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Wednesday, July 21, 2021

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव- 2021 जयपुर में

 

जयपुर में चातुर्मास महोत्सव गुरु पूर्णिमा से

डॉ. देवकुमार पुखराज

वाराणसी, 21 जुलाई।

रामभक्ति धारा को समर्पित रामानंद संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दिव्य चातुर्मास महोत्सव इस वर्ष जयपुर में होना सुनिश्चित हुआ है। स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की साधना स्थली, काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ के वर्तमान आचार्य हैं, जिसे बैरागी वैष्णव संप्रदाय और सगुण एवम निर्गुण रामभक्ति परंपरा का मूल आचार्यपीठ माना जाता है। चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा यानि 24 जुलाई की पावन तिथि से होगा।

काशी के श्रीमठ पीठाधीश्वर प्रत्येक वर्ष नियम पूर्वक चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से देश के अलग-अलग स्थानों पर करते रहे हैं। सभी प्रमुख तीर्थों और महानगरों में स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास अनुष्ठान समायोजित हो चुके हैं। पिछले साल जबलपुर के जिलहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम में और उसके साल भर पहले यानि 2019 में माउंट आबू स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर प्रांगण में चातुर्मास व्रत का आयोजन हुआ था।

रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल, जयपुर के संयोजक गजानन अग्रवाल बताते हैं कि महाराजश्री जयपुर में तीसरी बार चातुर्मास करने जा रहे हैं। सन 2002 और 2009 में भी आचार्यश्री यहां चातुर्मास अनुष्ठान पूर्ण किये थे। यह तीसरा आयोजन है, जो सन 2021 में हो रहा है। 

जयपुर के बनीपार्क स्थित खण्डाका हाउस ( पीतल फैक्टरी के समीप) में चातुर्मास महापर्व का भव्य प्रारंभ गुरु पूर्णिमा की पावन तिथि से होगा। चातुर्मास्य महोत्सव के संयोजक नेमप्रकाश संतकुमार खण्डाका के मुताबिक सियारामजी की कृपा छाया और स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास महापर्व के दौरान प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान होगें। प्रातः काल महाराजश्री पोषडोपचार विधि से श्रीसीताराम जी का पूजन करते हैं। फिर देव-ऋर्षि पितृतर्पण का कार्य संपादित करते हैं। समष्टि हवन और फिर स्वाध्याय का क्रम नियमित रुप से चलता है। दोपहर में वैष्णवाराधन और विश्राम के पश्चात संध्या काल के कार्यक्रम होते हैं। जिसमें आगंतुक संत-महंत अपने प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं। फिर महाराजश्री का आशीर्वचन स्वरुप प्रवचन होता है।

जयपुर चातुर्मास समिति के प्रमुख स्तंभ पुष्कर उपाध्याय के मुताबिक स्वामीजी का जयपुर में 23 जुलाई 2021 को शुभागमन हो रहा है। 24 जुलाई, 2021 को प्रातः 9 बजे से सर्वावतारी श्रीरामलला जी के पूजन व पंचमहायज्ञ के उपरांत गुरुपूर्णिमा महोत्सव का शुभ कार्यक्रम प्रारंभ होगा। गुरुपूजन के पश्चात महाराजश्री के आशीर्वाद स्वरुप प्रसादी की भी व्यवस्था है।


 

डॉ. शास्त्री कोसलेन्द्र दास के अनुसार चातुर्मास काल में सावन की प्रत्येक सोमवारी को भगवान शिव का रुद्राभिषेक के अलावे गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, संत सम्मेलन, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंद महोत्सव, विनायक चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व और महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। चातुर्मास के दौरान बीच-बीच में राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और विराट भंडारे का आयोजन होते रहता है। पूरे दो महीने तक अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन से भी पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है।

