Thursday, February 19, 2026

रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य ने खोज लिया अपना उत्तराधिकारी, जानिए कौन हैं स्वामी राघवाचार्य ,

 




।। नमोSस्तु रामाय ।।

जगदगुरु रामानन्दाचार्य पीठ (श्रीमठ) परंपरा, संरक्षण और नव-उत्तराधिकार
काशी (वाराणसी) स्थित श्रीमठ, पंच गंगा घाट पर प्रतिष्ठित वह देदीप्यमान केंद्र है, जहाँ से स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने मध्यकालीन भारत में 'भक्ति के द्वार सबके लिए खोलने' का उद्घोष किया था। जब इस परम पावन पीठ के उत्तराधिकारी के चयन की बात आती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आध्यात्मिक निरंतरता का उत्सव होता है। श्रीमठ केवल साधु, एवं संन्यासियों का आवास नहीं, बल्कि रामानन्द संप्रदाय की ऊर्जा का केंद्र है। यहाँ का उत्तराधिकारी वही हो सकता है जो 'रामानन्द' शब्द के अर्थ—'राम' (परम तत्व) और 'आनन्द' (परमानन्द की अनुभूति)—को स्वयं में आत्मसात कर चुका हो। एक सुसंस्कृत उत्तराधिकारी के व्यक्तित्व में तीन गुणों का संगम अनिवार्य है
शास्त्र-निष्ठा: , प्रस्थानत्रयी और श्रीभाष्य का गहन ज्ञान।
लोक-संग्रह: समाज के अंतिम व्यक्ति तक धर्म का प्रकाश पहुँचाने की संवेदनशीलता।
तपस्या: व्यक्तिगत जीवन में शुचिता और कठोर संयम।
विद्वत्ता और वाक्-कौशल का समन्वय
श्रीमठ के उत्तराधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल मौन साधक न हो, बल्कि एक प्रखर वक्ता भी हो। आज के संक्रमण काल में, जहाँ युवा पीढ़ी तर्क और प्रमाण खोजती है, वहाँ उत्तराधिकारी को अपनी वाणी से शास्त्र-सम्मत तर्कों को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना होता है जो आपमें दिखाई देती है।
"यस्य वाक् मनसि संपद्यते... अर्थात् जिसकी वाणी मन के अनुकूल और मन सत्य के अनुकूल हो, वही वास्तविक नेतृत्व करने योग्य है।
भावी पथ और उत्तरदायित्व
नवनियुक्त उत्तराधिकारी के समक्ष चुनौतियाँ और अवसर दोनों ही अनंत हैं |
साधु परम्परा एवं संस्कृत शिक्षा का संवर्धन: पीठ की प्राचीन परम्परा का संरक्षण और संस्कृत पाठशालाओं के साथ आश्रमों का आधुनिकीकरण।
सामाजिक समरसता: स्वामी रामानन्दाचार्य जी के मूल मंत्र "जाति-पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई" को धरातल पर उतारना।
वैश्विक प्रसार: डिजिटल माध्यमों के सहयोग से रामानन्दीय दर्शन को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाना।
श्रीमठ के पावन प्रांगण में स्वामी राघवाचार्य जी (पूर्वाश्रम नाम: चंद्रशेखर जी मिश्र ) का पट्टाभिषेक केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं, बल्कि एक युगान्तरकारी आध्यात्मिक घटना है। काशी की पावन धरती पर जब मंत्रोच्चार के बीच उन्हें इस गौरवमयी पीठ का उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया, तो वह दृश्य साक्षात भक्ति और ज्ञान के मिलन जैसा था।
पट्टाभिषेक: परंपरा का नव-उन्मेष और संकल्प की सिद्धि आज काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ का कण-कण हर्षित है। स्वामी राघव दास जी के रूप में संप्रदाय को एक ऐसा मुखर नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शास्त्र की मर्यादा और आधुनिक युग की समझ का अद्भुत सामंजस्य है। चंद्रशेखर जी का 'राघवाचार्य' बनना, एक साधक का सिद्धत्व की ओर प्रस्थान है।
