।। नमोSस्तु रामाय ।।
जगदगुरु रामानन्दाचार्य पीठ (श्रीमठ) परंपरा, संरक्षण और नव-उत्तराधिकार
काशी (वाराणसी) स्थित श्रीमठ, पंच गंगा घाट पर प्रतिष्ठित वह देदीप्यमान केंद्र है, जहाँ से स्वामी रामानन्दाचार्य जी ने मध्यकालीन भारत में 'भक्ति के द्वार सबके लिए खोलने' का उद्घोष किया था। जब इस परम पावन पीठ के उत्तराधिकारी के चयन की बात आती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आध्यात्मिक निरंतरता का उत्सव होता है। श्रीमठ केवल साधु, एवं संन्यासियों का आवास नहीं, बल्कि रामानन्द संप्रदाय की ऊर्जा का केंद्र है। यहाँ का उत्तराधिकारी वही हो सकता है जो 'रामानन्द' शब्द के अर्थ—'राम' (परम तत्व) और 'आनन्द' (परमानन्द की अनुभूति)—को स्वयं में आत्मसात कर चुका हो। एक सुसंस्कृत उत्तराधिकारी के व्यक्तित्व में तीन गुणों का संगम अनिवार्य है
शास्त्र-निष्ठा: , प्रस्थानत्रयी और श्रीभाष्य का गहन ज्ञान।
लोक-संग्रह: समाज के अंतिम व्यक्ति तक धर्म का प्रकाश पहुँचाने की संवेदनशीलता।
तपस्या: व्यक्तिगत जीवन में शुचिता और कठोर संयम।
विद्वत्ता और वाक्-कौशल का समन्वय
श्रीमठ के उत्तराधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल मौन साधक न हो, बल्कि एक प्रखर वक्ता भी हो। आज के संक्रमण काल में, जहाँ युवा पीढ़ी तर्क और प्रमाण खोजती है, वहाँ उत्तराधिकारी को अपनी वाणी से शास्त्र-सम्मत तर्कों को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना होता है जो आपमें दिखाई देती है।
"यस्य वाक् मनसि संपद्यते... अर्थात् जिसकी वाणी मन के अनुकूल और मन सत्य के अनुकूल हो, वही वास्तविक नेतृत्व करने योग्य है।
भावी पथ और उत्तरदायित्व
नवनियुक्त उत्तराधिकारी के समक्ष चुनौतियाँ और अवसर दोनों ही अनंत हैं |
साधु परम्परा एवं संस्कृत शिक्षा का संवर्धन: पीठ की प्राचीन परम्परा का संरक्षण और संस्कृत पाठशालाओं के साथ आश्रमों का आधुनिकीकरण।
सामाजिक समरसता: स्वामी रामानन्दाचार्य जी के मूल मंत्र "जाति-पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई" को धरातल पर उतारना।
वैश्विक प्रसार: डिजिटल माध्यमों के सहयोग से रामानन्दीय दर्शन को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाना।
श्रीमठ के पावन प्रांगण में स्वामी राघवाचार्य जी (पूर्वाश्रम नाम: चंद्रशेखर जी मिश्र ) का पट्टाभिषेक केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं, बल्कि एक युगान्तरकारी आध्यात्मिक घटना है। काशी की पावन धरती पर जब मंत्रोच्चार के बीच उन्हें इस गौरवमयी पीठ का उत्तराधिकारी स्वीकार किया गया, तो वह दृश्य साक्षात भक्ति और ज्ञान के मिलन जैसा था।
पट्टाभिषेक: परंपरा का नव-उन्मेष और संकल्प की सिद्धि आज काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ का कण-कण हर्षित है। स्वामी राघव दास जी के रूप में संप्रदाय को एक ऐसा मुखर नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में शास्त्र की मर्यादा और आधुनिक युग की समझ का अद्भुत सामंजस्य है। चंद्रशेखर जी का 'राघवाचार्य' बनना, एक साधक का सिद्धत्व की ओर प्रस्थान है।
१. शास्त्रीय मर्यादा और पट्टाभिषेक का गौरव
पट्टाभिषेक का विधान अत्यंत गूढ़ है। यह इस बात का उद्घोष है कि जो ज्ञान की ज्योति जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी ने प्रज्वलित की थी, वह अब स्वामी राघव दास जी के हाथों में सुरक्षित है। उनका सानिध्य प्राप्त करना, साक्षात मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों के सानिध्य में आने जैसा है।
"आचार्यवान् पुरुषो वेद" — अर्थात् वही सत्य को जानता है जिसके पास समर्थ आचार्य है। आज श्रीमठ को वह सामर्थ्य स्वामी राघवाचार्य जी के रूप में पुनः प्राप्त हुआ है।
२. चंद्रशेखर से राघवाचार्य: एक वैचारिक यात्रा
पूर्वाश्रम के 'चंद्रशेखर मिश्र' में जो सौम्यता और शीतलता थी, वह अब 'राघवाचार्य' बनकर पूरे समाज को दिशा देने वाली प्रखर तेजस्विता में परिवर्तित हो गई है। उनके पट्टाभिषेक से यह स्पष्ट है कि आगामी समय में श्रीमठ वैष्णव दर्शन को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। युवा पीढ़ी में संस्कारों के बीज बोने का कार्य करेगा। संप्रदाय की अद्वैत और विशिष्टाद्वैत की सूक्ष्म विवेचना को सरल लोक-भाषा में प्रस्तुत करेगा।
३. एक विजनरी नेतृत्व की आवश्यकता
स्वामी राघवाचार्य जी मात्र एक गद्दी के उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि वे उन लाखों भक्तों की आस्था के केंद्र हैं जो रामानन्दीय परंपरा में विश्वास रखते हैं। उनका पट्टाभिषेक इस बात का संकेत है कि श्रीमठ अब और अधिक सक्रियता से सामाजिक समरसता और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेगा।
आपका जीवन