श्रीमठ, काशी से जुड़े उपेन्द्र मिश्र ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा 24 जुलाई से लेकर भाद्र पूर्णिमा 20 सितम्बर, 2021 तक चलने वाले चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान देश भर से सद्गृहस्थ भक्त, संत-श्रीमहंत और महामंडलेश्वर पधारेंगे। कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की हर गाईडलाइंस खासकर साफ-सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष प्रबंध रखा जाएगा। खण्डाका हाउस की विशालता, भव्यता, समुचित संसाधन और आवास की पर्याप्त सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए ही इस स्थान का चयन चातुर्मास महोत्सव के लिए किया गया है। परिसर का वातावरण कोरोना को दूर रखने में सहायक होगा, ऐसा व्यवस्थापकों का मानना है।

 

महाराजश्री स्वयं भी इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों खासकर भंडारे और प्रवचनों के दौरान अनावश्यक भीडभाड़ न हो। उनकी ओर से विशाल परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग सहित कोरोना काल की जरुरी पाबंदियों का पालन अनिवार्य रुप से करने का निर्देश संतों- भक्तों को दिया गया है। ताकि चातुर्मास महापर्व का आध्यात्मिक स्वरूप हर स्थिति में बना रहे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। महामारी को देखते हुए ही इस बार संध्याकालीन प्रवचन का लाइव प्रसारण फेसबुक और यू-ट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर किये जाने का प्रबंध किया गया है, ताकि श्रद्धालु और भक्त दूर-दराज अपने-अपने घरों में बैठकर भी सत्संग और सभी महत्वपूर्ण उत्सवों का आनंद ले सकें।


Sunday, August 2, 2020

जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम में भव्य झूलनोत्सव का आयोजन Jhulan Mahotsav in Jabalpur

झूलनोत्सव अंशी में अंश की विलिनता का महोत्सव- स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज
" अंशी में विलीन होकर ही अंश अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त करता हैं "

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ( Jagadguru Ramanandacharya Swami Sri Ramnareshacharya ji Maharaj ) का परमकल्याणकामियों के लिये अमृतवर्षा:-
प्रसंग- भगवान का झूलनोत्सव

Jhulan Mahotsav by Swami Ramnareshacharya
 वैदिकशास्त्रों के अनुसार जीव अंश हैं तथा परमेश्वर अंशी हैं। अंशी में विलीन होकर ही अंश अपने वास्तविक परमस्वरूप को सम्प्राप्त करता हैं । अतएव अंश की सतत् क्रियायें अपने परमप्रयोजन की सिद्धि के लिये चलती रहती हैं ।
      सभी जलधाराएँ अपने अंशी समुद्र को पाकर ही परमस्वरूप को प्राप्त करती हैं, इसके बिना उन्हें विश्राम कहाँ। कहाँ ऐसे ही घटा-आकाश, मठाकाशादि अपने अंशी महाकाश में विलीन होकर पूर्णता को प्राप्त करते हैं। , तभी तो आकाश में प्रक्षिप्त मिट्टी के टुकड़े पुनः पृथ्वी पर लौटकर ही अपने अंशी पृथ्वी में विलीन होकर परम शान्ति को प्राप्त करते हैं, यही तो अंशों का परमगन्तव्य एवं परम प्राप्तव्य हैं ।

Bhagwan on Jhulan 


इसी प्रकार से संसार की सभी जीवात्माएं सतत् अपने अंशीभूत परमेश्वर को खोजती रहती हैं अपने प्रयत्नों से । क्योंकि उनको परमस्वरूप, परमविश्राम, परमानन्द और दिव्यधाम की सम्प्राप्ति तो तभी होगी। इसी को परमेश्वर ने प्रकट होकर अपनी दिव्य क्रीड़ाओं का सम्पादन कर उसके अनुसरण के लिये सतत् अंशी अन्वेषण नाम से जीवों को परम मंगलमय अवसर प्रदान किया है।

   इसी परमलाभ के सम्पादन के लिये प्रेमानन्द आश्रम में परम मंगलमय झूलनोत्सव समायोजित हैं, जिसका पूर्ण निष्ठा-तत्परता तथा प्रेम के साथ परम कल्याणकामी आस्वादन कर रहें हैं ।

