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Wednesday, February 3, 2021

स्वामी रामानंदाचार्यः (Swami Ramanand) भारत में धार्मिक नवजागरण और समरसता के प्रतीक

 

स्वामी रामानंद की 723 वीं जयंती (4 फरवरी, 2021) पर विशेष

 ·     देवकुमार पुखराज

 भारत के मध्यकाल में ही भक्ति आंदोलन का सूत्रपात माना जाता है. उस आंदोलन के शिखर संत थे स्वामी रामानंद ( Swami Ramanand). वे उत्तर भारत में जन्म लेने वाले भक्ति के पहले आचार्य हुए, जिन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के निचले तबके तक पहुंचाया. कहावत है- भक्ति द्रविड़ उपजी लाये रामानन्द, प्रकट किया कबीर ने, सात दीप नौ खंड. उस भक्ति काल को ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहते हैं.

 आरंभिक जीवन और शिक्षा-दीक्षा-

 स्वामी रामानंद का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग ( Prayagraj) में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में आज से 723 साल पहले माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था. पिता का नाम पंडित पुण्य सदन शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था. माता-पिता ने धार्मिक अभिरुचि देख बालक रामानंद को काशी (Kashi) के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ ( Srimath) में गुरू राघवानंद के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण के लिए भेजा. कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी शास्त्रों, वेदों- पुराणों का अध्ययन कर प्रवीणता प्राप्त कर ली. परिजनों-गुरुजनों के दबाव के बावजूद गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने का संकल्प लिया. स्वामी राघवानंद से रामतारक मंत्र की दीक्षा लेकर स्वामी रामानंदाचार्य बन गये.

 स्वामी रामानंद की शिष्य परंपरा-

 स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया. उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रविदास, सेननाई और पीपानरेश जैसे  मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे तो दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे. उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्वविश्रुत महाकवि भी उत्पन्न हुआ. स्वामी रामानंद ने दलितों- अछूतों के साथ ही महिलाओं को भी भक्ति के वितान में समान स्थान दिया. उनकी शिष्य मंडली में सुरसरी और पदमावती जैसी विदुषी महिलाओं का भी विशिष्ट स्थान आता है. बैरागी जमात इनको द्वादश महाभागवत कहकर पूजता है.

 कबीरदास ऐसे बने थे शिष्य-

कबीरदास (Kabir das) के बारे में प्रसिद्ध है कि स्वामी रामानंद का आशीर्वाद पाने के लिए  उनको काशी के पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर अहले सुबह लेटना पड़ा था, जिस रास्ते स्वामी रामानंद नित्य सुबह गंगास्नान के लिए जाया करते थे. कहते हैं कि अचानक स्वामी रामानंद का पैर कबीर पर पड़ा और वो अफसोस में राम-राम बच्चा बोल पढ़े. कबीर ने रामानंद से अपने को शिष्य बनाने का आग्रह किया और रामानंद ने जुलाहे घर पले-बढ़े कबीर को ह्रदय से लगा लिया. राम नाम ही उनका गुरुमंत्र हो गया.

 साधु-संतों की सबसे बड़ी जमात-

 स्वामी रामानंद द्वारा स्थापित रामानंद सम्प्रदाय या रामावत संप्रदाय वैष्णवों की सबसे बड़ी धार्मिक जमात है. वैष्णवों के 52  द्वारों में 36 द्वारे केवल रामानंदियों के हैं. इस संप्रदाय के संत बैरागी भी कहे जाते हैं. इनके अपने निर्वाणी, निर्मोही और दिगम्बर नाम से तीन अखाड़े हैं. रामानंद सम्प्रदाय की शाखाएं औऱ उपशाखाएं जैसे रामस्नेही, सखी संप्रदाय, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से फैली हुई हैं. अयोध्या, चित्रकूट, नासिक, हरिद्वार में इस संप्रदाय के सैकड़ो मठ-मंदिर हैं. काशी के पंचगंगा घाट पर मौजूद श्रीमठ, रामानंदी संतों-भक्तों का मूल गुरुस्थान है. उसे सगुण-निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का मूल आचार्यपीठ कहा जाता है. वहां की गादी पर प्रतिष्ठित आचार्य को जगदगुरु रामानंदाचार्य की पदवी परंपरा से मिलती है. वर्तमान में स्वामी रामनरेशाचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य के पद पर आसीन है.

 स्वामी रामानंद की भक्ति परंपरा और सिद्धांत-

 स्वामी रामानंद को रामोपासना के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है. उन्होंने श्रीसंप्रदाय के विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपत्तिसिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का संगठन किया. श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडाक्षर राममंत्र को गुरुदीक्षा का बीजमंत्र माना. बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया. छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन किया, नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया. कह सकते हैं कि मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ जैसी है. उन्होंने साधु समाज को अस्त्र-शस्र से लैश कर तीर्थ-व्रतों की रक्षा की. तीर्थस्थलों से लेकर गांव-गांव तक में वैरागी साधुओं ने मठ-मंदिर, ठाकुरबाड़ी स्थापित किये. आज भी उत्तर भारत में रामानंद संप्रदाय के ही सर्वाधिक साधु-संत और मंदिर हैं, जहां संत-साधु, अभ्यागत सेवा, रामगुणगान, अखंड रामनाम संकीर्तन व्यवस्थित तरीके से जारी हैं.

