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Thursday, February 25, 2021

सौ साल का हुआ काशी का प्रतिष्ठित सांगवेद विद्यालय, 101वें वर्ष में प्रवेश पर वर्धापनोत्सव सभा आयोजित

 

Swami Ramnareshacharya in Sangved Vidyalaya



वाराणसी, 26 फरवरी। रामघाट स्थित श्रीवल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय के 101वें वर्षप्रवेश के मंगल अवसर पर गुरुवार को पूर्वाह्न में भव्य समारोह हुआ। आरंभ सरस्वती पूजन से हुआ। अपराह्न में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज (श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी) के सान्निध्य में वर्धापनोत्सव की सभा सम्पन्न हुई, जिसकी अध्यक्षता सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पंडित राजाराम शुक्ल जी ने की। वाराणसी के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा मुख्यातिथि के तौर पर मौजूद रहे।

अपने आशीर्वचन में जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा कि सांगवेद विद्यालय का वेदों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। जिस प्रकार वेद सदा रहेंगे उसी प्रकार सांगवेद विद्यालय भी सदा रहेगा और संस्कृत-संस्कृति की सेवा करता रहेगा। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पण्डित राजाराम शुक्ल ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि कम साधन में कार्य कैसे करना और विपरीत परिस्थितियों में भी वातावरण को अनुकूल कैसे बनाना यह हमने सांगवेद विद्यालय से सीखा। तदनुसार ही हम कार्य कर रहे हैं।

मुख्य अतिथि के रुप में पधारे वाराणसी के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा ने कहा कि सांगवेद विद्यालय आदर्श विद्यालय है। इसकी सुरक्षा एवं संवर्धन में सहयोग देना सभी का कर्तव्य है।

समारोह के दौरान जगदगुरु रामानंदाचार्य जी, कुलपति और जिलाधिकारी का महावस्त्र, अभिनंदनपत्र, पुष्पमाला एवं श्रीफल देकर सम्मान किया गया। समस्त विद्वानों की ओर से कविवर पं. जगन्नाथ शास्त्री तैलंग जी ने विद्यालय के दीर्घायुष्य की कामना की। सांगवेद के अध्यापकगण, विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया। विद्यालय के अध्यक्ष पं. विश्वेश्वर शास्त्री द्राविडजी ने विद्यालय स्थापना का इतिहास बताया और विद्या सदाचार की रक्षा में सांगवेद विद्यालय के योगदान का उल्लेख किया। प्रारंभ में जगदगुरु कांचीशंकराचार्य जी, सुरेन्द्रलाल मेहता, शंकरलाल मेहता, केशवलाल मेहता, श्रीराम लोकरे एवं बबन लक्ष्मण मरके आदि के शुभकामना संदेश पढ़े गये। कार्यक्रम का संचालन पण्डित गणेश्वर शास्त्रीद्रवाडि जी ने किया। विद्वत्पूजन एवं प्रसाद वितरण के साथ सभा पूर्ण हुई।

Saturday, July 4, 2020

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास व्रत-2020 गुरुपूर्णिमा से जबलपुर में

रामभक्ति धारा को समर्पित रामानंद संप्रदाय के वर्तमान पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का दिव्य चातुर्मास महोत्सव इस साल जबलपुर में मां नर्मदा के पावन तट पर होना सुनिश्चित हुआ है। स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज आद्य जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की साधना स्थली श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य हैं, जिसे वैराणी वैष्णव संप्रदाय अपने आचार्य स्वामी रामानंद की पादुका पीठ के नाम से पूजता है। दो महीने तक चलने वाले चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का प्रारंभ गुरु पूर्णिमा यानि 5 जुलाई की पावन तिथि से होगा। 
Swami Ramnareshacharya
 