प्रतिदिन - झूलन तथा सम्पूर्ण परिसर का उत्कर्ष पूर्ण श्रृंगार, परमप्रभु श्रीरामलला जी का वैदिक गरिमा के साथ झूलन पर विराजना, साविधि उनका पूजन,  सुप्रतिष्ठित गायकों द्वारा झूलनगीतों का गायन, भक्तों एवं सन्तों द्वारा परमप्रभु को परमप्रेम एवं मर्यादा से झूलाना,  उत्तर पूजन, महाआरती तथा परमप्रभु का अपने दिव्यमहल में पधारना आदि मांगलिक क्रम संपादित होता हैं । इसके अनन्तर दिव्यधाम के समान सभी कल्याणकामी समानरूप से परमप्रभु का (झूलनबिहारी सरकार का ) प्रसाद ग्रहण करते हैं ।


परम कल्याणकामियों को अपने सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन की परमधन्यता का अवबोध - निरन्तरता के साथ प्रवाहित होने लगता हैं, ऐसा हो भी क्यों नहीं , अब तो उन्होंने अपने अंशी को पाया ही नहीं अपितु उसे झुलाया भी। ये ही तो उन्हें  परमाभीष्ट था ।
झूलन महोत्सव में प्रेमानंद आश्रम के श्रीमहंत नागा श्यामदास जी, व्यास राघवाचार्य जी महाराज और अयोध्या से पधारे मानसकेसरी जी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।  जय सियाराम

Thursday, September 15, 2016

पटना चातुर्मास्य में समरस समाजके निर्माणमें संतों का योगदान विषयक संगोष्ठी

पटना चातुर्मास्य के दौरान हिन्दी दिवस पर संगोष्ठी का उदघाटन करते स्वामी रामनरेशाचार्य जी एवम् हिन्दी सेवी विद्वान

पटना में जारी दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञके सम्पादन के क्रम में हिन्दी दिवस यानि 14 सितंबर को एक विद्वत् गोष्ठी का समायोजन जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में सुसम्पन्न हुआ, जिसमें भीमराव अंबेडकर विवि. मुजफ्फरपुर के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार सिंह, नालंदा खुला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रासबिहारी सिंह, और बिहार-झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव श्री विजय शंकर दुबे और काशी से पधारे प्रो. अशोक कुमार सिंह की गरिमामयी उपस्थिति रही। पूरे कार्यक्रम के संयोजक थे प्रो. डॉ. श्रीकान्त सिंह, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना। 

  सबसे पहले अभिनंदनीय संत-साहित्यके मर्मज्ञ महानुभावों का संक्षिप्त परिचय डॉ. श्रीकान्त सिंह ने कराया। कार्यक्रम का शुभारंभ जगगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज एवं संत-साहित्यके मर्मज्ञ महानुभावोंके द्वारा सूर्य-साक्षी स्वरूप दीप-प्रज्वलनन सह परम प्रभु श्री सीतारामजी के माल्यार्पणके साथ  हुआ।


मंगलाचरणके पश्चात् काशी से पधारे प्रो. अशोक सिंह को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने एक गीत -"सात खंड नवद्वीप विदित यह कलिमल हरनी गाथा...." के माध्यमसे आद्य जगदगुरु रामानन्दाचार्यजी की जीवन- गाथा से लेकर सम्प्रति जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी तक की कृतिको अपनी रसमयी वाणी में प्रस्तुत किया । शीर्षक की व्याख्या करते हुये डॉ. श्रीकान्त सिंहने ’संत’ तथा ’समरसता’ को परिभाषित किया। 


पश्चात् प्रो. रास बिहारी प्रसाद सिंह, कुलपति नालंदा खुला वि.वि. ने कहा कि मैं साधु और संतमें भेद मानता हूँ। साधु समाजसे कम जुड़ा रहता है पर संत समाजसे जुड़कर उसका कल्याणकामी होते हैं।


