तों को दिया गया है। ताकि चातुर्मास महापर्व का आध्यात्मिक स्वरूप हर स्थिति में बना रहे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। महामारी को देखते हुए ही इस बार संध्याकालीन प्रवचन का लाइव प्रसारण फेसबुक और यू-ट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर किये जाने का प्रबंध किया गया है, ताकि श्रद्धालु और भक्त दूर-दराज अपने-अपने घरों में बैठकर भी सत्संग और सभी महत्वपूर्ण उत्सवों का आनंद ले सकें।


Thursday, January 16, 2020

काशी के पंडित ढुण्ढ़िराज पाण्डेय पर्वत को मिला 2020 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार



Swami Ramnareshacharya

वाराणसी, 17 जनवरी। 
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य की 721वीं जन्म जयन्ती के पावन अवसर पर काशी के पंचगंगा घाट स्थित ऐतिहासिक रामानन्दाचार्य पीठ, श्रीमठ की ओर से बड़ी पियरी स्थित श्रीविहारम सभागार में गुरुवार को भव्य सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। समारोह में काशी के ख्यात विद्वान वेदमूर्ति पंडित ढुण्ढ़िराज पांडेय पर्वत को 2020 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। 


समारोह में अपना आशीर्वचन देते हुए श्रीमठ के वर्तमान पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि राम का पुरुषोत्तम स्वरूप ही ईश्वरत्व है। रामजी के ही अवतार रामानन्दाचार्य जी ने उनके उस लोकोत्तर स्वरूप शरणागत भाव रुपी रामभक्ति के जनपथ को लोकजीवन में स्थापित कर लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज ने रामानन्दाचार्य जयन्ती के अवसर पर संस्कृत एवं संस्कृति के क्षेत्र में श्रीमठ द्वारा प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रूपये की धनराशि वाले काशी के सबसे बड़े रामानन्दाचार्य पुरस्कार काशी के विद्वान वेदमूर्ति ढूंढ़िराज पाण्डेय पर्वतीय को प्रदान किया।

स्वामी जी ने कहा कि यह सम्मान नहीं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के आशीर्वाद का सम्प्रेषण है। हम तो केवल निमित्त रूप में प्रति वर्ष सनातन वैदिक धर्म, संस्कृति एवं साहित्य के साधकों को इसे समर्पित करते हैं।

स्वामी रामनरेशाचार्य ने इस अवसर पर प्रथम रामानन्दाचार्य पुरस्कार प्राप्तकर्ता स्व. प्रोफेसर भगवती प्रसाद सिंह के अप्राप्य ग्रंथ "रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय" का लोकार्पण भी किया। नये संस्करण का सम्पादन दिवंगत प्रोफेसर सिंह के शिष्य एवं भक्ति साहित्य के सुप्रतिष्ठित विद्वान डा. उदयप्रताप सिंह ने किया है। नये संस्करण का प्रकाशन आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली ने किया है। इस अवसर पर डा. उदय प्रताप सिंह का भी भक्ति साहित्य में उनके सर्जनात्मक योगदान के लिये सम्मान किया गया।

स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज का 721वां जन्म जयंती महोत्सव इस बार एक साथ ही काशी और प्रयागराज में मनाया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले जयंती महोत्सव के पहले दिन श्रीविहारम् में साहित्यिक गोष्ठी, पुरस्कार का वितरण और स्वामी जी के जीवन और कृतित्व पर चर्चा हुई। दूसरे दिन उनकी साधनाभूमि श्रीमठ में चरण पादूका पूजन, आचार्यजी की परंपरा से जुड़े संतों, श्रीमहंतों का सम्मान एवम् भंडारा तथा संध्या समय भजन गायन का कार्यक्रम है।

आदि जगदगुरु की प्राकट्य स्थली प्रयागराज के दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर परिसर में भी 18 जनवरी को विशिष्ठ कार्यक्रम का समायोजन स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में प्रस्तावित है। 


Sunday, July 15, 2018

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव इस साल तीर्थराज प्रयाग में