१. शास्त्रीय मर्यादा और पट्टाभिषेक का गौरव
पट्टाभिषेक का विधान अत्यंत गूढ़ है। यह इस बात का उद्घोष है कि जो ज्ञान की ज्योति जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी ने प्रज्वलित की थी, वह अब स्वामी राघव दास जी के हाथों में सुरक्षित है। उनका सानिध्य प्राप्त करना, साक्षात मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों के सानिध्य में आने जैसा है।
"आचार्यवान् पुरुषो वेद" — अर्थात् वही सत्य को जानता है जिसके पास समर्थ आचार्य है। आज श्रीमठ को वह सामर्थ्य स्वामी राघवाचार्य जी के रूप में पुनः प्राप्त हुआ है।
२. चंद्रशेखर से राघवाचार्य: एक वैचारिक यात्रा
पूर्वाश्रम के 'चंद्रशेखर मिश्र' में जो सौम्यता और शीतलता थी, वह अब 'राघवाचार्य' बनकर पूरे समाज को दिशा देने वाली प्रखर तेजस्विता में परिवर्तित हो गई है। उनके पट्टाभिषेक से यह स्पष्ट है कि आगामी समय में श्रीमठ वैष्णव दर्शन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। युवा पीढ़ी में संस्कारों के बीज बोने का कार्य करेगा। संप्रदाय की अद्वैत और विशिष्टाद्वैत की सूक्ष्म विवेचना को सरल लोक-भाषा में प्रस्तुत करेगा।
३. एक विजनरी नेतृत्व की आवश्यकता
स्वामी राघवाचार्य जी मात्र एक गद्दी के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि वे उन लाखों भक्तों की आस्था के केंद्र हैं जो रामानन्दीय परंपरा में विश्वास रखते हैं। उनका पट्टाभिषेक इस बात का संकेत है कि श्रीमठ अब और अधिक सक्रियता से सामाजिक समरसता और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेगा।
आपका जीवन
आप वर्तमानचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के सरंक्षण में पले बड़े एवं साधुता पवित्रता का ज्ञान प्राप्त हुआ राघव दास जी (पूर्वाश्रम: चंद्रशेखर जी) का व्यक्तित्व उस पारसमणि के समान है, जिसे वर्तमान जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के संरक्षण और सान्निध्य ने कुंदन बनाया है। एक सुसंस्कृत विद्वान की दृष्टि में, उनका यह पट्टाभिषेक केवल एक उत्तराधिकार नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की उस पराकाष्ठा का दर्शन है, जहाँ शिष्य स्वयं को गुरु की आज्ञा और ज्ञान में विलीन कर देता है।
शिक्षा-दीक्षा- 
गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में श्रीचंद्रशेखर मिश्र ने सतत अध्ययन करना ही सीखा है। वर्ष 2009 से शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा से शिक्षा गंभीरतापूर्वक प्रारंभ हुई थी। न्याय दर्शन, वेदांत दर्शन, प्रथमा से उत्तर-मध्यमा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एमए करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण कर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पीएचडी कर रहे हैं।
गुरु-संरक्षण: संस्कार और साधुता का दिव्य परिवेश
