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| Swami Ramnareshacharya |
Thursday, January 16, 2020
काशी के पंडित ढुण्ढ़िराज पाण्डेय पर्वत को मिला 2020 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार
Friday, October 19, 2018
पूज्यपाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के प्रवचनांश, प्रसंग- विजयादशमी
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| Swami Ramnareshacharya |
प्रतिशोध के लिए और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना के लिए उन कृत्यों की जरूरत नहीं है, जिन कृत्यों की हम निंदा करते हैं। जोर-ज्यादती ठीक नहीं है। रावण जैसी तानाशाही ठीक नहीं है। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब किसी ने गांधी जी से कहा कि देश में तानाशाही की जरूरत है। गांधी जी ने जवाब दिया, ‘यह मैं भी मानता हूं, लेकिन जो लोग दस साल तानाशाही चला लेंगे, वो फिर लोकतंत्र को नहीं आने देंगे।’ प्रतिशोध भाव होना चाहिए, लेकिन सुधार के लिए होना चाहिए। हमें यथोचित मर्यादाओं, संविधान, धर्म के हिसाब से चलना चाहिए। हमें कदापि बर्बर नहीं होना चाहिए।
Wednesday, November 9, 2016
कार्तिक पूर्णिमा स्नान और काशी की देवदीपावली
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| DevDeepawali at Panchganga ghat, Kashi |
कार्तिक पूर्णिमा को कार्तिकी भी कहते हैं। कार्तिकी को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्यने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। इस दिन अगर भरणी या कृतिका नक्षत्र पड़े, तो स्नान का विशेष फल मिलता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी हो तो विशेष स्नान पर्व का फल देती है और यदि रोहिणी हो तो इसका फल और भी बढ़ जाता है।
इस बार यानि साल 2016 में यह कार्तिक पूर्णिमा १४ नवम्बर, सोमवार को संध्या ४:२७ बजे तक भरणी नक्षत्र, तदोपरान्त कृतिका नक्षत्र एवं विशाखाका सूर्य है। कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र का योग होनेसे यह (महाकार्तिकी) अतिशय पुण्यदायी हो गयी है। यथा- " आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित्। महती सा तिथिर्ज्ञेया स्नानदानेषु चोत्तमा "-॥यमस्मृति॥
कहा जाता है कि इस योग में जो कार्तिकेयका दर्शन करता है वो सात जन्म तक धनाढ्य और वेद-पारग ब्राह्मण होता है। यथा-
"कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः कुर्यात् स्वामिदर्शन्म्। सप्त जन्म भवेद् विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः" ॥ काशीखंड॥
साथ ही साथ यह द्रष्टव्य है कि सूर्य विशाखा नक्षत्र पर (६ नवम्बर प्रातः ०७:३२ बजे से) हैं अतः पद्मक योग की भी सृष्टि हो रही है, जो पुष्कर तीर्थ में दुर्लभ माना गया है। यथा-
"विशाखासु यदा भानुः कित्तिकासु च चन्द्रमाः। स योगः पद्मको नाम पुष्करे त्वतिदुर्लभे"॥ पद्मपुराण॥
देव दीपावली की पौराणिक पृष्ठभूमि-
देवदीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से परिपूर्ण है। एक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने सभी को उत्पीडि़त करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध देवताओं की प्रार्थना पर किया, जिसके उल्लास में देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली। भार्गवार्चन दीपिकामें लिखा है-
कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः।
दृष्ट्वा प्रदीपं न च जन्मभागिनो भवन्ति नित्यं श्वपचा हि विप्राः॥
पौर्णमास्यां तु सन्ध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुरोत्सवः। दद्यात् पूर्वोक्त मन्त्रेण सुदीपांश्च सुरालये॥भविष्य.॥
यह भी मान्यता है कि इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा (इन ६ कृत्तिकाओं) के पूजन से शिवजी की प्रसन्नता प्राप्त होती है और गंगा-स्नान से पूरे वर्ष गंगा-स्नानका लाभ मिलता है। फलतः काशी के घाटों पर ३३ कोटि देवताओं द्वारा भगवान् विष्णु का आराधन किया जाता है और फिर देव दीपावली मनायी जाती है।