  काशी के श्रीमठ पीठाधीश्वर प्रत्येक वर्ष नियम पूर्वक चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से देश के अलग-अलग स्थानों पर करते रहे हैं। सभी प्रमुख तीर्थों और महानगरों में स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज के चातुर्मास अनुष्ठान समायोजित हो चुके हैं। पिछले साल माउंट आबू स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर प्रांगण में चातुर्मास व्रत का आयोजन हुआ था। इस वर्ष महाराजश्री जबलपुर में चातुर्मास के लिए संकल्पित हुए हैं। जबलपुर में मां नर्मादा के किनारे जिलेहरी घाट पर अवस्थित प्रेमानंद आश्रम को अनुष्ठान भूमि के रुप में चयनित किया गया है। 

   प्रेमानंद आश्रम में पावन चातुर्मास महापर्व का भव्य प्रारंभ 5 जुलाई गुरु पूर्णिमा से होगा। सियारामजी की कृपा छाया और स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में चातुर्मास महापर्व के दौरान प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान होेंगे। प्रातः काल महाराजश्री पोषडोपचार विधि से श्रीसीताराम जी का पूजन करते हैं। फिर देव-ऋर्षि पितृतर्पण का कार्य संपादित करते हैं। समष्टि हवन और फिर स्वाध्याय का क्रम नियमित रुप से चलता है। दोपहर में वैष्णवाराधन और विश्राम के पश्चात संध्या काल के कार्यक्रम होते हैं। जिसमें आगंतुक संत-महंत अपने प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं। फिर महाराजश्री का आशीर्वचन स्वरुप प्रवचन होता है। चातुर्मास काल में सावन की प्रत्येक सोमवारी को भगवान शिव का रुद्राभिषेक के अलावे गोस्वामी तुलसीदास की जयंती, संत सम्मेलन, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, नंद महोत्सव, विनायक चतुर्थी, अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व और महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। इसके अलावे राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन और विराट भंडारे का आयोजन में बीच-बीच में होते रहता है। पूरे दो महीने तक अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन से भी पूरा वातावरण भक्तिमय रहता है।  


Swami Ramnareshacharya chaturmas


जबलपुर के प्रेमानंद आश्रम के श्रीमहंत श्यामदास जी महाराज उर्फ नागा बाबा ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा 5 जुलाई से लेकर भाद्र पूर्णिमा 02 सितम्बर, 2020 तक चलने वाले चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान देश भर से भक्त,सद् गृहस्थ, संत- महंत और महामंडलेश्वर पधारेंगे। कोरोना संकट को देखते हुए सरकार की हर गाइडलाइंस खासकर साफ-सफाई और सोशल डिस्टेंसिंग का विशेष प्रबंध रखा जाएगा। आश्रम की विशालता, भव्यता, समुचित संसाधन और आवास की पर्याप्त सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए ही इस स्थान का चयन चातुर्मास महोत्सव के लिए किया गया है। आश्रम की प्राकृतिक छटा और संपूर्ण वातावरण कोरोना को दूर रखने में सहायक होगा, ऐसा व्यवस्थापकों का मानना है। 

महाराजश्री स्वयं भी इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों खासकर भंडारे और प्रवचनों के दौरान अनावश्यक भीडभाड़ न हो। उनकी ओर से विशाल परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग सहित कोरोना काल की जरुरी पाबंदियों का पालन अनिवार्य रुप से करने का निर्देश संतों- भक्तों को दिया गया है। ताकि चातुर्मास महापर्व का आध्यात्मिक स्वरूप हर स्थिति में बना रहे और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न हो। 

जबलपुर में महाराजश्री तीसरी बार चातुर्मास कर रहे हैं। सन 1990 और 2001 में भी आचार्यश्री यहां चातुर्मास व्रत किये थे। यह तीसरा आयोजन है, जो सन 2020 में हो रहा है।  

Friday, October 19, 2018

पूज्यपाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के प्रवचनांश, प्रसंग- विजयादशमी


