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Thursday, January 16, 2020

काशी के पंडित ढुण्ढ़िराज पाण्डेय पर्वत को मिला 2020 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार



Swami Ramnareshacharya

वाराणसी, 17 जनवरी। 
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य की 721वीं जन्म जयन्ती के पावन अवसर पर काशी के पंचगंगा घाट स्थित ऐतिहासिक रामानन्दाचार्य पीठ, श्रीमठ की ओर से बड़ी पियरी स्थित श्रीविहारम सभागार में गुरुवार को भव्य सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। समारोह में काशी के ख्यात विद्वान वेदमूर्ति पंडित ढुण्ढ़िराज पांडेय पर्वत को 2020 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। 


समारोह में अपना आशीर्वचन देते हुए श्रीमठ के वर्तमान पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि राम का पुरुषोत्तम स्वरूप ही ईश्वरत्व है। रामजी के ही अवतार रामानन्दाचार्य जी ने उनके उस लोकोत्तर स्वरूप शरणागत भाव रुपी रामभक्ति के जनपथ को लोकजीवन में स्थापित कर लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज ने रामानन्दाचार्य जयन्ती के अवसर पर संस्कृत एवं संस्कृति के क्षेत्र में श्रीमठ द्वारा प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रूपये की धनराशि वाले काशी के सबसे बड़े रामानन्दाचार्य पुरस्कार काशी के विद्वान वेदमूर्ति ढूंढ़िराज पाण्डेय पर्वतीय को प्रदान किया।

स्वामी जी ने कहा कि यह सम्मान नहीं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के आशीर्वाद का सम्प्रेषण है। हम तो केवल निमित्त रूप में प्रति वर्ष सनातन वैदिक धर्म, संस्कृति एवं साहित्य के साधकों को इसे समर्पित करते हैं।

स्वामी रामनरेशाचार्य ने इस अवसर पर प्रथम रामानन्दाचार्य पुरस्कार प्राप्तकर्ता स्व. प्रोफेसर भगवती प्रसाद सिंह के अप्राप्य ग्रंथ "रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय" का लोकार्पण भी किया। नये संस्करण का सम्पादन दिवंगत प्रोफेसर सिंह के शिष्य एवं भक्ति साहित्य के सुप्रतिष्ठित विद्वान डा. उदयप्रताप सिंह ने किया है। नये संस्करण का प्रकाशन आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली ने किया है। इस अवसर पर डा. उदय प्रताप सिंह का भी भक्ति साहित्य में उनके सर्जनात्मक योगदान के लिये सम्मान किया गया।

स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज का 721वां जन्म जयंती महोत्सव इस बार एक साथ ही काशी और प्रयागराज में मनाया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले जयंती महोत्सव के पहले दिन श्रीविहारम् में साहित्यिक गोष्ठी, पुरस्कार का वितरण और स्वामी जी के जीवन और कृतित्व पर चर्चा हुई। दूसरे दिन उनकी साधनाभूमि श्रीमठ में चरण पादूका पूजन, आचार्यजी की परंपरा से जुड़े संतों, श्रीमहंतों का सम्मान एवम् भंडारा तथा संध्या समय भजन गायन का कार्यक्रम है।

आदि जगदगुरु की प्राकट्य स्थली प्रयागराज के दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर परिसर में भी 18 जनवरी को विशिष्ठ कार्यक्रम का समायोजन स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में प्रस्तावित है। 


Friday, October 19, 2018

पूज्यपाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के प्रवचनांश, प्रसंग- विजयादशमी