रामानंद संप्रदाय (वैष्णव वैरागी) के प्रधान आचार्य और श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज हर वर्ष की भांति चातुर्मास व्रत करने वाले हैं। इसके लिए इस बार उन्होंने तीर्थराज प्रयाग का चयन किया है।
 प्रयाग के संगम तट से महज एक किलोमीटर की दूरी पर गंगा किनारे जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकट्य भूमि पर दिव्य चातुर्मास के सारे मांगलिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।
 सुबह के पूजा-पाठ और दूसरे अनुष्ठान रामानंदाचार्य प्राकट्य परिसर स्थित हरित माधव मंदिर में होंगे। शाम के सत्संग और अन्यान्य कार्यक्रम परिसर के मंडप में संपन्न होंगे।  27 जुलाई, 2018 को  गुरु पूर्णिमा के दिन से महोत्सव की भव्य शुरुआत होगी।
स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज 
 देश भर के वैष्णव जन और महाराजश्री के भक्त वहां पहुंचेंगे और गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष अनुष्ठान में शामिल होंगे। चातुर्मास्य व्रत का महानुष्ठान  25 सितंबर, 2018 तक अनवरत जारी रहेगा।
 
रामानंदाचार्य चातुर्मास कार्ड
  इस दौरान कई विशाल सार्वजनिक भंडारे, संत सम्मेलन, हर सोमवार को विशेष रुद्राभिषेक, विशेष तिथि -त्योहारों पर खास उत्सव आयोजित होंगे। गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर विद्वत संगोष्ठी और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर विशेष उत्सवों की ऋंखला आयोजित है।




Sunday, January 7, 2018

प्रोफेसर सियाराम तिवारी को वर्ष 2018 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी के ऐतिहासिक रामानंदाचार्य पीठ, श्रीमठ द्वारा 7 जनवरी को रामानंदाचार्य जयन्ती के  त्रिदिवसीय महोत्सव के प्रथम दिन बड़ी पियरी स्थित श्रीविहारम में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य के सान्निध्य में आयोजित संत-विद्वत-भक्त समागम के बीच विश्वभारती विश्वविद्यालय (शांति निकेतन ) के पूर्व आचार्य प्रो. सियाराम तिवारी को भक्ति साहित्य सेवा में विशिष्ट योगदान के लिए एक लाख रुपये का ''रामानंदाचार्य पुरस्कार'' प्रदान किया गया।

प्रो. सियाराम तिवारी को एक लाख रु. का पुरस्कार प्रदान करते पूर्व विधायक अजय राय
अपने सम्बोधन में प्रो.तिवारी ने कहा कि राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा परमाणु मिसाइल दागने की धमकी के बीच मानव संस्कृति अपूर्व चुनौती के दौर में है। ऐसे कठिन युगसंक्रमण के बीच स्वामी रामानंदाचार्य जी द्वारा काशी से प्रवर्तित रामभक्ति परंपरा के शास्वत व उदात्त मानवीय मूल्य प्रासंगिक और मानवता को सही दिशा देने में समर्थ हैं।

     प्रो.तिवारी ने समारोह के साथ नियोजित "विश्वगुरूत्व और रामभक्ति परंपरा '' विषयक विद्वत संगोष्ठी के परिप्रेक्ष्य में विद्वतजनों के विचारों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रामानंद जी की रामभक्ति परंपरा को आगे की पीढ़ी में उत्कर्ष प्रदान करने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम के अनुकरणीय उदात्त चरित्र को लोकमानस में सहज स्वरूप में स्थापित कर समाज को प्रेम और मर्यादा भाव से जोड़ने का अतुलनीय योगदान दिया। तुलसी दास की कुछ आधुनिक विद्वान समूहों द्वारा आलोचनाओं का प्रामाणिक उत्तर भी प्रो.तिवारी द्वारा रचित एवं रामानंदाचार्य स्मारक न्यास द्वारा प्रकाशित ग्रंथ "सत्य कहौं लिखि कागर कोरे" ग्रंथ के माध्यम से मिला, जिसका लोकार्पण भी समारोह के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो.परशुराम पाल ने किया।
ग्रंथ लोकार्पण करते प्रो.परशुराम पाल


   समारोह में ज.गु.रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने कहा कि रामानंदाचार्य पुरस्कार साहित्य व संस्कृति सेवा में  विशिष्ट योगदान के समादर की परंपरा है। सम्मान के भाव का विशिष्ट महत्व सभी संस्कृतियों और सभ्यता को उत्कर्ष प्रदान करने में रहा है।