Swami Ramnareshacharya
सबके मन में प्रतिशोध की भावना होती है, सबके मन में यह भावना होती है कि उसके हिसाब से ही सारे काम हों। सबके अपने-अपने संकल्प होते हैं। लेकिन इसके लिए जो लोग हमारे विपरीत हैं, उनका हम क्या करें? हमें बनाना है राम राज्य और हम प्रयोग कर रहे हैं रावण राज का। सरेआम सडक़ पर गलत काम हो, व्यभिचार हो, यह कदापि उचित नहीं। इस तरह से राम राज्य नहीं आएगा। रावण तो आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ। उसने तो राम जी की पत्नी का ही धोखे से अपहरण कर लिया। ब्राह्मणों की तो हत्या रोज ही होती थी, वेद ध्वनि बंद हो गई थी, यज्ञ बंद हो गए, माता-पिता का सम्मान बंद हो गया था, देवताओं का कोई सम्मान नहीं रहा। अर्थ यह कि धर्म की, श्रेष्ठता की, पवित्रता की, मर्यादाओं की, अच्छी परंपराओं की विधियां नष्ट हो गई थीं। दंड व प्रतिशोध का कोई विकल्प नहीं बच गया था। परन्तु तब भी राम जी ने हनुमान जी को भेजा, अंगद को भेजा, विभीषण, कुंभकर्ण और यहां तक कि पुलस्त्य को भी परोक्ष रूप से प्रेरित किया कि वे रावण को सुधरने के लिए समझाएं। ताकि रावण रास्ते पर आ जाए। राम जी ने रावण को पूरे मौके दिए, वे प्रतिशोध भावना के कारण अमर्यादित नहीं हुए। प्रतिशोध या किसी को दंड देने की भी एक मर्यादा होती है, एक उचित विधि होती है। हनुमान ने भी तरह-तरह से समझाया, अंगद ने भी रावण को खूब समझाया कि बिना हत्या-मारकाट, बिना युद्ध के ही सुधार हो जाए। रावण के ही कुटुंब के लोगों ने समझाया कि राम जी को उनकी धर्म पत्नी लौटा दो, धर्म का पालन करो, लेकिन जब रावण नहीं माना, तब राम जी ने अंतिम विकल्प के रूप में विधिवत व घोषित युद्ध का सहारा लिया। वे रावण की तरह छिपकर आक्रमण करने नहीं गए, उन्होंने रावण की तरह किसी को धोखा नहीं दिया। राम जी ने अमर्यादित व दुष्ट रावण को भी दंड देने के लिए युद्ध की तमाम मर्यादाओं का पालन किया। आक्रमण का वह तरीका नहीं था, जो आज दंगों के समय देखने को मिलता है या आतंककारी हमलों के समय देखने को मिलता है। राम जी की सेना ने खुलेआम सडक़ों पर मौत का तांडव नहीं मचाया। निर्दोष लोगों को नहीं मारा। लूटमार या हत्या या बलात्कार का सहारा नहीं लिया। युद्ध जीतने के बाद भी राम जी की सेना ने लंका में घुसकर कोई उत्पात नहीं मचाया। यदि सडक़ पर खुलेआम व्यभिचार होगा, अन्याय होगा, तो राम राज्य कैसे आएगा? एक हत्या करने के बाद हत्या की भावना बनी रहती है। लाखों में से कोई एक हत्यारा ही सामान्य हो पाता है।
प्रतिशोध के लिए और श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना के लिए उन कृत्यों की जरूरत नहीं है, जिन कृत्यों की हम निंदा करते हैं। जोर-ज्यादती ठीक नहीं है। रावण जैसी तानाशाही ठीक नहीं है। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब किसी ने गांधी जी से कहा कि देश में तानाशाही की जरूरत है। गांधी जी ने जवाब दिया, ‘यह मैं भी मानता हूं, लेकिन जो लोग दस साल तानाशाही चला लेंगे, वो फिर लोकतंत्र को नहीं आने देंगे।’ प्रतिशोध भाव होना चाहिए, लेकिन सुधार के लिए होना चाहिए। हमें यथोचित मर्यादाओं, संविधान, धर्म के हिसाब से चलना चाहिए। हमें कदापि बर्बर नहीं होना चाहिए।

