Thursday, September 15, 2016
पटना चातुर्मास्य में समरस समाजके निर्माणमें संतों का योगदान विषयक संगोष्ठी
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| पटना चातुर्मास्य के दौरान हिन्दी दिवस पर संगोष्ठी का उदघाटन करते स्वामी रामनरेशाचार्य जी एवम् हिन्दी सेवी विद्वान |
पटना में जारी दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञके सम्पादन के क्रम में हिन्दी दिवस यानि 14 सितंबर को एक विद्वत् गोष्ठी का समायोजन जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में सुसम्पन्न हुआ, जिसमें भीमराव अंबेडकर विवि. मुजफ्फरपुर के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार सिंह, नालंदा खुला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रासबिहारी सिंह, और बिहार-झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव श्री विजय शंकर दुबे और काशी से पधारे प्रो. अशोक कुमार सिंह की गरिमामयी उपस्थिति रही। पूरे कार्यक्रम के संयोजक थे प्रो. डॉ. श्रीकान्त सिंह, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना।
सबसे पहले अभिनंदनीय संत-साहित्यके मर्मज्ञ महानुभावों का संक्षिप्त परिचय डॉ. श्रीकान्त सिंह ने कराया। कार्यक्रम का शुभारंभ जगगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज एवं संत-साहित्यके मर्मज्ञ महानुभावोंके द्वारा सूर्य-साक्षी स्वरूप दीप-प्रज्वलनन सह परम प्रभु श्री सीतारामजी के माल्यार्पणके साथ हुआ।
मंगलाचरणके पश्चात् काशी से पधारे प्रो. अशोक सिंह को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने एक गीत -"सात खंड नवद्वीप विदित यह कलिमल हरनी गाथा...." के माध्यमसे आद्य जगदगुरु रामानन्दाचार्यजी की जीवन- गाथा से लेकर सम्प्रति जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी तक की कृतिको अपनी रसमयी वाणी में प्रस्तुत किया । शीर्षक की व्याख्या करते हुये डॉ. श्रीकान्त सिंहने ’संत’ तथा ’समरसता’ को परिभाषित किया।
पश्चात् प्रो. रास बिहारी प्रसाद सिंह, कुलपति नालंदा खुला वि.वि. ने कहा कि मैं साधु और संतमें भेद मानता हूँ। साधु समाजसे कम जुड़ा रहता है पर संत समाजसे जुड़कर उसका कल्याणकामी होते हैं।
बिहार और झारखंड सरकार के मुख्य सचिव और नालंदा खुला विवि के पूर्व कुलपति श्री विजय शंकर दुबे कहा कि वर्तमान समाज की रक्षा केवल रामानन्द सम्प्रदाय का मूल मंत्र ’जाति पाँति पूछै नहीं कोई। हरिको भजै सो हरि का होई॥’ के द्वारा ही सम्भव है और यह मात्र संत-समाज और विशेषतः स्वामी रामनरेशाचार्यजी जैसे संत ही कर सकते हैं। कोई सरकार, प्रशासन या राजनीतिज्ञ नहीं कर सकता। कबीर भी संत थे तथा तुलसीदास भी संत थे, पर समाजके प्रति जो अवदान गोस्वामी तुलसीदासजी का है वह कबीर का नहीं है। उन्होंने कहा कि ’ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी’ नहीं पर यह ’ढोल, गंवार, सूद, पशु नारी’ है यह राजापुरवालों का है। सूदका अर्थ है- हिंसक।
अगले वक्ता के रूप में उदबोधन हुआ प्रो. प्रमोद कुमार सिंह, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, मुजफ्फरपुर का। इन्होंने सर्वप्रथम बताया कि ’क्षुद्र’ शब्द ही ’शूद्र’ हो गया है। काव्य-शास्त्रमें जो वक्तव्य होता है वह कवि का नहीं वरन वक्ता का होता है। अतः ’ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी’ समुद्र का वक्तव्य है। अतः तुलसीदास को इससे लांक्षित नहीं किया जा सकता।
संत तो निःश्रेयस की ओर ले जाता है। संत सम भाव हैं, समत्व है, समदर्शी होता है। समदर्शिताके बिना कोई संत नहीं हो सकता। जैसे सदना, जो स्वामी रामानन्दका शिष्य था।
आचार्य श्री स्वामी रामनरेशाचार्यजी ने अपने मंगलाशीर्वचन में सभी विद्वानों के भावों का समर्थन करते हुए समरसता को सहज भावसे समझाया। इसके पश्चात् स्वामी जी महाराज ने विद्वानों को साविधि स्वयं अभिषेक कर पुष्पमाला, शॉल, मिष्टान, मठ साहित्य और दक्षिणादिक द्वारा सम्मानित किया। अंत में संत साहित्य के विद्वान और काशी से पधारे प्रोफेसर डॉ. उदय प्रताप सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
Monday, September 12, 2016
प्रभु को अर्पित करने के बाद ग्रहण करें भोजन - जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य
पटना,11 सितंबर।
सात्विक पदार्थो को सात्विक मन से परम प्रभु के लिए ही पकाया जाना और उन्हें ही सबसे पहले श्रेष्ठ प्रेम एवं संयतमना होकर समर्पित किया जाना, तत्पश्चात् उनका प्रसाद उनके ही रूप में ग्रहण करना एक आराधना ही है। यह आराधना महाराधना हो जाती है जब भोग हो प्रभुका छप्पन भोग और प्रसादग्राही हो ऊंच-नीच, जाति-भेद, वर्ण-भेद आदि से रहित सर्वजन। यह विचार जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने राजधानी में चल रहे दिव्य चातुर्मास्य के दौरान रखे।
राजधानी के लाला लाजपथ राय भवन में चल रहे कार्यक्रम में
रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि वैसे तो वैष्णवाराधन एक चलन सा हो गया है, पर
प्रसाद की महत्ता तो तब ही अक्षुण्ण रह पाती है जब भोग के संसाधन, उसका
पाक, प्रभु को अर्पण, प्रसाद-वितरण तथा उसकी सम्प्राप्ति सब कुछ नियमानुकूल
और विधिवत हो।
दिव्य चातुर्मास्य महोत्सव महायज्ञ के दौरान रविवार को बैंक रोड के मुहाने पर मंगलमय छप्पन भोग का भंडारा का आयोजन किया गया। स्वामी जी ने इस अवसर पर कहा कि जितनी भी अच्छी-से अच्छी वस्तुएं होती हैं, उसे हम सम्यक मन से प्रभु को समर्पित करते हैं। सब उन्हीं का तो है। ’त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’ यह केवल वाच्यात्मक नहीं भावनात्मक भी होनी चाहिये। तब प्रभु अपना सायुज्य देते हैं, यहां तक कि भोग में अपनी साम्यता भी दे देते हैं।
प्रभु ऐसे समतावादी हैं कि जो भोग वे स्वयं लेते हैं अपने भक्तों को भी प्रदान कर देते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सम्यक रूप से भावभावित प्रेमरस संपृक्त अर्पण प्रभु का सायुज्य देते हुए भोग की साम्यता भी करवा डालती है। छप्पन भोगात्मक समष्टि भण्डारा का (वैष्णवाराधन) के समायोजन में सेवा-व्रति लोग मोह-ग्रस्त हो रहे थे, परन्तु जब आचार्यश्री ने यह समझाया कि यह तो प्रभु-कार्य है, इसमें आप तो केवल निमित्तमात्र हैं। गीता में कहा है- निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन। यह एक विराट महायज्ञ है, आप इसमें निमित्त बनें, शेष तो प्रभु स्वयं संभाल लेंगे। अजरुन का मोह नष्ट हुआ और कार्य में प्रवृत्त होने पर प्रभु-साक्षात्कार भी हुआ।
सात्विक पदार्थो को सात्विक मन से परम प्रभु के लिए ही पकाया जाना और उन्हें ही सबसे पहले श्रेष्ठ प्रेम एवं संयतमना होकर समर्पित किया जाना, तत्पश्चात् उनका प्रसाद उनके ही रूप में ग्रहण करना एक आराधना ही है। यह आराधना महाराधना हो जाती है जब भोग हो प्रभुका छप्पन भोग और प्रसादग्राही हो ऊंच-नीच, जाति-भेद, वर्ण-भेद आदि से रहित सर्वजन। यह विचार जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य ने राजधानी में चल रहे दिव्य चातुर्मास्य के दौरान रखे।
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| पटना में समष्टि भंडारे का चित्र |
दिव्य चातुर्मास्य महोत्सव महायज्ञ के दौरान रविवार को बैंक रोड के मुहाने पर मंगलमय छप्पन भोग का भंडारा का आयोजन किया गया। स्वामी जी ने इस अवसर पर कहा कि जितनी भी अच्छी-से अच्छी वस्तुएं होती हैं, उसे हम सम्यक मन से प्रभु को समर्पित करते हैं। सब उन्हीं का तो है। ’त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’ यह केवल वाच्यात्मक नहीं भावनात्मक भी होनी चाहिये। तब प्रभु अपना सायुज्य देते हैं, यहां तक कि भोग में अपनी साम्यता भी दे देते हैं।
प्रभु ऐसे समतावादी हैं कि जो भोग वे स्वयं लेते हैं अपने भक्तों को भी प्रदान कर देते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सम्यक रूप से भावभावित प्रेमरस संपृक्त अर्पण प्रभु का सायुज्य देते हुए भोग की साम्यता भी करवा डालती है। छप्पन भोगात्मक समष्टि भण्डारा का (वैष्णवाराधन) के समायोजन में सेवा-व्रति लोग मोह-ग्रस्त हो रहे थे, परन्तु जब आचार्यश्री ने यह समझाया कि यह तो प्रभु-कार्य है, इसमें आप तो केवल निमित्तमात्र हैं। गीता में कहा है- निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन। यह एक विराट महायज्ञ है, आप इसमें निमित्त बनें, शेष तो प्रभु स्वयं संभाल लेंगे। अजरुन का मोह नष्ट हुआ और कार्य में प्रवृत्त होने पर प्रभु-साक्षात्कार भी हुआ।
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भगवत्प्रसाद का सेवन परम पुरुषार्थ यानि मोक्ष का साधन है- स्वामी रामनरेशाचार्य
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| पटना में समष्टि भंडारे का शुभारंभ करते स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज |
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| भक्तों और अभ्यागतों के बीच भंडारे का प्रसाद परोसते संत गण |