     उक्त अवसर पर श्रीमठ द्वारा उपस्थित विद्वानों का भी सम्मान किया गया। संगोष्ठी में विचार व्यक्त करने वाले  विद्वत जनों में  सर्वश्री प्रो.एम. एन.राय , प्रो.प्रभुनाथ द्विवेदी, डा.जितेंद्र नाथ मिश्र, डा.देवव्रत चौबे, प्रो.राधेश्याम दूबे व प्रो.सभापति मिश्र आदि प्रमुख रहे।
मंच पर विराजते जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज


        रामानंदाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रो.तिवारी का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सविधि प्रक्रिया से सम्मान एवं अभिनंदन की विभिन्न प्रवृत्तियों को संपादित करने वालों में शामिल थे श्री अजय राय, पूर्व विधायक,अरुण शर्मा,डा. उदय प्रताप सिंह,अमूल्य शर्मा, सत्येन्द्र पाण्डेय, महेन्द्र, ए.के.राय- एडवोकेट, पं.वल्लभ पाठक, प्रो.सतीश राय आदि के अलावा   राजस्थान एवं बिहार रामानंद युवा आध्यात्मिक मंडल के सदस्यगण।मंच संचालन चंदन कुमारी ने किया। श्रीमठ के युवा  वैदिकजन ने मंगलाचरण की प्रस्तुति की। आरंभ में आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के चित्र पर माल्यार्पण किया गया।



Sunday, October 9, 2016

प्रेरक कथा- जो जपता है राम का नाम, राम जपते हैं उसका नाम

रामनाम


प्रसिद्ध संत शिवानंद निरंतर राम का नाम जपते रहते थे। एक दिन वे जहाज पर यात्रा के दौरान रात में गहरी नींद में सो रहे थे। आधी रात को कुछ लोग उठने लगे और आपस में बात करने लगे कि ये राम नाम कौन जप रहा है। लोगों ने उस विराट, लेकिन शांतिमय आवाज की खोज की और खोजते-खोजते वे शिवानंद के पास पहुँच गए।

सभी को यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ की शिवानंद तो गहरी नींद में सो रहे है, लेकिन उनके भीतर से यह आवाज कैसे निकल रही है। उन्होंने शिवानंद को झकझोर कर उठाया तभी अचानक आवाज बंद हो गई। लोगों ने शिवानंद को कहा आपके भीतर से राम नाम की आवाज निकल रही थी इसका राज क्या है। उन्होंने कहा मैं भी उस आवाज को सुनता रहता हूँ। पहले तो जपना पड़ता था राम का नाम अब नहीं। बोलो श्रीराम।

‘राम’ यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है। हजारों संत औरमहात्माओं ने राम का नाम जपते-जपते मोक्ष को पा लिया है।ईश्वर-नाम की महिमा साक्षात ईश्वर से भी महान है। समर्थ रामदास स्वामी ने ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ इस त्रयोदशाक्षरी मंत्र के तेरह करोड़ जाप किए और उन्हें भगवान श्रीराम के साक्षात दर्शन हुए। ईश्वर-नाम की महिमा अपरंपार है ,इस कलयुगमें राम नाम ही सुख शांति का मार्ग है और राम नाम ही इस जीवन रूपी सागर से पार उतार सकता है। क्योंकि श्वास कब पूरे हो जाएं यह कोई नहीं जानता। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सच्चे मन से राम नाम का जाप करना चाहिए। प्राचीन काल में सबरी,गिद्धव अजामिलका राम नाम ने ही उद्धार किया था। राम नाम के संकीर्तन बिना जीवन रूपी भवसागर से पार नहीं उतरा जा सकता।

कहते हैं कि कलयुग में सब कुछ महँगा है, लेकिन राम का नाम ही सस्ता है। सस्ता ही नहीं सभी रोग और शोक की एक ही दवा है राम। वर्तमान में ध्यान, तप, साधना और अटूट भक्ति करने से भी श्रेष्ठ राम का नाम जपना है। भागमभाग जिंदगी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, धोखे पर धोखे, माया और मोह आदि सभी के बीच मानवता जब हताश और निराश होकर आत्महत्या करने लगती है तब सिर्फ राम नाम का सहारा ही उसे बचा सकता है।