Monday, October 3, 2016

श्रीमठ संगीत महोत्सव-2016 का निमंत्रण कार्ड


Shrimath Sangeet Mahotsava-2016
वाराणसी में पिछले कई सालों से पावन कार्तिक मास के दौरान होने वाले श्रीमठ संगीत महोत्सव-2016 की तिथि नजदीक आते ही आमंत्रण पत्र भी प्रकाशित होकर आ गया। तीन दिवसीय इस सारस्वत अनुष्ठान के दौरान संगीत सरिता में डुबकी लगाने के लिए आप सब सादर आमंत्रित हैं।

Thursday, December 31, 2015

काशी की तस्वीर

Swami Ramnareshacharya, Kashi 
वाराणसी के गंगा तट पर अवस्थित श्रीमठ के समीप की अलौकिक छटा

Thursday, July 30, 2015

जोधपुर में दिव्य चातुर्मास महोत्सव शुरू



  सगुण-निर्गुण रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ, पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का चातुर्मास 30 जुलाई, 2015 से जोधपुर में प्रारम्भ हो गया। गुरुवार को भव्य शोभायात्रा के साथ महाराज श्री को जूनाखेड़ापति मंदिर तक लाया गया, जहां अगले दो माह तक वे विराजेंगे।

आज गुरु पूर्णिमा पर्व के साथ ही दिव्य चातुर्मास महोत्सव का विधिवत आरंभ हो गया।  

SWAMI RAMNARESHACHARYA
जोधपुर के प्रसिद्ध जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में महाराजश्री के चातुर्मास अनुष्ठान के दौरान राम भावानुकूल अनेक धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन होगा। बीच-बीच में बड़े धार्मिक उत्सव भी होंगे। सावन महीने में प्रत्येक सोमवार को भगवान शंकर का भव्य अभिषेक होगा। सुबह से शाम तक विविध मांगलिक कार्यक्रम होंगे, जिसमें हवन, पूजन, सहस्त्राचन, देव-पितृ तर्पण यज्ञ, स्वाध्याय औऱ संध्या समय भजन-प्रवचन जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। बीच में पड़ने वाले सारे पर्व-त्यौहार भी उत्सव नुमा माहौल में मनाए जाएंगे।कार्यक्रम स्थल पर ही नियमित रुप से भजन और भंडारे का प्रबंध किया गया है।  देश भर से अनेक संत और विद्वान के साथ बड़ी संख्या में भक्तगण भी चातुर्मास के दौरान जोधपुर पधारेंगे। इनके ठहरने का भी प्रबंध चातुर्मास समिति ने किया है।

उल्लेखनीय है कि महाराजश्री ने वर्ष १९९४ में भी जोधपुर में चातुर्मास व्रत किया था। पूरे २० साल बाद जोधपुर में फिर से चातुर्मास समायोजित हुआ है।   एक खास बात यह है कि पिछले चातुर्मास में भी आयोजन समिति के अध्यक्ष सेनाचार्य स्वामी अचलानन्द जी गिरि थे और इस बार भी उन्हीं की अध्यक्षता में कार्यक्रम शुरू हुआ है। 

स्वामी रामनरेशाचार्य
जूनाखेड़ापति मंदिर परिसर में नियमित पूजन, हवन, प्रवचन को लेकर सारी तैयारियां पूर्ण हो चुकी हैं। चातुर्मास के प्रति स्थानीय लोगों में बहुत उत्साह है । जोधपुर शहर में जगह-जगह बैनर-पोस्टर लगे हुए हैं।   चातुर्मास स्थल शहर के एक मुख्य मार्ग पर स्थित है, इसलिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

