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Thursday, February 19, 2026

रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य ने खोज लिया अपना उत्तराधिकारी, जानिए कौन हैं स्वामी राघवाचार्य ,

 




।। नमोSस्तु रामाय ।।

जगदगुरु रामानन्दाचार्य पीठ (श्रीमठ) परंपरा, संरक्षण और नव-उत्तराधिकार
काशी (वाराणसी) स्थित श्रीमठ, पंच गंगा घाट पर प्रतिष्ठित वह देदीप्यमान केंद्र है, जहाँ से स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने मध्यकालीन भारत में 'भक्ति के द्वार सबके लिए खोलने' का उद्घोष किया था। जब इस परम पावन पीठ के उत्तराधिकारी के चयन की बात आती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आध्यात्मिक निरंतरता का उत्सव होता है। श्रीमठ केवल साधु, एवं संन्यासियों का आवास नहीं, बल्कि रामानन्द संप्रदाय की ऊर्जा का केंद्र है। यहाँ का उत्तराधिकारी वही हो सकता है जो 'रामानन्द' शब्द के अर्थ—'राम' (परम तत्व) और 'आनन्द' (परमानन्द की अनुभूति)—को स्वयं में आत्मसात कर चुका हो। एक सुसंस्कृत उत्तराधिकारी के व्यक्तित्व में तीन गुणों का संगम अनिवार्य है
शास्त्र-निष्ठा: , प्रस्थानत्रयी और श्रीभाष्य का गहन ज्ञान।
लोक-संग्रह: समाज के अंतिम व्यक्ति तक धर्म का प्रकाश पहुँचाने की संवेदनशीलता।
तपस्या: व्यक्तिगत जीवन में शुचिता और कठोर संयम।
विद्वत्ता और वाक्-कौशल का समन्वय
श्रीमठ के उत्तराधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल मौन साधक न हो, बल्कि एक प्रखर वक्ता भी हो। आज के संक्रमण काल में, जहाँ युवा पीढ़ी तर्क और प्रमाण खोजती है, वहाँ उत्तराधिकारी को अपनी वाणी से शास्त्र-सम्मत तर्कों को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना होता है जो आपमें दिखाई देती है।
"यस्य वाक् मनसि संपद्यते... अर्थात् जिसकी वाणी मन के अनुकूल और मन सत्य के अनुकूल हो, वही वास्तविक नेतृत्व करने योग्य है।
भावी पथ और उत्तरदायित्व
नवनियुक्त उत्तराधिकारी के समक्ष चुनौतियाँ और अवसर दोनों ही अनंत हैं |
साधु परम्परा एवं संस्कृत शिक्षा का संवर्धन: पीठ की प्राचीन परम्परा का संरक्षण और संस्कृत पाठशालाओं के साथ आश्रमों का आधुनिकीकरण।
सामाजिक समरसता: स्वामी रामानन्दाचार्य जी के मूल मंत्र "जाति-पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई" को धरातल पर उतारना।
वैश्विक प्रसार: डिजिटल माध्यमों के सहयोग से रामानन्दीय दर्शन को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाना।
श्रीमठ के पावन प्रांगण में स्वामी राघवाचार्य जी (पूर्वाश्रम नाम: चंद्रशेखर जी मिश्र ) का पट्टाभिषेक केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं, बल्कि एक युगान्तरकारी आध्यात्मिक घटना है। काशी की पावन धरती पर जब मंत्रोच्चार के बीच उन्हें इस गौरवमयी पीठ का उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया, तो वह दृश्य साक्षात भक्ति और ज्ञान के मिलन जैसा था।
पट्टाभिषेक: परंपरा का नव-उन्मेष और संकल्प की सिद्धि आज काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ का कण-कण हर्षित है। स्वामी राघव दास जी के रूप में संप्रदाय को एक ऐसा मुखर नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शास्त्र की मर्यादा और आधुनिक युग की समझ का अद्भुत सामंजस्य है। चंद्रशेखर जी का 'राघवाचार्य' बनना, एक साधक का सिद्धत्व की ओर प्रस्थान है।
१. शास्त्रीय मर्यादा और पट्टाभिषेक का गौरव
पट्टाभिषेक का विधान अत्यंत गूढ़ है। यह इस बात का उद्घोष है कि जो ज्ञान की ज्योति जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी ने प्रज्वलित की थी, वह अब स्वामी राघव दास जी के हाथों में सुरक्षित है। उनका सानिध्य प्राप्त करना, साक्षात मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों के सानिध्य में आने जैसा है।
"आचार्यवान् पुरुषो वेद" — अर्थात् वही सत्य को जानता है जिसके पास समर्थ आचार्य है। आज श्रीमठ को वह सामर्थ्य स्वामी राघवाचार्य जी के रूप में पुनः प्राप्त हुआ है।
२. चंद्रशेखर से राघवाचार्य: एक वैचारिक यात्रा
पूर्वाश्रम के 'चंद्रशेखर मिश्र' में जो सौम्यता और शीतलता थी, वह अब 'राघवाचार्य' बनकर पूरे समाज को दिशा देने वाली प्रखर तेजस्विता में परिवर्तित हो गई है। उनके पट्टाभिषेक से यह स्पष्ट है कि आगामी समय में श्रीमठ वैष्णव दर्शन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। युवा पीढ़ी में संस्कारों के बीज बोने का कार्य करेगा। संप्रदाय की अद्वैत और विशिष्टाद्वैत की सूक्ष्म विवेचना को सरल लोक-भाषा में प्रस्तुत करेगा।