वैदिक सनातन धर्म में भोजन केवल भूख मिटानेका ही साधन नहीं, अपितु वह परम कल्याणकामी विशिष्ट साधन है। उसकी प्रक्रिया यह है कि सात्विक पदार्थों को परम प्रभु के लिये ही पकाया जाय तथा उन्हें ही सबसे पहले श्रेष्ठ प्रेम एवं संयतमना होकर समर्पित किया जाय, तदन्तर उसका प्रसाद भगवान् के रूप में ही ग्रहण किया जाय। यह भी एक आराधना ही है। जैसे संसारी-जन जिस किसी भी प्रकार से धन का संग्रह कर धनवान होना चाहते हैं, वैसे ही कल्याणकामी भी हर-किसी प्रकारसे परम प्रभु को अपने भीतर (अपने मनमें) ले जाना चाहता है।
भगवदर्पण तथा उसका सेवन उसी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। तभी तो गीता में कहा गया है कि जो लोग अपने लिये भोजन पकाते हैं, वे तो पाप को ही पकाते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर उपासना-स्वरूप यज्ञादि को छोड़ने के लिये शास्त्रों ने मना किया। यज्ञादि के सम्पादन से उनका प्रसाद प्राप्त होगा तथा उनके माध्यम से बना हुआ मन ही वस्तुतः ज्ञान एवं भक्ति का श्रेष्ट उत्पादक होगा, जिसके माध्यम से व्यष्टि एवं समष्टि में राम-राज्य अवतरित होगा। जैसा-तैसा अन्न, वैसा ही पाक तथा वैसा ही भोजन एवं उससे बना मन तो कभी भी सही ज्ञान एवं भक्ति को प्राप्त नहीं करते हैं। अतएव राक्षसी जीवन को ही देते हैं।
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| प्रभुराम को 56 भोग |
इसी को ध्यान में रखकर दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञ के समापन की पूर्व संध्या पर रविवार, 11 सितंबर,2016 को प्रातः 10 बजे से रात्रि 10 बजे तक पटना गांधी मैदान से सटे बिस्कोमान भवन के सामने "परम मंगलमय छप्पन भोगात्मक समष्टि भण्डारा का (वैष्णवाराधन)" समायोजन किया गया। महाराज श्री ने एक दिन पहले ही भक्तों और आमजनों का आह्वान किया कि आप सब सादर सप्रेम आमंत्रित हैं। पधारिये, प्रसाद ग्रहण कीजिये तथा सर्वश्रेष्ठ मानव जीवनको परम धन्यतासे मण्डित कीजिये। स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराज ने मोक्षकामियोंको सम्बोधित करते हुए लाला लाजपत राय स्मारक सभागारमें ये बातें कही।
इस महायज्ञके समायोजक दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञ समिति बिहार है।
भंडारे के मुख्य सेवाव्रती निम्नांकित मंगलमयी सेवैकनिष्ठ महानुभाव रहे-
१. श्री आर. के. सिन्हा, सदस्य राज्य सभा, श्री विष्णु बिंदल- स्वस्तिक कोल कॉरपोरेशन, इन्दौर (मध्य प्रदेश), श्रीआर. पी. सिंह, कमलादित्य कन्स्ट्रक्शन, बोकारो। श्री सत्येन्द्र पाण्डेय एवं गीता पाण्डेय, पीएनबी, आरा, श्री सुरेन्द्र सिंह, पूर्व शिक्षक, फुलाड़ी (भोजपुर) , श्री वीरेन्द्र कुमार ’मुन्ना’ करवाँ, आरा। श्री ब्रजेश सहाय, सामाजिक कार्यकर्त्ता, बक्सर। श्री विनोद कुमार मंगलम्, पटना; श्री नृपेन्द्र कुमार- पीएनबी, पटना, श्री आनन्द कौशिक- पीएनबी, पटना। श्री दयाशंकर उपाध्याय- पीएनबी, आरा। श्री प्रशान्त तिवारी, पी. एन. बी. आरा; अवध किशोर शर्मा, खजरेठा, खगरिया; श्रीमती अंजलि कुमारी, समाजसेविका, पटना, कुन्दन कुमार , पीएनबी, सासाराम एवं श्री लक्ष्मण तिवारी- बरिसवन ,आरा।
Thursday, September 8, 2016
श्री गुरु गीता से जाने शिष्य धर्म
शिष्य धर्म को जानें-
शिष्य वह है जो नित्य गुरु मंत्र का जप उठते, बैठते, सोते जागते करता रहता है।
चाहे कितना ही कठिन एवं असंभव काम क्यो न सोपा जाए, शिष्य का मात्र कर्तव्य बिना किसी ना नुकर के उस काम में लग जाना चाहिए।
गुरु शिष्य की बाधाओं को अपने ऊपर लेते है, अतएव यह शिष्य का भी धर्म है की वह अपने गुरु की चिंताओं एवं परेशानियों को हटाने के लिए प्राणपण से जुटा रहे।
शिष्य का मात्र एक ही लक्ष्य होता है, और वह है, अपने ह्रदय में स्थायी रूप से गुरु को स्थापित करना।
और फिर ऐसा ही सौभाग्यशाली शिष्य आगे चलकर गुरु के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थापित हो पाता है।
जब ओठों से गुरु शब्द उच्चारण होते ही गला अवरूद्ध हो जाए और आँखे छलछला उठें तो समझे कि शिष्यता का पहला कदम उठ गया है।
और जब २४ घंटे गुरु का अहसास हो, खाना खाते, उठते, बैठते, हंसते गाते अन्य क्रियाकलाप करते हुए ऐसा लगे कि वे ही है मैं नहीं हूं, तों समझें कि आप शिष्य कहलाने योग्य हुए है।
जो कुछ करते हैं, गुरु करते हैं, यह सब क्रिया कलाप उन्ही की माया का हिस्सा है, मैं तो मात्र उनका दास, एक निमित्त मात्र हूं, जो यह भाव अपने मन में रख लेता है वह शिष्यता के उच्चतम सोपानों को प्राप्त कर लेता है।
गुरु से बढ़कर न शास्त्र है न तपस्या, गुरु से बढ़कर न देवी है, व देव और न ही मंत्र, जप या मोक्ष। एक मात्र गुरुदेव ही सर्वश्रेष्ठ हैं।
न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं
शिव शासनतः शिव शासनतः शिवन शासनतः, शिव शासनतः
जो इस वाक्य को अपने मन में बिठा लेता है, तो वह अपने आप ही शिष्य शिरोमणि बन कर गुरुदेव का अत्यन्त प्रिय हो जाता है। गुरु जो भी आज्ञा देते है, उसके पीछे कोई-रहस्य अवश्य होता है। अतः शिष्य को बिना किसी संशय के गुरु कि आज्ञा का पूर्ण तत्परता से, अविलम्ब पालन करना चाहिए, क्योंकि शिष्य इस जीवन में क्यो आया है, इस युग में क्यो जन्मा है, वह इस पृथ्वी पर क्या कर सकता है, इस सबका ज्ञान केवल गुरु ही करा सकता है।
शिष्य को न गुरु-निंदा करनी चाहिए और न ही निंदा सुननी चाहिए। यदि कोई गुरु कि निंदा करता है तो शिष्य को चाहिए कि या तो अपने वाग्बल अथवा सामर्थ्य से उसको परास्त कर दे, अथवा यदि वह ऐसा न कर सके, तो उसे ऐसे लोगों की संगति त्याग देनी चाहिए। गुरु निंदा सुन लेना भी उतना दोषपूर्ण है, जितना गुरु निंदा करना।
गुरु की कृपा से आत्मा में प्रकाश सम्भव है। यही वेदों में भी कहा है, यही समस्त उपनिषदों का सार निचोड़ है। शिष्य वह है, जो गुरु के बताये मार्ग पर चलकर उनसे दीक्षा लाभ लेकर अपने जीवन में चारों पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।
सदगुरु के लिए सबसे महत्वपूर्ण शब्द शिष्य ही होता है और जो शिष्य बन गया, वह कभी भी अपने गुरु से दूर नहीं होता। क्या परछाई को आकृति से अलग किया जा सकता है? शिष्य तो सदगुरु कि परछाई की तरह होते है।
जिसमे अपने आप को बलिदान करने की समर्थता है, अपने को समाज के सामने छाती ठोक कर खडा कर देने और अपनी पहचान के साथ-साथ गुरु की मर्यादा, सम्मान समाज में स्थापित कर देने की क्षमता हो वही शिष्य है।
गुरु से जुड़ने के बाद शिष्य का धर्म यही होता है, कि वह गुरु द्वारा बताये पथ पर गतिशील हो। जो दिशा निर्देश गुरु ने उसे दिया है, उनका अपने दैनिक जीवन में पालन करें।
यदि कोई मंत्र लें, साधना विधि लें, तो गुरु से ही लें, अथवा गुरुदेव रचित साहित्य से लें, अन्य किसी को भी गुरु के समान नहीं मानना चाहिए।
शिष्य के लिए गुरु ही सर्वस्व होता है। यदि किसी व्यक्ति की मित्रता राजा से हो जाए तो उसे छोटे-मोटे अधिकारी की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए श्रेष्ठ शिष्य वहीं है, जो अपने मन के तारों को गुरु से ही जोड़ता है।
शिष्य यदि सच्चे ह्रदय से पुकार करे, तो ऐसा होता ही नहीं कि उसका स्वर गुरुदेव तक न पहुंचे। उसकी आवाज गुरुदेव तक पहुंचती ही है, इसमे कभी संदेह नहीं करना चाहिए।
मलिन बुद्धि अथवा गुरु भक्ति से रहित, क्रोध लोभादी से ग्रस्त, नष्ट आचार-विचार वाले व्यक्ति के समक्ष गुरु तंत्र के इन दुर्लभ पवित्र रहस्यों को स्पष्ट नहीं करना चाहिए।
वास्तविकता को केवल शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता। आम का स्वाद उसे चख कर ही जाना जा सकता है। साधना द्वारा विकसित ज्ञान द्वारा ही परम सत्य का साक्षात्कार सम्भव है।
साभार -श्री गुरु गीता
शिष्य वह है जो नित्य गुरु मंत्र का जप उठते, बैठते, सोते जागते करता रहता है।
चाहे कितना ही कठिन एवं असंभव काम क्यो न सोपा जाए, शिष्य का मात्र कर्तव्य बिना किसी ना नुकर के उस काम में लग जाना चाहिए।
गुरु शिष्य की बाधाओं को अपने ऊपर लेते है, अतएव यह शिष्य का भी धर्म है की वह अपने गुरु की चिंताओं एवं परेशानियों को हटाने के लिए प्राणपण से जुटा रहे।
शिष्य का मात्र एक ही लक्ष्य होता है, और वह है, अपने ह्रदय में स्थायी रूप से गुरु को स्थापित करना।
और फिर ऐसा ही सौभाग्यशाली शिष्य आगे चलकर गुरु के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थापित हो पाता है।
जब ओठों से गुरु शब्द उच्चारण होते ही गला अवरूद्ध हो जाए और आँखे छलछला उठें तो समझे कि शिष्यता का पहला कदम उठ गया है।
और जब २४ घंटे गुरु का अहसास हो, खाना खाते, उठते, बैठते, हंसते गाते अन्य क्रियाकलाप करते हुए ऐसा लगे कि वे ही है मैं नहीं हूं, तों समझें कि आप शिष्य कहलाने योग्य हुए है।
जो कुछ करते हैं, गुरु करते हैं, यह सब क्रिया कलाप उन्ही की माया का हिस्सा है, मैं तो मात्र उनका दास, एक निमित्त मात्र हूं, जो यह भाव अपने मन में रख लेता है वह शिष्यता के उच्चतम सोपानों को प्राप्त कर लेता है।
गुरु से बढ़कर न शास्त्र है न तपस्या, गुरु से बढ़कर न देवी है, व देव और न ही मंत्र, जप या मोक्ष। एक मात्र गुरुदेव ही सर्वश्रेष्ठ हैं।
न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं
शिव शासनतः शिव शासनतः शिवन शासनतः, शिव शासनतः
जो इस वाक्य को अपने मन में बिठा लेता है, तो वह अपने आप ही शिष्य शिरोमणि बन कर गुरुदेव का अत्यन्त प्रिय हो जाता है। गुरु जो भी आज्ञा देते है, उसके पीछे कोई-रहस्य अवश्य होता है। अतः शिष्य को बिना किसी संशय के गुरु कि आज्ञा का पूर्ण तत्परता से, अविलम्ब पालन करना चाहिए, क्योंकि शिष्य इस जीवन में क्यो आया है, इस युग में क्यो जन्मा है, वह इस पृथ्वी पर क्या कर सकता है, इस सबका ज्ञान केवल गुरु ही करा सकता है।
