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Sunday, January 24, 2021

मां नर्मदा की कहानी, मां नर्मदा की जुबानी ( Story of Maa Narmada )

 

मैं नर्मदा हूं। जब गंगा नहीं थी , तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था , तभी भी मै थी। मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। इसी के कारण आर्य मुझ तक नहीं पहुंच सके। मैं अनेक वर्षों तक आर्यावर्त की सीमा रेखा बनी रही। उन दिनों मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था।


मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे मार्कंडेय, कपिल, भृगु , जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था । ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए। 


इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, " रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा।

एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा ।"नर्म" यानी आनंद । आनंद देनेवाली नदी।

मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूं । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है । पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं । स्कंदपुराण का "रेवाखंड " तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है।

"पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है।"

मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ । मैं पश्चिम की ओर बहती हूं। मेरा प्रवाह आधार चट्टानी भूमि है। मेरे तट पर आदिमजातियां निवास करती हैं । जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया।

मैं एक हूं ,पर मेरे रुप अनेक हैं । मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूं ,तो गर्मियों में बस मेरी सांस भर चलती रहती है।

मैं प्रपात बाहुल्या नदी हूं । कपिलधारा , दूधधारा , धावड़ीकुंड, सहस्त्रधारा मेरे मुख्य प्रपात हैं ।

ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है। महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ  के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है ।

मैं स्वयं को भरूच (भृगुकच्छ) में अरब सागर को समर्पित करती हूँ ‌।

मुझे याद आया।

 अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी। वहां तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाया करता था पर यहां मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है । यह तय करना कठिन है कि कहां मेरा अंत है और कहां समुद्र का आरंभ? पर आज मेरा स्वरुप बदल रहा है। मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है पर जब अकालग्रस्त , भूखे-प्यासे लोगों को पानी, चारे के लिए तड़पते पशुओं को , बंजर पड़े खेतों को देखती हूं , तो मन रो पड़ता है। आखिर में माँ हूं।


मुझ पर बने बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी । मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊंगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है।

त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे

Sunday, August 2, 2020

जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम में भव्य झूलनोत्सव का आयोजन Jhulan Mahotsav in Jabalpur

झूलनोत्सव अंशी में अंश की विलिनता का महोत्सव- स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज
" अंशी में विलीन होकर ही अंश अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त करता हैं "

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ( Jagadguru Ramanandacharya Swami Sri Ramnareshacharya ji Maharaj ) का परमकल्याणकामियों के लिये अमृतवर्षा:-
प्रसंग- भगवान का झूलनोत्सव

Jhulan Mahotsav by Swami Ramnareshacharya
 वैदिकशास्त्रों के अनुसार जीव अंश हैं तथा परमेश्वर अंशी हैं। अंशी में विलीन होकर ही अंश अपने वास्तविक परमस्वरूप को सम्प्राप्त करता हैं । अतएव अंश की सतत् क्रियायें अपने परमप्रयोजन की सिद्धि के लिये चलती रहती हैं ।
      सभी जलधाराएँ अपने अंशी समुद्र को पाकर ही परमस्वरूप को प्राप्त करती हैं, इसके बिना उन्हें विश्राम कहाँ। कहाँ ऐसे ही घटा-आकाश, मठाकाशादि अपने अंशी महाकाश में विलीन होकर पूर्णता को प्राप्त करते हैं। , तभी तो आकाश में प्रक्षिप्त मिट्टी के टुकड़े पुनः पृथ्वी पर लौटकर ही अपने अंशी पृथ्वी में विलीन होकर परम शान्ति को प्राप्त करते हैं, यही तो अंशों का परमगन्तव्य एवं परम प्राप्तव्य हैं ।

Bhagwan on Jhulan 


इसी प्रकार से संसार की सभी जीवात्माएं सतत् अपने अंशीभूत परमेश्वर को खोजती रहती हैं अपने प्रयत्नों से । क्योंकि उनको परमस्वरूप, परमविश्राम, परमानन्द और दिव्यधाम की सम्प्राप्ति तो तभी होगी। इसी को परमेश्वर ने प्रकट होकर अपनी दिव्य क्रीड़ाओं का सम्पादन कर उसके अनुसरण के लिये सतत् अंशी अन्वेषण नाम से जीवों को परम मंगलमय अवसर प्रदान किया है।