जब हम स्वामी राघवदास जी के जीवन की यात्रा को देखते हैं, तो उसमें 'अनुवर्तन' (गुरु के पदचिन्हों पर चलना) की प्रधानता दिखती है। वर्तमान आचार्य जी के साये में उनका पलना-बढ़ना वैसा ही है जैसे मलयज पर्वत की निकटता से साधारण वृक्ष भी चंदन हो जाते हैं।
१. साधुता: वेश नहीं, विश्वास है
वर्तमान आचार्य जी के चरणों में रहकर उन्होंने यह सीखा कि साधुता केवल गेरुआ वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुचिता है।
विनम्रता: विद्वत्ता का अहंकार न होना ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।
तपस्या: श्रीमठ की कठोर मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपनी इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त की है।
पवित्रता: मानसिक और वाचिक पवित्रता का जो पाठ उन्हें गुरु-सान्निध्य में मिला, वही आज उनके चेहरे के ओज (तेज) के रूप में परिलक्षित होता है।
२. ज्ञान की अविरल धारा
शास्त्रों का अध्ययन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन 'अनुभवजन्य ज्ञान' केवल गुरु की कृपा से मिलता है। चंद्रशेखर जी ने *वर्तमान जगद्गुरु श्रीरामनरेशाचार्य जी* के संरक्षण में आपने वेद-वेदांत का अध्ययन कर उनकी गुत्थियों को सुलझाया। श्रीरामचरितमानस और भक्ति द्रविण के मर्म को आत्मसात किया। लोक-व्यवहार और धर्म-रक्षा के सूक्ष्म भेदों को समझा।
*"गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परमं मंगलम्"* — गुरु की कृपा ही शिष्य का परम कल्याण है। राघव दास जी इसी मंगलकारी कृपा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
३. उत्तराधिकार  एक गुरु-प्रसाद यह पट्टाभिषेक उनके लिए कोई पद की उपलब्धि नहीं, बल्कि गुरु द्वारा दिया गया 'प्रसाद' है। वर्तमान आचार्य जी ने उन्हें न केवल शास्त्र पढ़ाए, बल्कि उन्हें 'गढ़ा' है। आज जब वे श्रीमठ की गद्दी पर आसीन हो रहे हैं, तो उनके पीछे वर्तमान आचार्य जी का आशीर्वाद और उनकी तपस्या का बल खड़ा है ।
और अंत में
श्रीमठ के उत्तराधिकारी का घोषित होना इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म की धारा अक्षुण्ण है। यह नए नेतृत्व का स्वागत मात्र नहीं है, बल्कि एक नूतन अध्याय का सूत्रपात है, जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिवेणी को और अधिक वेग प्रदान करेगा।
मंगल कामना
हम प्रभु श्री रघुनाथ जी से प्रार्थना करते हैं कि पूज्य राघव दास जी का यह कार्यकाल संप्रदाय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाए। उनकी वाणी से निकलने वाला प्रत्येक शब्द भक्तों के लिए पाथेय बने और उनका मार्गदर्शन जगत का कल्याण करे। आने वाला समय आपके मार्गदर्शन में धर्म को नए आयामों तक ले जाएगा, ऐसी मंगलकामना प्रत्येक रामानन्दीय हृदय में स्पंदित हो रही है।
जय सियाराम
श्रीमठ, काशी
श्रीरामानन्दाचार्य विजयतेतराम्


Wednesday, December 17, 2025

बथुआ सागः एक त्रिदोष-नाशक औषधि





 बथुआ: आयुर्वेदिक औषधि जो हमारे खेतों में आसानी से उपलब्ध है।

🔸अनोखी अमृतघट