  बिहार और झारखंड सरकार के मुख्य सचिव और नालंदा खुला विवि के पूर्व कुलपति
श्री विजय शंकर दुबे  कहा कि वर्तमान समाज की रक्षा केवल रामानन्द सम्प्रदाय का मूल मंत्र ’जाति पाँति पूछै नहीं कोई। हरिको भजै सो हरि का होई॥’ के द्वारा ही सम्भव है और यह मात्र संत-समाज और विशेषतः स्वामी रामनरेशाचार्यजी जैसे संत ही कर सकते हैं। कोई सरकार, प्रशासन या राजनीतिज्ञ नहीं कर सकता। कबीर भी संत थे तथा तुलसीदास भी संत थे, पर समाजके प्रति जो अवदान गोस्वामी तुलसीदासजी का है वह कबीर का नहीं है। उन्होंने कहा कि ’ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी’ नहीं पर यह ’ढोल, गंवार, सूद, पशु नारी’ है यह राजापुरवालों का है। सूदका अर्थ है- हिंसक।

अगले वक्ता के रूप में उदबोधन हुआ प्रो. प्रमोद कुमार सिंह, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष,  मुजफ्फरपुर का। इन्होंने सर्वप्रथम बताया कि ’क्षुद्र’ शब्द ही ’शूद्र’ हो गया है। काव्य-शास्त्रमें जो वक्तव्य होता है वह कवि का नहीं वरन वक्ता का होता है। अतः ’ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी’ समुद्र का वक्तव्य है। अतः तुलसीदास को इससे लांक्षित नहीं किया जा सकता। 


संत तो निःश्रेयस की ओर ले जाता है। संत सम भाव हैं, समत्व है, समदर्शी होता है। समदर्शिताके बिना कोई संत नहीं हो सकता। जैसे सदना, जो स्वामी रामानन्दका शिष्य था।


आचार्य श्री स्वामी रामनरेशाचार्यजी ने अपने मंगलाशीर्वचन में सभी विद्वानों के भावों का समर्थन करते हुए समरसता को सहज भावसे समझाया। इसके पश्चात् स्वामी जी महाराज ने विद्वानों को साविधि स्वयं अभिषेक कर पुष्पमाला, शॉल, मिष्टान, मठ साहित्य और दक्षिणादिक द्वारा सम्मानित किया। अंत में संत साहित्य के विद्वान और काशी से पधारे प्रोफेसर डॉ. उदय प्रताप सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

Thursday, September 8, 2016

शरणागतिके सभी अधिकारी हैं- स्वामी रामनरेशाचार्य

पटना में चल रहे चातुर्मास महायज्ञ के दौरान लाला लाजपत राय भवन में संध्याकालिन सत्संग के दौरान जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि लौकिक कर्मोंके समान कल्याणमार्गमें भी अधिकारीकी व्यवस्था है। सबलोग सभी कर्मोंको नहीं करवा सकते। अतएव कर्मसाधकोंको आमन्त्रित करनेवाला यह विज्ञापित करता है कि हमारे संस्थान (उद्योग)को कैसा साधक चाहिये। यदि वैसी योग्यतासे युक्त साधक नहीं हो तो उसे, अपने लिये उपयुक्त नहीं मानकर, लौटा देता है। उसे पूर्ण विश्वास होता है कि यह हमारे संस्थानकी फलदायकताको समृद्ध नहीं कर सकता।

    इसी प्रकारसे वैदिकशास्त्रोंने भी तत्-तत् फलदायक कर्मोंके सम्पादनके लिये अधिकारीका निर्धारण किया है।  मोक्षदायक ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वे ही अधिकारी हैं जो साधन-चतुष्टय सम्पन्न हैं; अर्थात् जिनके पास नित्य तथा अनित्यका विवेक हो, इस लोक एवं परलोकके समस्त भोगसाधनोंसे पूर्णतः विरक्ति हो, शम-दमादि छः सम्पत्तियाँ हों तथा दृढ़मुमुक्षुत्व (प्रबलतम मोक्षप्राप्तिकी इच्छा) हो। इतना ही नहीं, उपर्युक्त विशिष्ट साधनोंसे सम्पन्न साधकको ब्राह्मण होना आवश्यक है, वह भी पुरुष जाति का। क्योंकि ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानमें उपनयन-संस्कारसे मण्डित वेदाध्ययनके लिये अधिकृत मात्र ब्राह्मण ही है। वही संन्यासी बनकर ज्ञान-साधनाके अनुसार ज्ञानको प्राप्तकर मोक्षको प्राप्तकर सकता है। इस साधनामें क्षत्रियादि तथा स्त्रियोंकी अधिकारिता सर्वथा अवरुद्ध है।

