Wednesday, May 8, 2013

भगवान परशुराम मंदिर, हैदराबाद का होर्डिंग

Swami Ramnreshacharya ji Maharaj, Kashi

परशुराम मंदिर, हैदराबाद प्राण-प्रतिष्ठा समारोह आमंत्रण पत्र

Prashuram Mandir Hyderabad

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का हैदराबाद दौरा

रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य और सगुण एवम् निर्गुण रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ, काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज पांच दिवसीय प्रवास पर आज हैदराबाद पहुंच रहे हैं। शाम सवा पांच बजे वे बैंगलोर से वायुमार्ग द्वारा हैदराबाद के शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचेंगे। हैदराबाद के भक्तगण और ब्रह्मर्षि समाज के पदाधिकारी बड़ी संख्या में उनकी आगवानी कर उन्हें कुक्कटपल्ली ले जाएंगे, जहां अगले पांच दिनों तक उनका आवास रहेगा। ब्रह्मर्षि सेवा समाज, हैदराबाद के अध्यक्ष श्रीराम गोपाल चौधरी का आवास इस दौरान आचार्यश्री का अस्थायी आवास होगा। महाराजश्री हैदराबाद के जगतगिरीगुट्टा में बने भगवान परशुराम के नवनिर्मित मंदिर के तीन दिवसीय प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के मुख्य अतिथि हैं। अक्षय तृतीया यानि परशुराम जयंती के मौके पर मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा होना सुनिश्चित हुआ है। वैसे धार्मिक कार्यक्रमों की शुरुआत 11 मई को प्रातः सात बजे गणपति पूजा और देवताओं के आवाहन  के साथ हो जाएगी। अक्षय तृतीया के दिन 13 मई को प्रातः 10 बजकर 26 मिनट पर प्राण-प्रतिष्ठा का मुहुर्त्त है। इसके निमित्त मंदिर परिसर में यज्ञ मंडप का निर्माण हो चुका है। महाराजश्री के सान्निध्य में होने वाली समस्त मंगलप्रवृत्तियों का संचालन हैदराबाद के नल्लकुंटा स्थित प्राचीन रामालयम के प्रधान यज्ञरत्न आचार्य के.ए.चारी करेंगे। आचार्यश्री के हैदराबाद प्रवास के दौरान कई तरह के अन्य समारोह भी आयोजित हैं, जहां भक्त और श्रद्धालु उनके दर्शन-पूजन और आशीर्वचन के लाभ उठा सकेंगे। रामानंदी वैष्णव समाज के संत-महात्माओं में भी अपने आचार्य के आगमन को लेकर खासा उत्साह है।