शिष्य को न गुरु-निंदा करनी चाहिए और न ही निंदा सुननी चाहिए। यदि कोई गुरु कि निंदा करता है तो शिष्य को चाहिए कि या तो अपने वाग्बल अथवा सामर्थ्य से उसको परास्त कर दे, अथवा यदि वह ऐसा न कर सके, तो उसे ऐसे लोगों की संगति त्याग देनी चाहिए। गुरु निंदा सुन लेना भी उतना दोषपूर्ण है, जितना गुरु निंदा करना।
गुरु की कृपा से आत्मा में प्रकाश सम्भव है। यही वेदों में भी कहा है, यही समस्त उपनिषदों का सार निचोड़ है। शिष्य वह है, जो गुरु के बताये मार्ग पर चलकर उनसे दीक्षा लाभ लेकर अपने जीवन में चारों पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।
सदगुरु के लिए सबसे महत्वपूर्ण शब्द शिष्य ही होता है और जो शिष्य बन गया, वह कभी भी अपने गुरु से दूर नहीं होता। क्या परछाई को आकृति से अलग किया जा सकता है? शिष्य तो सदगुरु कि परछाई की तरह होते है।
जिसमे अपने आप को बलिदान करने की समर्थता है, अपने को समाज के सामने छाती ठोक कर खडा कर देने और अपनी पहचान के साथ-साथ गुरु की मर्यादा, सम्मान समाज में स्थापित कर देने की क्षमता हो वही शिष्य है।
गुरु से जुड़ने के बाद शिष्य का धर्म यही होता है, कि वह गुरु द्वारा बताये पथ पर गतिशील हो। जो दिशा निर्देश गुरु ने उसे दिया है, उनका अपने दैनिक जीवन में पालन करें।
यदि कोई मंत्र लें, साधना विधि लें, तो गुरु से ही लें, अथवा गुरुदेव रचित साहित्य से लें, अन्य किसी को भी गुरु के समान नहीं मानना चाहिए।
शिष्य के लिए गुरु ही सर्वस्व होता है। यदि किसी व्यक्ति की मित्रता राजा से हो जाए तो उसे छोटे-मोटे अधिकारी की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए श्रेष्ठ शिष्य वहीं है, जो अपने मन के तारों को गुरु से ही जोड़ता है।
शिष्य यदि सच्चे ह्रदय से पुकार करे, तो ऐसा होता ही नहीं कि उसका स्वर गुरुदेव तक न पहुंचे। उसकी आवाज गुरुदेव तक पहुंचती ही है, इसमे कभी संदेह नहीं करना चाहिए।
मलिन बुद्धि अथवा गुरु भक्ति से रहित, क्रोध लोभादी से ग्रस्त, नष्ट आचार-विचार वाले व्यक्ति के समक्ष गुरु तंत्र के इन दुर्लभ पवित्र रहस्यों को स्पष्ट नहीं करना चाहिए।
वास्तविकता को केवल शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता। आम का स्वाद उसे चख कर ही जाना जा सकता है। साधना द्वारा विकसित ज्ञान द्वारा ही परम सत्य का साक्षात्कार सम्भव है।
साभार -श्री गुरु गीता
शरणागतिके सभी अधिकारी हैं- स्वामी रामनरेशाचार्य
पटना में चल रहे चातुर्मास महायज्ञ के दौरान लाला लाजपत राय भवन में संध्याकालिन सत्संग के दौरान जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि लौकिक कर्मोंके समान कल्याणमार्गमें भी अधिकारीकी व्यवस्था है। सबलोग सभी कर्मोंको नहीं करवा सकते। अतएव कर्मसाधकोंको आमन्त्रित करनेवाला यह विज्ञापित करता है कि हमारे संस्थान (उद्योग)को कैसा साधक चाहिये। यदि वैसी योग्यतासे युक्त साधक नहीं हो तो उसे, अपने लिये उपयुक्त नहीं मानकर, लौटा देता है। उसे पूर्ण विश्वास होता है कि यह हमारे संस्थानकी फलदायकताको समृद्ध नहीं कर सकता।
इसी प्रकारसे वैदिकशास्त्रोंने भी तत्-तत् फलदायक कर्मोंके सम्पादनके लिये अधिकारीका निर्धारण किया है। मोक्षदायक ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वे ही अधिकारी हैं जो साधन-चतुष्टय सम्पन्न हैं; अर्थात् जिनके पास नित्य तथा अनित्यका विवेक हो, इस लोक एवं परलोकके समस्त भोगसाधनोंसे पूर्णतः विरक्ति हो, शम-दमादि छः सम्पत्तियाँ हों तथा दृढ़मुमुक्षुत्व (प्रबलतम मोक्षप्राप्तिकी इच्छा) हो। इतना ही नहीं, उपर्युक्त विशिष्ट साधनोंसे सम्पन्न साधकको ब्राह्मण होना आवश्यक है, वह भी पुरुष जाति का। क्योंकि ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानमें उपनयन-संस्कारसे मण्डित वेदाध्ययनके लिये अधिकृत मात्र ब्राह्मण ही है। वही संन्यासी बनकर ज्ञान-साधनाके अनुसार ज्ञानको प्राप्तकर मोक्षको प्राप्तकर सकता है। इस साधनामें क्षत्रियादि तथा स्त्रियोंकी अधिकारिता सर्वथा अवरुद्ध है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि कुछ आचार्योंने भक्तिको भी ब्रह्म-विद्या स्वरूप स्वीकारकर उसके प्रवेश-द्वारको क्षत्रियादि एवं स्त्रियोंके लिये बन्ध कर दिया है। केवल ब्राह्मण ही भक्ति-साधनाका अधिकारी है। इस सम्बन्धमें अन्यान्य महामनीषि आचार्य सहमत नहीं हैं। उनकी परमोदार घोषणा है कि भक्ति- साधनाके सभी अधिकारी हैं। उसका सम्पादन कर सभी मानव जीवनको परम धन्यतासे मण्डित कर सकते हैं।
परन्तु शरणागतिकी उदारता तो आकाशके समान है। धन्य है वैदिक सनातन धर्म, धन्य हैं राम-कृष्णादि भगवदवतार तथा धन्य हैं वे आचार्य व सन्तगण जिन्होंने शरणागतिको प्रचारित एवं प्रसारितकर असंख्य जीवोंको परमफलसे विभूषित किया।
इन विचारोंको जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराजने अभिव्यक्त किया कल्याणकामियोंके लिये; जो अपने पटना-प्रवास के क्रममें लगातार लाला लाजपत राय सभागारमें विचारामृतकी वर्षा कर रहे हैं।
इसी प्रकारसे वैदिकशास्त्रोंने भी तत्-तत् फलदायक कर्मोंके सम्पादनके लिये अधिकारीका निर्धारण किया है। मोक्षदायक ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वे ही अधिकारी हैं जो साधन-चतुष्टय सम्पन्न हैं; अर्थात् जिनके पास नित्य तथा अनित्यका विवेक हो, इस लोक एवं परलोकके समस्त भोगसाधनोंसे पूर्णतः विरक्ति हो, शम-दमादि छः सम्पत्तियाँ हों तथा दृढ़मुमुक्षुत्व (प्रबलतम मोक्षप्राप्तिकी इच्छा) हो। इतना ही नहीं, उपर्युक्त विशिष्ट साधनोंसे सम्पन्न साधकको ब्राह्मण होना आवश्यक है, वह भी पुरुष जाति का। क्योंकि ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानमें उपनयन-संस्कारसे मण्डित वेदाध्ययनके लिये अधिकृत मात्र ब्राह्मण ही है। वही संन्यासी बनकर ज्ञान-साधनाके अनुसार ज्ञानको प्राप्तकर मोक्षको प्राप्तकर सकता है। इस साधनामें क्षत्रियादि तथा स्त्रियोंकी अधिकारिता सर्वथा अवरुद्ध है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि कुछ आचार्योंने भक्तिको भी ब्रह्म-विद्या स्वरूप स्वीकारकर उसके प्रवेश-द्वारको क्षत्रियादि एवं स्त्रियोंके लिये बन्ध कर दिया है। केवल ब्राह्मण ही भक्ति-साधनाका अधिकारी है। इस सम्बन्धमें अन्यान्य महामनीषि आचार्य सहमत नहीं हैं। उनकी परमोदार घोषणा है कि भक्ति- साधनाके सभी अधिकारी हैं। उसका सम्पादन कर सभी मानव जीवनको परम धन्यतासे मण्डित कर सकते हैं।
परन्तु शरणागतिकी उदारता तो आकाशके समान है। धन्य है वैदिक सनातन धर्म, धन्य हैं राम-कृष्णादि भगवदवतार तथा धन्य हैं वे आचार्य व सन्तगण जिन्होंने शरणागतिको प्रचारित एवं प्रसारितकर असंख्य जीवोंको परमफलसे विभूषित किया।
इन विचारोंको जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्यजी महाराजने अभिव्यक्त किया कल्याणकामियोंके लिये; जो अपने पटना-प्रवास के क्रममें लगातार लाला लाजपत राय सभागारमें विचारामृतकी वर्षा कर रहे हैं।
Monday, September 5, 2016
अबलौं नसानी अब न नसैहौं' का पटना में लोकार्पण
पटना
में चल रहे जगदगुरु रामानन्दाचार्य श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के
चातुर्मास्य महोत्सव के दौरान गत 2 सितंबर, 2016 को 'अबलौं नसानी अब न नसैहौं' नाम से प्रवचन पुस्तक का विमोचन संपन्न हुआ। चित्र में
(दाएँ से) श्री ज्ञानेश उपाध्याय-राजस्थान पत्रिका, डॉ. संजय पासवान-पूर्व
मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, श्रीप्रमोद मुकेश-संपादक,दैनिक भास्कर, पटना, पूज्य
महाराजश्री, पदमश्री रामबहादुर राय-अध्यक्ष-इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र,
श्रीनरपतसिंह राजवी-विधायक एवं पूर्व मंत्री तथा शास्त्री डॉ. कोसलेन्द्र दास।
महाराज श्री के प्रवचनों के इस संग्रह का संकलन और संपादन ज्ञानेश उपाध्याय ने किया है। ये उनकी चौथी पुस्तक है।
महाराज श्री के प्रवचनों के इस संग्रह का संकलन और संपादन ज्ञानेश उपाध्याय ने किया है। ये उनकी चौथी पुस्तक है।
पटना चातुर्मास्य महायज्ञ के दौरान सामाजिक समरसता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
क्या कहा महाराजश्री ने-
जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि संप्रदाय बुरे अर्थ में नहीं है। संप्रदाय ही है, जिसने गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाने का काम की है। अनादि काल से गुरु-शिष्य की परंपरा चली रही है। संप्रदाय से हटने के कारण ही समाज में समरसता की कमी आई है। संप्रदाय प्रतिष्ठित शब्द था। धर्म आदमी को नजदीक लाता है, दूर नहीं ले जाता। धनवान होने की इच्छा बुरी बात नहीं है, लेकिन गलत कार्य कर धनवान होना गलत है। राम भाव के माध्यम से समाज में समरसता आए यही हमारा प्रयास है। इसके लिए हर व्यक्ति को साथ मिल कर काम करना होगा। ये बातें उन्होंने शुक्रवार को लाला लाजपत राय भवन में चल रहे दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञ में कहीं। अवसर था सामाजिक समरसता और स्वामी नरेशाचार्य जी महाराज विषय पर गोष्ठी का। इसके पहले महाराज जी के प्रवचन पुस्तिका अबलौं नसानी अब नसैहौं का लोकार्पण किया। अतिथियों का अभिनंदन स्वामी रामानंदाचार्य रामनरेशाचार्य जी महाराज द्वारा किया गया।