 रामानंद स्वामी का धार्मिक अवदान-

 आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि तारक राममंत्र का उपदेश उन्होंने पेड़ पर चढ़कर दिया था ताकि सब जाति के लोगों के कानों में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके. कहते हैं स्वामीजी की यौगिक शक्ति के चमत्कार से प्रभावित होकर तत्कालीन मुगल शासक मोहम्मद तुगलक संत कबीरदास के माध्यम से स्वामी रामानंद की शरण में आया और हिंदुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध और जजियाकर को हटाने का निर्देश जारी किया. बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्च ने ही प्रारंभ किया. इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में 34 हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया.

 स्वामी रामानंद की सारस्वत साधना-

 स्वामी रामानंदाचार्य ने अपने सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी. उन्होंने प्रस्थानत्रयी पर विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की. तत्व एवं आचारबोध की दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की. हनुमान जी प्रसिद्ध आरती के रचयिता भी स्वामी रामानंद को ही माना जाता है. देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया. भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को प्राप्त न हो सकी. शायद इसीलिए कतिपय आर्षग्रंथ एवं संत-साहित्य में उल्लेखित उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है. जिसमें कहा गया है- रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले. अर्थात राम ने ही धरती पर स्वयं रामानंद के रुप में अवतार लिया. इतिः

Tuesday, February 2, 2021

आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्राविड को 2021 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार- स्वामी रामनरेशाचार्य

 

 

रामानंदाचार्य की 723 वीं जयंती का अनुष्ठान काशी और प्रयागराज में

·       * 
 
देव कुमार पुखराज

 मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के शीर्ष संत स्वामी रामानंद की स्मृति में दिया जाने वाला एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार  इस बार काशी के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ को दिया जाएगा. स्वामी रामानंदाचार्य जी के प्राकट्य धाम (जन्मस्थली) प्रयागराज के दारागंज में 5 फरवरी को पुरस्कार वितरण समारोह होगा. पुरस्कार स्वरुप एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र, शॉल और श्रीफल देकर द्राविड जी का सम्मान किया जाएगा. रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने यह जानकारी दी.

 

संस्कृत और संस्कृति के लिए सम्मान-

 

       काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ के पीठाधीश्वर और रामानंदी वैष्णवों के प्रधान आचार्य जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य के अनुसार हर वर्ष स्वामी रामानंदाच्रार्य जी की जयंती प्रसंग पर किसी विशिष्ट विद्वान को एक लाख रुपये का पुरस्कार प्रदान किया जाता है. संस्कृत और संस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए काशी से दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा पुरस्कार है. उन्होंने बताया कि 1993 से लगातार यह पुरस्कार वितरित हो रहा है. इस वर्ष का पुरस्कार काशी ही नहीं अपितु राष्ट्र की वैदिक सनातन धर्म की विद्या, संयम, त्याग, निष्ठा और सदाचार की अप्रतिमविमूर्ति आचार्य गणेशश्वर शास्त्री द्राविड को प्रदान किया जाएगा.

 

कौन हैं आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्राविड-

 

काशी के रामनगर में 9 दिसम्बर, 1958 को जन्में गणेश्वर शास्त्री द्राविड रामघाट स्थित सांग्वेद विद्यालय के संचालक हैं. इनके पिता राजराजेश्वर शास्त्री द्राविड को पण्डितराज कहा जाता था और भारत सरकार ने उन्हें पदमभूषण से सम्मानित किया था. गणेश्वर शास्त्री को वेद, कृष्णयजुर्वेद, तैत्तिरीय शाखा, शुक्लयजुर्वेद-शतपथ ब्राह्मण, वेदांग, न्यायादिदर्शन, पुराण, इतिहास, राज-शास्त्र, धर्म-शास्त्र काव्य-कोष, ज्योतिष, तंत्रागम एवं श्रौत का आधिकारिक विद्वान माना जाता है. हाल में अयोध्या में श्रीराम मंदिर के शिलान्यास की लिए मुहुर्त निकालने का श्रेय भी गणेश्वर शास्त्री द्राविड के खाते में है. स्वामी रामनरेशाचार्य कहते हैं- गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ का सम्मान भारत की सनातन वैदिक परंपरा का सम्मान है. उन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन और यज्ञों के संपादन में ही अपना पूरा जीवन लगा दिया. निजी घर-गृहस्थी नहीं बसाई. नंगे पांव रहकर यम-नियम का संपादन करते हुए ऋर्षि तुल्य जीवन जीते रहे. वस्त्र के नाम पर केवल एक धोती पहनते हैं.

 

रामानंदाचार्य पुरस्कार का इतिहास-

 

श्रीमठ की ओर से दिया जाने वाला जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार सबसे पहले प्रोफेसर भगवती प्रसाद सिंह को पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के कर कमलों से प्रदान किया गया. तब इसकी राशि दस हजार रुपये थी, जिसे बढ़ाकर एक लाख रुपया कर दिया गया. 1993 में महामंडलेश्वर काशिकानंद महाराज को काशीराज महाराजा विभूतिनारायण सिंह की अध्यक्षता में पहला पुरस्कार प्रदान किया गया. फिर काशीनरेश श्रीविभूतिनारायण सिंह के हाथों  ही पण्डितराज राजराजेश्वर शास्त्री द्राविड को मरणोपरांत इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह महज संयोग नहीं है कि उनके ही पुत्र आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्राविड को 2021 में यह पुरस्कार दिया जा रहा है. अबतक डॉ. कर्ण सिंह, आचार्य डॉ. रामकरण शर्मा, डॉ. विवेकी राय, डॉ. कमलेश दत्त त्रिपाठी, श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा उर्फ मनु शर्मा, प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल, आचार्य रामयत्न शुक्ल, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डॉ. उदय प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, प्रो. रमाकांत आंगिरस, प्रो. युगेश्वर, डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी आदि को यह पुरस्कार मिल चुका है.