Saturday, November 29, 2014

जनकपुर में श्रीराम-जानकी विवाह संपन्न

नेपाल के जनकपुर धाम स्थित महाराज विदेह की नगरी में उनकी लाड़ली सीताजी का शादी विवाह पंचमी के दिन पूरे सनातन रीति-रिवाज के साथ धूमधाम से 27 नवंबर को संपन्न हुई। एक मोटे अनुमान के मुताबिक भारत, नेपाल और दुनिया के कई देशों से आए करीब 12 लाख लोगों ने इसबार श्रीराम-जानकी विवाह के मंगलमय अनुष्ठान में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और अपने जीवन को धन्य बनाया।  सगुण एवम निर्गुण रामभक्ति परंपरा के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,पंचगंगा घाट, काशी के वर्तमान आचार्य और जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्टित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज इस बार आयोजन के मुख्य समन्वयक थे। रामभक्तों के लिए यह अतीव गौरव और प्रसन्नता की बात रही कि कई वर्षों बाद आचार्यश्री जनकपुर पधारे थे और वो भी संतो-भक्तों की बड़ी मंडली लेकर।
                      जनकपुर का श्रीराम- जानकी विवाह वैसे भी परंपरा और ऐतिहासिकता का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। इस दौरान वे सारे मांगलिक कार्य पूर्ण विधि-विधान और लोक रीति से संपादित होते हैं, जो मिथिला की संस्कृति में आदि काल से प्रचलित रहे हैं। इस बार भी अयोध्या से चलकर काशी और बक्सर जैसे स्थानों से होते हुए बारात जनकपुर तक आई थी। बारात का वैसे ही स्वागत हुआ जैसा कभी जनकजी ने किया होगा।
                     ऐतिहासिक राममंदिर और जानकी मंदिर में विवाह की सभी रस्में पूरी की गयी। परंपरानुसार मंगलवार यानि 26 नवंबर को तिलकोत्सव हुआ। बु्धवार को पूजा मटकोर हुआ और अगले दिन यानि गुरुवार-27 नवंबर,2014 को शादी हुई। शुक्रवार को भतखई के बाद बारात की विदाई हो गयी।
                
                      

 