अबधर्म की सत्ता को स्वीकार किया जा रहा है : रामबहादुर राय
सामाजिकसमरसता और स्वामी नरेशाचार्य जी महाराज विषय पर आयोजित गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि असहज और अस्वाभाविक को ही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मान लिया गया। इसे छोड़ना होगा तभी सामाजिक समरसता आएगी। समरसता लाना चाहते हैं, तो एक मंत्र गांठ बांध लें। आदर का मूल्य बदलना होगा। अहंकार ही समरसता को तोड़ता है। महत्वाकांक्षा भी समरसता में बाधा है। महत्वाकांक्षा तब हानिकर होती है जब किसी को पछाड़ने में नैतिकता की हद पार कर देती है। आतंकवाद और गरीबी जब तक है सामाजिक समरसता नहीं हो सकती। धर्म की सत्ता को अब स्वीकार किया जा रहा है। पिछली सदी में धर्म को अफीम माना जाता था। लेकिन अब संयुक्त राष्ट्र भी इसे स्वीकार कर रहा है कि धर्म की सत्ता को स्थापित करने में कैसे योगदान दें। लोकतंत्र भारत की प्राणवायु है। लोकतंत्र यानी विविधता। यह सिर्फ शासन प्रणाली ही नहीं, जीवन शैली भी है।
समानता से बना शब्द है समरसता - संजय पासवान
पूर्वकेंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने समरसता को परिभाषित करते हुए कहा कि समरसता समानता से बना शब्द है। समरसता में स- समानता है, म-ममता, र-रमण, स-सामंजस्य और त- तारतम्यता है। सब एक साथ मिलती है, तो समरसता बनता है। समरसता के सभी घटकों को जोड़ना होगा। वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा कि प्रवचन पुस्तिका में राम और रावण में भेद को भी बताया गया है। राजस्थान के पूर्व मंत्री नरपत सिंह राजवी ने कहा कि ऐसी राजनीति भी कोई काम की नहीं जिसमें सिद्धांत के विपरीत काम करें। दैनिक भास्कर के संपादक प्रमोद मुकेश ने कहा कि सामाजिक समरसता से ही देश का विकास होगा। आचार्य के भाव और आंदोलन पूरे विश्व में फैले और सामाजिक समरसता साकार हो।
सामाजिक समरसता और स्वामी रामनरेशाचार्य विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए स्वामी जी के कार्यों की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
बीजेपी सांसद आर के सिन्हा ने लिया महाराजश्री से आशीर्वचन
पटना में चल रहे दिव्य चातुर्मास्य महायज्ञ के दौरान पिछले 30 अगस्त, 2016
को बीजेपी के राज्यसभा सांसद और बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान
समाचार सेवा के संरक्षक, सिक्य़ूरिटी कंपनी एसआईएस के संस्थापक श्री आर के
सिन्हा ने महाराजश्री का दर्शन किया। चित्र में साथ दिख रहे हैं वरिष्ठ
पत्रकार पदमश्री रामबहादुर राय
Wednesday, April 6, 2016
Thursday, December 31, 2015
Friday, December 18, 2015
जयपुर के खाण्डका हाउस में आचार्यश्री का पांच दिवसीय प्रवचन शुरू
जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का पांच दिवसीय प्रवचन 17 दिसंबर से 21 दिसम्बर तक जयपुर में
| Swami Ramnareshacharya ji Maharaj |
श्रीमठ काशी पीठाधीश्वर रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज का प्रवचन 17 दिसम्बर से जयपुर के पीतल फैक्ट्री स्थित खण्डाका हाउस में चल रहा है। स्वामी श्री रामनरेशाचार्य अपने पांच दिवसीय प्रवास के क्रम में २१ दिसंबर तक जयपुर में विराजमान रहेंगे। इस दौरान 'संतत सुनिअ राम गुण ग्रामहिं' विषयक धर्मसभा में प्रतिदिन सायंकाल ५ बजे से आचार्यश्री के प्रवचन होंगे। प्रतिदिन श्रीरामललाजी का विशिष्ट पूजन, स्वाध्याय, आचार्य पूजन व विद्वत सभा का आयोजन किया गया है। उसी की दो तस्वीरें यहां दी जा रही है। एक में मंच पर विराजमान आचार्यश्री हैं तो दूसरे में उनका अखबार में प्रकाशित समाचार है।
| Swami Ramnareshacharya at Jaipur |
Monday, November 30, 2015
गंगा को बचाने के लिए फिर से मातृ सदन का संत सत्याग्रह पर
* देवकुमार पुखराज
| Brahmachari Atmabodhanand |
हरिद्वार
के मातृ
सदन के सन्त ब्रह्मचारी
आत्मबोधानन्द जी ने
गंगा
में अवैध
और
अनधिकृत खनन के दोषी के विरुद्ध
कार्रवाई और अवैध खनन सामग्री
को खरीदने वाले स्टोन क्रशर
को बन्द करने के संकल्प को
लेकर 28
नवंबर
से तपस्या
(
सत्याग्रह
)
शुरू
किया था,
जो
आज तीसरे दिन भी जारी है।
ज्ञात
हो कि
राज्य खनन नियमावाली,
केन्द्रीय
पर्यावरण मन्त्रालय नई दिल्ली
की अधिसूचना 2006
और
राज्य स्तरीय या केन्द्रीय
स्तर दोनों के तरफ से कानून
सम्मत खनन की परिभाषा यही दी
जाती है कि जो सामग्री बरसात
के दिनों में धारा से आकर नदी
के मध्य भाग में इकट्ठा हो
जाता है उसका केवल 90
प्रतिशत
भाग ही उठाया जायेगा जिसकी
पूर्ति पुनः स्वतः बरसात के
दिनों में हो जायेगी। नदी के
कुल चैड़ाई का चैथाई भाग दोनों
किनारों पर सुरक्षित छोड़नले
का प्रावधान
है।
यह भी प्रावधान है कि
जलस्तर से नीचे भी खनन नहीं
हो सकता।
गंगा
में हरिद्वार में जो खनन अब
तक हुआ है और अभी हो रहा है वह
मानकों/नियमों
का उल्लंघन करके हो रहा है।
पर्यावरण मंत्रालय,
नई
दिल्ली की रिपोर्ट दिनांक 27
मार्च
2015
में
स्पष्ट वर्णित है कि
हरिद्वार
में भीमगोड़ा बराज बनने के
बाद बोल्डर और पत्थरों की
प्रतिपूर्ति सम्भव नहीं है,
क्यों
कि उपर से पत्थर नहीं आते हैं।
वहीं रेत की मात्रा और इकट्ठा
होने के स्थान के चिन्हीकरण
को लेकर किसी राष्ट्रीय संस्थान
से आकलन करवाने की संस्तुति
की गई है और उत्तराखण्ड सरकार
को समस्त अवैध खनन को बन्द
करने को कहा गया है।
| swami Shivanand |
केन्द्रीय
प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड,
नई
दिल्ली और उत्तराखण्ड प्रदूषण
नियंत्रण
बोर्ड देहरादून ने भी जिलाधिकारी
हरिद्वार को खनन बन्द करने
का निर्देश दिया है,
परन्तु
जिलाधिकारी उसका अनुपालन नही
कर रहे हैं
और अखबारों में बयान दे रहे
है कि खनन पर रोक नहीं है।
इसके
अलावे
राष्ट्रीय हरित अधिकरण नई
दिल्ली ने अपने आदेश दिनांक
4
फरवरी
में स्पष्ट कहा है कि केवल
एकत्रित रेत ही उठाया जा सकता
है। केन्द्रीय पर्यावरण नई
दिल्ली ने रेत की परिभाषा ६
मिली मीटर से २ मिली मीटर
के रूप में दिया है। अपने आदेश
दिनांक 15
अप्रैल
2015
में
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने
जिलाधिकारी हरिद्वार को अवैध
और
अनधिकृत खनन बन्द करने को कहा
है परन्तु जिलाधिकारी हरिद्वार
इन आदेशों की भी अवमानना कर
रहे हैं।
उल्लेखनीय
है कि विगत वर्ष पहले 2
जून
को तत्कालीन मुख्य सचिव जो
अब
भी
मुख्यमन्त्री रावत जी के
प्रधान मुख्य सचिव भी हैं,
मातृ
सदन आये थे
और
उन्होंने मातृ सदन के तथ्यो
से
सहमत होते
हुए
कहा कि रायवाला से भोगपुर के
क्षेत्र में जो कुछ बोल्डर/पत्थर
है वह जमीन के नीचे है और उसका
रहना नदी
के लिए आवश्यक
है। तथ्य यह भी है कि रायवाला
से भोगपुर तक रेत धारा के बीच
में नहीं ठहरता है बल्कि नीचे
जाकर ही रुकता है जिसका अध्ययन
करवाकर निर्णय लिया जा सकता
है। दिनांक 7
जून
को स्वयं मुख्यमन्त्री श्री
हरीश रावत जी मातृ सदन आये और
इसी आश्वासन पर तपस्या को
समाप्त करवाया था ।
परन्तु
यह
कडवा सच है कि गंगा
किनारे लगे दो दर्जन से ज्यादा
स्टोन क्रशर चल
रहे है और
गगा का
सीना छलनी कर ही अपना व्यवसाय
कर रहे है। आज
तक इन स्टोन क्रशरों के विरुद्ध
कोई कार्रवाई तक नहीं हुइ है।
इनके
द्वारा चाहरदीवारी
के अन्दर तालाब बनाकर अवैध
माल का भण्डारण किया जाता है
ताकि चोरी के माल को दबाया जा
सके। प्रशासन को सूचना देने
के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं
की जाती है। ऐसी परिस्थित में
मातृ सदन के पास सत्य को उजागर
करने और माँ गंगा की रक्षा
करने के लिये तपस्या/सत्याग्रह
के अलावा और कोई रास्ता शेष
नहीं रह जाता।
Wednesday, August 26, 2015
पू्र्व लोकसभा सांसद ब्रह्मचारी विश्वनाथ दास शास्त्री का निधन
![]() | |
| Vishwanath Das Shastri |
बीजेपी के पूर्व सांसद और अयोध्या स्थित दर्शन भवन मंदिर (स्वामी रामानंद मंदिर) के श्री महंत विश्वनाथ दास शास्त्री का कल लम्बी बीमारी के बाद दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। श्री शास्त्री को लीवर और हृदय की बीमारी थी, उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली से विमान द्वारा अयोध्या लाने की तैयारी की जा रही है। आज ही उनका अंतिम संस्कार सरयू तट पर होगा।
सन 1950 में बिहार के सीतामढ़ी जिले में जन्में शास्त्रीजी बचपन से ही आरएसएस से जुड़े रहे और अविवाहित रहे। काशी के संपूर्णानंद विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में एमए करने के बाद पूरा जीवन ही संघ और धर्म को समर्पित कर दिया। संघ के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए वनवासी सेवा केन्द्र के जरिये भी उन्होंने देश की खूब सेवा की। प्रखर ओजस्वी भाषण उनकी पहचान थी।
अयोध्या से सटे सुल्तानपुर से 1991 में वे बीजेपी की टिकट पर दसवीं लोकसभा के लिए चुने गये। बावजूद इसके उनके सादगी, ईमानदारी देखने लायक थी। पूर्व एमपी के रुप में मिलने वाली अधिकांश सुविधाओं का भी उन्होंने त्याग कर रखा था। जब बीमार पड़े तभी जाकर फिर से मेडिकल सटिफिकेट बनवाया, ताकि एम्स में इलाज हो सके।
अभी पिछले दिनों संभवतः 4 जून,2015 को अयोध्या प्रवास के दौरान उनके दर्शन और
सत्संग का लाभ मिला था। शरीर कमजोर था फिर भी आभामंडल देखने लायक थी। उनके