 

रामानंदाचार्य जयंती 4-5 फरवरी को

 

       जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी ने बताया कि रामावतार श्रीसंप्रदायाचार्य रामानंदाचार्य जी का 723 वां जयंती महोत्सव इस बार भी उनके मूलपीठ श्रीमठ की ओर से दो दिवसीय अनुष्ठान के तौर पर 4 और 5 फरवरी को समायोजित है. इस बार यह आयोजन उनकी साधना पीठ श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के अलावे उनके प्राकट्य धाम, दारागंज, प्रयागराज में भी धूमधाम से किया जा रहा है. पहले दिन यानि चार फरवरी को श्रीमठ में सुबह 9 से 11 बजे तक स्वामी रामानंद जी का पूर्ण वैदिक गरिमा एवं समृद्धि से पूजन होगा. 11 बजे से दोपहर 01 बजे तक संतों, महंतों एवम भक्त विद्वानों के द्वारा आचार्य गुणगान होगा. दोपहर से शाम तक संत, महंत, भक्त और अभ्यागतों का वैष्णवाराधन यानि भंडारा चलेगा.  

 

स्वामी रामानंद की जन्मभूमि पर समारोह-

 

दूसरे दिन यानि 5 फरवरी को प्रयागराज के मोरी दारागंज स्थित जगदगुरु रामानंदाचार्य प्राकट्यधाम में दिनभर उत्सव होंगे. सुबह 10 बजे से 12 बजे तक जगदम्बा सुशीला देवी की गोद में विराजमान आचार्यश्री का पूजन होगा. दोपहर में समष्टि भंडारे का कार्यक्रम है. शाम 3 बजे से 6 बजे तक आचार्यश्री पर केन्द्रित विद्वत संगोष्ठी होगी और उसी शाम 6 बजे से जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार समर्पण का कार्यक्रम होगा

Saturday, July 4, 2020

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास व्रत-2020 गुरुपूर्णिमा से जबलपुर में

रामभक्ति धारा को समर्पित रामानंद संप्रदाय के वर्तमान पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दिव्य चातुर्मास महोत्सव इस साल जबलपुर में मां नर्मदा के पावन तट पर होना सुनिश्चित हुआ है। स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की साधना स्थली श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य हैं, जिसे वैराणी वैष्णव संप्रदाय अपने आचार्य स्वामी रामानंद की पादुका पीठ के नाम से पूजता है। दो महीने तक चलने वाले चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा यानि 5 जुलाई की पावन तिथि से होगा। 
Swami Ramnareshacharya
 


  काशी के श्रीमठ पीठाधीश्वर प्रत्येक वर्ष नियम पूर्वक चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से देश के अलग-अलग स्थानों पर करते रहे हैं। सभी प्रमुख तीर्थों और महानगरों में स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास अनुष्ठान समायोजित हो चुके हैं। पिछले साल माउंट आबू स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर प्रांगण में चातुर्मास व्रत का आयोजन हुआ था। इस वर्ष महाराजश्री जबलपुर में चातुर्मास के लिए संकल्पित हुए हैं। जबलपुर में मां नर्मादा के किनारे जिलेहरी घाट पर अवस्थित प्रेमानंद आश्रम को अनुष्ठान भूमि के रुप में चयनित किया गया है। 

   प्रेमानंद आश्रम में पावन चातुर्मास महापर्व का भव्य प्रारंभ 5 जुलाई गुरु पूर्णिमा से होगा। सियारामजी की कृपा छाया और स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास महापर्व के दौरान प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान होेंगे। प्रातः काल महाराजश्री पोषडोपचार विधि से श्रीसीताराम जी का पूजन करते हैं। फिर देव-ऋर्षि पितृतर्पण का कार्य संपादित करते हैं। समष्टि हवन और फिर स्वाध्याय का क्रम नियमित रुप से चलता है। दोपहर में वैष्णवाराधन और विश्राम के पश्चात संध्या काल के कार्यक्रम होते हैं। जिसमें आगंतुक संत-महंत अपने प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं। फिर महाराजश्री का आशीर्वचन स्वरुप प्रवचन होता है। चातुर्मास काल में सावन की प्रत्येक सोमवारी को भगवान शिव का रुद्राभिषेक के अलावे गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, संत सम्मेलन, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंद महोत्सव, विनायक चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व और महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। इसके अलावे राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और विराट भंडारे का आयोजन में बीच-बीच में होते रहता है। पूरे दो महीने तक अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन से भी पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है।  


Swami Ramnareshacharya chaturmas


जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम के श्रीमहंत श्यामदास जी महाराज उर्फ नागा बाबा ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा 5 जुलाई से लेकर भाद्र पूर्णिमा 02 सितम्बर, 2020 तक चलने वाले चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान देश भर से भक्त,सद् गृहस्थ, संत- महंत और महामंडलेश्वर पधारेंगे। कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की हर गाइडलाइंस खासकर साफ-सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष प्रबंध रखा जाएगा। आश्रम की विशालता, भव्यता, समुचित संसाधन और आवास की पर्याप्त सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए ही इस स्थान का चयन चातुर्मास महोत्सव के लिए किया गया है। आश्रम की प्राकृतिक छटा और संपूर्ण वातावरण कोरोना को दूर रखने में सहायक होगा, ऐसा व्यवस्थापकों का मानना है। 