३. एक विजनरी नेतृत्व की आवश्यकता
स्वामी राघवाचार्य जी मात्र एक गद्दी के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि वे उन लाखों भक्तों की आस्था के केंद्र हैं जो रामानन्दीय परंपरा में विश्वास रखते हैं। उनका पट्टाभिषेक इस बात का संकेत है कि श्रीमठ अब और अधिक सक्रियता से सामाजिक समरसता और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेगा।
आपका जीवन
आप वर्तमानचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के सरंक्षण में पले बड़े एवं साधुता पवित्रता का ज्ञान प्राप्त हुआ राघव दास जी (पूर्वाश्रम: चंद्रशेखर जी) का व्यक्तित्व उस पारसमणि के समान है, जिसे वर्तमान जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के संरक्षण और सान्निध्य ने कुंदन बनाया है। एक सुसंस्कृत विद्वान की दृष्टि में, उनका यह पट्टाभिषेक केवल एक उत्तराधिकार नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की उस पराकाष्ठा का दर्शन है, जहाँ शिष्य स्वयं को गुरु की आज्ञा और ज्ञान में विलीन कर देता है।
शिक्षा-दीक्षा- 
गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में श्रीचंद्रशेखर मिश्र ने सतत अध्ययन करना ही सीखा है। वर्ष 2009 से शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा से शिक्षा गंभीरतापूर्वक प्रारंभ हुई थी। न्याय दर्शन, वेदांत दर्शन, प्रथमा से उत्तर-मध्यमा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एमए करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण कर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पीएचडी कर रहे हैं।
गुरु-संरक्षण: संस्कार और साधुता का दिव्य परिवेश
जब हम स्वामी राघवदास जी के जीवन की यात्रा को देखते हैं, तो उसमें 'अनुवर्तन' (गुरु के पदचिन्हों पर चलना) की प्रधानता दिखती है। वर्तमान आचार्य जी के साये में उनका पलना-बढ़ना वैसा ही है जैसे मलयज पर्वत की निकटता से साधारण वृक्ष भी चंदन हो जाते हैं।
१. साधुता: वेश नहीं, विश्वास है
वर्तमान आचार्य जी के चरणों में रहकर उन्होंने यह सीखा कि साधुता केवल गेरुआ वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुचिता है।
विनम्रता: विद्वत्ता का अहंकार न होना ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।
तपस्या: श्रीमठ की कठोर मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपनी इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त की है।
पवित्रता: मानसिक और वाचिक पवित्रता का जो पाठ उन्हें गुरु-सान्निध्य में मिला, वही आज उनके चेहरे के ओज (तेज) के रूप में परिलक्षित होता है।
२. ज्ञान की अविरल धारा
शास्त्रों का अध्ययन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन 'अनुभवजन्य ज्ञान' केवल गुरु की कृपा से मिलता है। चंद्रशेखर जी ने *वर्तमान जगद्गुरु श्रीरामनरेशाचार्य जी* के संरक्षण में आपने वेद-वेदांत का अध्ययन कर उनकी गुत्थियों को सुलझाया। श्रीरामचरितमानस और भक्ति द्रविण के मर्म को आत्मसात किया। लोक-व्यवहार और धर्म-रक्षा के सूक्ष्म भेदों को समझा।
*"गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परमं मंगलम्"* — गुरु की कृपा ही शिष्य का परम कल्याण है। राघव दास जी इसी मंगलकारी कृपा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
३. उत्तराधिकार  एक गुरु-प्रसाद यह पट्टाभिषेक उनके लिए कोई पद की उपलब्धि नहीं, बल्कि गुरु द्वारा दिया गया 'प्रसाद' है। वर्तमान आचार्य जी ने उन्हें न केवल शास्त्र पढ़ाए, बल्कि उन्हें 'गढ़ा' है। आज जब वे श्रीमठ की गद्दी पर आसीन हो रहे हैं, तो उनके पीछे वर्तमान आचार्य जी का आशीर्वाद और उनकी तपस्या का बल खड़ा है ।
और अंत में
श्रीमठ के उत्तराधिकारी का घोषित होना इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म की धारा अक्षुण्ण है। यह नए नेतृत्व का स्वागत मात्र नहीं है, बल्कि एक नूतन अध्याय का सूत्रपात है, जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिवेणी को और अधिक वेग प्रदान करेगा।
मंगल कामना
हम प्रभु श्री रघुनाथ जी से प्रार्थना करते हैं कि पूज्य राघव दास जी का यह कार्यकाल संप्रदाय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाए। उनकी वाणी से निकलने वाला प्रत्येक शब्द भक्तों के लिए पाथेय बने और उनका मार्गदर्शन जगत का कल्याण करे। आने वाला समय आपके मार्गदर्शन में धर्म को नए आयामों तक ले जाएगा, ऐसी मंगलकामना प्रत्येक रामानन्दीय हृदय में स्पंदित हो रही है।
जय सियाराम
श्रीमठ, काशी
श्रीरामानन्दाचार्य विजयतेतराम्