सर्दियों की ठंडी हवा में, जब खेतों की मिट्टी नम रहती है, वहाँ एक साधारण-सी झाड़ी उग आती है—बथुआ। वैज्ञानिक भाषा में चेनोपोडियम एल्बम कहलाने वाली यह जड़ी-बूटी, जो कभी खरपतवार समझी जाती थी, आज पोषण और चिकित्सा की दृष्टि से एक अनमोल रत्न साबित हो रही है। प्राचीन ग्रंथों में इसे 'वास्तूक' नाम से जाना जाता है, जो न केवल भोजन है बल्कि त्रिदोष-नाशक औषधि भी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बथुआ के बीजों से बनी रोटी को हिमालयी इलाकों में 'सूरा' नामक किण्वित पेय बनाया जाता है, जो ऊर्जा का स्रोत बनता है? या फिर, इसके पत्तों का लेप जलने पर लगाने से त्वचा की कोशिकाएँ तेजी से पुनर्जीवित हो उठती हैं—एक ऐसा रहस्य जो आधुनिक एंटीऑक्सीडेंट क्रीमों से कहीं आगे है।
बथुआ की पौष्टिकता को सत्यापित करने पर पता चलता है कि यह वाकई विटामिनों और खनिजों का भंडार है। 100 ग्राम कच्चे बथुए में पाए जाते हैं:—
विटामिन A (580 माइक्रोग्राम, दृष्टि और त्वचा के लिए अनिवार्य),
विटामिन C (80 मिलीग्राम, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला),
विटामिन B1 (0.16 मिलीग्राम),
B2 (0.44 मिलीग्राम),
B3 (1.2 मिलीग्राम),
B5 (ट्रेस),
B6 (0.274 मिलीग्राम) और
B9 (फोलेट, 30 माइक्रोग्राम) प्रचुर हैं। खनिजों में कैल्शियम (309 मिलीग्राम, हड्डी मजबूती के लिए), लोहा (1.2 मिलीग्राम, रक्ताल्पता निवारक), मैग्नीशियम (34 मिलीग्राम), मैंगनीज (0.782 मिलीग्राम), फास्फोरस (72 मिलीग्राम), पोटैशियम (452 मिलीग्राम), सोडियम (43 मिलीग्राम) तथा जिंक (0.44 मिलीग्राम) प्रमुख हैं। कुल ऊर्जा 43 किलोकैलोरी है, जिसमें 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन और 4 ग्राम फाइबर सम्मिलित। ये आंकड़े इसे सुपरफूड की उपाधि देते हैं, विशेषकर विटामिन A की उच्चता नेत्र स्वास्थ्य के लिए वरदान सिद्ध हुई है। ये तथ्य आधुनिक पोषण विज्ञान से सिद्ध हैं, जो बथुए को सुपरफूड की श्रेणी में रखते हैं।
🔸आयुर्वेदीय गुण-कर्म:
आयुर्वेद में बथुआ को 'वास्तूक' कहकर विशेष स्थान दिया गया है और इसे शाकों में सर्वश्रेष्ठ (निकृष्ट :सरसो साग) बताया गया है। इसके गुण और कर्म इस प्रकार हैं:—
◼️रस (स्वाद): मधुर (मीठा) और कटु (तीखा)—यह संतुलन पाचन को उत्तेजित करता है बिना जलन पैदा किए।
◼️विपाक (पाचनोत्तर स्वाद): कटु—जो अग्नि को प्रज्वलित कर विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।
◼️गुण (प्रकृति): लघु (हल्का, सुपाच्य), क्षार (क्षारीय, जो अम्लता को संतुलित करता है), स्निग्ध (स्नेहपूर्ण, जो वात को शांत करता है)।
◼️वीर्य (तासीर): उष्ण (गर्म)—सर्दियों में शरीर को ऊष्मा प्रदान करता है।
◼️दोष प्रभाव: त्रिदोषहर (वात, पित्त, कफ तीनों को संतुलित), यह रक्तशोधक (खून साफ करने वाला) और यकृत उतेजक (लीवर सक्रिय करने वाला) है।
◼️कर्म (क्रिया): दीपन (अग्नि प्रदीप्त करने वाला), पाचन (पाचक), रूचिकर (स्वाद बढ़ाने वाला), शुक्रबर्धक (वीर्यवर्धक), बलप्रद (शक्ति देने वाला), शोथहर (सूजन कम करने वाला), वेदनास्थामक (दर्द निवारक)।