महाराजश्री स्वयं भी इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों खासकर भंडारे और प्रवचनों के दौरान अनावश्यक भीडभाड़ न हो। उनकी ओर से विशाल परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग सहित कोरोना काल की जरुरी पाबंदियों का पालन अनिवार्य रुप से करने का निर्देश संतों- भक्तों को दिया गया है। ताकि चातुर्मास महापर्व का आध्यात्मिक स्वरूप हर स्थिति में बना रहे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। 

जबलपुर में महाराजश्री तीसरी बार चातुर्मास कर रहे हैं। सन 1990 और 2001 में भी आचार्यश्री यहां चातुर्मास व्रत किये थे। यह तीसरा आयोजन है, जो सन 2020 में हो रहा है।  

Friday, October 19, 2018

पूज्यपाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के प्रवचनांश, प्रसंग- विजयादशमी


Swami Ramnareshacharya
सबके मन में प्रतिशोध की भावना होती है, सबके मन में यह भावना होती है कि उसके हिसाब से ही सारे काम हों। सबके अपने-अपने संकल्प होते हैं। लेकिन इसके लिए जो लोग हमारे विपरीत हैं, उनका हम क्या करें? हमें बनाना है राम राज्य और हम प्रयोग कर रहे हैं रावण राज का। सरेआम सडक़ पर गलत काम हो, व्यभिचार हो, यह कदापि उचित नहीं। इस तरह से राम राज्य नहीं आएगा। रावण तो आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ। उसने तो राम जी की पत्नी का ही धोखे से अपहरण कर लिया। ब्राह्मणों की तो हत्या रोज ही होती थी, वेद ध्वनि बंद हो गई थी, यज्ञ बंद हो गए, माता-पिता का सम्मान बंद हो गया था, देवताओं का कोई सम्मान नहीं रहा। अर्थ यह कि धर्म की, श्रेष्ठता की, पवित्रता की, मर्यादाओं की, अच्छी परंपराओं की विधियां नष्ट हो गई थीं। दंड व प्रतिशोध का कोई विकल्प नहीं बच गया था। परन्तु तब भी राम जी ने हनुमान जी को भेजा, अंगद को भेजा, विभीषण, कुंभकर्ण और यहां तक कि पुलस्त्य को भी परोक्ष रूप से प्रेरित किया कि वे रावण को सुधरने के लिए समझाएं। ताकि रावण रास्ते पर आ जाए। राम जी ने रावण को पूरे मौके दिए, वे प्रतिशोध भावना के कारण अमर्यादित नहीं हुए। प्रतिशोध या किसी को दंड देने की भी एक मर्यादा होती है, एक उचित विधि होती है। हनुमान ने भी तरह-तरह से समझाया, अंगद ने भी रावण को खूब समझाया कि बिना हत्या-मारकाट, बिना युद्ध के ही सुधार हो जाए। रावण के ही कुटुंब के लोगों ने समझाया कि राम जी को उनकी धर्म पत्नी लौटा दो, धर्म का पालन करो, लेकिन जब रावण नहीं माना, तब राम जी ने अंतिम विकल्प के रूप में विधिवत व घोषित युद्ध का सहारा लिया। वे रावण की तरह छिपकर आक्रमण करने नहीं गए, उन्होंने रावण की तरह किसी को धोखा नहीं दिया। राम जी ने अमर्यादित व दुष्ट रावण को भी दंड देने के लिए युद्ध की तमाम मर्यादाओं का पालन किया। आक्रमण का वह तरीका नहीं था, जो आज दंगों के समय देखने को मिलता है या आतंककारी हमलों के समय देखने को मिलता है। राम जी की सेना ने खुलेआम सडक़ों पर मौत का तांडव नहीं मचाया। निर्दोष लोगों को नहीं मारा। लूटमार या हत्या या बलात्कार का सहारा नहीं लिया। युद्ध जीतने के बाद भी राम जी की सेना ने लंका में घुसकर कोई उत्पात नहीं मचाया। यदि सडक़ पर खुलेआम व्यभिचार होगा, अन्याय होगा, तो राम राज्य कैसे आएगा? एक हत्या करने के बाद हत्या की भावना बनी रहती है। लाखों में से कोई एक हत्यारा ही सामान्य हो पाता है।
प्रतिशोध के लिए और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना के लिए उन कृत्यों की जरूरत नहीं है, जिन कृत्यों की हम निंदा करते हैं। जोर-ज्यादती ठीक नहीं है। रावण जैसी तानाशाही ठीक नहीं है। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब किसी ने गांधी जी से कहा कि देश में तानाशाही की जरूरत है। गांधी जी ने जवाब दिया, ‘यह मैं भी मानता हूं, लेकिन जो लोग दस साल तानाशाही चला लेंगे, वो फिर लोकतंत्र को नहीं आने देंगे।’ प्रतिशोध भाव होना चाहिए, लेकिन सुधार के लिए होना चाहिए। हमें यथोचित मर्यादाओं, संविधान, धर्म के हिसाब से चलना चाहिए। हमें कदापि बर्बर नहीं होना चाहिए।

Sunday, July 15, 2018

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव इस साल तीर्थराज प्रयाग में