   उन्होंने जोर देकर कहा कि कुछ आचार्योंने भक्तिको भी ब्रह्म-विद्या स्वरूप स्वीकारकर उसके प्रवेश-द्वारको क्षत्रियादि एवं स्त्रियोंके लिये बन्ध कर दिया है। केवल ब्राह्मण ही भक्ति-साधनाका अधिकारी है। इस सम्बन्धमें अन्यान्य महामनीषि आचार्य सहमत नहीं हैं। उनकी परमोदार घोषणा है कि भक्ति- साधनाके सभी अधिकारी हैं। उसका सम्पादन कर सभी मानव जीवनको परम धन्यतासे मण्डित कर सकते हैं।

    परन्तु शरणागतिकी उदारता तो आकाशके समान है। धन्य है वैदिक सनातन धर्म, धन्य हैं राम-कृष्णादि भगवदवतार तथा धन्य हैं वे आचार्य व सन्तगण जिन्होंने शरणागतिको प्रचारित एवं प्रसारितकर असंख्य जीवोंको परमफलसे विभूषित किया।
इन विचारोंको जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराजने अभिव्यक्त किया कल्याणकामियोंके लिये; जो अपने पटना-प्रवास के क्रममें लगातार लाला लाजपत राय सभागारमें विचारामृतकी वर्षा कर रहे हैं।

Monday, September 5, 2016

अबलौं नसानी अब न नसैहौं' का पटना में लोकार्पण

पटना में चल रहे जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास्य महोत्सव के दौरान गत 2 सितंबर, 2016 को  'अबलौं नसानी अब न नसैहौं' नाम से प्रवचन पुस्तक का विमोचन संपन्न हुआ। चित्र में (दाएँ से) श्री ज्ञानेश उपाध्याय-राजस्थान पत्रिका, डॉ. संजय पासवान-पूर्व मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, श्रीप्रमोद मुकेश-संपादक,दैनिक भास्कर, पटना,  पूज्य महाराजश्री, पदमश्री रामबहादुर राय-अध्यक्ष-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, श्रीनरपतसिंह राजवी-विधायक एवं पूर्व मंत्री तथा शास्त्री डॉ. कोसलेन्द्र दास। 

महाराज श्री के प्रवचनों के इस संग्रह का संकलन और संपादन ज्ञानेश उपाध्याय ने किया है। ये उनकी चौथी पुस्तक है।

Monday, November 3, 2014

भगवान विष्णु के चार महीने तक सोने- जगने का रहस्य

चातुर्मास व्रत क्यों और कैसे 

वर्षा काल के चार महीनों को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। इस दौरान संत-महात्मा यात्रा करने से बचते हैं और एक ही जगह रुक जप-तप करते हैं।  माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और  उनके अधिपति भगवान विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जगते हैं। उस दिन को देवोत्थान एकादशी और हरिप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस चार माह की अवधि मे कोई विवाह, नया निर्माण , कारोबार और शुभ-मंगल कार्य आरंभ नहीं होता।
swami Ramnareshacharya


श्रद्धालु जन सोचते होंगे कि देवता भी क्या सचमुच सोते हैं। पर वे एकादशी के दिन सुबह तड़के ही विष्णु और उनके सहयोगी देवताओं का पूजन करने के बाद शंख- घंटा घड़ियाल बजाने लगते हैं। पारंपरिक आरती- कीर्तन के साथ वे गाने लगते हैं- उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओं देवा।‘इस आह्रान में भी संदेश छुपा है।

श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी  के वर्तमान पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी  के अनुसार वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव बताने, उस प्रभाव से अपना सामंजस्य बिठाने का संदेश छिपा है। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इस वजह से पृथ्वी पर कीट-पतंगों की बहुतायत हो जाती है। ऋषियों ने कहा कि इन चार महीनों में विष्णु सो जाते हैं। यह अवधि आहार विहार के मामले में खास सावधानी रखने तक ही सीमित नहीं है। एक और कथा बताती है कि एक बार लक्ष्मी जी ने विष्णु भगवान से कहा कि आप विश्राम क्यों नहीं करते। कहते हैं कि लक्ष्मी जी के कहने पर ही भगवान विष्णु ने बरसात को अपने विश्राम के लिए चुना।