आप वर्तमानचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के सरंक्षण में पले बड़े एवं साधुता पवित्रता का ज्ञान प्राप्त हुआ राघव दास जी (पूर्वाश्रम: चंद्रशेखर जी) का व्यक्तित्व उस पारसमणि के समान है, जिसे वर्तमान जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी के संरक्षण और सान्निध्य ने कुंदन बनाया है। एक सुसंस्कृत विद्वान की दृष्टि में, उनका यह पट्टाभिषेक केवल एक उत्तराधिकार नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की उस पराकाष्ठा का दर्शन है, जहाँ शिष्य स्वयं को गुरु की आज्ञा और ज्ञान में विलीन कर देता है।
शिक्षा-दीक्षा-
गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में श्रीचंद्रशेखर मिश्र ने सतत अध्ययन करना ही सीखा है। वर्ष 2009 से शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा से शिक्षा गंभीरतापूर्वक प्रारंभ हुई थी। न्याय दर्शन, वेदांत दर्शन, प्रथमा से उत्तर-मध्यमा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एमए करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण कर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पीएचडी कर रहे हैं।
शिक्षा-दीक्षा-
गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में श्रीचंद्रशेखर मिश्र ने सतत अध्ययन करना ही सीखा है। वर्ष 2009 से शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा से शिक्षा गंभीरतापूर्वक प्रारंभ हुई थी। न्याय दर्शन, वेदांत दर्शन, प्रथमा से उत्तर-मध्यमा, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शास्त्री, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एमए करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण कर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पीएचडी कर रहे हैं।
गुरु-संरक्षण: संस्कार और साधुता का दिव्य परिवेश
जब हम स्वामी राघवदास जी के जीवन की यात्रा को देखते हैं, तो उसमें 'अनुवर्तन' (गुरु के पदचिन्हों पर चलना) की प्रधानता दिखती है। वर्तमान आचार्य जी के साये में उनका पलना-बढ़ना वैसा ही है जैसे मलयज पर्वत की निकटता से साधारण वृक्ष भी चंदन हो जाते हैं।
१. साधुता: वेश नहीं, विश्वास है
वर्तमान आचार्य जी के चरणों में रहकर उन्होंने यह सीखा कि साधुता केवल गेरुआ वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुचिता है।
विनम्रता: विद्वत्ता का अहंकार न होना ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।
तपस्या: श्रीमठ की कठोर मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपनी इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त की है।
पवित्रता: मानसिक और वाचिक पवित्रता का जो पाठ उन्हें गुरु-सान्निध्य में मिला, वही आज उनके चेहरे के ओज (तेज) के रूप में परिलक्षित होता है।
२. ज्ञान की अविरल धारा
शास्त्रों का अध्ययन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन 'अनुभवजन्य ज्ञान' केवल गुरु की कृपा से मिलता है। चंद्रशेखर जी ने *वर्तमान जगद्गुरु श्रीरामनरेशाचार्य जी* के संरक्षण में आपने वेद-वेदांत का अध्ययन कर उनकी गुत्थियों को सुलझाया। श्रीरामचरितमानस और भक्ति द्रविण के मर्म को आत्मसात किया। लोक-व्यवहार और धर्म-रक्षा के सूक्ष्म भेदों को समझा।
*"गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परमं मंगलम्"* — गुरु की कृपा ही शिष्य का परम कल्याण है। राघव दास जी इसी मंगलकारी कृपा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
३. उत्तराधिकार एक गुरु-प्रसाद यह पट्टाभिषेक उनके लिए कोई पद की उपलब्धि नहीं, बल्कि गुरु द्वारा दिया गया 'प्रसाद' है। वर्तमान आचार्य जी ने उन्हें न केवल शास्त्र पढ़ाए, बल्कि उन्हें 'गढ़ा' है। आज जब वे श्रीमठ की गद्दी पर आसीन हो रहे हैं, तो उनके पीछे वर्तमान आचार्य जी का आशीर्वाद और उनकी तपस्या का बल खड़ा है ।
और अंत में
श्रीमठ के उत्तराधिकारी का घोषित होना इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म की धारा अक्षुण्ण है। यह नए नेतृत्व का स्वागत मात्र नहीं है, बल्कि एक नूतन अध्याय का सूत्रपात है, जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिवेणी को और अधिक वेग प्रदान करेगा।
मंगल कामना
हम प्रभु श्री रघुनाथ जी से प्रार्थना करते हैं कि पूज्य राघव दास जी का यह कार्यकाल संप्रदाय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाए। उनकी वाणी से निकलने वाला प्रत्येक शब्द भक्तों के लिए पाथेय बने और उनका मार्गदर्शन जगत का कल्याण करे। आने वाला समय आपके मार्गदर्शन में धर्म को नए आयामों तक ले जाएगा, ऐसी मंगलकामना प्रत्येक रामानन्दीय हृदय में स्पंदित हो रही है।
जय सियाराम
श्रीमठ, काशी
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