कहते हैं जो जपता है राम का नाम राम जपते हैं उसका नाम।

Monday, September 5, 2016

अबलौं नसानी अब न नसैहौं' का पटना में लोकार्पण

पटना में चल रहे जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास्य महोत्सव के दौरान गत 2 सितंबर, 2016 को  'अबलौं नसानी अब न नसैहौं' नाम से प्रवचन पुस्तक का विमोचन संपन्न हुआ। चित्र में (दाएँ से) श्री ज्ञानेश उपाध्याय-राजस्थान पत्रिका, डॉ. संजय पासवान-पूर्व मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, श्रीप्रमोद मुकेश-संपादक,दैनिक भास्कर, पटना,  पूज्य महाराजश्री, पदमश्री रामबहादुर राय-अध्यक्ष-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, श्रीनरपतसिंह राजवी-विधायक एवं पूर्व मंत्री तथा शास्त्री डॉ. कोसलेन्द्र दास। 

महाराज श्री के प्रवचनों के इस संग्रह का संकलन और संपादन ज्ञानेश उपाध्याय ने किया है। ये उनकी चौथी पुस्तक है।

Thursday, January 8, 2015

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार


श्रीमठ,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार इस वर्ष देश के जाने-माने पत्रकार औऱ राजनीतिक विश्लेषक रामबहादुर राय को दिया जाएगा। स्वामी रामानंद जयंती के अवसर पर वाराणसी के नागरी नाटक मंडली सभागार में 12 जनवरी को संध्या समय राय साहब को एक लाख रुपये नकद, अंग वस्त्रम्, प्रशस्ति पत्र आदि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा। रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य और श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्य के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती वर्ष मनाया जा रहा है, इसी कड़ी में वर्षपर्यन्त आयोजित कार्यक्रमों का समापन समारोह 10 जनवरी से 14 जनवरी तक काशी में आयोजित है। राय साहब के अलावे चार अन्य विभूतियों को भी इस साल एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।
    इस वर्ष जिन पांच महान विभूतियों को रामानंदाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है उनमें काशी के वेदमूर्ति विनायक मंगलेश्वर, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष और आधुनिक पाणिनी कहे जाने वाले आचार्य रामयत्न शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पाक्षिक पत्रिका के संपादक रामबहादुर राय, मूर्धन्य साहित्यकार प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल (दिल्ली) और संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. उदय प्रताप सिंह शामिल हैं। सभी को एक-एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और अंग वस्त्रम् से सम्मानित किया जाएगा।
    श्रीमठ की ओर से हर साल हिन्दी और संस्कृत साहित्य के एक महामनीषी को एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाता है। इसी कड़ी को आगे बढा़ते हुए रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में एक साथ पांच मनीषियों को इस बार रामानंदाचार्य पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। समारोह में देश के जाने-माने विद्वान, राजनीतिज्ञ, संत-महात्मा और साहित्य-संस्कृति के मूर्धन्य लोग शामिल हो रहे हैं। पूरे कार्यक्रमों का समायोजन श्रीमठ महोत्सव न्यास, काशी ने किया है।
    काशी के पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ ऐतिहासिक मठ है जिसका गौरवशाली इतिहास रहा है। करीब सात सौ साल पहले इसी मठ को स्वामी रामानंद ने अपनी साधना स्थली बनाई थी। यही रहते हुए उन्होंने संत कबीरदास, रविदास , धन्ना जाठ और पीपा नरेश जैसे शिष्यों को दीक्षा दी थी। इस रुप में श्रीमठ को रामानंद संप्रदाय और रामभक्ति परंपरा का मूल आचार्यपीठ होने का गौरव हासिल है। यह एक साथ सगुण और निर्गुण रामभक्ति परंपरा का संवाहक केन्द्र रहा है।  मध्यकालिन भक्ति आंदोलन में स्वामी रामानंद का अतुलनीय योगदान रहा है। उन्होंने  'जाति-पांत पूछे ना कोई, हरि को भजे सो हरि का होई ' का नारा देकर उस समय समाज में व्याप्त जातीय विद्वेष और पाखंड के खिलाफ अलख जगाई थी।