इसमें खास शासन अनुशासन भी है। इसका उद्देश्य वर्षा के दिनों में होने वाले प्रकृति परिवर्तनों के कारण फैलने वाली मौसमी बीमारियों से सुरक्षा भी है। निजी जीवन में स्वास्थ्य संतुलन का ध्यान रखने के साथ यह चार माह की अवधि साधु- संतों के लिए भी विशेष दायित्वों का तकाजा लेकर आती है। घूम-घूम कर धर्म अध्यात्म की शिक्षा देने, लोक कल्याण की गतिविधियों को चलाते रहने वाले साधु संत इन दिनों एक ही जगह पर रुक कर साधना शिक्षण करते हैं।

 श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी नियमित तौर पर हर साल चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान और शास्त्रीय गरिमा के अनुसार करते हैं। वे विभिन्न शहरों में हरेक साल इस अनुष्ठान को करते हैं। सुबह से शाम तक इस दौरान धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन किया जाता है। इस मौसम में पड़ने वाले व्रत-त्यौहार, जैसे- सावन की सोमवारी, तुलसीदास जयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, नंद महोत्सव और झूलनोत्सव जैसे त्योहार पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं।

स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सान्निध्य में संत सम्मेलन, विद्धत संगोष्ठी, दलित सम्मेलन जैसे कार्यक्रम चातुर्मास महोत्सव के दौरान होते हैं। शाम की सभा में भजन-प्रवचन का सिलसिला निर्वाध रुप से चलता है। रामानंद संप्रदाय से जुड़े संत-श्रीमहंत और दूसरे महात्मा गण इस दौरान एकत्रित होते हैंं और संप्रदाय की एकता को लेकर योजनाएं बनाते हैं।