Monday, April 15, 2013

भगवान परशुराम : देश की पहली बड़ी लड़ाई के महानायक

parashuram-सूर्यकांत बाली
हमें महाभारत के नाम से प्रसिद्ध एक भयानक संग्राम की याद है जो आज से करीब पांच हजार साल पहले (अर्थात् पांच हजार साल से भी पचास-साठ साल पहले) लड़ा गया था, जिसमें सारे देश के राजाओं ने किसी न किसी रूप में हिस्सा लिया था। पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि महाराज मनु से मिलने वाले अपने देश के ज्ञात इतिहास में महाभारत से भी पहले महासंग्राम लड़े गए थे।
दाशराज युद्ध नामक एक अन्य महासंग्राम का जिक्र हम कर चुके हैं जो पुरुवंशी सुदास और दस विरोधी राजाओं के महासंघ के बीच सरस्वती, परुष्णी और दृषद्वती नदियों के बीच महाभारत के करीब साढ़े आठ सौ वर्ष पहले लड़ा गया था जिसमें सुदास जीते और दस  राजाओं का महासंघ हारा।
हम जानते हैं कि दाशराज युद्ध से भी करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले (यानी आज से करीब छह हजार वर्ष पहले) राम ने दक्षिण भारत की वनवासी जातियों की एक विराट सेना का नेतृत्व कर रावण से भयानक संग्राम किया था और जीते थे। ऐतिहासिक राम-रावण युद्ध से भी करीब (एक हजार साल पहले) भगवान परशुराम ने उत्तर और पूर्व के राजाओं का एक महासंघ बनाकर आधुनिक गुजरात के हैहय राजाओं के खिलाफ एक महासंग्राम को नेतृत्व प्रदान किया था।
यानी महाभारत युद्ध आज से 5000 वर्ष पूर्व, राम रावण युद्ध आज से 6000 वर्ष पूर्व और हैहृय-परशुराम युद्ध आज से करीब 7000 वर्ष पूर्व लड़े गए। अगर महाभारत युद्ध द्वापर युग के अंत में, राम-रावण युद्ध और दाशराज युद्ध त्रेतायुग के अंत में लडे ग़ए तो परशुराम के नेतृत्व में हैहयों के विरुद्ध यह युद्ध सत्ययुग अर्थात् कृतयुग के अंत में लड़ा गया। भारत के आठ हजार वर्षों के मनुपरवर्ती ज्ञात इतिहास का यह पहला महासंग्राम था, जिसके विजेता महानायक परशुराम को इस देश का बच्चा-बच्चा जानता है तो उस युद्ध के कारण नहीं बल्कि अन्य कारणों से और इस युद्ध की एक अजीबोगरीब बना दी गई व्याख्या के कारण से।
तो कौन थे परशुराम जिन्हें हमारा पुराना साहित्य भगवान परशुराम के नाम से पूरी इज्जत और श्रद्धा के साथ याद करता है तो इस देश के ब्राह्मण जाति के लोगों ने इधर उन्हें अपना लक्कड़दादा मानकर उनकी जयंती मनानी शुरू कर दी है? हालत करीब-करीब वही है जो वसिष्ठों और विश्वामित्रों के सन्दर्भ में देख आए हैं। परशुराम जिस भार्गव वंश के थे, इसकी पूरी एक वंशपरम्परा है जिसके सभी महापुरुष भार्गव या परशुराम स्वाभाविक रूप से कहलाए, लेकिन वसिष्ठों और विश्वामित्रों की तरह हमने सभी परशुरामों को भी एक कर दिया है।
एक परशुराम वे थे, जिन्होंने भीष्म (पितामह) के साथ इसलिए युद्ध किया था ताकि भीष्म खुद उनके (भीष्म के) द्वारा अपहरण करके लाई गई अम्बा (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका वाली अम्बा) के साथ विवाह करें, पर वे भीष्म को आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा से डिगा नहीं सके। इन्हीं परशुराम से आगे चलकर कुन्तीपुत्र कर्ण ने अस्त्र विद्या सीखी थी।
इनसे एक हजार साल पहले के एक परशुराम वे थे जिन्होंने शिव धानुष तोड़ने वाले राम के साथ विवाद किया, उसके शौर्य को चुनौती दी और राम से अपना मद-दलन करवा कर लौटे। हैहयों से लड़ने वाले परशुराम इससे भी करीब एक हजार साल पहले हुए। हैहयों से हुए इस महासंग्राम में परशुराम ने हैहयों को एक के बाद एक इक्कीस बार पराजित किया। पर तब से हमारी स्मृतियों के इतिहास में दर्ज यह हो गया कि परशुराम ने भारत भूमि को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया। क्या क्षत्रियों का इक्कीस बार विनाश कोई एक ही योद्धा कर सकता है? क्या यह संभव है? नहीं। इसलिए हमारा कहना है कि हैहयों के साथ हुए इस महायुद्ध की इस अजीबोगरीब व्याख्या के कारण देश का बच्चा-बच्चा परशुराम के बारे में जितना जानता है, उसके अलावा भी परशुराम के बारे में कुछ और जरूरी बातें जान लेनी चाहिए।