Swami Ramnareshacharya
सबके मन में प्रतिशोध की भावना होती है, सबके मन में यह भावना होती है कि उसके हिसाब से ही सारे काम हों। सबके अपने-अपने संकल्प होते हैं। लेकिन इसके लिए जो लोग हमारे विपरीत हैं, उनका हम क्या करें? हमें बनाना है राम राज्य और हम प्रयोग कर रहे हैं रावण राज का। सरेआम सडक़ पर गलत काम हो, व्यभिचार हो, यह कदापि उचित नहीं। इस तरह से राम राज्य नहीं आएगा। रावण तो आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ। उसने तो राम जी की पत्नी का ही धोखे से अपहरण कर लिया। ब्राह्मणों की तो हत्या रोज ही होती थी, वेद ध्वनि बंद हो गई थी, यज्ञ बंद हो गए, माता-पिता का सम्मान बंद हो गया था, देवताओं का कोई सम्मान नहीं रहा। अर्थ यह कि धर्म की, श्रेष्ठता की, पवित्रता की, मर्यादाओं की, अच्छी परंपराओं की विधियां नष्ट हो गई थीं। दंड व प्रतिशोध का कोई विकल्प नहीं बच गया था। परन्तु तब भी राम जी ने हनुमान जी को भेजा, अंगद को भेजा, विभीषण, कुंभकर्ण और यहां तक कि पुलस्त्य को भी परोक्ष रूप से प्रेरित किया कि वे रावण को सुधरने के लिए समझाएं। ताकि रावण रास्ते पर आ जाए। राम जी ने रावण को पूरे मौके दिए, वे प्रतिशोध भावना के कारण अमर्यादित नहीं हुए। प्रतिशोध या किसी को दंड देने की भी एक मर्यादा होती है, एक उचित विधि होती है। हनुमान ने भी तरह-तरह से समझाया, अंगद ने भी रावण को खूब समझाया कि बिना हत्या-मारकाट, बिना युद्ध के ही सुधार हो जाए। रावण के ही कुटुंब के लोगों ने समझाया कि राम जी को उनकी धर्म पत्नी लौटा दो, धर्म का पालन करो, लेकिन जब रावण नहीं माना, तब राम जी ने अंतिम विकल्प के रूप में विधिवत व घोषित युद्ध का सहारा लिया। वे रावण की तरह छिपकर आक्रमण करने नहीं गए, उन्होंने रावण की तरह किसी को धोखा नहीं दिया। राम जी ने अमर्यादित व दुष्ट रावण को भी दंड देने के लिए युद्ध की तमाम मर्यादाओं का पालन किया। आक्रमण का वह तरीका नहीं था, जो आज दंगों के समय देखने को मिलता है या आतंककारी हमलों के समय देखने को मिलता है। राम जी की सेना ने खुलेआम सडक़ों पर मौत का तांडव नहीं मचाया। निर्दोष लोगों को नहीं मारा। लूटमार या हत्या या बलात्कार का सहारा नहीं लिया। युद्ध जीतने के बाद भी राम जी की सेना ने लंका में घुसकर कोई उत्पात नहीं मचाया। यदि सडक़ पर खुलेआम व्यभिचार होगा, अन्याय होगा, तो राम राज्य कैसे आएगा? एक हत्या करने के बाद हत्या की भावना बनी रहती है। लाखों में से कोई एक हत्यारा ही सामान्य हो पाता है।
प्रतिशोध के लिए और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना के लिए उन कृत्यों की जरूरत नहीं है, जिन कृत्यों की हम निंदा करते हैं। जोर-ज्यादती ठीक नहीं है। रावण जैसी तानाशाही ठीक नहीं है। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब किसी ने गांधी जी से कहा कि देश में तानाशाही की जरूरत है। गांधी जी ने जवाब दिया, ‘यह मैं भी मानता हूं, लेकिन जो लोग दस साल तानाशाही चला लेंगे, वो फिर लोकतंत्र को नहीं आने देंगे।’ प्रतिशोध भाव होना चाहिए, लेकिन सुधार के लिए होना चाहिए। हमें यथोचित मर्यादाओं, संविधान, धर्म के हिसाब से चलना चाहिए। हमें कदापि बर्बर नहीं होना चाहिए।

Wednesday, November 9, 2016

कार्तिक पूर्णिमा स्नान और काशी की देवदीपावली


DevDeepawali at Panchganga ghat, Kashi
* स्वामी पद्मनाभम
कार्तिक पूर्णिमा को कार्तिकी भी कहते हैं। कार्तिकी को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्यने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। इस दिन अगर भरणी या कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है। 
इस बार यानि साल 2016 में यह कार्तिक पूर्णिमा १४ नवम्बर, सोमवार को संध्या ४:२७ बजे तक भरणी नक्षत्र, तदोपरान्त कृतिका नक्षत्र एवं विशाखाका सूर्य है। कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र का योग होनेसे यह (महाकार्तिकी) अतिशय पुण्यदायी हो गयी है। यथा- " आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित्। महती सा तिथिर्ज्ञेया स्नानदानेषु चोत्तमा "-॥यमस्मृति॥
कहा जाता है कि इस योग में जो कार्तिकेयका दर्शन करता है वो सात जन्म तक धनाढ्य और वेद-पारग ब्राह्मण होता है। यथा-
"कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः कुर्यात् स्वामिदर्शन्म्। सप्त जन्म भवेद् विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः" ॥ काशीखंड॥

साथ ही साथ यह द्रष्टव्य है कि सूर्य विशाखा नक्षत्र पर (६ नवम्बर प्रातः ०७:३२ बजे से) हैं अतः पद्मक योग की भी सृष्टि हो रही है, जो पुष्कर तीर्थ में दुर्लभ माना गया है। यथा-
"विशाखासु यदा भानुः कित्तिकासु च चन्द्रमाः। स योगः पद्मको नाम पुष्करे त्वतिदुर्लभे"॥ पद्मपुराण॥

देव दीपावली की पौराणिक पृष्ठभूमि-
देवदीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से परिपूर्ण है। एक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने सभी को उत्पीडि़त करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध देवताओं की प्रार्थना पर किया, जिसके उल्लास में देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली। भार्गवार्चन दीपिकामें लिखा है-
कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः।
दृष्ट्वा प्रदीपं न च जन्मभागिनो भवन्ति नित्यं श्वपचा हि विप्राः॥