   इसी परमलाभ के सम्पादन के लिये प्रेमानन्द आश्रम में परम मंगलमय झूलनोत्सव समायोजित हैं, जिसका पूर्ण निष्ठा-तत्परता तथा प्रेम के साथ परम कल्याणकामी आस्वादन कर रहें हैं ।

प्रतिदिन - झूलन तथा सम्पूर्ण परिसर का उत्कर्ष पूर्ण श्रृंगार, परमप्रभु श्रीरामलला जी का वैदिक गरिमा के साथ झूलन पर विराजना, साविधि उनका पूजन,  सुप्रतिष्ठित गायकों द्वारा झूलनगीतों का गायन, भक्तों एवं सन्तों द्वारा परमप्रभु को परमप्रेम एवं मर्यादा से झूलाना,  उत्तर पूजन, महाआरती तथा परमप्रभु का अपने दिव्यमहल में पधारना आदि मांगलिक क्रम संपादित होता हैं । इसके अनन्तर दिव्यधाम के समान सभी कल्याणकामी समानरूप से परमप्रभु का (झूलनबिहारी सरकार का ) प्रसाद ग्रहण करते हैं ।


परम कल्याणकामियों को अपने सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन की परमधन्यता का अवबोध - निरन्तरता के साथ प्रवाहित होने लगता हैं, ऐसा हो भी क्यों नहीं , अब तो उन्होंने अपने अंशी को पाया ही नहीं अपितु उसे झुलाया भी। ये ही तो उन्हें  परमाभीष्ट था ।
झूलन महोत्सव में प्रेमानंद आश्रम के श्रीमहंत नागा श्यामदास जी, व्यास राघवाचार्य जी महाराज और अयोध्या से पधारे मानसकेसरी जी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।  जय सियाराम

Wednesday, July 29, 2020

विश्व परमौषधि के अनुपम प्रकाशक गोस्वामी तुलसीदास- जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य

जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम में विधि-विधान से मनी गोस्वामी तुलसीदास की जयंती

SWAMI RAMNARESHACHARYA JI MAHARAJ
जबलपुर के जिलेहरी घाट स्थित प्रसिद्ध प्रेमानंद आश्रम में सावन शुक्ल संप्तमी यानि 27-7-2020 को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती महोत्सव वैदिक सनातन धर्म की मर्यादा एवं समृद्धि के साथ मनाया गया। इस क्रम में उनके समग्र साहित्य का परायण, तैल चित्र की सविधि पूजन, बधाई गान तथा श्री रामभावाभिसिक्त महानुभावों के द्वारा गोस्वामी जी के विभिन्न अनुपम पक्षों को प्रस्तुत कर परमकल्याणकामियों को राम भाव रुपी गंगा में अवगाहन कराया गया। समापन पर विशिष्ट भंडारा समायोजित हुआ ।

जगदगुरु रामानंदाचार्यय पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के दिव्य चातुर्मास महोत्सव के प्रसंग पर वैसे तो गोस्वामीजी की जयंती कार्यक्रम त्रिदिवसीय रूप से समायोजित था, परन्तु परमप्रभु श्रीराम जी की कृपा एवं प्रेरणा से (करोना महामारी की भयंकर छाया) में एक दिवसीय रूप में संपन्न हुआ।

अपने आशीर्वचन में स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि आज सम्पूर्ण संसार कोरोना की परम पीड़ा एवं हानि से पीड़ित है तथा उसके निवारण के लिए औषधि की खोज में है एवं  औषधि के बिना भी यथासंभव निवारण का प्रयास कर अपने को तथा दूसरों को संतोष दिला रहा है !

महाराजश्री ने आगे कहा कि  वैदिक सनातन धर्म के समस्त शास्त्र -ऋषि -मुनि -संत-महात्मा- आचार्यगण अनादि काल से कोरोना की ही औषधि तो बतलाते हैं। वह भी कुछ देर के लिए रोगों के निवारण के लिए नहीं, अपितु हमेशा-हमेशा के लिए। ऐसी महामारी को दूर करने वाली वैदिक शास्त्रों  के अनुसार जो सर्वमान्य है. जन्म-मरण, जरा (बुढ़ापा ) व्याधि, प्रिय का वियोग, अप्रिय का मिलन, घनघोर अपमान, धन एवं सम्मान की  हानि पद की हानि इत्यादि,  इन सभी कोरोनाओं की अचूक दवा गोस्वामी जी ने वैदिक शास्त्रों, संतो एवं गुरुओं से परिपूर्ण रूप से सीखा और उसके माध्यम से अपने (कोरोना ) माता-पिता, सहयोगी जनो का वियोग, घनघोर उपेक्षा, धन की नगण्यता इत्यादि अनेकानेक कोरोनाओं को हमेशा- हमेशा के लिए भगाकर अपने सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन को वस्तुतः सर्वश्रेष्ठ बना दिया।
 