Friday, January 24, 2014

गुरु चरणों में चढ़ाये श्रद्धा के सुमन

आदि जगदगुरु रामानंदाचार्य की 715वीं जयंती पर 23 जनवरी,2013 को अनुयायियों ने पूजन अनुष्ठान किया। गीत संगीत गूंजे, नृत्य से भावांजलि दी और शोभायात्र भी निकाली। काशी स्थित रामानंद सम्प्रदाय की मूल आचार्य पीठ- श्रीमठ में पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने सुबह चरण पादुका पूजन किया। षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की गई। सम्पूर्ण वैदिक कर्मकांडों का संपादन पं. त्रिलोकीनाथ जेतली कराया। चारों वेदों की ऋचाओं का पारायण भी किया गया। शाम को गौरव मिश्र ने बधाई के गीत गाए। डा. ममता टंडन, रवि शंकर मिश्र व गौरव सौरव मिश्र ने कथक से गुरु वंदना के भाव सजाए। शिव व यशोदा पर आधारित नृत्य किया। तबला पर भोलानाथ मिश्र, हारमोनियम पर गौरव मिश्र, सितार पर ध्रुवनाथ मिश्र, सहनृत्य में सूफी व मांडवी ने साथ दिया। संयोजन विधान बाबा ने किया। दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन अर्थात 24 जनवरी को विशाल संत-सम्मेलन का आयोजन किया गया है। साथ ही वरिष्ठ पत्रकार आनंद मिश्र को समारोह में जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार भी दिया जाएगा।

Tuesday, January 21, 2014

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''