पौर्णमास्यां तु सन्ध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुरोत्सवः। दद्यात् पूर्वोक्त मन्त्रेण सुदीपांश्च सुरालये॥भविष्य.॥
 यह भी मान्यता है कि इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा (इन ६ कृत्तिकाओं) के पूजन से शिवजी की प्रसन्नता प्राप्त होती है और गंगा-स्नान से पूरे वर्ष गंगा-स्नानका लाभ मिलता है। फलतः काशी के घाटों पर ३३ कोटि देवताओं द्वारा भगवान् विष्णु का आराधन किया जाता है और फिर देव दीपावली मनायी जाती है।
एक अन्य कथानक के अनुसार राजर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को स्वर्ग पहुंचा दिया। देवतागण इससे उद्विग्न हो गए और त्रिशंकु को देवताओं ने स्वर्ग से भगा दिया। शापग्रस्त त्रिशंकु अधर में लटके रहे। स्वर्ग से निष्कासित त्रिशंकु को देखकर क्षुब्ध विश्वामित्र ने पृथ्वी-स्वर्ग आदि से मुक्त एक नई समूची सृष्टि की ही अपने तपोबल से रचना प्रारंभ कर दी यथा- कुश, मिट्टी, ऊँट, बकरी-भेड़, नारियल, कोहड़ा, सिंघाड़ा आदि। इसी क्रम में विश्वामित्र ने वर्तमान ब्रह्मा-विष्णु-महेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अभिमंत्रित कर उनमें प्राण फूंकना आरंभ किया। सारी सृष्टि हिल उठी। हर ओर हाहाकार मच गया। हाहाकार के बीच देवताओं ने राजर्षि विश्वामित्र की अभ्यर्थना की ,जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने नई सृष्टि की रचना का अपना संकल्प वापस ले लिया। देवताओं और ऋषि-मुनियों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल सभी जगह इस अवसर पर दीपावली मनाई गई। यही अवसर अब देवदीपावली के रूप में विख्यात है।
इसी तिथिमें सायंकाल विष्णुक्का मत्स्यावतार हुआ है:-
"वरान् दत्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः।
तस्यां दत्तंहुतं जप्तं तदक्षय्यफलं स्मृतम् "॥प.पु. कार्तिक माहात्म्य॥

शरद् ऋतु को भगवान की महारासलीला का काल माना गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार शरद् पूर्णिमा की चाँदनी में श्रीकृष्ण का महारास संपन्न हुआ था। उसी का द्योतक यह आकाशदीप माना जाता है। दीपक पवित्रता और शुचिताका साक्षी माना गया है और इसी कारण से प्रत्येक पूजा कर्ममें प्रथमतः कर्म दीपक जलाया जाता है। अतः आकाशदीपदान निम्नलिखित मन्त्रोंसे करते हैं-
 दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च। नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम्॥

 भगवान् विष्णु, वामनावतारके पश्चात्, बलिके पाससे लौटकर अपने निवासस्थान वैकुण्ठको पधारे थे अतः देवताओंने प्रसन्नताके दीपक जलाये। उसी की स्मृतिमें आकाशदीपदान कर देवदीपावली मनायी जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाली दीपदान की परंपरा आकाशदीपों के माध्यम से काशी में अनूठे सांस्कृतिक वातावरण का द्योतक है। गंगा के किनारे घाटों पर और मंदिरों, भवनों की छतों पर आकाश की ओर उठती दीपों की लौ यानी आकाशदीप के माध्यम से देवाराधन और पितरों की अभ्यर्थना तथा मुक्ति-कामना की यह बनारसी पद्धति है।
शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीप-महोत्सव पहले केवल पंचगंगा (गंगा, सरस्‍वती, धुपापापा, यमुना और किरना के संगम)  की शोभा थी। आगे चलकर काशी के सभी घाटों की नयनाभिराम छवि का यह पावन अवसर बन गया।
परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम-देव दीपावली- धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई होलकर के प्रयत्नों से भी जुड़ा है। उन्होंने ही प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत 'हजारा दीपस्तंभ’  स्थापित किया था, जो इस परंपरा का साक्षी है। अब जो देवदीपावली प्रचलन में है, उसकी शुरुआत दो दशक पूर्व यहीं से हुई थी। पंचगंगा का यह 'हजारा दीपस्तंभ' देव दीपावली के दिन 1001 से अधिक दीपों की लौ से जगमगा उठता है और अभूतपूर्व दृश्य की सृष्टि करता है।

 इस विस्मयकारी दृश्य की संकल्पना की पृष्ठभूमि में पूर्व काशी नरेश स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह की प्रेरणा उल्लेखनीय थी। बाद में श्रीमठ पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने इस संकल्प को भव्य आयाम प्रदान किया।
हरिहरक्षेत्र का मेला-
कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है एक मेला जो बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर छपरा, जिले के सोनपुर में गंडक और गंगा के संगम तट लगता है। सोनपुर मेले को  विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहरनाथ की पूजा सोनपुर में होती थी, लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।


डुमरी स्थित श्रीमठ की "रामानन्द वाटिका" में आंवला पूजनोत्सव

आंवला पूजन करते Swami Ramnareshacharya

काशी, भारतीय संस्कृति की संवाहिका है और  पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ, उसे दिव्यता प्रदान करने का पवित्र स्थल है । पवित्र कार्तिक मास इन दोनों को प्रकाशित कर देता है । इसे माधव मास भी कहते हैं । माधव साक्षात विष्णु ही हैं। अतः पंचगंगा के माहात्म्य को परखकर रामावतार स्वामी रामानन्दाचार्य ने इसी पंचगंगा तट पर विष्णु स्वरुप श्रीराम की आराधना की थी । अतः यहां कार्तिक में स्नान, दान और पूजा, आराधना करना विशेष फल का प्रदाता होता है।
Swami Ramnareshacharya