रामानंद संप्रदाय (वैष्णव वैरागी) के प्रधान आचार्य और श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज हर वर्ष की भांति चातुर्मास व्रत करने वाले हैं। इसके लिए इस बार उन्होंने तीर्थराज प्रयाग का चयन किया है।
 प्रयाग के संगम तट से महज एक किलोमीटर की दूरी पर गंगा किनारे जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकट्य भूमि पर दिव्य चातुर्मास के सारे मांगलिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।
 सुबह के पूजा-पाठ और दूसरे अनुष्ठान रामानंदाचार्य प्राकट्य परिसर स्थित हरित माधव मंदिर में होंगे। शाम के सत्संग और अन्यान्य कार्यक्रम परिसर के मंडप में संपन्न होंगे।  27 जुलाई, 2018 को  गुरु पूर्णिमा के दिन से महोत्सव की भव्य शुरुआत होगी।
स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज 
 देश भर के वैष्णव जन और महाराजश्री के भक्त वहां पहुंचेंगे और गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष अनुष्ठान में शामिल होंगे। चातुर्मास्य व्रत का महानुष्ठान  25 सितंबर, 2018 तक अनवरत जारी रहेगा।
 
रामानंदाचार्य चातुर्मास कार्ड
  इस दौरान कई विशाल सार्वजनिक भंडारे, संत सम्मेलन, हर सोमवार को विशेष रुद्राभिषेक, विशेष तिथि -त्योहारों पर खास उत्सव आयोजित होंगे। गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर विद्वत संगोष्ठी और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर विशेष उत्सवों की ऋंखला आयोजित है।




Sunday, January 7, 2018

प्रोफेसर सियाराम तिवारी को वर्ष 2018 का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी के ऐतिहासिक रामानंदाचार्य पीठ, श्रीमठ द्वारा 7 जनवरी को रामानंदाचार्य जयन्ती के  त्रिदिवसीय महोत्सव के प्रथम दिन बड़ी पियरी स्थित श्रीविहारम में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य के सान्निध्य में आयोजित संत-विद्वत-भक्त समागम के बीच विश्वभारती विश्वविद्यालय (शांति निकेतन ) के पूर्व आचार्य प्रो. सियाराम तिवारी को भक्ति साहित्य सेवा में विशिष्ट योगदान के लिए एक लाख रुपये का ''रामानंदाचार्य पुरस्कार'' प्रदान किया गया।

प्रो. सियाराम तिवारी को एक लाख रु. का पुरस्कार प्रदान करते पूर्व विधायक अजय राय
अपने सम्बोधन में प्रो.तिवारी ने कहा कि राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा परमाणु मिसाइल दागने की धमकी के बीच मानव संस्कृति अपूर्व चुनौती के दौर में है। ऐसे कठिन युगसंक्रमण के बीच स्वामी रामानंदाचार्य जी द्वारा काशी से प्रवर्तित रामभक्ति परंपरा के शास्वत व उदात्त मानवीय मूल्य प्रासंगिक और मानवता को सही दिशा देने में समर्थ हैं।

     प्रो.तिवारी ने समारोह के साथ नियोजित "विश्वगुरूत्व और रामभक्ति परंपरा '' विषयक विद्वत संगोष्ठी के परिप्रेक्ष्य में विद्वतजनों के विचारों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रामानंद जी की रामभक्ति परंपरा को आगे की पीढ़ी में उत्कर्ष प्रदान करने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम के अनुकरणीय उदात्त चरित्र को लोकमानस में सहज स्वरूप में स्थापित कर समाज को प्रेम और मर्यादा भाव से जोड़ने का अतुलनीय योगदान दिया। तुलसी दास की कुछ आधुनिक विद्वान समूहों द्वारा आलोचनाओं का प्रामाणिक उत्तर भी प्रो.तिवारी द्वारा रचित एवं रामानंदाचार्य स्मारक न्यास द्वारा प्रकाशित ग्रंथ "सत्य कहौं लिखि कागर कोरे" ग्रंथ के माध्यम से मिला, जिसका लोकार्पण भी समारोह के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो.परशुराम पाल ने किया।
ग्रंथ लोकार्पण करते प्रो.परशुराम पाल


   समारोह में ज.गु.रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने कहा कि रामानंदाचार्य पुरस्कार साहित्य व संस्कृति सेवा में  विशिष्ट योगदान के समादर की परंपरा है। सम्मान के भाव का विशिष्ट महत्व सभी संस्कृतियों और सभ्यता को उत्कर्ष प्रदान करने में रहा है।

     उक्त अवसर पर श्रीमठ द्वारा उपस्थित विद्वानों का भी सम्मान किया गया। संगोष्ठी में विचार व्यक्त करने वाले  विद्वत जनों में  सर्वश्री प्रो.एम. एन.राय , प्रो.प्रभुनाथ द्विवेदी, डा.जितेंद्र नाथ मिश्र, डा.देवव्रत चौबे, प्रो.राधेश्याम दूबे व प्रो.सभापति मिश्र आदि प्रमुख रहे।
मंच पर विराजते जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज


        रामानंदाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रो.तिवारी का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सविधि प्रक्रिया से सम्मान एवं अभिनंदन की विभिन्न प्रवृत्तियों को संपादित करने वालों में शामिल थे श्री अजय राय, पूर्व विधायक,अरुण शर्मा,डा. उदय प्रताप सिंह,अमूल्य शर्मा, सत्येन्द्र पाण्डेय, महेन्द्र, ए.के.राय- एडवोकेट, पं.वल्लभ पाठक, प्रो.सतीश राय आदि के अलावा   राजस्थान एवं बिहार रामानंद युवा आध्यात्मिक मंडल के सदस्यगण।मंच संचालन चंदन कुमारी ने किया। श्रीमठ के युवा  वैदिकजन ने मंगलाचरण की प्रस्तुति की। आरंभ में आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी के चित्र पर माल्यार्पण किया गया।