Monday, April 15, 2013

भगवान परशुराम : देश की पहली बड़ी लड़ाई के महानायक

parashuram-सूर्यकांत बाली
हमें महाभारत के नाम से प्रसिद्ध एक भयानक संग्राम की याद है जो आज से करीब पांच हजार साल पहले (अर्थात् पांच हजार साल से भी पचास-साठ साल पहले) लड़ा गया था, जिसमें सारे देश के राजाओं ने किसी न किसी रूप में हिस्सा लिया था। पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि महाराज मनु से मिलने वाले अपने देश के ज्ञात इतिहास में महाभारत से भी पहले महासंग्राम लड़े गए थे।
दाशराज युद्ध नामक एक अन्य महासंग्राम का जिक्र हम कर चुके हैं जो पुरुवंशी सुदास और दस विरोधी राजाओं के महासंघ के बीच सरस्वती, परुष्णी और दृषद्वती नदियों के बीच महाभारत के करीब साढ़े आठ सौ वर्ष पहले लड़ा गया था जिसमें सुदास जीते और दस  राजाओं का महासंघ हारा।
हम जानते हैं कि दाशराज युद्ध से भी करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले (यानी आज से करीब छह हजार वर्ष पहले) राम ने दक्षिण भारत की वनवासी जातियों की एक विराट सेना का नेतृत्व कर रावण से भयानक संग्राम किया था और जीते थे। ऐतिहासिक राम-रावण युद्ध से भी करीब (एक हजार साल पहले) भगवान परशुराम ने उत्तर और पूर्व के राजाओं का एक महासंघ बनाकर आधुनिक गुजरात के हैहय राजाओं के खिलाफ एक महासंग्राम को नेतृत्व प्रदान किया था।
यानी महाभारत युद्ध आज से 5000 वर्ष पूर्व, राम रावण युद्ध आज से 6000 वर्ष पूर्व और हैहृय-परशुराम युद्ध आज से करीब 7000 वर्ष पूर्व लड़े गए। अगर महाभारत युद्ध द्वापर युग के अंत में, राम-रावण युद्ध और दाशराज युद्ध त्रेतायुग के अंत में लडे ग़ए तो परशुराम के नेतृत्व में हैहयों के विरुद्ध यह युद्ध सत्ययुग अर्थात् कृतयुग के अंत में लड़ा गया। भारत के आठ हजार वर्षों के मनुपरवर्ती ज्ञात इतिहास का यह पहला महासंग्राम था, जिसके विजेता महानायक परशुराम को इस देश का बच्चा-बच्चा जानता है तो उस युद्ध के कारण नहीं बल्कि अन्य कारणों से और इस युद्ध की एक अजीबोगरीब बना दी गई व्याख्या के कारण से।
तो कौन थे परशुराम जिन्हें हमारा पुराना साहित्य भगवान परशुराम के नाम से पूरी इज्जत और श्रद्धा के साथ याद करता है तो इस देश के ब्राह्मण जाति के लोगों ने इधर उन्हें अपना लक्कड़दादा मानकर उनकी जयंती मनानी शुरू कर दी है? हालत करीब-करीब वही है जो वसिष्ठों और विश्वामित्रों के सन्दर्भ में देख आए हैं। परशुराम जिस भार्गव वंश के थे, इसकी पूरी एक वंशपरम्परा है जिसके सभी महापुरुष भार्गव या परशुराम स्वाभाविक रूप से कहलाए, लेकिन वसिष्ठों और विश्वामित्रों की तरह हमने सभी परशुरामों को भी एक कर दिया है।
एक परशुराम वे थे, जिन्होंने भीष्म (पितामह) के साथ इसलिए युद्ध किया था ताकि भीष्म खुद उनके (भीष्म के) द्वारा अपहरण करके लाई गई अम्बा (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका वाली अम्बा) के साथ विवाह करें, पर वे भीष्म को आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा से डिगा नहीं सके। इन्हीं परशुराम से आगे चलकर कुन्तीपुत्र कर्ण ने अस्त्र विद्या सीखी थी।
इनसे एक हजार साल पहले के एक परशुराम वे थे जिन्होंने शिव धानुष तोड़ने वाले राम के साथ विवाद किया, उसके शौर्य को चुनौती दी और राम से अपना मद-दलन करवा कर लौटे। हैहयों से लड़ने वाले परशुराम इससे भी करीब एक हजार साल पहले हुए। हैहयों से हुए इस महासंग्राम में परशुराम ने हैहयों को एक के बाद एक इक्कीस बार पराजित किया। पर तब से हमारी स्मृतियों के इतिहास में दर्ज यह हो गया कि परशुराम ने भारत भूमि को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया। क्या क्षत्रियों का इक्कीस बार विनाश कोई एक ही योद्धा कर सकता है? क्या यह संभव है? नहीं। इसलिए हमारा कहना है कि हैहयों के साथ हुए इस महायुद्ध की इस अजीबोगरीब व्याख्या के कारण देश का बच्चा-बच्चा परशुराम के बारे में जितना जानता है, उसके अलावा भी परशुराम के बारे में कुछ और जरूरी बातें जान लेनी चाहिए।