अक्षय नवमी पर आँवला के वृक्ष के पूजन की सदियों पुरानी परंपरा है। इस दिन आंवला पूजन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण होता है कि इस दिन सभी देवी- देवता तीर्थ सद्प्रवत्तियाँ आँवला में ही निहित हो जाती हैं । कार्तिक मास के दौरान ऐसी अनेक धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन गंगा तट पर पंचगंगा घाट पर सम्पन्न होते हैं।

श्रीसम्प्रदाय और श्रीमठ के वर्तमानाचार्य जगदगुरु रामानन्दचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने गंगा पार डुमरी में स्थित रामानंद वाटिका के आंवला के बाग में पूर्ण वैदिक रीति से पूजन किया। वेद मंत्रों से आचार्य श्रीवल्लभ पाठक जी नेतृत्व में ये सारे कार्य सम्पन्न हुए। देश- विदेश से आये भक्तों ने मठ की गोशाला में पूजन किया ।

पूजनोपरांत आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि आज का दिन महत्त्वपूर्ण एवं अक्षय पुण्य देने वाला है। सभी अलौकिक शक्तियां आज आंवला में ही समाहित होती हैं।  यह अमृत फल है जो कई पुण्यों का प्रदाता है। पर्यावरण की आधुनिक चेतना का सजग प्रहरी है। अतः ज्ञान के साथ आँवला  विज्ञान का भी सूचक है । इससे शुद्ध पर्यावरण की चेतना भी प्राप्त होती है।



अन्ततः महा आरती, विशाल भंडारा एवं संगीत का आयोजन भी हुआ । संगीत में श्री अशोक झा गायन पर रहे थे। तबले पर सागर गुजराती ने संगत किया। मिथिला से आये संगीतज्ञों ने  भी साथ दिया। आयोजन में  डुमरी ग्राम निवासी हजारों भक्तो ने प्रसाद ग्रहण किया। पूरा आयोजन रामानन्द आध्यत्मिक मंडल, पंजाब की  ओर से किया गया था।

कार्यक्रम में  विभिन्न प्रान्तों से पधारे हुये भक्तों की गरिमामयी उपस्थिति रही। वाराणसी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव जी सपत्नीक पधारे। जोधपुर से हनुमान जी , इंदौर  से श्रीमती प्रेमलता जादोन,  वाराणसी के  अमूल्य शर्मा, अरुण शर्मा, रमेश अग्रवाल ,डॉ. राजेश्वराचार्य , हीरालाल अग्रवाल, डॉ.उदयप्रताप सिंह , मुकुंद लाल सेलट, अशोक कुमार,  श्रीरामजी सिंह रघुवंशी- इंदौर  आदि भक्तजन  उपस्थित रहे



Saturday, October 15, 2016

श्रीमठ संगीत महोत्सव-2016 का उदघाटन समारोह- प्रेस की नजर में

Swami Ramnareshacharya



Swami Ramnareshacharya 

श्रीमठ संगीत महोत्सव -2016 के पहले दिन सजी सुर और साज की महफिल

Srimath Sangeet Mahotsava-2016
वाराणसी में त्रिदिवसीय श्रीमठ संगीत महोत्सव -2016 के पहले दिन यानि 14 अक्टूबर को हुए कार्यक्रम का समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट

Monday, October 3, 2016

श्रीमठ संगीत महोत्सव-2016 का निमंत्रण कार्ड


Shrimath Sangeet Mahotsava-2016
वाराणसी में पिछले कई सालों से पावन कार्तिक मास के दौरान होने वाले श्रीमठ संगीत महोत्सव-2016 की तिथि नजदीक आते ही आमंत्रण पत्र भी प्रकाशित होकर आ गया। तीन दिवसीय इस सारस्वत अनुष्ठान के दौरान संगीत सरिता में डुबकी लगाने के लिए आप सब सादर आमंत्रित हैं।

Thursday, December 31, 2015

काशी की तस्वीर

Swami Ramnareshacharya, Kashi 
वाराणसी के गंगा तट पर अवस्थित श्रीमठ के समीप की अलौकिक छटा

Tuesday, January 21, 2014

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''