Saturday, July 4, 2020

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास व्रत-2020 गुरुपूर्णिमा से जबलपुर में

रामभक्ति धारा को समर्पित रामानंद संप्रदाय के वर्तमान पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दिव्य चातुर्मास महोत्सव इस साल जबलपुर में मां नर्मदा के पावन तट पर होना सुनिश्चित हुआ है। स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की साधना स्थली श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य हैं, जिसे वैराणी वैष्णव संप्रदाय अपने आचार्य स्वामी रामानंद की पादुका पीठ के नाम से पूजता है। दो महीने तक चलने वाले चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा यानि 5 जुलाई की पावन तिथि से होगा। 
Swami Ramnareshacharya
 


  काशी के श्रीमठ पीठाधीश्वर प्रत्येक वर्ष नियम पूर्वक चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से देश के अलग-अलग स्थानों पर करते रहे हैं। सभी प्रमुख तीर्थों और महानगरों में स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास अनुष्ठान समायोजित हो चुके हैं। पिछले साल माउंट आबू स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर प्रांगण में चातुर्मास व्रत का आयोजन हुआ था। इस वर्ष महाराजश्री जबलपुर में चातुर्मास के लिए संकल्पित हुए हैं। जबलपुर में मां नर्मादा के किनारे जिलेहरी घाट पर अवस्थित प्रेमानंद आश्रम को अनुष्ठान भूमि के रुप में चयनित किया गया है। 

   प्रेमानंद आश्रम में पावन चातुर्मास महापर्व का भव्य प्रारंभ 5 जुलाई गुरु पूर्णिमा से होगा। सियारामजी की कृपा छाया और स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास महापर्व के दौरान प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान होेंगे। प्रातः काल महाराजश्री पोषडोपचार विधि से श्रीसीताराम जी का पूजन करते हैं। फिर देव-ऋर्षि पितृतर्पण का कार्य संपादित करते हैं। समष्टि हवन और फिर स्वाध्याय का क्रम नियमित रुप से चलता है। दोपहर में वैष्णवाराधन और विश्राम के पश्चात संध्या काल के कार्यक्रम होते हैं। जिसमें आगंतुक संत-महंत अपने प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं। फिर महाराजश्री का आशीर्वचन स्वरुप प्रवचन होता है। चातुर्मास काल में सावन की प्रत्येक सोमवारी को भगवान शिव का रुद्राभिषेक के अलावे गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, संत सम्मेलन, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंद महोत्सव, विनायक चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व और महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। इसके अलावे राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और विराट भंडारे का आयोजन में बीच-बीच में होते रहता है। पूरे दो महीने तक अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन से भी पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है।  