परशुराम जिस कुल में जन्मे उसके आदिपुरुष का नाम भृगु था। ये वही भृगु हैं जिनके किसी वंशज के प्रयासों से वह भृगुसंहिता रची गई, जिसे पढ़कर लोग अपना भविष्य जानने को उत्सुक रहते हैं। इसी भृगु के कारण उनके सभी वंशज भार्गव कहलाए। परशुराम भार्गव के पिता का नाम जमदग्नि था, इसलिए हमारी इस गाथा के कथानक के नायक को परशुराम भार्गव के अलावा परशुराम जागदग्न्य भी कह दिया जाता है।
इनकी माता का नाम रेणुका था और हम भारतीयों को गाथा याद है कि किसी बात पर रुष्ट अपने पिता जन्मदग्नि के आदेश का पालन करते हुए परशुराम ने अपने परशु (फरसा) से मां का वध कर दिया। जब प्रसन्न पिता ने वर मांगने को कहा तो उन्होंने अपनी मां का ही पुनर्जीवन मांग कर मां को फिर से पा लिया। भार्गवों को अगर (कौशिकों और कश्यपों की तरह) प्रामाणिक ब्राह्मण कुल न मानने की परम्परा चल पड़ी है तो इसका कारण परशुराम द्वारा किया गया मातृ-वध ही नजर आता है।
परम्परा के भार्गव लोग नर्मदा के किनारे रहा करते थे और आनर्त (गुजरात) के हैहय राजवंश के कुलगुरु थे। परशुराम भी अपने पिता जगदग्नि के साथ नर्मदा नदी के तट पर बने अपने आश्रम में रहा करते थे। अब तो परशुराम नाम का रिश्ता ही फरसे और दूसरे कई तरह के शस्त्रों से तथा हैहयों के साथ लड़े गए युद्ध के साथ बन गया है। पर मूलत: भार्गव आयुधजीवी ब्राह्मण नहीं थे और जमदग्नि का नाम भी शस्त्र के बजाय ज्ञान और विद्या के साथ ही जोड़ा जाता है।
एक विचारधारा यह भी है कि भार्गव और आंगिरस कुल के परवर्ती आचार्यो ने ही रामायण, महाभारत और पुराणों का संपूर्ण नव-संस्कार किया था और कई बाद की परम्पराओं को पुराणों में जोड़कर इन्हें लगातार नवीनतम बनाने का प्रयास किया था। भार्गव कुल इस हद तक विद्यानुरागी था कि हैहयों से मनमुटाव हो जाने के कारण अपने तिरस्कर्ता राजाओं से झगड़ने की बजाय वे लोग कान्यकुब्ज में जाकर रहने लग गए थे।
पर जमदग्नि के साथ हुए अपमान को उनके पुत्र परशुराम सहन नहीं कर पाए और शस्त्र विद्या पर परमज्ञान प्राप्त कर वे कई राजाओं का महासंघ बनाकर हैहयों से उलझ पड़े और एक महासमर को नेतृत्व दिया जिसमें हैहय जगह-जगह हारे। उसके बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि भार्गव की बजाय परशुराम ही मानो कुल नाम पड़ गया और वह हर वंशज, जो युद्धविद्या में प्रवीण हो गया, खुद को परशुराम कहलाना ही पसंद करने लगा। इसलिए जो राम से उलझे वे भी परशुराम, और जो भीष्म से लड़े वे भी परशुराम।
जैसे किसी बहुत बूढ़े आदमी के भूतकाल के जीवन के बारे में कई तरह की अतिशय से भरी उक्तियां कह दी जाती हैं, किसी पुराने जीर्णशीर्ण मकान या उद्यान को लेकर कई तरह की कहानियां गढ़ दी जाती हैं या उससे जुड़ी कई घटनाओं की कई तरह से व्याख्याएं चलन में आ जाती हैं, वैसे ही भारत जैसे अतिप्राचीन देश के इतिहास की कई घटनाओं की विचित्र व्याख्याएं कर दी गई हैं। हैहयों को एक लम्बी चली लड़ाई में इक्कीस जगहों पर पराजय देने वाले परशुराम के बारे में यह फैल गया है कि उन्होंने इक्कीस बार इस धरती पर क्षत्रियों का समूलोन्मूलन कर दिया।
वैसे तो एक बार के समूलोन्मूलन के बाद दोबारा क्षत्रियों के पैदा होने का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। इक्कीस बार तो संभव ही नहीं है। पर इतना ही नहीं, परशुराम के हाथों इतने ज्यादा बड़े भू-भाग पर, इतने ज्यादा राजवंशों के इतने बड़े पैमाने पर विनाश की कथाएं पुराणों में मिल जाती है कि पढ़ते-पढ़ते कुछ कोफ्त होने लगती है कि पुराणकार आखिर अपने पाठकों को समझते क्या हैं। इन विवरणों को जितना चाहे बढ़ा सकते हैं।