             स्वामी रामानंदाचार्य की जयंती 23 जनवरी पर विशेष

"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''
                                                                                                                     *डॉ.देवकुमार पुखराज
काशी (वाराणसी) के सुरम्य गंगा घाटों में पंच्चगंगा घाट का अपना एक विशिष्ट स्थान है, इसी घाट पर अवस्थित है श्रीमठ, जिसे मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के शीर्ष संत स्वामी रामानंद की तपः स्थली होने का गौरव प्राप्त है। उस रामानंद ने आज से सात सौ पंद्रह वर्ष पहले समाज-जीवन के विविध क्षेत्रों, विभिन्न मत-पंथ- संप्रदायों में व्याप्त वैमनस्यता और कटुता को दूर कर हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया। आचार्यपाद ने स्वतंत्र रूप से श्रीसंप्रदाय का प्रवर्तन किया। जिसे रामानंदी,रामावत अथवा वैरागी संप्रदाय भी कहते हैं।  उन्होंने बिखरते और नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला हैसर्वे प्रपत्तेधिकारिणो मताः
स्वामी श्रीरामानंद ने दलित, शोषित और उपेक्षित जातियों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर समाज में समरसता का अपू्र्व वातावरण निर्मित किया। आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने तारक राममंत्र का उपदेश पेड़ पर चढ़कर दिया था,ताकि  सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके। उन्होंने नारा दिया था-
"जाति-पाति पूछे न कोई , हरि को भजै सो हरि का होई "
ऐसा कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वर्ण के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया। चर्मकार जाति में जन्मे रैदास ( रविदास) और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं। युग प्रवर्त्तक स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति कही--सुनी जाती है, जिसके अनुसार-
"भक्ति द्रविड़ ऊपजी, लायो रामानंद,”  अर्थात भक्ति की धारा को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में लाने का श्रेय भी स्वामी रामानंद को ही जाता है।
उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेन नाई और पीपा नरेश जैसे जाति-पांति, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे, तो दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे। उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत, कालजयी महाकवि भी उत्पन्न हुए।
            स्वामी रामानंद को रामोपासना के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है। उन्होंने श्रीसंप्रदाय के विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपत्ति सिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का सूत्रपात किया। श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडक्षर( रां रामाय नमः) राममंत्र को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना। बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया। छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन किया। नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया। साथ-साथ सिद्धांतों के प्रचार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी। स्वामी रामानंद ने प्रस्थानत्रयी पर विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की। तत्व एवं आचारबोध की दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत के स्थान पर जन सामान्य के बीच प्रचलित हिन्दी अथवा अवधि भाषा को सर्वप्रथम अपनी रचना का माध्यम स्वामी रामानंद ने ही बनाया। इन कार्यों के चलते ही कई विद्वान उन्हें हिन्दी का पहला कवि भी कहते हैं।  
            ऐसे महान तपस्वी संत, परम विचारक, समन्वयी महात्मा का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्मतिथि को लेकर मतभेद होने के बावजूद रामानंद संप्रदाय में मान्यता है कि आद्य जगद्गुरू का प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित पुण्य सदन शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था। धार्मिक संस्कारों वाले पंडित शर्मा मे रामानंद को शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में गुरू राघवानंद के पास भेजा था। कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन कर प्रवीणता प्राप्त कर ली। गुरु राघवानंद और माता-पिता के दबाव के बावजूद उन्होंने गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने का संकल्प लिया। बाध्य होकर गुरुदेव ने स्वामी रामानंद को रामतारक मंत्र की दीक्षा प्रदान की। उन्होंने श्रीमठ की गुह्य साधनास्थली में प्रविष्ट हो राममंत्र का अनुष्ठान तथा अन्यान्य तांत्रिक साधनाओं का प्रयोग करते हुए घोर तपश्चर्या की। योगमार्ग की तमाम गुत्थियों को सुलझाते हुए अष्टांग योग की साधना पूर्ण की। दीर्घायुष्य प्राप्त करने के कारण जगद्गुरु राघवानंद ने अपने तेजस्वी और परमप्रिय शिष्य रामानंद को श्रीमठ की पावन पीठ पर अभिषिक्त कर दिया। अपने पहले संबोधन में ही जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने तथा परस्पर आत्मीयता एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार के बदौलत धर्म रक्षार्थ विराट संगठित शक्ति खड़ा करने का संकल्प व्यक्त किया। 
            श्रीसीताजी द्वारा पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत (राममय जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा रामभक्ति की पावन धारा को मध्यकाल में स्वामी श्रीरामानंदाचार्य ने अनुपम तीव्रता प्रदान की। उन्होंने क्रुर, विवेकशून्य, पूर्वाग्रही तथा असहिष्णु यवन शासकों के अत्याचारों का मुखर विरोध किया। शंखध्वनी कर अपनी यौगिक शक्ति से ऐसा माहौल बनाया कि तत्कालीन मुगल सम्राट तुगलक को कबीरदास के माध्यम से स्वामीजी के पास शरणागत होकर क्षमा याचना करनी पड़ी। उसे हिन्दुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध हटाने और जजियाकर को समाप्त करने का आदेश निर्गत करना पड़ा।
            मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ जैसी है उन्होंने अभूतपूर्व सामाजिक क्रांति का श्रीगणेश करके बड़ी जीवटता से समाज और संस्कृति की रक्षा की उन्हीं के चलते उत्तरभारत में तीर्थ क्षेत्रों की रक्षा और वहां सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना संभव हो सकी। उस युग की परिस्थितियों के अनुसार, वैरागी साधु समाज को अस्त्र-शस्र से सज्जित अनी के रूप में संगठित कर तीर्थ-व्रत की रक्षा के लिए, धर्म का सक्रिय मूर्तिमान स्वरूप खड़ा किया। तीर्थस्थानों से लेकर गांव-गांव में वैरागी साधुओं ने अखाड़े स्थापित किए। आज भी निर्वाणी, दिगम्बर और निर्मोही नामक तीन मूल अखाड़े और उसकी कई शाखाएं देश भर में सनातन धर्म की मूल पताका को लहरा रही हैं।  मूल्य ह्रास की इस विषम अवस्था में भी संपूर्ण संसार में रामानंद संप्रदाय के सर्वाधि मठ, मंदिर और संत-महात्मा हैंआज भी इस संप्रदाय के आश्रमों में संत-साधु और गृहस्थ की सेवा, रामगुणगान, अखंड श्रीरामना संकीर्तन व्यवस्थित हैं और सर्वत्र आध्यामिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं। इस संप्रदाय की व्यापकता का हिसाब इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वैष्णवों के बावन द्वारों में सर्वाधिक छत्तीस द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हैं। कुंभ मेले के दौरान रामानंदी साधुओं के विराट स्वरुप, इनकी उदारता और अन्नदान की परंपरा को कोई भी देख सकता है।
            युगप्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्यजी महाराज द्वारा प्रर्वतित मूल रामानंद संप्रदाय के अलावे इसकी शाखा, प्रशाखा और अवान्तर शाखाएं जैसे- रामस्नेही, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से सक्रिय हैं, जो इस संप्रदाय की मूलभावना की संवाहिका बनी हैं यह स्वामी रामानंद के ही व्यक्तित्व का प्रभाव था कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, शैव-वैष्णव विवाद, वर्ण-विद्वेष, मत-मतांतर का झगड़ा और परस्पर सामाजिक कटुता बहुत हद तक कम हो गई
             बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्य जी ने ही प्रारंभ किया था। इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था।
             काशी के परम पावन पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, आचार्यपाद द्वारा प्रवाहित श्रीराम प्रपत्ति की पावनधारा के मुख्यकेंद्र के रूप में प्रतिष्ठित होकर उसी ओजस्वी परंपरा का अनवरत प्रवर्तन कर रहा है। आज भी श्रीमठ आचार्यचरण की परिकल्पना के अनुरूप उनके द्वारा प्रज्ज्वलित दीप से जनमानस को आलोकित कर रहा है। यही वह दिव्यस्थल है, जहां विराजमान होकर स्वामीजी ने अपने परमप्रतापी शिष्यों के माध्यम से अपनी अनुग्रहशक्ति का उपयोग किया था रामानंदाचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्ध श्रीमठ, दुनिया भर में फैले श्रीराम भक्तों की श्रद्धा का अनुपम केन्द्र है और सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का एकमात्र मूल आचार्यपीठ अथवा दूसरे शब्दों में कहें को मुख्यालय है। श्रीमठ में अवस्थित रामानंदाचार्य जी की पावन चरणपादुका दुनियाभर में बिखरे रामानंदी संतों, तपस्वियों एवं अनुयायियों के बीच समादृत है।
             श्रीमठ के वर्तमान पीठासीन आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी भी स्वामी रामानंदाचार्च की प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं। इनका ज्ञान, वग्मिता और सबसे अच्छी नकी उदारता और संयोजन चेतना  को देखकर यह  कल्पना किया जा सकता है कि स्वामी रामानंद का व्यक्तित्व कैसा रहा होगा वर्तमान जगद्गुरू रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सत्प्रयासों का नतीजा है कि श्रीमठ से कभी अलग हो चुकी कबीरदासीय, रविदासीय, रामस्नेही, प्रभृति परंपराएं वैष्णवता के सूत्र में बंधकर श्रीमठ से एकरूपता स्थापित कर रही है कई परंपरावादी मठ -मंदिरों की इकाईयां श्रीमठ में विलीन हो रही हैं तीर्थराज प्रयाग के दारागंज स्थित आद्य जगद्गुरू रामनंदाचार्य का प्राकट्यधाम भी इनकी प्रेरणा से फिर भव्य स्वरूप में प्रकट हुआ है।