Monday, September 12, 2016

प्रभु को अर्पित करने के बाद ग्रहण करें भोजन - जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य

पटना,11 सितंबर।

सात्विक पदार्थो को सात्विक मन से परम प्रभु के लिए ही पकाया जाना और उन्हें ही सबसे पहले श्रेष्ठ प्रेम एवं संयतमना होकर समर्पित किया जाना, तत्पश्चात् उनका प्रसाद उनके ही रूप में ग्रहण करना एक आराधना ही है। यह आराधना महाराधना हो जाती है जब भोग हो प्रभुका छप्पन भोग और प्रसादग्राही हो ऊंच-नीच, जाति-भेद, वर्ण-भेद आदि से रहित सर्वजन। यह विचार जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने राजधानी में चल रहे दिव्य चातुर्मास्य के दौरान रखे। 

पटना में समष्टि भंडारे का चित्र
राजधानी के लाला लाजपथ राय भवन में चल रहे कार्यक्रम में रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज  ने कहा कि वैसे तो वैष्णवाराधन एक चलन सा हो गया है, पर प्रसाद की महत्ता तो तब ही अक्षुण्ण रह पाती है जब भोग के संसाधन, उसका पाक, प्रभु को अर्पण, प्रसाद-वितरण तथा उसकी सम्प्राप्ति सब कुछ नियमानुकूल और विधिवत हो।

 दिव्य चातुर्मास्य महोत्सव महायज्ञ के दौरान रविवार को बैंक रोड के मुहाने पर मंगलमय छप्पन भोग का भंडारा का आयोजन किया गया। स्वामी जी ने इस अवसर पर कहा कि जितनी भी अच्छी-से अच्छी वस्तुएं होती हैं, उसे हम सम्यक मन से प्रभु को समर्पित करते हैं। सब उन्हीं का तो है। ’त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’ यह केवल वाच्यात्मक नहीं भावनात्मक भी होनी चाहिये। तब प्रभु अपना सायुज्य देते हैं, यहां तक कि भोग में अपनी साम्यता भी दे देते हैं।

 प्रभु ऐसे समतावादी हैं कि जो भोग वे स्वयं लेते हैं अपने भक्तों को भी प्रदान कर देते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सम्यक रूप से भावभावित प्रेमरस संपृक्त अर्पण प्रभु का सायुज्य देते हुए भोग की साम्यता भी करवा डालती है। छप्पन भोगात्मक समष्टि भण्डारा का (वैष्णवाराधन) के समायोजन में सेवा-व्रति लोग मोह-ग्रस्त हो रहे थे, परन्तु जब आचार्यश्री ने यह समझाया कि यह तो प्रभु-कार्य है, इसमें आप तो केवल निमित्तमात्र हैं। गीता में कहा है- निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन। यह एक विराट महायज्ञ है, आप इसमें निमित्त बनें, शेष तो प्रभु स्वयं संभाल लेंगे। अजरुन का मोह नष्ट हुआ और कार्य में प्रवृत्त होने पर प्रभु-साक्षात्कार भी हुआ।

Thursday, September 8, 2016

शरणागतिके सभी अधिकारी हैं- स्वामी रामनरेशाचार्य

पटना में चल रहे चातुर्मास महायज्ञ के दौरान लाला लाजपत राय भवन में संध्याकालिन सत्संग के दौरान जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि लौकिक कर्मोंके समान कल्याणमार्गमें भी अधिकारीकी व्यवस्था है। सबलोग सभी कर्मोंको नहीं करवा सकते। अतएव कर्मसाधकोंको आमन्त्रित करनेवाला यह विज्ञापित करता है कि हमारे संस्थान (उद्योग)को कैसा साधक चाहिये। यदि वैसी योग्यतासे युक्त साधक नहीं हो तो उसे, अपने लिये उपयुक्त नहीं मानकर, लौटा देता है। उसे पूर्ण विश्वास होता है कि यह हमारे संस्थानकी फलदायकताको समृद्ध नहीं कर सकता।

    इसी प्रकारसे वैदिकशास्त्रोंने भी तत्-तत् फलदायक कर्मोंके सम्पादनके लिये अधिकारीका निर्धारण किया है।  मोक्षदायक ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वे ही अधिकारी हैं जो साधन-चतुष्टय सम्पन्न हैं; अर्थात् जिनके पास नित्य तथा अनित्यका विवेक हो, इस लोक एवं परलोकके समस्त भोगसाधनोंसे पूर्णतः विरक्ति हो, शम-दमादि छः सम्पत्तियाँ हों तथा दृढ़मुमुक्षुत्व (प्रबलतम मोक्षप्राप्तिकी इच्छा) हो। इतना ही नहीं, उपर्युक्त विशिष्ट साधनोंसे सम्पन्न साधकको ब्राह्मण होना आवश्यक है, वह भी पुरुष जाति का। क्योंकि ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानमें उपनयन-संस्कारसे मण्डित वेदाध्ययनके लिये अधिकृत मात्र ब्राह्मण ही है। वही संन्यासी बनकर ज्ञान-साधनाके अनुसार ज्ञानको प्राप्तकर मोक्षको प्राप्तकर सकता है। इस साधनामें क्षत्रियादि तथा स्त्रियोंकी अधिकारिता सर्वथा अवरुद्ध है।