साथ बैठकर बातचीत करने और उस दौर की राजनीति को समझने का वो अंतिम मौका
मिला था। उनके रहन-सहन को देखकर ऐसा लगा था कि कैसे लोग थे वे। सांसद रहे फिर भी हाथ हमेशा तंग रहा। कोई दिखावा और आडम्बर नहीं। बेहद सामान्य जीवन जीते हुए हरिनाम जपते हुए वे चले गय़े। जब तक शरीर साथ दिया खूब काम किया। देश सेवा और धर्म की सेवा में ही जीवन लगा दिया। लेकिन अपने लिए कुछ नहीं रखा।
हमारे अग्रज रामगोपाल चौधरी तो बेहद भावुक से हो गये थे। उनको आराम मिले इसलिए कमरे में एसी लगवाने का उसी दिन ऑडर दिया फिर आश्रम में एक वातानुकूलित कमरा बनवाने के लिए भी एक लाख रुपया दिया। तय हुआ था कि नई सीता रसोई जब बनकर तैयार हो तो उसका भव्य उदघाटन कराया जाए। लेकिन नीयती को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। चौधरी भैया उनको स्वास्थ्य लाभ के लिए हैदराबाद भी लाना चाहते थे। उन्होंने हामी भी भर दी थी। लेकिन लगता है भगवान अपने बैकुंठ धाम में उनका इंतजार कर रहे थे।
हमारे अग्रज रामगोपाल चौधरी तो बेहद भावुक से हो गये थे। उनको आराम मिले इसलिए कमरे में एसी लगवाने का उसी दिन ऑडर दिया फिर आश्रम में एक वातानुकूलित कमरा बनवाने के लिए भी एक लाख रुपया दिया। तय हुआ था कि नई सीता रसोई जब बनकर तैयार हो तो उसका भव्य उदघाटन कराया जाए। लेकिन नीयती को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। चौधरी भैया उनको स्वास्थ्य लाभ के लिए हैदराबाद भी लाना चाहते थे। उन्होंने हामी भी भर दी थी। लेकिन लगता है भगवान अपने बैकुंठ धाम में उनका इंतजार कर रहे थे।
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Thursday, July 30, 2015
जोधपुर में दिव्य चातुर्मास महोत्सव शुरू
सगुण-निर्गुण
रामभक्ति परंपरा और रामानंद
संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ,
श्रीमठ,
पंचगंगा
घाट, काशी
के वर्तमान आचार्य जगदगुरु
रामानन्दाचार्य स्वामी
श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज
का चातुर्मास 30
जुलाई,
2015 से
जोधपुर में प्रारम्भ हो गया।
गुरुवार को भव्य शोभायात्रा
के साथ महाराज श्री को जूनाखेड़ापति
मंदिर तक लाया गया,
जहां
अगले दो माह तक वे विराजेंगे।
आज
गुरु पूर्णिमा पर्व के साथ
ही दिव्य चातुर्मास महोत्सव
का विधिवत आरंभ हो गया।
| SWAMI RAMNARESHACHARYA |
जोधपुर
के प्रसिद्ध जूनाखेड़ापति
मंदिर परिसर में महाराजश्री
के चातुर्मास अनुष्ठान के
दौरान राम भावानुकूल अनेक
धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन
होगा। बीच-बीच
में बड़े धार्मिक उत्सव भी
होंगे। सावन महीने में प्रत्येक
सोमवार को भगवान शंकर का भव्य
अभिषेक होगा। सुबह से शाम तक
विविध मांगलिक कार्यक्रम
होंगे,
जिसमें
हवन, पूजन,
सहस्त्राचन,
देव-पितृ
तर्पण यज्ञ,
स्वाध्याय
औऱ संध्या समय भजन-प्रवचन
जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
बीच में पड़ने वाले सारे
पर्व-त्यौहार
भी उत्सव नुमा माहौल में मनाए
जाएंगे।कार्यक्रम स्थल पर
ही नियमित रुप से भजन और भंडारे
का प्रबंध किया गया है। देश
भर से अनेक संत और विद्वान के
साथ बड़ी संख्या में भक्तगण
भी चातुर्मास के दौरान जोधपुर
पधारेंगे। इनके ठहरने का
भी प्रबंध चातुर्मास समिति
ने किया है।
उल्लेखनीय है कि महाराजश्री ने वर्ष १९९४ में भी जोधपुर में चातुर्मास व्रत किया था। पूरे २० साल बाद जोधपुर में फिर से चातुर्मास समायोजित हुआ है। एक खास बात यह है कि पिछले चातुर्मास में भी आयोजन समिति के अध्यक्ष सेनाचार्य स्वामी अचलानन्द जी गिरि थे और इस बार भी उन्हीं की अध्यक्षता में कार्यक्रम शुरू हुआ है।
| स्वामी रामनरेशाचार्य |
जूनाखेड़ापति
मंदिर परिसर में नियमित पूजन,
हवन,
प्रवचन
को लेकर सारी तैयारियां पूर्ण
हो चुकी हैं। चातुर्मास के
प्रति स्थानीय लोगों में बहुत
उत्साह है । जोधपुर शहर में
जगह-जगह
बैनर-पोस्टर
लगे हुए हैं। चातुर्मास
स्थल शहर के एक मुख्य मार्ग
पर स्थित है,
इसलिए
यहां आसानी से पहुंचा जा सकता
है।
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जगदगुरु रामानंदाचार्य,
रामनरेशाचार्य
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Jodhpur, Rajasthan, India
गुरु पूर्णिमा शुभकामना
जीवन यात्रा
की आध्यात्मिक भावनामय विश्राम
स्थली का नाम गुरु पुर्णिमा
है। प्रत्येक व्यक्ति लौकिक-भौतिक
व्यवस्था के साथ आध्यात्मिक
विश्राम चाहता हैं, एतदर्थ
उसका चिन्तन-मनन
पवित्र दिवस पर अधिक उपादेय
एवम् युक्तिसंगत हैं। हम
निरन्तर आध्यात्मिक शान्ति
की खोज में हैं। उसका उत्तर
शान्त-पवित्र भावों
में गुरू पूर्णिमा को सुलभ
हो सकता हैं।
महर्षि
वेदव्यास को श्रद्धा निवेदित
करते हुए अपने गुऱुदेव स्वामी
श्रीरामनरेशाचार्य जी के
पावन चरणों में शीश झुकाता
हूं।
| स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज |
आप सबके आनन्दमय, मंगलमय, अभ्युदय पूर्ण, क्रियाशील एवं अनाशक्त जीवन की सफलता के लिए अनंत शुभकामनाएं।
| Swami Ramnareshacharya ji an Punjab |
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Location:
Jodhpur, Rajasthan, India
Thursday, January 8, 2015
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार
श्रीमठ,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार इस वर्ष देश के जाने-माने पत्रकार औऱ राजनीतिक विश्लेषक रामबहादुर राय को दिया जाएगा। स्वामी रामानंद जयंती के अवसर पर वाराणसी के नागरी नाटक मंडली सभागार में 12 जनवरी को संध्या समय राय साहब को एक लाख रुपये नकद, अंग वस्त्रम्, प्रशस्ति पत्र आदि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा। रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य और श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्य के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती वर्ष मनाया जा रहा है, इसी कड़ी में वर्षपर्यन्त आयोजित कार्यक्रमों का समापन समारोह 10 जनवरी से 14 जनवरी तक काशी में आयोजित है। राय साहब के अलावे चार अन्य विभूतियों को भी इस साल एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।
इस वर्ष जिन पांच महान विभूतियों को रामानंदाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है उनमें काशी के वेदमूर्ति विनायक मंगलेश्वर, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष और आधुनिक पाणिनी कहे जाने वाले आचार्य रामयत्न शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पाक्षिक पत्रिका के संपादक रामबहादुर राय, मूर्धन्य साहित्यकार प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल (दिल्ली) और संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. उदय प्रताप सिंह शामिल हैं। सभी को एक-एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और अंग वस्त्रम् से सम्मानित किया जाएगा।
श्रीमठ की ओर से हर साल हिन्दी और संस्कृत साहित्य के एक महामनीषी को एक लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाता है। इसी कड़ी को आगे बढा़ते हुए रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में एक साथ पांच मनीषियों को इस बार रामानंदाचार्य पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। समारोह में देश के जाने-माने विद्वान, राजनीतिज्ञ, संत-महात्मा और साहित्य-संस्कृति के मूर्धन्य लोग शामिल हो रहे हैं। पूरे कार्यक्रमों का समायोजन श्रीमठ महोत्सव न्यास, काशी ने किया है।
काशी के पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ ऐतिहासिक मठ है जिसका गौरवशाली इतिहास रहा है। करीब सात सौ साल पहले इसी मठ को स्वामी रामानंद ने अपनी साधना स्थली बनाई थी। यही रहते हुए उन्होंने संत कबीरदास, रविदास , धन्ना जाठ और पीपा नरेश जैसे शिष्यों को दीक्षा दी थी। इस रुप में श्रीमठ को रामानंद संप्रदाय और रामभक्ति परंपरा का मूल आचार्यपीठ होने का गौरव हासिल है। यह एक साथ सगुण और निर्गुण रामभक्ति परंपरा का संवाहक केन्द्र रहा है। मध्यकालिन भक्ति आंदोलन में स्वामी रामानंद का अतुलनीय योगदान रहा है। उन्होंने 'जाति-पांत पूछे ना कोई, हरि को भजे सो हरि का होई ' का नारा देकर उस समय समाज में व्याप्त जातीय विद्वेष और पाखंड के खिलाफ अलख जगाई थी।
Saturday, November 29, 2014
जनकपुर में श्रीराम-जानकी विवाह संपन्न
जनकपुर का श्रीराम- जानकी विवाह वैसे भी परंपरा और ऐतिहासिकता का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। इस दौरान वे सारे मांगलिक कार्य पूर्ण विधि-विधान और लोक रीति से संपादित होते हैं, जो मिथिला की संस्कृति में आदि काल से प्रचलित रहे हैं। इस बार भी अयोध्या से चलकर काशी और बक्सर जैसे स्थानों से होते हुए बारात जनकपुर तक आई थी। बारात का वैसे ही स्वागत हुआ जैसा कभी जनकजी ने किया होगा।
ऐतिहासिक राममंदिर और जानकी मंदिर में विवाह की सभी रस्में पूरी की गयी। परंपरानुसार मंगलवार यानि 26 नवंबर को तिलकोत्सव हुआ। बु्धवार को पूजा मटकोर हुआ और अगले दिन यानि गुरुवार-27 नवंबर,2014 को शादी हुई। शुक्रवार को भतखई के बाद बारात की विदाई हो गयी।
Monday, November 3, 2014
भगवान विष्णु के चार महीने तक सोने- जगने का रहस्य
चातुर्मास व्रत क्यों और कैसे