             स्वामी रामानंदाचार्य की जयंती 23 जनवरी पर विशेष

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''
                                                                                                                     *डॉ.देवकुमार पुखराज
काशी (वाराणसी) के सुरम्य गंगा घाटों में पंच्चगंगा घाट का अपना एक विशिष्ट स्थान है, इसी घाट पर अवस्थित है श्रीमठ, जिसे मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के शीर्ष संत स्वामी रामानंद की तपः स्थली होने का गौरव प्राप्त है। उस रामानंद ने आज से सात सौ पंद्रह वर्ष पहले समाज-जीवन के विविध क्षेत्रों, विभिन्न मत-पंथ- संप्रदायों में व्याप्त वैमनस्यता और कटुता को दूर कर हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया। आचार्यपाद ने स्वतंत्र रूप से श्रीसंप्रदाय का प्रवर्तन किया। जिसे रामानंदी,रामावत अथवा वैरागी संप्रदाय भी कहते हैं।  उन्होंने बिखरते और नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला हैसर्वे प्रपत्तेधिकारिणो मताः
स्वामी श्रीरामानंद ने दलित, शोषित और उपेक्षित जातियों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर समाज में समरसता का अपू्र्व वातावरण निर्मित किया। आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने तारक राममंत्र का उपदेश पेड़ पर चढ़कर दिया था,ताकि  सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके। उन्होंने नारा दिया था-
"जाति-पाति पूछे न कोई , हरि को भजै सो हरि का होई "
ऐसा कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वर्ण के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया। चर्मकार जाति में जन्मे रैदास ( रविदास) और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं। युग प्रवर्त्तक स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति कही--सुनी जाती है, जिसके अनुसार-
"भक्ति द्रविड़ ऊपजी, लायो रामानंद,”  अर्थात भक्ति की धारा को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाने का श्रेय भी स्वामी रामानंद को ही जाता है।
उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेन नाई और पीपा नरेश जैसे जाति-पांति, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे, तो दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे। उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत, कालजयी महाकवि भी उत्पन्न हुए।
            स्वामी रामानंद को रामोपासना के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है। उन्होंने श्रीसंप्रदाय के विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपत्ति सिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का सूत्रपात किया। श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडक्षर( रां रामाय नमः) राममंत्र को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना। बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया। छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन किया। नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया। साथ-साथ सिद्धांतों के प्रचार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी। स्वामी रामानंद ने प्रस्थानत्रयी पर विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की। तत्व एवं आचारबोध की दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत के स्थान पर जन सामान्य के बीच प्रचलित हिन्दी अथवा अवधि भाषा को सर्वप्रथम अपनी रचना का माध्यम स्वामी रामानंद ने ही बनाया। इन कार्यों के चलते ही कई विद्वान उन्हें हिन्दी का पहला कवि भी कहते हैं।  
            ऐसे महान तपस्वी संत, परम विचारक, समन्वयी महात्मा का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्मतिथि को लेकर मतभेद होने के बावजूद रामानंद संप्रदाय में मान्यता है कि आद्य जगद्गुरू का प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित पुण्य सदन शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था। धार्मिक संस्कारों वाले पंडित शर्मा मे रामानंद को शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में गुरू राघवानंद के पास भेजा था। कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन कर प्रवीणता प्राप्त कर ली। गुरु राघवानंद और माता-पिता के दबाव के बावजूद उन्होंने गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने का संकल्प लिया। बाध्य होकर गुरुदेव ने स्वामी रामानंद को रामतारक मंत्र की दीक्षा प्रदान की। उन्होंने श्रीमठ की गुह्य साधनास्थली में प्रविष्ट हो राममंत्र का अनुष्ठान तथा अन्यान्य तांत्रिक साधनाओं का प्रयोग करते हुए घोर तपश्चर्या की। योगमार्ग की तमाम गुत्थियों को सुलझाते हुए अष्टांग योग की साधना पूर्ण की। दीर्घायुष्य प्राप्त करने के कारण जगद्गुरु राघवानंद ने अपने तेजस्वी और परमप्रिय शिष्य रामानंद को श्रीमठ की पावन पीठ पर अभिषिक्त कर दिया। अपने पहले संबोधन में ही जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने तथा परस्पर आत्मीयता एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार के बदौलत धर्म रक्षार्थ विराट संगठित शक्ति खड़ा करने का संकल्प व्यक्त किया। 
            श्रीसीताजी द्वारा पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत (राममय जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा रामभक्ति की पावन धारा को मध्यकाल में स्वामी श्रीरामानंदाचार्य ने अनुपम तीव्रता प्रदान की। उन्होंने क्रुर, विवेकशून्य, पूर्वाग्रही तथा असहिष्णु यवन शासकों के अत्याचारों का मुखर विरोध किया। शंखध्वनी कर अपनी यौगिक शक्ति से ऐसा माहौल बनाया कि तत्कालीन मुगल सम्राट तुगलक को कबीरदास के माध्यम से स्वामीजी के पास शरणागत होकर क्षमा याचना करनी पड़ी। उसे हिन्दुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध हटाने और जजियाकर को समाप्त करने का आदेश निर्गत करना पड़ा।
            मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ जैसी है उन्होंने अभूतपूर्व सामाजिक क्रांति का श्रीगणेश करके बड़ी जीवटता से समाज और संस्कृति की रक्षा की उन्हीं के चलते उत्तरभारत में तीर्थ क्षेत्रों की रक्षा और वहां सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना संभव हो सकी। उस युग की परिस्थितियों के अनुसार, वैरागी साधु समाज को अस्त्र-शस्र से सज्जित अनी के रूप में संगठित कर तीर्थ-व्रत की रक्षा के लिए, धर्म का सक्रिय मूर्तिमान स्वरूप खड़ा किया। तीर्थस्थानों से लेकर गांव-गांव में वैरागी साधुओं ने अखाड़े स्थापित किए। आज भी निर्वाणी, दिगम्बर और निर्मोही नामक तीन मूल अखाड़े और उसकी कई शाखाएं देश भर में सनातन धर्म की मूल पताका को लहरा रही हैं।  मूल्य ह्रास की इस विषम अवस्था में भी संपूर्ण संसार में रामानंद संप्रदाय के सर्वाधि मठ, मंदिर और संत-महात्मा हैंआज भी इस संप्रदाय के आश्रमों में संत-साधु और गृहस्थ की सेवा, रामगुणगान, अखंड श्रीरामना संकीर्तन व्यवस्थित हैं और सर्वत्र आध्यामिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं। इस संप्रदाय की व्यापकता का हिसाब इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वैष्णवों के बावन द्वारों में सर्वाधिक छत्तीस द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हैं। कुंभ मेले के दौरान रामानंदी साधुओं के विराट स्वरुप, इनकी उदारता और अन्नदान की परंपरा को कोई भी देख सकता है।
            युगप्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्यजी महाराज द्वारा प्रर्वतित मूल रामानंद संप्रदाय के अलावे इसकी शाखा, प्रशाखा और अवान्तर शाखाएं जैसे- रामस्नेही, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से सक्रिय हैं, जो इस संप्रदाय की मूलभावना की संवाहिका बनी हैं यह स्वामी रामानंद के ही व्यक्तित्व का प्रभाव था कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, शैव-वैष्णव विवाद, वर्ण-विद्वेष, मत-मतांतर का झगड़ा और परस्पर सामाजिक कटुता बहुत हद तक कम हो गई
             बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्य जी ने ही प्रारंभ किया था। इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था।
             काशी के परम पावन पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, आचार्यपाद द्वारा प्रवाहित श्रीराम प्रपत्ति की पावनधारा के मुख्यकेंद्र के रूप में प्रतिष्ठित होकर उसी ओजस्वी परंपरा का अनवरत प्रवर्तन कर रहा है। आज भी श्रीमठ आचार्यचरण की परिकल्पना के अनुरूप उनके द्वारा प्रज्ज्वलित दीप से जनमानस को आलोकित कर रहा है। यही वह दिव्यस्थल है, जहां विराजमान होकर स्वामीजी ने अपने परमप्रतापी शिष्यों के माध्यम से अपनी अनुग्रहशक्ति का उपयोग किया था रामानंदाचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्ध श्रीमठ, दुनिया भर में फैले श्रीराम भक्तों की श्रद्धा का अनुपम केन्द्र है और सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का एकमात्र मूल आचार्यपीठ अथवा दूसरे शब्दों में कहें को मुख्यालय है। श्रीमठ में अवस्थित रामानंदाचार्य जी की पावन चरणपादुका दुनियाभर में बिखरे रामानंदी संतों, तपस्वियों एवं अनुयायियों के बीच समादृत है।
             श्रीमठ के वर्तमान पीठासीन आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी भी स्वामी रामानंदाचार्च की प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं। इनका ज्ञान, वग्मिता और सबसे अच्छी नकी उदारता और संयोजन चेतना  को देखकर यह  कल्पना किया जा सकता है कि स्वामी रामानंद का व्यक्तित्व कैसा रहा होगा वर्तमान जगद्गुरू रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सत्प्रयासों का नतीजा है कि श्रीमठ से कभी अलग हो चुकी कबीरदासीय, रविदासीय, रामस्नेही, प्रभृति परंपराएं वैष्णवता के सूत्र में बंधकर श्रीमठ से एकरूपता स्थापित कर रही है कई परंपरावादी मठ -मंदिरों की इकाईयां श्रीमठ में विलीन हो रही हैं तीर्थराज प्रयाग के दारागंज स्थित आद्य जगद्गुरू रामनंदाचार्य का प्राकट्यधाम भी इनकी प्रेरणा से फिर भव्य स्वरूप में प्रकट हुआ है।