   उन्होंने जोर देकर कहा कि कुछ आचार्योंने भक्तिको भी ब्रह्म-विद्या स्वरूप स्वीकारकर उसके प्रवेश-द्वारको क्षत्रियादि एवं स्त्रियोंके लिये बन्ध कर दिया है। केवल ब्राह्मण ही भक्ति-साधनाका अधिकारी है। इस सम्बन्धमें अन्यान्य महामनीषि आचार्य सहमत नहीं हैं। उनकी परमोदार घोषणा है कि भक्ति- साधनाके सभी अधिकारी हैं। उसका सम्पादन कर सभी मानव जीवनको परम धन्यतासे मण्डित कर सकते हैं।

    परन्तु शरणागतिकी उदारता तो आकाशके समान है। धन्य है वैदिक सनातन धर्म, धन्य हैं राम-कृष्णादि भगवदवतार तथा धन्य हैं वे आचार्य व सन्तगण जिन्होंने शरणागतिको प्रचारित एवं प्रसारितकर असंख्य जीवोंको परमफलसे विभूषित किया।
इन विचारोंको जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराजने अभिव्यक्त किया कल्याणकामियोंके लिये; जो अपने पटना-प्रवास के क्रममें लगातार लाला लाजपत राय सभागारमें विचारामृतकी वर्षा कर रहे हैं।

Thursday, July 30, 2015

जोधपुर में दिव्य चातुर्मास महोत्सव शुरू



  सगुण-निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास 30 जुलाई, 2015 से जोधपुर में प्रारम्भ हो गया। गुरुवार को भव्य शोभायात्रा के साथ महाराज श्री को जूनाखेड़ापति मंदिर तक लाया गया, जहां अगले दो माह तक वे विराजेंगे।

आज गुरु पूर्णिमा पर्व के साथ ही दिव्य चातुर्मास महोत्सव का विधिवत आरंभ हो गया।  

SWAMI RAMNARESHACHARYA
जोधपुर के प्रसिद्ध जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में महाराजश्री के चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान राम भावानुकूल अनेक धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन होगा। बीच-बीच में बड़े धार्मिक उत्सव भी होंगे। सावन महीने में प्रत्येक सोमवार को भगवान शंकर का भव्य अभिषेक होगा। सुबह से शाम तक विविध मांगलिक कार्यक्रम होंगे, जिसमें हवन, पूजन, सहस्त्राचन, देव-पितृ तर्पण यज्ञ, स्वाध्याय औऱ संध्या समय भजन-प्रवचन जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। बीच में पड़ने वाले सारे पर्व-त्यौहार भी उत्सव नुमा माहौल में मनाए जाएंगे।कार्यक्रम स्थल पर ही नियमित रुप से भजन और भंडारे का प्रबंध किया गया है।  देश भर से अनेक संत और विद्वान के साथ बड़ी संख्या में भक्तगण भी चातुर्मास के दौरान जोधपुर पधारेंगे। इनके ठहरने का भी प्रबंध चातुर्मास समिति ने किया है।

उल्लेखनीय है कि महाराजश्री ने वर्ष १९९४ में भी जोधपुर में चातुर्मास व्रत किया था। पूरे २० साल बाद जोधपुर में फिर से चातुर्मास समायोजित हुआ है।   एक खास बात यह है कि पिछले चातुर्मास में भी आयोजन समिति के अध्यक्ष सेनाचार्य स्वामी अचलानन्द जी गिरि थे और इस बार भी उन्हीं की अध्यक्षता में कार्यक्रम शुरू हुआ है। 

स्वामी रामनरेशाचार्य
जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में नियमित पूजन, हवन, प्रवचन को लेकर सारी तैयारियां पूर्ण हो चुकी हैं। चातुर्मास के प्रति स्थानीय लोगों में बहुत उत्साह है । जोधपुर शहर में जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगे हुए हैं।   चातुर्मास स्थल शहर के एक मुख्य मार्ग पर स्थित है, इसलिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

Friday, October 31, 2014

स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज का जनकपुर प्रवास, तैयारियां शुरू

जनकपुर में विवाह पंचमी महोत्सव  के मुख्य यजमान होंगे जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज

Janaki Temple, Janakpur, Nepal
सनातन धर्मावलम्बियों के लिए इस बार की विवाह पंचमी यानि प्रभु श्रीरामजी का सीताजी के साथ विवाह की तिथि विशेष अहम होने जा रही है। हिन्दुओं के पावन तीर्थ जनकपुर धाम (नेपाल) में आयोजित होने वाले वार्षिक मुख्य समारोह के प्रधान यजमान खुद जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज रहने वाले हैं। श्रीराम जानकी विवाह उत्सव 27 नवबंर और प्रभु श्रीराम का तिलकोत्सव 25 नवंबर,2014 को प्रस्तावित है।
प्रत्येक वर्ष की भांति प्रभु श्रीराम की बारात भी अयोध्या, काशी और बक्सर जैसे स्थानों से निकलेगी और
जिस रास्ते प्रभु राम जनकपुर गये थे, उसी रास्ते का अनुगमन करते हुए जनकपुर तक जाएगी। रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ के वर्तमान आचार्य श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल हो रहे हैं। इसलिए भी इस साल का महत्व काशी स्थित श्रीमठ के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व का है।
Maa Janki Temple
आचार्यश्री का कारवां श्रीमठ, काशी से 24 नवंबर को प्रस्थान करेगा। उसी दिन दोपहर में बक्सर होते हुए आरा पहुंचेगा, जहां संत, श्रमहंत और सदगृहस्थ दोपहर का भोजन और विश्राम करेंगे। फिर शाम में दर्जनों गाड़ियों के साथ ये काफिला पटना रवाना होगा। वहीं यात्रा का पड़ाव है। रात्रि विश्राम के बाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में यात्रा मुजफ्फरपुर के लिए प्रस्थान करेगी। दोपहर में भोजन और विश्राम वहीं होगा। उसी शाम सभी संत औऱ भक्तगण जनकपुर पहुंच जाएंगे।
बिहार के विभिन्न स्थानों पर यात्रा में शामिल लोगों के  स्वागत औऱ अभिनंदन की पुरजोर तैयारी चल रही है। रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल से जुड़े लोग देशभर से आए रहे संत-महात्मा और भक्तों के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में जी जान से लगे हैं। यात्रा का दौरान बाहर से आ रहे अतिथियों के कोई परेशानी न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
श्रीमठ, काशी से जुड़े आरा निवासी सत्येन्द्र पाण्डेय ने बताया कि श्रीराम विवाह यात्रा का पहला पड़ाव आरा में पड़ रहा है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गयी है। आरा में अतिथियों को सुरुचिपूर्ण बिहारी व्यंजन परोसा जाएगा। यात्रा को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर तरह के प्रबंध किये जा रहे हैं। प्रचार-प्रसार के लिए पर्चा, पोस्टर और होर्डिंग्स बनवाये जा रहे हैं।