वर्षा काल के चार महीनों को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। इस दौरान संत-महात्मा यात्रा करने से बचते हैं और एक ही जगह रुक जप-तप करते हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और उनके अधिपति भगवान विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जगते हैं। उस दिन को देवोत्थान एकादशी और हरिप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस चार माह की अवधि मे कोई विवाह, नया निर्माण , कारोबार और शुभ-मंगल कार्य आरंभ नहीं होता।
श्रद्धालु जन सोचते होंगे कि देवता भी क्या सचमुच सोते हैं। पर वे एकादशी के दिन सुबह तड़के ही विष्णु और उनके सहयोगी देवताओं का पूजन करने के बाद शंख- घंटा घड़ियाल बजाने लगते हैं। पारंपरिक आरती- कीर्तन के साथ वे गाने लगते हैं- उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओं देवा।‘इस आह्रान में भी संदेश छुपा है।
श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के अनुसार वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव बताने, उस प्रभाव से अपना सामंजस्य बिठाने का संदेश छिपा है। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इस वजह से पृथ्वी पर कीट-पतंगों की बहुतायत हो जाती है। ऋषियों ने कहा कि इन चार महीनों में विष्णु सो जाते हैं। यह अवधि आहार विहार के मामले में खास सावधानी रखने तक ही सीमित नहीं है। एक और कथा बताती है कि एक बार लक्ष्मी जी ने विष्णु भगवान से कहा कि आप विश्राम क्यों नहीं करते। कहते हैं कि लक्ष्मी जी के कहने पर ही भगवान विष्णु ने बरसात को अपने विश्राम के लिए चुना।
इसमें खास शासन अनुशासन भी है। इसका उद्देश्य वर्षा के दिनों में होने वाले प्रकृति परिवर्तनों के कारण फैलने वाली मौसमी बीमारियों से सुरक्षा भी है। निजी जीवन में स्वास्थ्य संतुलन का ध्यान रखने के साथ यह चार माह की अवधि साधु- संतों के लिए भी विशेष दायित्वों का तकाजा लेकर आती है। घूम-घूम कर धर्म अध्यात्म की शिक्षा देने, लोक कल्याण की गतिविधियों को चलाते रहने वाले साधु संत इन दिनों एक ही जगह पर रुक कर साधना शिक्षण करते हैं।
श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी नियमित तौर पर हर साल चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान और शास्त्रीय गरिमा के अनुसार करते हैं। वे विभिन्न शहरों में हरेक साल इस अनुष्ठान को करते हैं। सुबह से शाम तक इस दौरान धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन किया जाता है। इस मौसम में पड़ने वाले व्रत-त्यौहार, जैसे- सावन की सोमवारी, तुलसीदास जयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, नंद महोत्सव और झूलनोत्सव जैसे त्योहार पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं।
स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सान्निध्य में संत सम्मेलन, विद्धत संगोष्ठी, दलित सम्मेलन जैसे कार्यक्रम चातुर्मास महोत्सव के दौरान होते हैं। शाम की सभा में भजन-प्रवचन का सिलसिला निर्वाध रुप से चलता है। रामानंद संप्रदाय से जुड़े संत-श्रीमहंत और दूसरे महात्मा गण इस दौरान एकत्रित होते हैंं और संप्रदाय की एकता को लेकर योजनाएं बनाते हैं।
वर्षा काल के चार महीनों को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। इस दौरान संत-महात्मा यात्रा करने से बचते हैं और एक ही जगह रुक जप-तप करते हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और उनके अधिपति भगवान विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जगते हैं। उस दिन को देवोत्थान एकादशी और हरिप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस चार माह की अवधि मे कोई विवाह, नया निर्माण , कारोबार और शुभ-मंगल कार्य आरंभ नहीं होता।
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| swami Ramnareshacharya |
श्रद्धालु जन सोचते होंगे कि देवता भी क्या सचमुच सोते हैं। पर वे एकादशी के दिन सुबह तड़के ही विष्णु और उनके सहयोगी देवताओं का पूजन करने के बाद शंख- घंटा घड़ियाल बजाने लगते हैं। पारंपरिक आरती- कीर्तन के साथ वे गाने लगते हैं- उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओं देवा।‘इस आह्रान में भी संदेश छुपा है।
श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के अनुसार वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव बताने, उस प्रभाव से अपना सामंजस्य बिठाने का संदेश छिपा है। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इस वजह से पृथ्वी पर कीट-पतंगों की बहुतायत हो जाती है। ऋषियों ने कहा कि इन चार महीनों में विष्णु सो जाते हैं। यह अवधि आहार विहार के मामले में खास सावधानी रखने तक ही सीमित नहीं है। एक और कथा बताती है कि एक बार लक्ष्मी जी ने विष्णु भगवान से कहा कि आप विश्राम क्यों नहीं करते। कहते हैं कि लक्ष्मी जी के कहने पर ही भगवान विष्णु ने बरसात को अपने विश्राम के लिए चुना।
इसमें खास शासन अनुशासन भी है। इसका उद्देश्य वर्षा के दिनों में होने वाले प्रकृति परिवर्तनों के कारण फैलने वाली मौसमी बीमारियों से सुरक्षा भी है। निजी जीवन में स्वास्थ्य संतुलन का ध्यान रखने के साथ यह चार माह की अवधि साधु- संतों के लिए भी विशेष दायित्वों का तकाजा लेकर आती है। घूम-घूम कर धर्म अध्यात्म की शिक्षा देने, लोक कल्याण की गतिविधियों को चलाते रहने वाले साधु संत इन दिनों एक ही जगह पर रुक कर साधना शिक्षण करते हैं।
श्रीमठ पीठाधीश्वर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी नियमित तौर पर हर साल चातुर्मास व्रत का अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान और शास्त्रीय गरिमा के अनुसार करते हैं। वे विभिन्न शहरों में हरेक साल इस अनुष्ठान को करते हैं। सुबह से शाम तक इस दौरान धार्मिक प्रवृतियों का समायोजन किया जाता है। इस मौसम में पड़ने वाले व्रत-त्यौहार, जैसे- सावन की सोमवारी, तुलसीदास जयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, नंद महोत्सव और झूलनोत्सव जैसे त्योहार पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं।
स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सान्निध्य में संत सम्मेलन, विद्धत संगोष्ठी, दलित सम्मेलन जैसे कार्यक्रम चातुर्मास महोत्सव के दौरान होते हैं। शाम की सभा में भजन-प्रवचन का सिलसिला निर्वाध रुप से चलता है। रामानंद संप्रदाय से जुड़े संत-श्रीमहंत और दूसरे महात्मा गण इस दौरान एकत्रित होते हैंं और संप्रदाय की एकता को लेकर योजनाएं बनाते हैं।
भगवान विष्णु को क्यों प्रिय हैं तुलसी
तुलसी के पत्ते से भगवान विष्णु की पूजा का पुण्य
पुराणों में बताया गया है भगवान विष्णु को सबसे अधिक प्रिय तुलसी का पत्ता है। जिस घर में तुलसी की पूजा होती है और नियमित तुलसी को धूप-दीप दिखाया जाता है उस घर में भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि भगवान विष्णु की पूजा में अगर तुलसी पत्ते के साथ भोग अर्पित नहीं किया जाता है तो भगवान उस भोग को स्वीकार नहीं करते।
इसका कारण यह है कि भगवान विष्णु ने जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा का सतीत्व व्रत से विमुख करके जलंधर का वध करने में सहयोग किया था। वृंदा को जब भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर होने कि शाप दे दिया। इसीलिए शालिग्राम रुप में भगवान विष्णु की पूजा होती है। लेकिन देवताओं के मनाने पर वृंदा ने भगवान विष्णु को शाप से मुक्त कर दिया और प्राण त्याग दिया।
भगवान विष्णु ने उसी समय वृंदा को वरदान दिया कि तुम मुझे सबसे प्रिय रहोगी और बिना तुम्हारे मैं भोजन भी ग्रहण नहीं करुंगा। वृंदा तुलसी के पौधे के रुप में प्रकट हुई और भगवान विष्णु ने तुलसी को अपने मस्तक पर स्थान दिया।
पुराणों में बताया गया है भगवान विष्णु को सबसे अधिक प्रिय तुलसी का पत्ता है। जिस घर में तुलसी की पूजा होती है और नियमित तुलसी को धूप-दीप दिखाया जाता है उस घर में भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि भगवान विष्णु की पूजा में अगर तुलसी पत्ते के साथ भोग अर्पित नहीं किया जाता है तो भगवान उस भोग को स्वीकार नहीं करते।
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| lord Vishnu |
इसका कारण यह है कि भगवान विष्णु ने जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा का सतीत्व व्रत से विमुख करके जलंधर का वध करने में सहयोग किया था। वृंदा को जब भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर होने कि शाप दे दिया। इसीलिए शालिग्राम रुप में भगवान विष्णु की पूजा होती है। लेकिन देवताओं के मनाने पर वृंदा ने भगवान विष्णु को शाप से मुक्त कर दिया और प्राण त्याग दिया।
भगवान विष्णु ने उसी समय वृंदा को वरदान दिया कि तुम मुझे सबसे प्रिय रहोगी और बिना तुम्हारे मैं भोजन भी ग्रहण नहीं करुंगा। वृंदा तुलसी के पौधे के रुप में प्रकट हुई और भगवान विष्णु ने तुलसी को अपने मस्तक पर स्थान दिया।
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एकादशी व्रत,
भगवान विष्णु
Location:
Telangana, India
Friday, October 31, 2014
स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज का जनकपुर प्रवास, तैयारियां शुरू