परशुराम जिस कुल में जन्मे उसके आदिपुरुष का नाम भृगु था। ये वही भृगु हैं जिनके किसी वंशज के प्रयासों से वह भृगुसंहिता रची गई, जिसे पढ़कर लोग अपना भविष्य जानने को उत्सुक रहते हैं। इसी भृगु के कारण उनके सभी वंशज भार्गव कहलाए। परशुराम भार्गव के पिता का नाम जमदग्नि था, इसलिए हमारी इस गाथा के कथानक के नायक को परशुराम भार्गव के अलावा परशुराम जागदग्न्य भी कह दिया जाता है।
इनकी माता का नाम रेणुका था और हम भारतीयों को गाथा याद है कि किसी बात पर रुष्ट अपने पिता जन्मदग्नि के आदेश का पालन करते हुए परशुराम ने अपने परशु (फरसा) से मां का वध कर दिया। जब प्रसन्न पिता ने वर मांगने को कहा तो उन्होंने अपनी मां का ही पुनर्जीवन मांग कर मां को फिर से पा लिया। भार्गवों को अगर (कौशिकों और कश्यपों की तरह) प्रामाणिक ब्राह्मण कुल न मानने की परम्परा चल पड़ी है तो इसका कारण परशुराम द्वारा किया गया मातृ-वध ही नजर आता है।
परम्परा के भार्गव लोग नर्मदा के किनारे रहा करते थे और आनर्त (गुजरात) के हैहय राजवंश के कुलगुरु थे। परशुराम भी अपने पिता जगदग्नि के साथ नर्मदा नदी के तट पर बने अपने आश्रम में रहा करते थे। अब तो परशुराम नाम का रिश्ता ही फरसे और दूसरे कई तरह के शस्त्रों से तथा हैहयों के साथ लड़े गए युद्ध के साथ बन गया है। पर मूलत: भार्गव आयुधजीवी ब्राह्मण नहीं थे और जमदग्नि का नाम भी शस्त्र के बजाय ज्ञान और विद्या के साथ ही जोड़ा जाता है।
एक विचारधारा यह भी है कि भार्गव और आंगिरस कुल के परवर्ती आचार्यो ने ही रामायण, महाभारत और पुराणों का संपूर्ण नव-संस्कार किया था और कई बाद की परम्पराओं को पुराणों में जोड़कर इन्हें लगातार नवीनतम बनाने का प्रयास किया था। भार्गव कुल इस हद तक विद्यानुरागी था कि हैहयों से मनमुटाव हो जाने के कारण अपने तिरस्कर्ता राजाओं से झगड़ने की बजाय वे लोग कान्यकुब्ज में जाकर रहने लग गए थे।
पर जमदग्नि के साथ हुए अपमान को उनके पुत्र परशुराम सहन नहीं कर पाए और शस्त्र विद्या पर परमज्ञान प्राप्त कर वे कई राजाओं का महासंघ बनाकर हैहयों से उलझ पड़े और एक महासमर को नेतृत्व दिया जिसमें हैहय जगह-जगह हारे। उसके बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि भार्गव की बजाय परशुराम ही मानो कुल नाम पड़ गया और वह हर वंशज, जो युद्धविद्या में प्रवीण हो गया, खुद को परशुराम कहलाना ही पसंद करने लगा। इसलिए जो राम से उलझे वे भी परशुराम, और जो भीष्म से लड़े वे भी परशुराम।
जैसे किसी बहुत बूढ़े आदमी के भूतकाल के जीवन के बारे में कई तरह की अतिशय से भरी उक्तियां कह दी जाती हैं, किसी पुराने जीर्णशीर्ण मकान या उद्यान को लेकर कई तरह की कहानियां गढ़ दी जाती हैं या उससे जुड़ी कई घटनाओं की कई तरह से व्याख्याएं चलन में आ जाती हैं, वैसे ही भारत जैसे अतिप्राचीन देश के इतिहास की कई घटनाओं की विचित्र व्याख्याएं कर दी गई हैं। हैहयों को एक लम्बी चली लड़ाई में इक्कीस जगहों पर पराजय देने वाले परशुराम के बारे में यह फैल गया है कि उन्होंने इक्कीस बार इस धरती पर क्षत्रियों का समूलोन्मूलन कर दिया।
वैसे तो एक बार के समूलोन्मूलन के बाद दोबारा क्षत्रियों के पैदा होने का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। इक्कीस बार तो संभव ही नहीं है। पर इतना ही नहीं, परशुराम के हाथों इतने ज्यादा बड़े भू-भाग पर, इतने ज्यादा राजवंशों के इतने बड़े पैमाने पर विनाश की कथाएं पुराणों में मिल जाती है कि पढ़ते-पढ़ते कुछ कोफ्त होने लगती है कि पुराणकार आखिर अपने पाठकों को समझते क्या हैं। इन विवरणों को जितना चाहे बढ़ा सकते हैं।