Friday, December 27, 2013

आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है- स्वामी रामनरेशाचार्य

डा. राधिका नागरथ महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए
हरिद्वार 21 सितंबर। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने कहा कि आज देश संकट के दौर से गुजर रहा है। देश के सामने आज धर्म, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में चारों ओर संकट ही संकट दिखार्इ दे रहा है। हर क्षेत्र में गिरावट आर्इ है। पूरे देश में आज नैतिकता और चरित्र का पतन होता दिखाई दे रहा है।
वे कनखल में हरिगंगा सभागार में हरिद्वार के नागरिकों की ओर से जनअधिकार अभियान और गाँधी जागृति मिशन द्वारा आयोजित नागरिक अभिनन्दन समारोह में बोल रहे थे। यह अभिनन्दन समारोह स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज के चातुर्मास के समापन के अवसर पर आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि रामानंदा सम्प्रदाय ने सामाजिक जनजागरण के लिए सराहनीय कार्य किया। रामानंदाचार्य जी की वजह से समाज में फैली सामाजिक विषमताओं को दूर किया गया। उन्होंने कहा कि भक्त रैदास से बड़ा कोर्इ भक्त नहीं था। मीराबाई समेत क बड़े विद्वानों और संतों ने रैदास महाराज से दीक्षा ली। जो भारत की सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार प्राध्यापक डा. कमलकांत बुधकर ने कहा कि महाराज श्री ने चातुर्मास के माध्यम से वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा तीर्थनगरी हरिद्वार को ऊर्जावान बनाने का कार्य किया है। उन्होंने रामानंद सम्प्रदाय को सनातन धर्म की उच्च मर्यादाओं को साबित करते हुए जाति- पाति का भेद मिटाकर समाज को एक सूत्र में बांधने कार्य किया है।
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक सुधीर कुमार गुप्ता ने कहा कि महाराज श्री के हरिद्वार आगमन से ऐसा लग रहा है कि मानों शिव की नगरी में राम और शिव का मिलन हो रहा है। गुप्ता ने कहा कि राम शिव में और शिव राम में रमन करते है। कार्यक्रम की आयोजिका डा. राधिका नागरथ ने महाराज श्री को गंगाजलि भेंट करते हुए कहा कि जिस तरह माँ गंगा अपने पावन जल से हमें शीतलता प्रदान करती है वैसे ही महाराज श्री के उपदेश हमें हमेशा शीतलता प्रदान करते रहेंगे। कार्यक्रम के संचालक पुरूषोतम शर्मा गांधीवादी ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय के निष्काम सिद्धि का मार्ग ही नहीं बलिक दरिद्रनारायण की सेवा के लिए लोक संग्रह का मार्ग भी तय करता है। उन्होंने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य वेदान्त एवं सनातन धर्म का आदर्श स्थापित कर रहे हैं। जनअधिकार अभियान के प्रदेश अध्यक्ष सुनील दत्त पांडेय ने कहा कि स्वामी रामनरेशाचार्य ने चातुर्मास के दौरान बौद्धिक गोष्ठियां करवाकर देश की ज्वलन्त समस्याओं को समाज के सामने रखा और उनके निराकरण का रास्ता भी बताया। प्रेस क्लब के अध्यक्ष संजय आर्य ने कहा कि चातुर्मास संतों के लिए आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है। आज संत समाज में चातुर्मास की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। परन्तु स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज ने इस परम्परा को पुनस्र्थापित करने का एक सराहनीय कार्य किया है। कथावाचक पंडित जयप्रकाश कौशिक ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने देश की एकता और अखण्डता के लिए अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर डा. श्यामसुन्दर दास शास्त्री ने रामानंद सम्प्रदाय को सामाजिक एकता का प्रतीक बताया। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविधालय के कुलपति डा. महावीर अग्रवाल ने कहा कि रामानंद सम्प्रदाय ने जाति बंधनों को तोड़कर समाज को न दिशा दी। इस अवसर पर हरिद्वार नगर निगम के मेयर मनोज गर्ग, रामकुमार एडवोकेट, भगवत शरण अग्रवाल, इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन हरिद्वार के अध्यक्ष प्रभात कुमार, महामंत्री विनीत धीमान, प्रेस क्लब के महामंत्री रामचंद्र कन्नौजिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुदित अग्रवाल, सचिव विकास चौहान, दीपक नोटियाल, महावीर नेगी, शैलेन्द्र सिंह, ललितेंद्र नाथ, मनोज रावत, अम्बरीश कुमार, नीरज छाछर, अमित कुमार, महन्त महेन्द्र सिंह, महन्त शिवशंकर गिरि, महन्त भगवानदास, महन्त रघुवीरदास, भरत शर्मा, कोमल शर्मा आदि ने रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज का स्मृति चिन्ह भेंट कर और माला पहनाकर स्वागत किया। निर्मल संस्कृत महाविधालय के छात्रों ने स्वसितवाचन कर महाराज श्री का स्वागत किया।
(साभार एक्सप्रेस इंडियन)

Wednesday, July 31, 2013

हरिद्वार में स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास महोत्सव आरंभ

पतित पावनी गंगा के तट पर देवभूमि हरिद्वार में इस वर्ष श्रीमठ, काशी के वर्तमान आचार्य एवम् जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का  'दिव्य चातुर्मास महोत्सव' श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। भूपतवाला स्थित निर्माणाधीन अद्वितीय श्रीराम मंदिर परिसर चातुर्मास महोत्सव की विविध प्रवृत्तियों का समायोजन किया जा रहा है। नित्य कार्यक्रमों के साथ ही सावन मास की प्रत्येक सोमवारी को भगवान भोलेनाथ का महाभिषेक पूर्ण-विधि विधान से संपन्न हो रहा है। जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे आत्मशुद्धि का पर्व बताया।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास में संत-महात्माओं को आत्मचिंतन का अवसर प्राप्त होता है। इसमें हमें सनातन धर्म की रक्षा को लेकर चिंतन करने के साथ व्यक्तिगत खामियों को दूर करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि संत का उद्देश्य सनातन धर्म एवं मानव कल्याण को गति देना है।
वैसे गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर ही देश भर से आए भक्तों की उपस्थिति में गुरु पूजन के साथ महोत्सव का आरंभ हो गया।