              स्वामी रामानंद के द्वारा दी गई देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया। भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को प्राप्त न हो सकी। महाराष्ट्र के नाथपंथियों ने ज्ञानदेव के पिता विट्ठल पंत के गुरू के रूप में उन्हें पूजा, अद्वैत मतावलंबियों ने ज्योतिर्मठ के ब्रह्मचारी के रूप में उन्हें अपनाया। बाबरीपंथ के संतों ने अपने संप्रदाय के प्रवर्तक मानकर उनकी वंदना की और कबीर के गुरू तो वे थे ही, इसलिये कबीरपंथियों में उनका आदर स्वाभाविक है स्वामी रामानंदाचार्य  के व्यक्तित्व की इस व्यापकता का रहस्य- उनकी उदार और समन्वयकारी विचारधारा में निहित है निश्चय हीं उनके विराट व्यक्तित्व एवं व्यापक महत्ता के अनुरूप कतिपय आर्षग्रंथ एवं संत-साहित्य में उल्लेखित उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है। अगस्त संहिताकार ने लिखा है कि - रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले। अर्थात स्वयं श्रीराम ही पृथ्वी पर रामानंद के रुप में अवतार लिये। ऐसे महान तपस्वी, साधक और मानवता के परम उन्नायक को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
 -इति-