एक अन्य कथानक के अनुसार राजर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को स्वर्ग पहुंचा दिया। देवतागण इससे उद्विग्न हो गए और त्रिशंकु को देवताओं ने स्वर्ग से भगा दिया। शापग्रस्त त्रिशंकु अधर में लटके रहे। स्वर्ग से निष्कासित त्रिशंकु को देखकर क्षुब्ध विश्वामित्र ने पृथ्वी-स्वर्ग आदि से मुक्त एक नई समूची सृष्टि की ही अपने तपोबल से रचना प्रारंभ कर दी यथा- कुश, मिट्टी, ऊँट, बकरी-भेड़, नारियल, कोहड़ा, सिंघाड़ा आदि। इसी क्रम में विश्वामित्र ने वर्तमान ब्रह्मा-विष्णु-महेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अभिमंत्रित कर उनमें प्राण फूंकना आरंभ किया। सारी सृष्टि हिल उठी। हर ओर हाहाकार मच गया। हाहाकार के बीच देवताओं ने राजर्षि विश्वामित्र की अभ्यर्थना की ,जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने नई सृष्टि की रचना का अपना संकल्प वापस ले लिया। देवताओं और ऋषि-मुनियों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल सभी जगह इस अवसर पर दीपावली मनाई गई। यही अवसर अब देवदीपावली के रूप में विख्यात है।
इसी तिथिमें सायंकाल विष्णुक्का मत्स्यावतार हुआ है:-
"वरान् दत्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः।
तस्यां दत्तंहुतं जप्तं तदक्षय्यफलं स्मृतम् "॥प.पु. कार्तिक माहात्म्य॥
शरद् ऋतु को भगवान की महारासलीला का काल माना गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार शरद् पूर्णिमा की चाँदनी में श्रीकृष्ण का महारास संपन्न हुआ था। उसी का द्योतक यह आकाशदीप माना जाता है। दीपक पवित्रता और शुचिताका साक्षी माना गया है और इसी कारण से प्रत्येक पूजा कर्ममें प्रथमतः कर्म दीपक जलाया जाता है। अतः आकाशदीपदान निम्नलिखित मन्त्रोंसे करते हैं-
दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च। नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम्॥

भगवान् विष्णु, वामनावतारके पश्चात्, बलिके पाससे लौटकर अपने निवासस्थान वैकुण्ठको पधारे थे अतः देवताओंने प्रसन्नताके दीपक जलाये। उसी की स्मृतिमें आकाशदीपदान कर देवदीपावली मनायी जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाली दीपदान की परंपरा आकाशदीपों के माध्यम से काशी में अनूठे सांस्कृतिक वातावरण का द्योतक है। गंगा के किनारे घाटों पर और मंदिरों, भवनों की छतों पर आकाश की ओर उठती दीपों की लौ यानी आकाशदीप के माध्यम से देवाराधन और पितरों की अभ्यर्थना तथा मुक्ति-कामना की यह बनारसी पद्धति है।
शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीप-महोत्सव पहले केवल पंचगंगा (गंगा, सरस्वती, धुपापापा, यमुना और किरना के संगम) की शोभा थी। आगे चलकर काशी के सभी घाटों की नयनाभिराम छवि का यह पावन अवसर बन गया।
परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम-देव दीपावली- धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई होलकर के प्रयत्नों से भी जुड़ा है। उन्होंने ही प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत 'हजारा दीपस्तंभ’ स्थापित किया था, जो इस परंपरा का साक्षी है। अब जो देवदीपावली प्रचलन में है, उसकी शुरुआत दो दशक पूर्व यहीं से हुई थी। पंचगंगा का यह 'हजारा दीपस्तंभ' देव दीपावली के दिन 1001 से अधिक दीपों की लौ से जगमगा उठता है और अभूतपूर्व दृश्य की सृष्टि करता है।
इस विस्मयकारी दृश्य की संकल्पना की पृष्ठभूमि में पूर्व काशी नरेश स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह की प्रेरणा उल्लेखनीय थी। बाद में श्रीमठ पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने इस संकल्प को भव्य आयाम प्रदान किया।
हरिहरक्षेत्र का मेला-
कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है एक मेला जो बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर छपरा, जिले के सोनपुर में गंडक और गंगा के संगम तट लगता है। सोनपुर मेले को विश्व का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। मेलों से जुडे तमाम आयोजन यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहरनाथ की पूजा सोनपुर में होती थी, लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।
डुमरी स्थित श्रीमठ की "रामानन्द वाटिका" में आंवला पूजनोत्सव
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| आंवला पूजन करते Swami Ramnareshacharya |
काशी, भारतीय संस्कृति की संवाहिका है और पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ, उसे दिव्यता प्रदान करने का पवित्र स्थल है । पवित्र कार्तिक मास इन दोनों को प्रकाशित कर देता है । इसे माधव मास भी कहते हैं । माधव साक्षात विष्णु ही हैं। अतः पंचगंगा के माहात्म्य को परखकर रामावतार स्वामी रामानन्दाचार्य ने इसी पंचगंगा तट पर विष्णु स्वरुप श्रीराम की आराधना की थी । अतः यहां कार्तिक में स्नान, दान और पूजा, आराधना करना विशेष फल का प्रदाता होता है।
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| Swami Ramnareshacharya |
अक्षय नवमी पर आँवला के वृक्ष के पूजन की सदियों पुरानी परंपरा है। इस दिन आंवला पूजन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण होता है कि इस दिन सभी देवी- देवता तीर्थ सद्प्रवत्तियाँ आँवला में ही निहित हो जाती हैं । कार्तिक मास के दौरान ऐसी अनेक धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन गंगा तट पर पंचगंगा घाट पर सम्पन्न होते हैं।
श्रीसम्प्रदाय और श्रीमठ के वर्तमानाचार्य जगदगुरु रामानन्दचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने गंगा पार डुमरी में स्थित रामानंद वाटिका के आंवला के बाग में पूर्ण वैदिक रीति से पूजन किया। वेद मंत्रों से आचार्य श्रीवल्लभ पाठक जी नेतृत्व में ये सारे कार्य सम्पन्न हुए। देश- विदेश से आये भक्तों ने मठ की गोशाला में पूजन किया ।
पूजनोपरांत आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि आज का दिन महत्त्वपूर्ण एवं अक्षय पुण्य देने वाला है। सभी अलौकिक शक्तियां आज आंवला में ही समाहित होती हैं। यह अमृत फल है जो कई पुण्यों का प्रदाता है। पर्यावरण की आधुनिक चेतना का सजग प्रहरी है। अतः ज्ञान के साथ आँवला विज्ञान का भी सूचक है । इससे शुद्ध पर्यावरण की चेतना भी प्राप्त होती है।

अन्ततः महा आरती, विशाल भंडारा एवं संगीत का आयोजन भी हुआ । संगीत में श्री अशोक झा गायन पर रहे थे। तबले पर सागर गुजराती ने संगत किया। मिथिला से आये संगीतज्ञों ने भी साथ दिया। आयोजन में डुमरी ग्राम निवासी हजारों भक्तो ने प्रसाद ग्रहण किया। पूरा आयोजन रामानन्द आध्यत्मिक मंडल, पंजाब की ओर से किया गया था।
कार्यक्रम में विभिन्न प्रान्तों से पधारे हुये भक्तों की गरिमामयी उपस्थिति रही। वाराणसी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव जी सपत्नीक पधारे। जोधपुर से हनुमान जी , इंदौर से श्रीमती प्रेमलता जादोन, वाराणसी के अमूल्य शर्मा, अरुण शर्मा, रमेश अग्रवाल ,डॉ. राजेश्वराचार्य , हीरालाल अग्रवाल, डॉ.उदयप्रताप सिंह , मुकुंद लाल सेलट, अशोक कुमार, श्रीरामजी सिंह रघुवंशी- इंदौर आदि भक्तजन उपस्थित रहे
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Monday, October 17, 2016
Saturday, October 15, 2016
Monday, October 3, 2016
Thursday, December 31, 2015
Tuesday, January 21, 2014
"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''
Wednesday, November 27, 2013
जगदगुरु ने लिया महायज्ञ की तैयारियों का जायजा
Friday, February 22, 2013
महाकुंभ में मना स्वामी रामनरेशाचार्य का जन्मदिन