Swami Ramnareshacharya chaturmas


जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम के श्रीमहंत श्यामदास जी महाराज उर्फ नागा बाबा ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा 5 जुलाई से लेकर भाद्र पूर्णिमा 02 सितम्बर, 2020 तक चलने वाले चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान देश भर से भक्त,सद् गृहस्थ, संत- महंत और महामंडलेश्वर पधारेंगे। कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की हर गाइडलाइंस खासकर साफ-सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष प्रबंध रखा जाएगा। आश्रम की विशालता, भव्यता, समुचित संसाधन और आवास की पर्याप्त सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए ही इस स्थान का चयन चातुर्मास महोत्सव के लिए किया गया है। आश्रम की प्राकृतिक छटा और संपूर्ण वातावरण कोरोना को दूर रखने में सहायक होगा, ऐसा व्यवस्थापकों का मानना है। 

महाराजश्री स्वयं भी इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों खासकर भंडारे और प्रवचनों के दौरान अनावश्यक भीडभाड़ न हो। उनकी ओर से विशाल परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग सहित कोरोना काल की जरुरी पाबंदियों का पालन अनिवार्य रुप से करने का निर्देश संतों- भक्तों को दिया गया है। ताकि चातुर्मास महापर्व का आध्यात्मिक स्वरूप हर स्थिति में बना रहे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। 

जबलपुर में महाराजश्री तीसरी बार चातुर्मास कर रहे हैं। सन 1990 और 2001 में भी आचार्यश्री यहां चातुर्मास व्रत किये थे। यह तीसरा आयोजन है, जो सन 2020 में हो रहा है।  

Monday, December 2, 2013

बक्सर में परवान चढ़ी श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां

पौराणिक शहर बक्सर के चरित्रवन स्थित सोमेश्वर स्थान पर गंगा किनारे 7 दिसंबर से होने वाले शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां परवान पर है। इसके लिए वहां करीब सौ कारीगरों व स्वयं सेवकों के दल को तैनात किया गया है, जो दिन-रात निर्माण कार्य में जुटे हैं। इनके द्वारा काफी मेहनत-मशक्कत कर यज्ञशाला म् प्रवचन मंडप के अलावा अन्य कार्यो को अंतिम रूप दिया जा रहा है। यज्ञ स्थल पर रविवार को इसकी जानकारी देते हुए आयोजन समिति के अध्यक्ष आर के राय और सचिव राजवंश तिवारी ने बताया कि नौ दिवसीय श्रीराम महायज्ञ का शुभारंभ वाराणसी स्थित श्रीमठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशचार्य जी महराज के सान्निध्य में 7 दिसंबर को भव्य कलश यात्र के साथ होगा। जिसका समापन समष्टि भंडारे के साथ 15 दिसंबर को होगा। उन्होंने बताया कि सौ कुंडीय महर्षि विश्वामित्र नामक यज्ञशाला का निर्माण चौदह कट्ठा भूमि पर कराया जा रहा है। यज्ञ मंडप पांच मंजिला बना है। यज्ञशाला के समीप ही वशिष्ठ मुनि के नाम पर विशाल सभागार बनाया जा रहा है। जिसमें संत समागम के अलावा रासलीला, रामलीला म् अन्य विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस मौके पर समिति के प्रवक्ता राकेश कुमार राय ‘कल्लू’, योगेश राय, सोमेश्वरनाथ मंदिर के महंत संजय दास, सिद्धनाथ राय, प्रमोद पांडेय, जितेन्द्र गिरी, प्रचार प्रभारी डा.रमेश कुमार, मनोज पांडेय, जितेन्द्र पांडेय, नंदू पांडेय, अनिल पांडेय, हरेन्द्र यादव व विजय तिवारी आदि लोग मौजूद थे
बक्सर की ऐतिहासिक धरती पर होने वाला ये अपने तरह का पहला यज्ञ है जिसमें देश के जाने-माने संत-महात्मा और धर्माचार्य सम्मिलित होंगे। प्रभु श्रीरा्म की शिक्षाभूमि पर इस बार रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ की ओर से ये आयोजन हो रहा है, जिसे लेकर इलाके में भारी उत्साह है।

Friday, June 14, 2013

अयोध्या में जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज की प्रेसवार्ता