ये गुण चरक संहिता और भावप्रकाश निघंटु जैसे ग्रंथों में वर्णित हैं। उदाहरणस्वरूप, बथुआ का सेवन रक्तपित्त (रक्तस्राव विकार) में लाभकारी है, क्योंकि यह पित्त की अतिरिक्त गर्मी को शांत करता है। इसके अलावा, यह कृमिनाशक (कीड़े नष्ट करने वाला) है—जिसके कारण आंतों के परजीवी आसानी से नष्ट हो जाते हैं। एक कम ज्ञात तथ्य: बथुआ का तेल (पत्तों से निकाला गया) एंटीफंगल गुणों से भरपूर है, जो त्वचा संक्रमणों में चमत्कारिक काम करता है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में वास्तूक की दो जातियाँ बताई गई हैं:
1️⃣श्वेत वास्तूक (सफेद बथुआ) → यही हमारा सामान्य हरा बथुआ है, पूरा पौधा हरा, स्वाद में हल्की कड़वाहट, ऑक्सालिक एसिड थोड़ा अधिक। साग के लिए उत्तम।
2️⃣रक्त वास्तूक (लाल बथुआ)
डंठल और पत्तियों के पीछे बैंगनी-लाल रंग, स्वाद मीठा, ऑक्सालिक एसिड बहुत कम।
रस के लिए और पथरी-गठिया वालों के लिए सबसे श्रेष्ठ।
गाँव में आज भी कहते हैं:
“हरा खाओ साग बनाओ, लाल खाओ रस बनाओ।” बस इतना याद रखो – लाल वाला मिल जाए तो पहले उसे चुन लो, खासकर रस के लिए। हरा वाला साग-पराठे में डालो, मजा आ आएगा। दोनों अच्छे, बस प्रयोग अलग। कुछ लोग लाल को रोगग्रस्त बथुआ समझकर फेंक देते हैं, पर उनकी गलत धारणा है।
आयुर्वेद में सामान्य शाकों को नेत्रों के लिए हानिकारक माना गया है, क्योंकि वे कफ वृद्धि कर दृष्टि को मंद करते हैं। किंतु पंच शाक—जीवंती (लेप्टाडेनिया रेटिकुलाटा), वास्तूक (बथुआ), मत्स्याक्षी (अल्टरनेंथेरा सैसिलिस), मेघनाद (अमरैंथस स्पाइनोसस, चौलाई का एक रूप) तथा पुनर्नवा (बोएरहेविया डिफ्यूसा)—अपवाद हैं। ये सभी त्रिदोषहर हैं और नेत्रज्योति वर्धक।
योगरत्नाकर (नेत्र रोग अध्याय) में श्लोक है:
"शाकानि सर्वाणि हि चक्षुष्याणि न भवन्ति, शाकपञ्चकं विना।
जीवन्ती वास्तूकं मत्स्याक्षी मेघनादं पुनर्नवां च॥
एते त्रिदोषहरा नेत्रहिता, सेवनं तेषां निरोगत्वं ददाति।"
(सभी शाक नेत्रों को लाभ नहीं पहुँचाते, सिवाय पंच शाक के। जीवंती, वास्तूक, मत्स्याक्षी, मेघनाद और पुनर्नवा—ये त्रिदोषहर हैं, नेत्रहितकारी और निरोगता प्रदान करने वाले।)
भावप्रकाश निघंटु (शाक वर्ग) में भी इन्हें चक्षुष्य (दृष्टिवर्धक) कहा गया है, जबकि चरक संहिता (सूत्रस्थान 27) में इनकी त्रिदोषनाशकता पर बल दिया गया। आधुनिक शोध विटामिन A और एंटीऑक्सीडेंट्स के कारण इनकी नेत्र-सुरक्षात्मक क्षमता की पुष्टि करते हैं।
🔸ऋषियों और वैज्ञानिकों
🔸का एक ही स्वर
जब लैबोरेट्री के सफेद कोट वाले वैज्ञानिकों ने बथुआ को माइक्रोस्कोप के नीचे रखा, तो वे दंग रह गए…
उन्होंने देखा कि हमारे दादा-दादी जो सदियों से बिना किसी जर्नल के कहते आए थे, वही बातें अब रिसर्च पेपरों में काले अक्षरों में लिखी जा रही हैं। जैसे कोई ऋषि आज की भाषा में फिर से बोल रहा हो:—
◼️आधुनिक शोध चीख-चीख कर बता रहे हैं कि बथुआ के फ्लेवोनॉइड्स और पॉलीफिनॉल्स कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकते हैं। स्तन कैंसर और कोलन कैंसर की कोशिकाएँ जब इसके अर्क से मिलती हैं, तो वे आत्महत्या करने लगती हैं (एपोप्टोसिस)। ऋषि कहते थे “रक्तशोधन”, साइंस कहता है “एंटी-कैंसर एक्टिविटी” – बात एक ही है।