प्रयाग महाकुंभ के दौरान यूं तो विविध प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान समायोजित हुए ,लेकिन श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन समारोह अपने आप में अनूठा और यादगार बन गया। जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन वसंत पंचमी (यानि 15 फरवरी ) के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया।
जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरित
जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन भी वसंत पंचमी के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया।
Wednesday, February 6, 2013
Guru Vandana in Bhojpuri
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग सेजाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
चरण पखरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आसन लगइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
भोगवा बनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
पनियां छनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आरती उतरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से।
Thursday, February 2, 2012
Sunday, January 15, 2012
डॉ.विवेकी राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार
वाराणसी। जगदगुरु रामानंदाचार्य जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह का श्रीगणेश शनिवार को धर्माचार्यों के सानिध्य में हुआ। प्रथम दिन पियरी स्थित श्रीमठ की शाखा श्रीविहारम परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में हिंदी और भोजपुरी की स्वनामधन्य साहित्यकार डा. विवेकी राय को रामानंदाचार्य सम्मान से विभूषित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गई।
जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य एवं गोपाल मंदिर के षष्ठपीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज के सानिध्य में साहित्यसेवी डा. विवेकी राय को सम्मानित किया गया। स्वामी रामनरेशाचार्य ने उनका तिलक कर एक लाख की राशि का चेक प्रदान किया तो श्याममनोहर महाराज ने उन्हें प्रशस्तिपत्र प्रदान किया।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कार्य करने वाले नगर के 22 साहित्यसेवियों का भी समारोह में अभिनंदन किया गया। इनमें प्रो. बलराम पांडेय, डा. राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डा. जितेंद्रनाथ मिश्र, डा. रणजीत सिंह, डा. जगदीश त्रिपाठी, डा. जगदीश प्रसाद मिश्र, परमानंद आनंद, प्रो. अरविंद पांडेय, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डा. पवनकुमार शास्त्री, डा. बलबीर सिंह, डा. समुन जैन, डा. ऋचा सिंह, बृजेश पांडेय के अलावा इटैलियन युवती दानिएला बेवीलाकुवा शामिल हैं। समारोह में संतद्वय के आशीर्वचन से पूर्व प्रो. युगेश्वर, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. बंशीधर त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए।समारोह का संचालन डा. यूपी सिंह ने किया।
साहित्यकार होने का अहंकार है मुझे
वाराणसी। मैं गरीब साहित्यकार हूं। मेरे पास कार नहीं है लेकिन साहित्यकार होने का अहंकार जरूर है। किंतु आज इस सभा में उस अहंकार को भी गाजीपुर में ही छोड़ कर आया हूं। यह बातें सम्मान से अभिभूत डा. विवेकी राय ने शनिवार को श्रीविहारम में आयोजित समारोह में कहीं। उन्होंने पुराने संस्मरण भी सुनाए। बताया, मुझे याद आता है दिल्ली का वह समारोह जब श्रीरामनरेशाचार्य महाराज के सानिध्य मेें समारोह हो रहा था। उनके आदेश पर पहले मुझे रामनामी ओढ़ाई गई। कुछ देर बाद ही रामनामी की जगह एक कीमती शाल ओढ़ा दी गई। मुझे लगा, शायद अभी मैं वैराग्य के योग्य नहीं हुआ हूं। पूरी तरह संसारी हूं इसलिए रामनामी लेकर शाल दी गई है। अब आप फिर मुझे माया सौंप रहे हैं। कम से कम अब तो मुझे राम नाम का महामंत्र दे ही दीजिए।