श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज तीन दिवसीय श्रीराम रामानंद भावाभिसिक्त यात्रा के क्रम में वर्ष 2008 के मार्च महीने में अयोध्याजी पहुंचे थे। रामलला के दर्शन, सरयू जी  का पूजन और स्नान, विभिन्न संत-श्रीमहंतों द्वारा अभिनंदन और आश्रमों में पधरावणियों के बीच ही उन्होंने सम-समायिक राजनीतिक परिस्थियों और धार्मिक ज्वलंत विषयों पर अपनी बेबाक राय रखी। उसी का एक वीडियो क्लिप आप सबके लिए यहां पेश है।

Wednesday, June 12, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी का श्रीअयोध्या यात्रा

रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज, साल 2008 में तीन दिनों के लिए अयोध्याजी की यात्रा पर गये थे। अयोध्या में रामानंद संप्रदाय के संतो, श्रीमहंतों और अखाड़े के संतो ने अपने आचार्य का जोरदार स्वागत किया था। अयोध्या यात्रा के पहले दिन महाराजश्री ने सरयू स्नान और पूजन किया था। उसी श्रीराम रामानंद भावाभिसिक्त यात्रा के दौरान का एक वीडियो चित्र जो 30 मार्च,2008 को लिया गया था।

Tuesday, June 11, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य ने किया अयोध्या में श्रीरामलला का दर्शन

रामभक्ति परंपरा के मूलपीठ,श्रीमठ,काशी के जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज ने पिछले दिनों अयोध्या में भगवान श्रीरामलला का दर्शन किया था। उसी का वीडियो क्लिप
 जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का इंदौर प्रेस क्लब में संबोधन

Wednesday, May 8, 2013

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का हैदराबाद दौरा

रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य और सगुण एवम् निर्गुण रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ, काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज पांच दिवसीय प्रवास पर आज हैदराबाद पहुंच रहे हैं। शाम सवा पांच बजे वे बैंगलोर से वायुमार्ग द्वारा हैदराबाद के शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचेंगे। हैदराबाद के भक्तगण और ब्रह्मर्षि समाज के पदाधिकारी बड़ी संख्या में उनकी आगवानी कर उन्हें कुक्कटपल्ली ले जाएंगे, जहां अगले पांच दिनों तक उनका आवास रहेगा। ब्रह्मर्षि सेवा समाज, हैदराबाद के अध्यक्ष श्रीराम गोपाल चौधरी का आवास इस दौरान आचार्यश्री का अस्थायी आवास होगा। महाराजश्री हैदराबाद के जगतगिरीगुट्टा में बने भगवान परशुराम के नवनिर्मित मंदिर के तीन दिवसीय प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के मुख्य अतिथि हैं। अक्षय तृतीया यानि परशुराम जयंती के मौके पर मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा होना सुनिश्चित हुआ है। वैसे धार्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत 11 मई को प्रातः सात बजे गणपति पूजा और देवताओं के आवाहन  के साथ हो जाएगी। अक्षय तृतीया के दिन 13 मई को प्रातः 10 बजकर 26 मिनट पर प्राण-प्रतिष्ठा का मुहुर्त्त है। इसके निमित्त मंदिर परिसर में यज्ञ मंडप का निर्माण हो चुका है। महाराजश्री के सान्निध्य में होने वाली समस्त मंगलप्रवृत्तियों का संचालन हैदराबाद के नल्लकुंटा स्थित प्राचीन रामालयम के प्रधान यज्ञरत्न आचार्य के.ए.चारी करेंगे। आचार्यश्री के हैदराबाद प्रवास के दौरान कई तरह के अन्य समारोह भी आयोजित हैं, जहां भक्त और श्रद्धालु उनके दर्शन-पूजन और आशीर्वचन के लाभ उठा सकेंगे। रामानंदी वैष्णव समाज के संत-महात्माओं में भी अपने आचार्य के आगमन को लेकर खासा उत्साह है।

Sunday, January 29, 2012

ज्योतिष सम्मेलन में स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज

ज्योतिष में शोधपरक कार्य की जरूरत : रामनरेशाचार्य

Updated on: Sat, 21 Jan 2012 09:16 PM (IST)
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ज्योतिष में शोधपरक कार्य की जरूरत : रामनरेशाचार्य

जागरण संवाददाता, इलाहाबाद : बिना किसी औषधि के ज्योतिष के माध्यम से जटिल रोगों का किये जा रहे उपचार से सारा विश्व आश्चर्यचकित है। आज ज्योतिष के ज्ञान को सीमित दायरे से हटाकर शोधपरक करने की जरूरत है, ताकि उससे पूरे विश्व की समस्याओं का समाधान हो सके। यह विचार रामानन्दाचार्य जगद्गुरु रामनरेशाचार्य ने शनिवार को भारतीय विद्या भवन में आई कास द्वारा संचालित ज्योतिष कक्षाओं के सत्रारम्भ एवं उत्तीर्ण छात्रों के लिए आयोजित दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए।