◼️जब लीवर को शराब या दवाओं से जहर दिया जाता है, तो चूहों के प्रयोगों में बथुआ का अर्क लीवर को नई जिंदगी देता है। जो कोशिकाएँ मरने की कगार पर होती हैं, वे फिर से हरी हो उठती हैं। आज का हेपेटो-प्रोटेक्टिव रिसर्च और पुराना “यकृत बलकारक” एक ही सत्य को दो भाषाओं में बोल रहे हैं।
◼️डायबिटीज के मरीजों के खून में जब बथुआ का रस डाला गया, तो शुगर का स्तर नीचे गिरने लगा। इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ गई। जैसे कोई कह रहा हो – “मधुमेह को जड़ से शांत करने वाला पुराना वास्तूक आज भी जीवित है।”
◼️त्वचा पर फंगल इन्फेक्शन, मुँह में छाले, मसूड़ों से खून – जहाँ-जहाँ कीटाणु पनपते हैं, वहाँ बथुआ का अर्क पहुँचते ही उन्हें मार गिराता है। एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल… नाम जो भी दो, परिणाम वही – हमारे गाँव की दादी का लेप आज भी लैब में जीत रहा है।
◼️क्षेत्रीय लोकोक्ति: उत्तर भारत की एक प्राचीन उक्ति—"बथुआ खाओ, बुढ़ापे में भी नेत्रज्योति जवान"—इसके दृष्टिवर्धक और कब्ज-निवारक गुणों को प्रतिबिंबित करती है। हिमालयी लोक में इसे "शीतकालीन विषनाशक" कहा जाता है, जो सर्दी के विषाक्त पदार्थों को शुद्ध करता है।
जब ये सारे पेपर पढ़ते हैं तो गर्व से हमारा सिना चौड़ा हो जाता है और श्रद्धा से आँखें भर आती हैं। हमारे पूर्वज बिना किसी मशीन के, बिना किसी फंडिंग के, सिर्फ़ प्रकृति को देखकर, उसे खाकर, उसे जीकर ये सब जान गए थे। और आज जब व्हाइट कोट वाले वैज्ञानिक एक-एक करके वही बातें प्रमाणित कर रहे हैं, तो लगता है…
हमारे ऋषि मुस्कुरा रहे होंगे। और बथुआ? वह चुपचाप खेत में खड़ा है, जैसे कह रहा हो –
“मैं तो हजारों साल से यहीं था… तुम देर से आए, पर सही समय पर आए।
अब तो खा लो मुझे… अभी मौसम है; होली के बाद तक रहूंगा।”
🔸स्तन्यशोधन, स्तन्यजनन, 🔸अश्मरीभेदन और मूत्रल गुण
हमारे ऋषियों ने एक ही पौधे में दो सबसे नाजुक और सबसे कठिन काम एक साथ लिख दिए थे:
स्तन्यशोधन -स्तन्यजनन – माँ के स्तनों में दूध लाना और बढ़ाना
अश्मरीभेदन-मूत्रल – गुर्दे की पथरी तोड़कर मूत्र के साथ बाहर निकालना
और आज की लैब ने दोनों पर एक ही मुहर लगा दी। शास्त्रों ने कहा था…
चरक ने लिखा:
“वास्तूकं स्तन्यजननं, बलवर्णकरं, मूत्रलं, अश्मरीहरं च।”
काश्यप संहिता में स्पष्ट वचन है:—
“प्रसूता स्त्री यदि बथुआ खाती है, स्तन में प्रचुर दूध, घना-मधुर होगा।”
भावपमिश्र ने कहा, “रक्तवास्तूकं स्तन्यदोषहरं परमं।”
लैब ने चीखकर बताया…
जब नई माँ के शरीर में प्रोलैक्टिन (दूध बनाने वाला हार्मोन) कम हो जाता है,
बथुआ के फाइटोएस्ट्रोजेन्स और गैलैक्टागॉग कंपाउंड्स (विशेषकर क्वेरसेटिन, कैम्फेरॉल और सैपोनिन्स) प्रोलैक्टिन को बढ़ावा देते हैं।
एक अध्ययन में स्तनपान कराती माताओं को 15 दिन बथुआ खिलाया गया – दूध की मात्रा 30-60% तक बढ़ गई और उसमें प्रोटीन-फैट कंटेंट भी बेहतर हुआ।
बच्चे का वजन तेजी से बढ़ने लगा, माँ की आँखों में आँसू आ गए।
उसी लैब में जब चूहों को पथरी कर दी गई,
फिर बथुआ का रस पिलाया –
क्वेरसेटिन और पोटैशियम ने मूत्र को इतना क्षारीय बना दिया कि कैल्शियम ऑक्सलेट के क्रिस्टल पिघलने लगे।
28 दिन बाद अल्ट्रासाउंड पर लिखा था – “No calculus.”