जगदगुरु रामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा- ''अपना ही नहीं अपितु असंख्य भावों का (जैसे परमप्रभु श्रीरामजी  ने अपने अवतार काल में सभी करोनाओं से ग्रसित कोल-भील, किरात, असुर आदि को बनाया था) रामचरित्रमानस का समापन करते हुए गोस्वामी जी ने लिखा है- पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाहीं कहूँ."

आचार्यश्री के मुताबिक मूल रूप से श्रीराम से जुड़ कर ही हमेशा-हमेशा के लिए सभी कोरोनाओं से मुक्त हुआ जा सकता है। अभी तो जिस रीति से शास्त्र, परमेश्वर, सदाचारी संत, गुरु और सात्विक आहार, विहार से रहित होकर केवल धन- प्रतिष्ठा, परमभोग की लालसा, जैसे-तैसे पद, अस्त्र- शस्त्र की प्राप्ति की विवेकहीन दौड़ में संसार दौड़ रहा है, उससे कभी भी परम विश्राम की सम्भावना नहीं है।

हमेशा अपने सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन में गोस्वामी तुलसीदास जी के उपदेशों एवं जीवन चरित्रों से प्रेरणा  लेकर जो संपूर्ण वैदिक शास्त्रों का अनादि एवं अनुपम सारसर्वस्व है, परम धन्यता से मण्डित करना चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने असंख्य जीवों को  इस परमौषधि से परम विश्राम से जोड़ा, जिसकी कोई दूसरी दवा नहीं। ( तुलसीदास जयंती प्रसंग पर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के अमृत वर्षा रुपी प्रवचनों का संक्षिप्त अंश) 

Tuesday, November 1, 2011

यज्ञो वै रामः


जबलपुर में शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ

* डॉ. देवकुमार पुखराज

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परमेश्वर के द्वारा उत्पादित एवम् पालित सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उत्पादन मानव जीवन है, ऐसी दृढ़भावना वैदिकों तथा वेद ब्रह्मों की भी है। ब्रह्मा का अंश होने के कारण जीव विशेषकर मानव सतत विकास के लिए प्रयासरत है। विकास की चरम परिणति विकसित भोजन,मकान तथा वस्त्रादि हीं नहीं हैं अपितु श्रीराम भाव की प्राप्ति है, इससे रहित विकास की आंधी ने मानव जीवन को राक्षसी जीवन के निर्माण तक पहुंचा दिया है। विकास वरदान के बदले अभिशाप बन गया है।

सृष्टिकर्ता प्रभु ने वेदों तथा वेदानुकूल शास्त्रों को मानव विकास के लिए प्रदान किया था। हम सभी वेदानुमोदित मार्ग से अपने विकास को चरण बिन्दु तक पहुंचायें। सम्पूर्ण शास्त्रों का सार सर्वस्व है-धर्म। यहीं मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता को वस्तुतः सार्थकता प्रदान करता है। यह धर्म हीं अभ्युदय (लौकिक उन्नति) एवं निः श्रेयस( मोक्ष) का परम साधन है। उसी धर्म की संस्थापना के लिए परम प्रभु श्रीराम जीवन धारण करते हैं । वे अपनी प्रथम यात्रा विश्वामित्र के साथ धर्म रक्षा के लिए हीं करते हैं। वैसे भी धर्म का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप यज्ञ है। भगवान वेद ने भी मानवों के लिए यज्ञ का विधान किया था। जो अतुलनीय तथा विकल्प रहित मानव जीवन की सम्पूर्णता का सर्वश्रेष्ठ साधन है ,लेकिन अज्ञान,दम्भ तथा पापों के बाहुल्य के चलते लोग उसे छोड़ते चले गये तथा कलांतर में पतन के महागर्त में अवस्थित हो गये।