अध्यक्षता कर रहे डीआइजी स्थापना लालजी शुक्ल ने कहा कि ज्योतिष ऐसा प्रकाश है जिससे केवल मनुष्य की समस्याएं ही नहीं बल्कि उसके अंत:करण का अज्ञान दूर होता है। देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि ज्योतिष के बिना अन्य शास्त्रों का ज्ञान भी अधूरा है। आचार्य अविनाश राय ने ग्रहों का आंकलन कर बताया कि आने वाले चुनाव में अशांतिमय की स्थिति रहेगी। आचार्य त्रिवेणी प्रसाद त्रिपाठी ने ज्योतिष के शोधपूर्ण अध्ययन पर जोर दिया। भारतीय विद्या भवन के निदेशक व आई कास के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा.रामनरेश त्रिपाठी ने ज्योतिष शिक्षा के लिए किये जा रहे कार्यो पर प्रकाश डाला। आशुतोष वाष्र्णेय ने स्वागत व संचालन ज्योतिर्विद गुंजन वाष्र्णेय ने किया। चार वर्षीय कृति वाष्र्णेय ने ग्रह नक्षत्रों की जानकारी दी। समारोह में उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

Sunday, January 15, 2012

रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरण समारोह के चित्र





डॉ.विवेकी राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी। जगदगुरु रामानंदाचार्य जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह का श्रीगणेश शनिवार को धर्माचार्यों के सानिध्य में हुआ। प्रथम दिन पियरी स्थित श्रीमठ की शाखा श्रीविहारम परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में हिंदी और भोजपुरी की स्वनामधन्य साहित्यकार डा. विवेकी राय को रामानंदाचार्य सम्मान से विभूषित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गई।

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य एवं गोपाल मंदिर के षष्ठपीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज के सानिध्य में साहित्यसेवी डा. विवेकी राय को सम्मानित किया गया। स्वामी रामनरेशाचार्य ने उनका तिलक कर एक लाख की राशि का चेक प्रदान किया तो श्याममनोहर महाराज ने उन्हें प्रशस्तिपत्र प्रदान किया।

जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कार्य करने वाले नगर के 22 साहित्यसेवियों का भी समारोह में अभिनंदन किया गया। इनमें प्रो. बलराम पांडेय, डा. राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डा. जितेंद्रनाथ मिश्र, डा. रणजीत सिंह, डा. जगदीश त्रिपाठी, डा. जगदीश प्रसाद मिश्र, परमानंद आनंद, प्रो. अरविंद पांडेय, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डा. पवनकुमार शास्त्री, डा. बलबीर सिंह, डा. समुन जैन, डा. ऋचा सिंह, बृजेश पांडेय के अलावा इटैलियन युवती दानिएला बेवीलाकुवा शामिल हैं। समारोह में संतद्वय के आशीर्वचन से पूर्व प्रो. युगेश्वर, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. बंशीधर त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए।समारोह का संचालन डा. यूपी सिंह ने किया।


साहित्यकार होने का अहंकार है मुझे
वाराणसी। मैं गरीब साहित्यकार हूं। मेरे पास कार नहीं है लेकिन साहित्यकार होने का अहंकार जरूर है। किंतु आज इस सभा में उस अहंकार को भी गाजीपुर में ही छोड़ कर आया हूं। यह बातें सम्मान से अभिभूत डा. विवेकी राय ने शनिवार को श्रीविहारम में आयोजित समारोह में कहीं। उन्होंने पुराने संस्मरण भी सुनाए। बताया, मुझे याद आता है दिल्ली का वह समारोह जब श्रीरामनरेशाचार्य महाराज के सानिध्य मेें समारोह हो रहा था। उनके आदेश पर पहले मुझे रामनामी ओढ़ाई गई। कुछ देर बाद ही रामनामी की जगह एक कीमती शाल ओढ़ा दी गई। मुझे लगा, शायद अभी मैं वैराग्य के योग्य नहीं हुआ हूं। पूरी तरह संसारी हूं इसलिए रामनामी लेकर शाल दी गई है। अब आप फिर मुझे माया सौंप रहे हैं। कम से कम अब तो मुझे राम नाम का महामंत्र दे ही दीजिए।