Monday, October 24, 2011
श्रीमठ संगीत महोत्सव आरंभ
Last Updated: 01-11-10 12:13 AM
कहते हैं भगवान की आराधना में संगीत का उद्गम मंदिरों के परिसर में हुआ। इस समय संगीत की प्राचीन सनातन परंपरा को जीवंत करने में कई धार्मिक संस्थान और मठ सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनमें वाराणसी के श्रीमठ के रामनरेशाचार्य हैं।
उन्होंने स्पीकमैके के सहयोग से भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का भव्य श्रीमठ संगीत महोत्सव बनारस के पंचगंगा घाट पर शरदपूर्णिमा की रात को आयोजित करते रहे है। चंदा की चांदनी के मुक्ताकाश में गंगा के किनारे संगीत के स्वरों और जलधारा की लहरों का जो तारतम्य जुड़ रहा था, उसके रसपान की अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं, बल्कि वहां उपस्थित रह कर ही की जा सकती है।
मंगलाचरण के रूप शंखनाद और श्लोक उच्चारण से श्रीमठ संगीत महोत्सव का आरंभ हुआ। समारोह में संगीत की शुरुआत मशहूर संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने राग मारवा से की। कश्मीर घाटी में सोपोरी परिवार का संतूर से गहरा रिश्ता है। भजन जी ने इस वादन में अपनी एक अलग शैली इजाद की है। उन्होंने इस सपाट तारों के वाद्य में ध्रुपद अंग को जोड़ने में एक उल्लेखनीय काम किया है।
राग मारवा ध्रुपद का बहुत प्रभावी राग है, उसी ध्रुपद अंग के चलन में इस राग को रंजकता से भजन सोपोरी ने प्रस्तुत किया। तीनताल में निबद्ध राग पूरिया कल्याण की दो बंदिशों को पेश करने में उनका अंदाज बड़ा सरस था। उनके साथ तबले पर अकरम ने भी अपनी थिरकती उंगलियों का जादू दिखाया।
ध्रुपद में डागरवाणी के वरिष्ठ उस्ताद रहीम फहीमउद्दीन डागर ने राग चंद्रकौंस को आलाप में विस्तार से पेश करते राग की परत-दर-परत को बड़ी संजीदगी से खोला। इसके रागात्मक रूप में तांडव और लास्य दोनों का मर्मस्पर्शी भाव उनके गायन में प्रगट हुआ। प्रवीण आर्य की पखावज संगत पर सुर और ताल का बेजोड़ मेल इस प्रस्तुति में था। राग धमार और तोड़ी की प्रस्तुति में ध्रुपद का दुर्लभ चलन उनके गायन में दिखा।
भरतनाट्यम की सुपरिचित नृत्यांगना गीता चंद्रन का वर्चस्व नृत्य के हर पक्ष में नज़र आया। इस महोत्सव में उन्होंने अपनी शिष्याओं के साथ परंपरागत भरतनाट्यम को सरसता से प्रस्तुत किया। राग हंसध्वनि में निबद्ध मल्लारी में शिव और कृष्ण के लालित्य रूपों को नृत-नृत्य अभिनय से दर्शाने में एक सुंदर संकल्पना गीता की थी।
गीता चंद्रन द्वारा भक्तिभाव में पंचाक्षर स्त्रोत की प्रस्तुति के बाद शरद ऋतु में कृष्ण और गोपियों के महारास को इस नृत्य शैली में जिस जीवंतता और मोहकता से गीता और उनकी शिष्याओं ने प्रस्तुत किया, वह वाकई में रोमांचित करने वाला था। बनारस की गिरजा देवी ने ठेठ बनारसी रंग में ठुमरी और दादरा अपनी शिष्या मालिनी अवस्थी और शुचिता के साथ प्रस्तुत किया।
गंगा, श्रीगणेश, पार्वती की स्तुति और राग यमन कल्याण की शुद्ध रागदारी में विलंबित और छोटा खयाल गाने के बाद मिश्र खमाज में ठुमरी शुरू करते ही उन्होंने समां बांध दिया। बंदिश सांवरिया को देखे बिना नाही चैन’ गायन में नायिका के मनोभावों की अभिव्यक्ति में बनारसी बोली की चाशनी उनके स्वरों में चढ़कर बह रही थी। ताल दादरा की लहकती लय में उन्होंने दो रचनाओं को हमेशा की तरह अपने अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया।
रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खां ने अपने बेटे अली जकी हैदर के साथ बीनकारी अंग में राग दरबारी कन्हरा को अपने अनूठे अंदाज में गहराई से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन 102 साल के बुजुर्ग और प्राचीन गायकी के गवाह उस्ताद अब्दुल रशीद खां ने अपने रचित राग नर पंचम, सावनी विहाग तराना, ठुमरी, भजन आदि की प्रस्तुति से किया। गायन में उनकी एक अलग ही शैली नजर आ रही थी






