परमप्रभु श्रीराम ने अपने अवतार के सम्पूर्ण 33 हजार वर्षों के एक-एक क्षण का उपयोग धर्म संस्थापना के लिए किया, जिसके माध्यम से अनादि एवं विशालतम सृष्टि में अनुपम रामराज्य प्रकट हो सका, जो संसार के लिए परम आदर्शभूत तथा प्रेरणाभूत पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा। यह निर्विवाद सत्य है कि सुख का कारण तो केवल औऱ केवल धर्म हीं है। धर्म के वगैर श्रद्धा-प्रेम-वैराग्य ज्ञानादि कोई भी कल्याणकारी भाव प्रकट हीं नहीं होते।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए रामभक्ति परंपरा और रामानंद सम्प्रदाय के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी ने वैदिक यज्ञों की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास तेज किया है। वर्तमान रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज देश के सभी प्रमुख शहरों और गांवों तक में श्रीराम महायज्ञ करने के लिए संकल्पित हैं। इसकी शुरूआत काशी से हुई थी। साल 2009 में चण्डीगढ़ में भव्य श्रीराम यज्ञ संपादित हुआ और इसी कड़ी में नया नाम संस्कारधानी के रूप में विख्यात जबलपुर का भी जुड़ गया है। जबलपुर के जिलेहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम में शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है। मां नर्मदा के पावन तट पर 29 अक्टूबर से 4 नवम्बर तक होने वाले श्रीराम महायज्ञ को लेकर देश भर से साधु,संत, भगवद्प्रेमी श्रद्धालु जबलपुर पहुंचे हैं। जगदगुरु शंकराचार्य की परंपरा में दीक्षित परमसिद्ध संत स्वामी प्रेमानंद जी द्वारा स्थापित प्रेमानंद आश्रम अपने आरंभिक काल से हीं भगवान श्रीराम की अर्चा, रामायण गान, संतों-नर्मदा परिक्रमावासियों तथा अभ्यागतों को अन्नदान एवम् विभिन्न वैदिक तथा स्मार्त समायोजनों के द्वारा निरंतर श्रीरामभाव के सृजन में समर्पित रहा है। स्वामीजी ने अपने सत्प्रयासों से असंख्य लोगों के जीवन को राममयता प्रदान की। उसी परम मंगलमयी श्रीराम धारा को विशालतम रूप में प्रकट करने और राम राज्य को विस्तार देने के लिए श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है।

कार्तिक मास में पहली बार मां नर्मदा के पावन तट पर हो रहे इस अद्वितीय यज्ञ के लिए सात मंजिले विशाल यज्ञमंडप बनाया गया है। जिसमें सौ आहुतियों के लिये सौ कुण्ड बनाये गये हैं। वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार सौ कुण्ड और एक करोड़ आहुतियां हीं अधिकाधिक रूप में मान्य हैं। कार्तिक शुक्ल तृतीया से आरंभ होकर नवमीं तक चलने वाले महायज्ञ का आरंभ जलभरी शोभायात्रा से हुई। शाम में विशाल मंच से श्रीराम कथा का रसास्वादन उपस्थित जनसमुदाय ने किया। सुबह से हीं पूरा वातावरण वेद ऋचाओं के पाठ से गुंजायमान था। बीच-बीच में सुप्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न विस्मिलाह खान के वंशजों द्वारा बजाई जा रही शहनाई पूरे माहौल में रस घोल दे रही थी। संध्या में वाराणसी से आई चर्चित कत्थक नृत्यांगना ममता की मंडली ने अपने भक्ति गीतों और भावनृत्यों से समां बांध दिया। देर रात तक अयोध्याजी से आई श्रीरामलीला मंडली ने वातावरण को श्रीराममय बनाये रखा।

श्रीराम महायज्ञ के मुख्य यजमान अतुल तिवारी ने बताया कि एक करोड़ आहुतियों के साथ-साथ वेद की सभी शाखाओं का पाठ,सभी पुराणों तथा सभी रामायणों का पाठ, श्रीरामनाम संकीर्तन, सुप्रसिद्ध मंडली द्वारा श्रीरामलीला का मंचन, विशिष्ट विद्वानों तथा आचार्यों का सम्मेलन, संतों,श्रीमहंतों,ब्राह्मणों तथा भक्तों के लिए भण्डारा तथा श्रीराम संगीत महायज्ञ जैसे अनुष्ठान सम्पादित होने वाले हैं।

-इति--