पर भारत के इतिहास में आज करीब सात हजार साल पहले परशुराम ने यकीनन एक बड़ी निर्णायक लड़ाई हैहयों से लड़ी थी। लड़ाई का कारण क्या था, सहसा समझ में नहीं आ रहा। दो बातें मिलती हैं। एक यह कि एक हैहय राजा कृतवीर्य ने अपने कुलगुरु औचीक और्व भार्गव को प्रभूत धन दिया था। जब कुछ समय बाद राजा ने पैसा वापिस मांगा तो औचीक ने आनाकानी की। राजा ने उनका अपमान कर दिया और औचीक अपना आश्रम छोड़ कान्यकुब्ज चले गये। लेकिन, उनके पुत्र जमदग्नि अपने आश्रम में वापिस आ गए। परशुराम के साथ एक और पुराण कथा जुड़ी है।
ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार कृतवीर्य के पुत्र कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि से उनकी कामधेनु गाय मांगी। गुरु ने मना कर दिया तो कार्तवीर्य ने उनका तिरस्कार कर दिया। बल्कि कहानी यहां तक कहती है कि एक बार जब जमदग्नि के पुत्र परशुराम तप के लिए आश्रम से बाहर गए हुए थे तो कार्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि का वध कर दिया। तप से लौटे परशुराम ने इससे कुपित होकर हैहयों के नाश की प्रतिज्ञा कर डाली।
क्या आपको कहीं कोई खास बात मिलती नजर आ रही है? कृतवीर्य-औचीक तथा कीर्तवीर्य-जमदग्नि के बीच विरोध का ऐसा कोई बड़ा कारण इन दोनों कथाओं में से उभरता नजर नहीं आ रहा। जाहिर है कि कोई बड़ा कारण था जिसकी वजह से परशुराम ने हैहयों को सबक सिखाने की ठान ली। बस लग गए वे अपनी धुन के पीछे। अयोध्या, विदेह, काशी, कान्यकुब्ज और वैशाली के राजाओं का एक महासंघ बनाकर खुद वे उसके नेता बने।
उधर हैहयों ने भी आज के सिन्ध और राजस्थान के कुछ राजाओं को अपने साथ मिलाया। परशुराम ने हैहयों को इक्कीस जगह पराजय दी। जाहिर है कि युद्ध लंबा और भयानक चला होगा। यह अनुमान भी लगा सकते हैं कि महाभारत की तरह यह युद्ध भी कई दिन यानी इक्कीस दिन चला और इसमें हैहयों को भारी हार का सामना करना पड़ा हो। जहां युद्ध का कोई बड़ा कारण हमारे इतिहास के स्मृतिपटल से लगभग पुंछ चुका है, वैसे ही इक्कीस संख्या के असली अर्थ से भी हम करीब-करीब वंचित हो चुके हैं।
पर मनुपरवर्ती भारत के इस पहले महासमर को लेकर दो बातें जरूर ध्यान में आ जाती हैं। एक, परशुराम हमारे इतिहास के पहले ब्राह्मण पात्र हैं जिन्होंने किसी राजा को दंड देने के लिए राजाओं को ही एक जुट कर लिया। इसके पहले पुरुरवा, वेन, नहुष, शशाद जैसे राजाओं की दुष्टताओं या लापरवाहियों को दंडित करने के लिए ऋषि या ब्राह्मण अपने ही स्तर पर आगे आए थे।
पहली बार सारे मामले को एक ऐसी राजनीतिक शक्ल मिली कि संघर्ष का स्वरूप ही बदल गया। इसका असर क्या पड़ा, यह आकलन इसलिए कठिन है क्योंकि घटनाचक्र का पूरा रूप हमारे सामने नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात उस युग के स्वरूप के बारे में है। कैसा रहा होगा वह युग? एक ओर उत्तर में वसिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष चल रहा था तो पश्चिम में हैहयों और भार्गवों के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई थी।
अयोध्या में सत्यव्रत त्रिशुंक नाम से एक उद्धत राजा राज कर रहा था तो आनर्त में बराबर के उद्धत कार्तवीर्य की दुन्दुभि बज रही थी। और इन सबसे ऊपर विश्वामित्र और परशुराम नाम के दो विराट मस्तिष्क सारी राजनीति को आंदोलित किए हुए थे। कैसा रहा होगा वह युग जो सत्ययुग की छवि के हिसाब से बहुत ही शांत होना चाहिए, पर कितनी हलचल और कितनी गतिविधि से सराबोर था?