              स्वामी रामानंद के द्वारा दी गई देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया। भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को प्राप्त न हो सकी। महाराष्ट्र के नाथपंथियों ने ज्ञानदेव के पिता विट्ठल पंत के गुरू के रूप में उन्हें पूजा, अद्वैत मतावलंबियों ने ज्योतिर्मठ के ब्रह्मचारी के रूप में उन्हें अपनाया। बाबरीपंथ के संतों ने अपने संप्रदाय के प्रवर्तक मानकर उनकी वंदना की और कबीर के गुरू तो वे थे ही, इसलिये कबीरपंथियों में उनका आदर स्वाभाविक है स्वामी रामानंदाचार्य  के व्यक्तित्व की इस व्यापकता का रहस्य- उनकी उदार और समन्वयकारी विचारधारा में निहित है निश्चय हीं उनके विराट व्यक्तित्व एवं व्यापक महत्ता के अनुरूप कतिपय आर्षग्रंथ एवं संत-साहित्य में उल्लेखित उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है। अगस्त संहिताकार ने लिखा है कि - रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले। अर्थात स्वयं श्रीराम ही पृथ्वी पर रामानंद के रुप में अवतार लिये। ऐसे महान तपस्वी, साधक और मानवता के परम उन्नायक को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
 -इति-