Wednesday, November 27, 2013

जगदगुरु ने लिया महायज्ञ की तैयारियों का जायजा

बक्सर के चरित्रवन स्थित सोमेश्वर स्थान पर 7 दिसंबर से शुरू होने वाले नौ दिवसीय शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां शुरू कर दी गई है। जिसके तहत यज्ञ मंडप व प्रवचन पंडाल आदि निर्माण का काम जोर पकड़ने लगा है। यज्ञ का आयोजन जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में हो रहा है। गुरुवार को श्री पीठ काशी से पधारे महाराज श्री ने तैयारियों का जायजा लिया तथा आयोजक मंडल को आवश्यक दिशा निर्देश दिया। गत 21 नवम्बर को बक्सर पधारे महाराज श्री ने कहा कि यज्ञ का उद्देश्य वैदिक सनातन धर्म के माध्यम से सामाजिक सद्भाव बनाते हुए जन कल्याण करना है। यज्ञ के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए स्वामी जी ने कहा कि वैदिक शास्त्रीय विधान के अनुसार एक सौ कुंडीय यज्ञ का ही महत्व है। उन्होंने बताया कि सभी कुंडों पर चार-चार जोड़े दंपति एक-एक आचार्य के निर्देशन में एक करोड़ आहूतियां देंगे। उन्होंने बताया कि वैदिक प्रवर विनायक मंगलेश्वर बादल ‘घनपाठी’ व दत्तात्रये नारायण रहाटे के आचार्यत्व में महायज्ञ संपन्न होगा। इस मौके पर समिति के अध्यक्ष आर.के.राय, उपाध्यक्ष प्रभु प्रसाद गुप्ता, सुरेन्द्र राय व दिनेश राय के अलावा सचिव राजवंश तिवारी, हरेन्द्र कुमार सिंह, मीडिया प्रभारी डा.रमेश कुमार, सह सचिव योगेश राय व चंद्रश्वेर पांडेय, कोषाध्यक्ष सत्येन्द्र पांडेय के अलावा जवाहर पासवान, काशीनाथ प्रसाद, संजय दास, रामव्रत सिंह, विभूति नारायण राय, शिव नायक सिंह, सिद्धनाथ राय, देव नारायण शर्मा, राजाराम शास्त्री, जितेन्द्र गिरी, भालचंद्र बादल, लाल दास, आचार्य फूलेन्द्र सिंह, प्रदीप पाठक व उपेन्द्र पाठक आदि मौजूद थे।

Friday, February 22, 2013

महाकुंभ में मना स्वामी रामनरेशाचार्य का जन्मदिन

प्रयाग महाकुंभ के दौरान यूं तो विविध प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान समायोजित हुए ,लेकिन श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन समारोह अपने आप में अनूठा और यादगार बन गया। जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन वसंत पंचमी (यानि 15 फरवरी ) के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरित

प्रयाग महाकुंभ के दौरान वसंत पंचमी के दिन (15 फरवरी,2013 को) दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर ,जो जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकटय स्थली के नाम से विख्यात है,में विशेष सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। इस मौके पर वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2013 का ये पुरस्कार हिन्दी,संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य के उदभट विद्वान और काशी निवासी प्रोफेसर प्रभुनाथ द्विवेदी को सौंपा गया। इस मौके पर राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा सहित बड़ी संख्या में संत,श्रीमहंत,विद्नान और श्रद्धालु मौजूद थे।
  जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन भी वसंत पंचमी के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

Wednesday, February 6, 2013

Guru Vandana in Bhojpuri

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
चरण पखरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आसन लगइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
भोगवा बनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
पनियां छनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आरती उतरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से।

Sunday, January 15, 2012

रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरण समारोह के चित्र





डॉ.विवेकी राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी। जगदगुरु रामानंदाचार्य जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह का श्रीगणेश शनिवार को धर्माचार्यों के सानिध्य में हुआ। प्रथम दिन पियरी स्थित श्रीमठ की शाखा श्रीविहारम परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में हिंदी और भोजपुरी की स्वनामधन्य साहित्यकार डा. विवेकी राय को रामानंदाचार्य सम्मान से विभूषित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गई।

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य एवं गोपाल मंदिर के षष्ठपीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज के सानिध्य में साहित्यसेवी डा. विवेकी राय को सम्मानित किया गया। स्वामी रामनरेशाचार्य ने उनका तिलक कर एक लाख की राशि का चेक प्रदान किया तो श्याममनोहर महाराज ने उन्हें प्रशस्तिपत्र प्रदान किया।

जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कार्य करने वाले नगर के 22 साहित्यसेवियों का भी समारोह में अभिनंदन किया गया। इनमें प्रो. बलराम पांडेय, डा. राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डा. जितेंद्रनाथ मिश्र, डा. रणजीत सिंह, डा. जगदीश त्रिपाठी, डा. जगदीश प्रसाद मिश्र, परमानंद आनंद, प्रो. अरविंद पांडेय, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डा. पवनकुमार शास्त्री, डा. बलबीर सिंह, डा. समुन जैन, डा. ऋचा सिंह, बृजेश पांडेय के अलावा इटैलियन युवती दानिएला बेवीलाकुवा शामिल हैं। समारोह में संतद्वय के आशीर्वचन से पूर्व प्रो. युगेश्वर, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. बंशीधर त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए।समारोह का संचालन डा. यूपी सिंह ने किया।


साहित्यकार होने का अहंकार है मुझे
वाराणसी। मैं गरीब साहित्यकार हूं। मेरे पास कार नहीं है लेकिन साहित्यकार होने का अहंकार जरूर है। किंतु आज इस सभा में उस अहंकार को भी गाजीपुर में ही छोड़ कर आया हूं। यह बातें सम्मान से अभिभूत डा. विवेकी राय ने शनिवार को श्रीविहारम में आयोजित समारोह में कहीं। उन्होंने पुराने संस्मरण भी सुनाए। बताया, मुझे याद आता है दिल्ली का वह समारोह जब श्रीरामनरेशाचार्य महाराज के सानिध्य मेें समारोह हो रहा था। उनके आदेश पर पहले मुझे रामनामी ओढ़ाई गई। कुछ देर बाद ही रामनामी की जगह एक कीमती शाल ओढ़ा दी गई। मुझे लगा, शायद अभी मैं वैराग्य के योग्य नहीं हुआ हूं। पूरी तरह संसारी हूं इसलिए रामनामी लेकर शाल दी गई है। अब आप फिर मुझे माया सौंप रहे हैं। कम से कम अब तो मुझे राम नाम का महामंत्र दे ही दीजिए।