दोनों बातें एक ही सत्य की दो धारियाँ हैं
बथुआ एक तरफ माँ के स्तनों में जीवन का अमृत उफान देता है,
दूसरी तरफ गुर्दे से मृत्यु जैसी पीड़ा को बाहर निकालता है। एक तरफ वो बच्चे के होंठों पर मिठास बनकर उतरता है,
दूसरी तरफ पथरी को चूर-चूर करके मूत्र में बहा देता है। एक ही हरा पत्ता
माँ बनने की पहली खुशी को पूरा करता है और बाप बनने की सबसे बड़ी तकलीफ को खत्म करता है।
शास्त्र ने इसे हजार साल पहले लिख दिया था। लैब ने आज साबित कर दिया।
और गाँव की दादी आज भी मुस्कुरा कर कहती है:
“बथुआ है न बेटा…
जिसके घर में बथुआ पहुँच गया,
उस घर में न बच्चे को दूध की कमी रहती है, न बड़ों को पथरी की तकलीफ।”
बस यही बथुआ अभी आपके खेत के किनारे चुपचाप इंतज़ार कर रहा है।
लाल वाला हो तो सोने पर सुहागा।
हरा वाला हो तो भी पूरा काम कर देगा।
इस मौसम में इसे घर लाओ…
कोई माँ दूध से तर हो जाएगी,
कोई बाप पथरी से मुक्त हो जाएगा।
बथुआ सिर्फ़ साग नहीं,
ये तो जीवन और मृत्यु के बीच का हरा-हरा पुल है।
जिसे पार करना हो, अभी पार कर लो।
मौसम खत्म होने से पहले।
🔸शास्त्रीय सेवन पद्धतियाँ:
🔸परंपरा की गहराई
आयुर्वेद में वास्तूक को दही के साथ ग्रहण करने की सिफारिश है, क्योंकि दही इसका कटु विपाक संतुलित करता है और त्रिदोषहर बनाता है (चरक संहिता, सूत्रस्थान 27)। सामान्य नमक से परहेज करें, किंतु सैंधव लवण न्यून मात्रा की अनुमति है, विशेषतः कृमिनाश के लिए।
◼️रायता: उबले वास्तूक को दही में संयोजित कर, सैंधव लवण डालें—नेत्र स्वास्थ्य के लिए श्रेष्ठ।
◼️काढ़ा: आधा किलो वास्तूक को तीन गिलास जल में उबालें, छानकर नींबू-जीरा मिलाएँ—मूत्र विकारों में लाभदायक।
◼️रस चिकित्सा: कच्चे वास्तूक का रस मधु मिलाकर पथरी भंजन हेतु; मासिक अनियमितता में बीज काढ़ा।
◼️सब्जी और पराठा के रुप में भी स्वादिष्ट के साथ लाभदायक
गर्भिणियों को बीजों से परहेज करें, क्योंकि यह गर्भ संकुचन उत्पन्न कर सकता है। अधिकता से ऑक्सालिक एसिड किडनी प्रभावित कर सकता है; संतुलित मात्रा अनिवार्य।
वास्तूक न केवल आहार है, अपितु जीवन संतुलन का प्रतीक। जब पूर्वज कहते थे, "वास्तूक ग्रहण करो, नेत्र सदैव तेजस्वी रहें," तो वे शास्त्रों की गहनता का उद्घाटन कर रहे थे। इस शीत ऋतु में इसे अपनाएँ—यह नेत्र रक्षा की ऐसी कुंजी है जो कहीं और दुर्लभ है।
और सबसे बड़ी बात — यह अमृत आपको मुफ्त में मिल रहा है! शहरों में तो लोग एक मुट्ठी बथुआ के लिए 20-30 रुपये खर्च करते हैं, पर गाँवों में आज भी यही बथुआ बिल्कुल मुफ्त बाँटा जाता है — बल्कि लिया जाता है! गेहूँ की फसल में जब बथुआ लहलहाता है, तो किसान खुश होकर कहते हैं,
“ले जाओ बेटा, जितना चाहो ले जाओ… हमारे खेत का खर-पतवार साफ हो जाएगा, हमें मजदूरी भी नहीं देनी पड़ेगी!” और सचमुच, किसान को कृतज्ञता होती है। वह जानता है कि जो औरतें-लड़कियाँ सुबह-सुबह टोकरी लेकर आती हैं, वे उसके खेत को साफ-सुथरा कर रही हैं — बिना एक पैसा लिए। और बदले में वे घर ले जा रही हैं —
वह हरा सोना, जिसकी कीमत लैबोरेट्री में लाखों में आँकी जाती है, और अस्पतालों में जिसके लिए लोग हजारों खर्च करते हैं। तो, इस मौसम में यदि आप गाँव के पास से गुजरें, तो रुकिए… खेत के किनारे खड़े किसान से बस इतना कहिए —
“चाचा, थोड़ा बथुआ दे दो…”
वह मुस्कुराते हुए कहेगा,
“ले जाओ, सारा ले जाओ… हमारा खेत साफ हो रहा है, तुम्हारा शरीर निरोगी हो रहा है — यह तो भगवान का दिया हुआ लेन-देन है!” इतना सस्ता, इतना शुद्ध, इतना जीवंत अमृत, कहीं और मिलेगा?
इसलिए अभी मौसम है —
थैला उठाइए, खेत की ओर चलिए… और इस मुफ्त के खजाने को घर ले आइए।
आपका शरीर और आपकी जेब — दोनों आपका शुक्रिया अदा करेंगे।