Sunday, June 9, 2013

बिहार के आठ दिवसीय प्रवास पर आरा पहुंचे स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य

बिहार की आठ दिवसीय धर्म यात्रा पर आरा पहुंचे जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा है कि देश में ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनना चाहिए जिसमें पूरे देश को एक साथ लेकर चलने की क्षमता हो। आरा में ईटीवी के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी से आरएसएस औऱ उसके दूसरे संगठन के लोग खुश नहीं है, इसीलिए उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में विलंब हो रहा है।
आरा प्रवास के दौरान महाराजश्री आज यानि 9 जून 2013 को भोजपुर जिले के शाहपुर और बिहियां के कई गांवों का दौरा किया। सबसे पहले वे गंगा तट पर बसे बहोरनपुर गांव में गये और भक्तों को आशीर्वाद दिया। फिर गौरा और बारा आदि गांवों में भी महाराजश्री के प्रवचन हुए। अगले दो दिनों तक स्वामी जी बक्सर जिले के कई गांवों में प्रवास करेंगे। दरअसल बक्सर में आगामी दिसम्बर माह में श्रीमठ की ओर से प्रस्तावित कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारियां भी शुरू हो गयी हैं। महाराज श्री अपने प्रवास के क्रम में श्रीराम महायज्ञ को लेकर भी भक्तों को निमंत्रित कर रहे हैं।

Friday, February 22, 2013

जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरित

प्रयाग महाकुंभ के दौरान वसंत पंचमी के दिन (15 फरवरी,2013 को) दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर ,जो जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकटय स्थली के नाम से विख्यात है,में विशेष सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। इस मौके पर वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2013 का ये पुरस्कार हिन्दी,संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य के उदभट विद्वान और काशी निवासी प्रोफेसर प्रभुनाथ द्विवेदी को सौंपा गया। इस मौके पर राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा सहित बड़ी संख्या में संत,श्रीमहंत,विद्नान और श्रद्धालु मौजूद थे।
  जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन भी वसंत पंचमी के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

Monday, October 24, 2011

जबलपुर में श्रीराम महायज्ञ

रामभक्ति परंपरा और रामानंद सम्प्रदाय के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ काशी यूं तो वर्षभर कोई न कोई मांगलिक आयोजन करते हीं रहता है। अभी काशी में तीन दिवसीय शरद सांस्कृतिक महोत्सव संपन्न हुए चंद दिन हीं बीते थे कि आचार्यश्री अब जबलपुर में होने जा रहे शतकोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारी में जुट गये हैं। जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामीश्री रामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सानिध्य में जबलपुर के जिलहरी घाट पर होने वाले इस महायज्ञ की तैयारियां अब अंतिम चरण में हैं। मां नर्मदा के तट पर 29 अक्टूबर से आरंभ होकर ये यज्ञ 4 नवम्बर को पूर्ण होगा। एक दिन पहले यानि 28 अक्टूबर को हीं भव्य शोभायात्रा का समायोजन किया गया है। कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ में भाग लेने के लिए देश भर से साधु-संत,प्रवचनकर्ता, याज्ञिक पंडित और श्रद्धालु आने वाले हैं। आयोजकों ने इस निमित्त खास प्रबंध किये हैं।
श्रीराम महायज्ञ में कोटि देवताओं का आवाहन किया जाएगा। सामूहिक भंडारे का कार्यक्रम अनवरत ढंग से चलेगा। संत पुरुषों के श्रीमुख से ज्ञानगंगा की रसधारा बहेगी। जबलपुर और उसके आसपास के श्रीराम भक्तों और रामानंदी वैष्णव संतों को इस आयोजन का इंतजार है। उन्हें देश भर से आने वाले संत-महात्माओं के दर्शन और पूजन का एक साथ लाभ प्राप्त होगा , साथ हीं यज्ञीय कर्मकांडों में शामिल होकर जीवन को परम धन्य बनाने का सुअवसर भी प्राप्त हो जाएगा। आइए हम इस यज्ञ के सफल आयोजन के लिए परम प्रतापी प्रभु श्रीराम का आह्वान करें और इस यज्ञ में तन-मन-धन से शामिल होकर अपने जीवन को सफल बनावें..