जनकपुर में विवाह पंचमी महोत्सव के मुख्य यजमान होंगे जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज
सनातन धर्मावलम्बियों के लिए इस बार की विवाह पंचमी यानि प्रभु श्रीरामजी का सीताजी के साथ विवाह की तिथि विशेष अहम होने जा रही है। हिन्दुओं के पावन तीर्थ जनकपुर धाम (नेपाल) में आयोजित होने वाले वार्षिक मुख्य समारोह के प्रधान यजमान खुद जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज रहने वाले हैं। श्रीराम जानकी विवाह उत्सव 27 नवबंर और प्रभु श्रीराम का तिलकोत्सव 25 नवंबर,2014 को प्रस्तावित है।
प्रत्येक वर्ष की भांति प्रभु श्रीराम की बारात भी अयोध्या, काशी और बक्सर जैसे स्थानों से निकलेगी और
जिस रास्ते प्रभु राम जनकपुर गये थे, उसी रास्ते का अनुगमन करते हुए जनकपुर तक जाएगी। रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ के वर्तमान आचार्य श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल हो रहे हैं। इसलिए भी इस साल का महत्व काशी स्थित श्रीमठ के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व का है।
आचार्यश्री का कारवां श्रीमठ, काशी से 24 नवंबर को प्रस्थान करेगा। उसी दिन दोपहर में बक्सर होते हुए आरा पहुंचेगा, जहां संत, श्रमहंत और सदगृहस्थ दोपहर का भोजन और विश्राम करेंगे। फिर शाम में दर्जनों गाड़ियों के साथ ये काफिला पटना रवाना होगा। वहीं यात्रा का पड़ाव है। रात्रि विश्राम के बाद स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में यात्रा मुजफ्फरपुर के लिए प्रस्थान करेगी। दोपहर में भोजन और विश्राम वहीं होगा। उसी शाम सभी संत औऱ भक्तगण जनकपुर पहुंच जाएंगे।
बिहार के विभिन्न स्थानों पर यात्रा में शामिल लोगों के स्वागत औऱ अभिनंदन की पुरजोर तैयारी चल रही है। रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल से जुड़े लोग देशभर से आए रहे संत-महात्मा और भक्तों के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में जी जान से लगे हैं। यात्रा का दौरान बाहर से आ रहे अतिथियों के कोई परेशानी न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
श्रीमठ, काशी से जुड़े आरा निवासी सत्येन्द्र पाण्डेय ने बताया कि श्रीराम विवाह यात्रा का पहला पड़ाव आरा में पड़ रहा है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गयी है। आरा में अतिथियों को सुरुचिपूर्ण बिहारी व्यंजन परोसा जाएगा। यात्रा को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर तरह के प्रबंध किये जा रहे हैं। प्रचार-प्रसार के लिए पर्चा, पोस्टर और होर्डिंग्स बनवाये जा रहे हैं।
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| Janaki Temple, Janakpur, Nepal |
प्रत्येक वर्ष की भांति प्रभु श्रीराम की बारात भी अयोध्या, काशी और बक्सर जैसे स्थानों से निकलेगी और
जिस रास्ते प्रभु राम जनकपुर गये थे, उसी रास्ते का अनुगमन करते हुए जनकपुर तक जाएगी। रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ के वर्तमान आचार्य श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के 25 साल हो रहे हैं। इसलिए भी इस साल का महत्व काशी स्थित श्रीमठ के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व का है।
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| Maa Janki Temple |
बिहार के विभिन्न स्थानों पर यात्रा में शामिल लोगों के स्वागत औऱ अभिनंदन की पुरजोर तैयारी चल रही है। रामानंदाचार्य आध्यात्मिक मंडल से जुड़े लोग देशभर से आए रहे संत-महात्मा और भक्तों के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में जी जान से लगे हैं। यात्रा का दौरान बाहर से आ रहे अतिथियों के कोई परेशानी न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
श्रीमठ, काशी से जुड़े आरा निवासी सत्येन्द्र पाण्डेय ने बताया कि श्रीराम विवाह यात्रा का पहला पड़ाव आरा में पड़ रहा है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गयी है। आरा में अतिथियों को सुरुचिपूर्ण बिहारी व्यंजन परोसा जाएगा। यात्रा को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर तरह के प्रबंध किये जा रहे हैं। प्रचार-प्रसार के लिए पर्चा, पोस्टर और होर्डिंग्स बनवाये जा रहे हैं।
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Jagadguru,
जगदगुरु रामानंदाचार्य,
परशुराम
Monday, October 27, 2014
Saturday, July 19, 2014
जय राम रमा रमनं समनं
जय राम राम रमनं समनं । भव ताप भयाकुल पाहि जनम ॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥
दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरी महा महि भूरी रुजा ॥
रजनीचर बृंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥
महि मंडल मंडन चारुतरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ॥
मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥
मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूली परे ॥
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्री निरादर के फल ए ॥
भव सिन्धु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥
अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीती नहीं ॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह के ॥
नहीं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह के सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पड़ पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥
सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥
मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रंधीर अजे ॥
तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥
गुण सील कृपा परमायतनं । प्रणमामि निरंतर श्रीरमनं ॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥
बार बार बर मागऊँ हरषी देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥
Tuesday, April 29, 2014
जय जय सुरनायक
जय जय सुरनायक जन
सुखदायक प्रनत पाल भगवंता
गो द्विज हितकारी जय
असुरारी सिंधु सुता प्रिय कंता
पालन सुर धरनी अदभुत
करनी मरम जानइ कोई
सो सहज कृपाला
दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई
जय जय अविनाशी सब घट
बासी व्यापक परमानंदा
अबिगत गोतितं चरित
पुनीतं मायारहित मुकुंदा
जेहि लागि बिरागी
अति अनुरागी बिगत मोह मुनिवृंदा
निसि बासर ध्यावहीं
गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा
जेहि सृष्टि उपाई
त्रिबिधि बनायी संग सहाय न दूजा
सो करउ अघारी चिंत
हमारी जानिय भगति न पूजा
जो भव भय भंजन मुनि
मन रंजन गंजन विपति बरुथा
मन बच क्रम बानी
छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा
सारद श्रुति सेषा
रिषय असेषा जा कहुं कोउ नहिं जाना
जेहि दीन पिआरे वेद
पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना
सब बारिधि मंदर सब
विधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा
मुनि सिद्ध सकल सुर
परम भयातुर नमत नाथ पदकंजा।।
साभार-श्रीरामचरितमानस के बालकांड से
Thursday, April 10, 2014
अयोध्या में स्वामी रामनरेशाचार्य का जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठा का रजत जयंती समारोह संपन्न
रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ, पंचगंगा घाट,काशी के वर्तमान आचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य के जगदगुरु रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए 25 साल हो गये। श्रीमठ इस वर्ष को आचार्यश्री की पद प्रतिष्ठा की रजत जयंती वर्ष के तौर पर मना रहा है। श्रीमठ की ओर से वर्ष पर्यन्त विविध कार्यक्रमों का समायोजन किया जा रहा है। इसकी शुरुआत अयोध्या में नवरात्र के दौरान आयोजित समारोह से हुई। नौ दिनों तक चले कार्यक्रम में सुबह से दोपहर तक धार्मिक कार्यक्रम होते रहे और शाम में संगीत की महफिल सजती थी, जिसमें नामी-गिरामी कलाकार भगवान श्रीराम के लिए बधाई गान गाते थे। पहले दिन कोलकाता से आए सुख्यात बांसुरी वादक रोनू मजुमदार ने समां बांधा था। बीच के दिनों में मालिनी अवस्थी, भरत शर्मा व्यास, इंदौर की कल्पना जोगारकर, कोलकाता के अर्णव चटर्जी, वाराणसी के प्रो. राजेश्वर आचार्य, रायपुर के स्वामी जी सी डी भारत, मुम्बई के अखिलेश चतुर्वेदी, वाराणसी के देवाशीष डे, मुम्बई की श्रीमती कंकन बनर्जी आए। अंतिम दिन यानि श्रीरामनवमी को विख्यात भजन गायक रवीन्द्र जैन ने समापन समारोह में चार-चांद लगा दिया। अयोध्या के जानकी घाट स्थित श्रीरामवल्लभा कुंज सहित बाकी प्रमुख वैरागी आश्रमों में अलग-अलग दिन कार्यक्रम हुए। अंतिम दिन छोटी छावनी के नाम से प्रसिद्ध मणिराम दास की छावनी में कार्यक्रम हुआ। पूरे कार्यक्रमों में देश भर से आए रामानंदी साधु-संत, श्रीमहंत, श्रीमठ के भक्त और अयोध्याजी के प्रमुख संतों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
Location:
Andhra Pradesh, India
Saturday, January 25, 2014
"समाज की सहज अभिव्यक्ति है भक्ति"-प्रो.कमलेश दत्त
वाराणसी : भक्ति की भावना भारतीय समाज की सहज अभिव्यक्ति है। प्रेम,
करुणा, सहनशीलता और समानता उसके तत्व हैं। इसलिए ‘आंदोलन’ और ‘प्रस्थान’
दोनों समय-समय पर उपयुक्त हुए हैं। यह बातें शुक्रवार को श्रीमठ में प्रो.
कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कहीं। वे भक्ति आंदोलन और भारतीय समाज विषयक
संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आंदोलन और प्रस्थान शब्द
में शास्त्रीयता और सामाजिक राजनीतिक ध्वनि का स्वर सुनाई देता है। इस अवसर
पर साहित्यकार एवं पत्रकार आनंद शर्मा को जगतगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार
के रूप में एक लाख रुपये नकद दिए जाने की घोषणा की गई। खराब स्वास्थ की वजह
से वह नहीं आ सके।श्रीमठ पीठाधीश्वर जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी ने कहा कि भक्ति सनातन है। आंदोलन
परिधिबद्ध। सनातन शक्ति का मांगलिक चरण है। स्वामी रामानंद इसके पुरोधा थे।
अशोक सिंह, प्रो. देवव्रत चौबे, बाबूराम त्रिपाठी, शिवशंकर मिश्र आदि ने
विचार व्यक्त किया। संचालन डा. उदय प्रताप सिंह ने किया।
Friday, January 24, 2014
गुरु चरणों में चढ़ाये श्रद्धा के सुमन
आदि जगदगुरु रामानंदाचार्य की 715वीं जयंती पर
23 जनवरी,2013 को अनुयायियों
ने पूजन अनुष्ठान किया। गीत
संगीत गूंजे, नृत्य
से भावांजलि दी और शोभायात्र
भी निकाली। काशी स्थित रामानंद सम्प्रदाय
की मूल आचार्य पीठ- श्रीमठ में
पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज
ने सुबह चरण पादुका पूजन किया।
षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना
की गई। सम्पूर्ण वैदिक कर्मकांडों का संपादन पं. त्रिलोकीनाथ
जेतली कराया।
चारों वेदों की ऋचाओं का पारायण
भी किया गया। शाम को गौरव मिश्र
ने बधाई के गीत गाए। डा. ममता
टंडन, रवि शंकर मिश्र
व गौरव सौरव मिश्र ने कथक से
गुरु वंदना के भाव सजाए। शिव
व यशोदा पर आधारित नृत्य किया।
तबला पर भोलानाथ मिश्र,
हारमोनियम पर गौरव
मिश्र, सितार पर
ध्रुवनाथ मिश्र, सहनृत्य
में सूफी व मांडवी ने साथ दिया।
संयोजन विधान बाबा ने किया। दो दिवसीय आयोजन के दूसरे दिन अर्थात 24 जनवरी को विशाल संत-सम्मेलन का आयोजन किया गया है। साथ ही वरिष्ठ पत्रकार आनंद मिश्र को समारोह में जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार भी दिया जाएगा।
Labels:
srimath,
जगद्गुरू रामानंदाचार्य,
श्रीमठ
Location:
Andhra Pradesh, India
Tuesday, January 21, 2014
"रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले''
स्वामी
रामानंदाचार्य की जयंती 23 जनवरी पर विशेष
*डॉ.देवकुमार पुखराज
काशी (वाराणसी) के सुरम्य गंगा घाटों में पंच्चगंगा घाट का अपना एक
विशिष्ट स्थान है, इसी घाट पर अवस्थित
है श्रीमठ, जिसे मध्यकालीन भक्ति आंदोलन
के शीर्ष संत स्वामी रामानंद की तपः स्थली होने का गौरव प्राप्त है। उस रामानंद ने
आज से सात सौ पंद्रह वर्ष पहले समाज-जीवन
के विविध क्षेत्रों, विभिन्न मत-पंथ- संप्रदायों में
व्याप्त वैमनस्यता और कटुता को दूर कर हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य
किया। स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग
का निदर्शन किया। आचार्यपाद ने स्वतंत्र रूप से श्रीसंप्रदाय का प्रवर्तन किया।
जिसे रामानंदी,रामावत अथवा वैरागी
संप्रदाय भी कहते हैं। उन्होंने बिखरते और
नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की
शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला है- सर्वे प्रपत्तेधिकारिणो मताः
स्वामी श्रीरामानंद ने दलित, शोषित और उपेक्षित
जातियों और महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर समाज में समरसता का अपू्र्व
वातावरण निर्मित किया। आचार्य
रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने तारक राममंत्र का उपदेश पेड़ पर चढ़कर दिया था,ताकि सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से
अधिक लोगों का कल्याण हो सके। उन्होंने नारा दिया था-
"जाति-पाति पूछे न कोई , हरि को भजै सो हरि का होई "।
ऐसा कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वर्ण
के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया। चर्मकार जाति में जन्मे रैदास ( रविदास) और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं। युग प्रवर्त्तक स्वामी रामानंदाचार्य जी
महाराज के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति कही--सुनी
जाती है, जिसके अनुसार-
"भक्ति द्रविड़
ऊपजी, लायो रामानंद,” अर्थात भक्ति की धारा को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में
लाने का श्रेय भी स्वामी रामानंद को ही जाता है।
उनकी शिष्य मंडली
में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास,
सेन नाई और पीपा नरेश जैसे जाति-पांति, छुआछूत, वैदिक
कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी
निर्गुणवादी संत थे, तो दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा
करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद,
सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे। उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी
साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत, कालजयी महाकवि भी उत्पन्न हुए।
स्वामी रामानंद को रामोपासना
के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है। उन्होंने श्रीसंप्रदाय के
विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपत्ति सिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का
सूत्रपात किया। श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडक्षर( रां रामाय नमः) राममंत्र
को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना। बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में
आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया। छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन
किया। नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया। साथ-साथ सिद्धांतों के प्रचार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा
की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी। स्वामी रामानंद ने प्रस्थानत्रयी पर
विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की। तत्व एवं आचारबोध की
दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम
जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत के स्थान
पर जन सामान्य के बीच प्रचलित हिन्दी अथवा अवधि भाषा को सर्वप्रथम अपनी रचना का
माध्यम स्वामी रामानंद ने ही बनाया। इन कार्यों के चलते ही कई विद्वान उन्हें
हिन्दी का पहला कवि भी कहते हैं।
ऐसे महान तपस्वी संत, परम विचारक, समन्वयी
महात्मा का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में
हुआ था। जन्मतिथि को लेकर मतभेद होने के बावजूद रामानंद संप्रदाय में मान्यता है
कि आद्य जगद्गुरू का प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित पुण्य सदन
शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था। धार्मिक संस्कारों वाले पंडित शर्मा मे
रामानंद को शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में गुरू
राघवानंद के पास भेजा था। कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी
शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन कर
प्रवीणता प्राप्त कर ली। गुरु राघवानंद और माता-पिता
के दबाव के बावजूद उन्होंने गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने
का संकल्प लिया। बाध्य होकर गुरुदेव ने स्वामी रामानंद को रामतारक मंत्र की दीक्षा
प्रदान की। उन्होंने श्रीमठ की गुह्य साधनास्थली में प्रविष्ट हो राममंत्र का
अनुष्ठान तथा अन्यान्य तांत्रिक साधनाओं का प्रयोग करते हुए घोर तपश्चर्या की।
योगमार्ग की तमाम गुत्थियों को सुलझाते हुए अष्टांग योग की साधना पूर्ण की।
दीर्घायुष्य प्राप्त करने के कारण जगद्गुरु राघवानंद ने अपने तेजस्वी और परमप्रिय
शिष्य रामानंद को श्रीमठ की पावन पीठ पर अभिषिक्त कर दिया। अपने पहले संबोधन में
ही जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों
को दूर करने तथा परस्पर आत्मीयता एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार के बदौलत धर्म रक्षार्थ
विराट संगठित शक्ति खड़ा करने का संकल्प व्यक्त किया।
श्रीसीताजी द्वारा
पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत (राममय
जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा
रामभक्ति की पावन धारा को मध्यकाल में स्वामी श्रीरामानंदाचार्य ने अनुपम तीव्रता
प्रदान की। उन्होंने क्रुर, विवेकशून्य, पूर्वाग्रही तथा असहिष्णु यवन शासकों के अत्याचारों का
मुखर विरोध किया। शंखध्वनी कर अपनी यौगिक शक्ति से ऐसा माहौल बनाया कि तत्कालीन
मुगल सम्राट तुगलक को कबीरदास के माध्यम से स्वामीजी के पास शरणागत होकर क्षमा
याचना करनी पड़ी। उसे हिन्दुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध हटाने और जजियाकर को समाप्त
करने का आदेश निर्गत करना पड़ा।
मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी
की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ
जैसी है। उन्होंने अभूतपूर्व
सामाजिक क्रांति का श्रीगणेश करके बड़ी जीवटता से समाज और संस्कृति की रक्षा की। उन्हीं के चलते उत्तरभारत में तीर्थ
क्षेत्रों की रक्षा और वहां सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना संभव हो सकी। उस युग की परिस्थितियों के अनुसार, वैरागी
साधु समाज को अस्त्र-शस्र से
सज्जित अनी के रूप में संगठित कर तीर्थ-व्रत की रक्षा के लिए, धर्म
का सक्रिय मूर्तिमान स्वरूप खड़ा किया। तीर्थस्थानों से लेकर गांव-गांव में वैरागी साधुओं ने अखाड़े स्थापित किए। आज भी निर्वाणी, दिगम्बर और निर्मोही नामक तीन मूल अखाड़े और उसकी कई
शाखाएं देश भर में सनातन धर्म की मूल पताका को लहरा रही हैं। मूल्य
ह्रास की इस विषम अवस्था में भी संपूर्ण संसार में रामानंद संप्रदाय के सर्वाधिक मठ, मंदिर और संत-महात्मा
हैं, आज भी इस संप्रदाय के आश्रमों में संत-साधु और गृहस्थ की
सेवा, रामगुणगान, अखंड श्रीरामनाम संकीर्तन व्यवस्थित हैं और
सर्वत्र आध्यामिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं। इस संप्रदाय की व्यापकता का हिसाब इस बात से
भी लगाया जा सकता है कि वैष्णवों
के बावन द्वारों में सर्वाधिक छत्तीस
द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हैं। कुंभ मेले के दौरान रामानंदी साधुओं के विराट स्वरुप, इनकी उदारता और अन्नदान की परंपरा को कोई भी देख सकता
है।
युगप्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्यजी महाराज द्वारा प्रर्वतित मूल
रामानंद संप्रदाय के अलावे इसकी
शाखा, प्रशाखा और अवान्तर शाखाएं
जैसे- रामस्नेही, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से सक्रिय हैं, जो
इस संप्रदाय की मूलभावना की
संवाहिका बनी हैं। यह स्वामी रामानंद के ही व्यक्तित्व का प्रभाव
था कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य,
शैव-वैष्णव विवाद, वर्ण-विद्वेष, मत-मतांतर का झगड़ा और परस्पर सामाजिक कटुता बहुत हद तक कम हो गई।
बलपूर्वक
इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए
परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्य जी ने ही प्रारंभ किया था। इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के
नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के
लिए प्रेरित किया था।
काशी
के परम पावन पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, आचार्यपाद द्वारा प्रवाहित श्रीराम प्रपत्ति की
पावनधारा के मुख्यकेंद्र के रूप में प्रतिष्ठित होकर उसी ओजस्वी परंपरा का अनवरत
प्रवर्तन कर रहा है। आज भी श्रीमठ आचार्यचरण
की परिकल्पना के अनुरूप उनके द्वारा प्रज्ज्वलित दीप से जनमानस को आलोकित कर रहा है। यही वह दिव्यस्थल है, जहां विराजमान होकर स्वामीजी ने अपने परमप्रतापी
शिष्यों के माध्यम से अपनी अनुग्रहशक्ति का उपयोग किया था। रामानंदाचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्ध श्रीमठ, दुनिया भर में फैले
श्रीराम भक्तों की श्रद्धा का अनुपम केन्द्र है और सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति
परंपरा और रामानंद संप्रदाय का एकमात्र मूल
आचार्यपीठ अथवा दूसरे शब्दों में कहें को मुख्यालय है। श्रीमठ में अवस्थित
रामानंदाचार्य जी की पावन चरणपादुका दुनियाभर में बिखरे रामानंदी संतों,
तपस्वियों एवं अनुयायियों के बीच समादृत है।
श्रीमठ
के वर्तमान पीठासीन आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी भी स्वामी रामानंदाचार्च की
प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं। इनका
ज्ञान, वग्मिता और सबसे अच्छी इनकी उदारता और संयोजन चेतना को देखकर
यह कल्पना किया जा सकता है कि स्वामी रामानंद का व्यक्तित्व कैसा रहा होगा। वर्तमान जगद्गुरू रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सत्प्रयासों का नतीजा है
कि श्रीमठ से कभी अलग हो चुकी कबीरदासीय, रविदासीय, रामस्नेही,
प्रभृति परंपराएं वैष्णवता के सूत्र में बंधकर श्रीमठ से एकरूपता
स्थापित कर रही है। कई परंपरावादी मठ -मंदिरों
की इकाईयां श्रीमठ में विलीन हो रही हैं।
तीर्थराज प्रयाग के दारागंज स्थित आद्य जगद्गुरू रामनंदाचार्य का प्राकट्यधाम भी
इनकी प्रेरणा से फिर भव्य स्वरूप में प्रकट हुआ है।
स्वामी रामानंद के द्वारा दी गई देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी
संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया। भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी
सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों
के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को
प्राप्त न हो सकी। महाराष्ट्र के
नाथपंथियों ने ज्ञानदेव के पिता विट्ठल पंत के गुरू के रूप में उन्हें पूजा,
अद्वैत मतावलंबियों ने ज्योतिर्मठ के
ब्रह्मचारी के रूप में उन्हें अपनाया। बाबरीपंथ के संतों ने अपने संप्रदाय के प्रवर्तक मानकर उनकी वंदना की और कबीर के
गुरू तो वे थे ही, इसलिये कबीरपंथियों में उनका
आदर स्वाभाविक है। स्वामी रामानंदाचार्य के
व्यक्तित्व की इस व्यापकता का रहस्य- उनकी
उदार और समन्वयकारी विचारधारा में निहित है।
निश्चय हीं उनके विराट व्यक्तित्व एवं व्यापक महत्ता के अनुरूप कतिपय आर्षग्रंथ
एवं संत-साहित्य में उल्लेखित
उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है। अगस्त संहिताकार ने लिखा है कि - रामानंद:
स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले। अर्थात स्वयं श्रीराम ही
पृथ्वी पर रामानंद के रुप में अवतार लिये। ऐसे महान तपस्वी, साधक और मानवता के परम उन्नायक को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
-इति-
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काशी,
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Andhra Pradesh, India
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