Monday, October 24, 2011

श्रीमठ संगीत महोत्सव आरंभ

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शरद पूर्णिमा पर सुर ताल की महफिल
First Published: 01-11-10 12:08 AM
Last Updated: 01-11-10 12:13 AM
रवींद्र मिश्र
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कहते हैं भगवान की आराधना में संगीत का उद्गम मंदिरों के परिसर में हुआ। इस समय संगीत की प्राचीन सनातन परंपरा को जीवंत करने में कई धार्मिक संस्थान और मठ सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनमें वाराणसी के श्रीमठ के रामनरेशाचार्य हैं।

उन्होंने स्पीकमैके के सहयोग से भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का भव्य श्रीमठ संगीत महोत्सव बनारस के पंचगंगा घाट पर शरदपूर्णिमा की रात को आयोजित करते रहे है। चंदा की चांदनी के मुक्ताकाश में गंगा के किनारे संगीत के स्वरों और जलधारा की लहरों का जो तारतम्य जुड़ रहा था, उसके रसपान की अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं, बल्कि वहां उपस्थित रह कर ही की जा सकती है।

मंगलाचरण के रूप शंखनाद और श्लोक उच्चारण से श्रीमठ संगीत महोत्सव का आरंभ हुआ। समारोह में संगीत की शुरुआत मशहूर संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने राग मारवा से की। कश्मीर घाटी में सोपोरी परिवार का संतूर से गहरा रिश्ता है। भजन जी ने इस वादन में अपनी एक अलग शैली इजाद की है। उन्होंने इस सपाट तारों के वाद्य में ध्रुपद अंग को जोड़ने में एक उल्लेखनीय काम किया है।

राग मारवा ध्रुपद का बहुत प्रभावी राग है, उसी ध्रुपद अंग के चलन में इस राग को रंजकता से भजन सोपोरी ने प्रस्तुत किया। तीनताल में निबद्ध राग पूरिया कल्याण की दो बंदिशों को पेश करने में उनका अंदाज बड़ा सरस था। उनके साथ तबले पर अकरम ने भी अपनी थिरकती उंगलियों का जादू दिखाया।

ध्रुपद में डागरवाणी के वरिष्ठ उस्ताद रहीम फहीमउद्दीन डागर ने राग चंद्रकौंस को आलाप में विस्तार से पेश करते राग की परत-दर-परत को बड़ी संजीदगी से खोला। इसके रागात्मक रूप में तांडव और लास्य दोनों का मर्मस्पर्शी भाव उनके गायन में प्रगट हुआ। प्रवीण आर्य की पखावज संगत पर सुर और ताल का बेजोड़ मेल इस प्रस्तुति में था। राग धमार और तोड़ी की प्रस्तुति में ध्रुपद का दुर्लभ चलन उनके गायन में दिखा।

भरतनाट्यम की सुपरिचित नृत्यांगना गीता चंद्रन का वर्चस्व नृत्य के हर पक्ष में नज़र आया। इस महोत्सव में उन्होंने अपनी शिष्याओं के साथ परंपरागत भरतनाट्यम को सरसता से प्रस्तुत किया। राग हंसध्वनि में निबद्ध मल्लारी में शिव और कृष्ण के लालित्य रूपों को नृत-नृत्य अभिनय से दर्शाने में एक सुंदर संकल्पना गीता की थी।

गीता चंद्रन द्वारा भक्तिभाव में पंचाक्षर स्त्रोत की प्रस्तुति के बाद शरद ऋतु में कृष्ण और गोपियों के महारास को इस नृत्य शैली में जिस जीवंतता और मोहकता से गीता और उनकी शिष्याओं ने प्रस्तुत किया, वह वाकई में रोमांचित करने वाला था। बनारस की गिरजा देवी ने ठेठ बनारसी रंग में ठुमरी और दादरा अपनी शिष्या मालिनी अवस्थी और शुचिता के साथ प्रस्तुत किया।

गंगा, श्रीगणेश, पार्वती की स्तुति और राग यमन कल्याण की शुद्ध रागदारी में विलंबित और छोटा खयाल गाने के बाद मिश्र खमाज में ठुमरी शुरू करते ही उन्होंने समां बांध दिया। बंदिश सांवरिया को देखे बिना नाही चैन’ गायन में नायिका के मनोभावों की अभिव्यक्ति में बनारसी बोली की चाशनी उनके स्वरों में चढ़कर बह रही थी। ताल दादरा की लहकती लय में उन्होंने दो रचनाओं को हमेशा की तरह अपने अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया।

रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खां ने अपने बेटे अली जकी हैदर के साथ बीनकारी अंग में राग दरबारी कन्हरा को अपने अनूठे अंदाज में गहराई से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन 102 साल के बुजुर्ग और प्राचीन गायकी के गवाह उस्ताद अब्दुल रशीद खां ने अपने रचित राग नर पंचम, सावनी विहाग तराना, ठुमरी, भजन आदि की प्रस्तुति से किया। गायन में उनकी एक अलग ही शैली नजर आ रही थी