पर भारत के इतिहास में आज करीब सात हजार साल पहले परशुराम ने यकीनन एक बड़ी निर्णायक लड़ाई हैहयों से लड़ी थी। लड़ाई का कारण क्या था, सहसा समझ में नहीं आ रहा। दो बातें मिलती हैं। एक यह कि एक हैहय राजा कृतवीर्य ने अपने कुलगुरु औचीक और्व भार्गव को प्रभूत धन दिया था। जब कुछ समय बाद राजा ने पैसा वापिस मांगा तो औचीक ने आनाकानी की। राजा ने उनका अपमान कर दिया और औचीक अपना आश्रम छोड़ कान्यकुब्ज चले गये। लेकिन, उनके पुत्र जमदग्नि अपने आश्रम में वापिस आ गए। परशुराम के साथ एक और पुराण कथा जुड़ी है।
ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार कृतवीर्य के पुत्र कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि से उनकी कामधेनु गाय मांगी। गुरु ने मना कर दिया तो कार्तवीर्य ने उनका तिरस्कार कर दिया। बल्कि कहानी यहां तक कहती है कि एक बार जब जमदग्नि के पुत्र परशुराम तप के लिए आश्रम से बाहर गए हुए थे तो कार्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि का वध कर दिया। तप से लौटे परशुराम ने इससे कुपित होकर हैहयों के नाश की प्रतिज्ञा कर डाली।
क्या आपको कहीं कोई खास बात मिलती नजर आ रही है? कृतवीर्य-औचीक तथा कीर्तवीर्य-जमदग्नि के बीच विरोध का ऐसा कोई बड़ा कारण इन दोनों कथाओं में से उभरता नजर नहीं आ रहा। जाहिर है कि कोई बड़ा कारण था जिसकी वजह से परशुराम ने हैहयों को सबक सिखाने की ठान ली। बस लग गए वे अपनी धुन के पीछे। अयोध्या, विदेह, काशी, कान्यकुब्ज और वैशाली के राजाओं का एक महासंघ बनाकर खुद वे उसके नेता बने।
उधर हैहयों ने भी आज के सिन्ध और राजस्थान के कुछ राजाओं को अपने साथ मिलाया। परशुराम ने हैहयों को इक्कीस जगह पराजय दी। जाहिर है कि युद्ध लंबा और भयानक चला होगा। यह अनुमान भी लगा सकते हैं कि महाभारत की तरह यह युद्ध भी कई दिन यानी इक्कीस दिन चला और इसमें हैहयों को भारी हार का सामना करना पड़ा हो। जहां युद्ध का कोई बड़ा कारण हमारे इतिहास के स्मृतिपटल से लगभग पुंछ चुका है, वैसे ही इक्कीस संख्या के असली अर्थ से भी हम करीब-करीब वंचित हो चुके हैं।
पर मनुपरवर्ती भारत के इस पहले महासमर को लेकर दो बातें जरूर ध्यान में आ जाती हैं। एक, परशुराम हमारे इतिहास के पहले ब्राह्मण पात्र हैं जिन्होंने किसी राजा को दंड देने के लिए राजाओं को ही एक जुट कर लिया। इसके पहले पुरुरवा, वेन, नहुष, शशाद जैसे राजाओं की दुष्टताओं या लापरवाहियों को दंडित करने के लिए ऋषि या ब्राह्मण अपने ही स्तर पर आगे आए थे।
पहली बार सारे मामले को एक ऐसी राजनीतिक शक्ल मिली कि संघर्ष का स्वरूप ही बदल गया। इसका असर क्या पड़ा, यह आकलन इसलिए कठिन है क्योंकि घटनाचक्र का पूरा रूप हमारे सामने नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात उस युग के स्वरूप के बारे में है। कैसा रहा होगा वह युग? एक ओर उत्तर में वसिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष चल रहा था तो पश्चिम में हैहयों और भार्गवों के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई थी।
अयोध्या में सत्यव्रत त्रिशुंक नाम से एक उद्धत राजा राज कर रहा था तो आनर्त में बराबर के उद्धत कार्तवीर्य की दुन्दुभि बज रही थी। और इन सबसे ऊपर विश्वामित्र और परशुराम नाम के दो विराट मस्तिष्क सारी राजनीति को आंदोलित किए हुए थे। कैसा रहा होगा वह युग जो सत्ययुग की छवि के हिसाब से बहुत ही शांत होना चाहिए, पर कितनी हलचल और कितनी गतिविधि से सराबोर था?

Friday, February 22, 2013

महाकुंभ में मना स्वामी रामनरेशाचार्य का जन्मदिन

प्रयाग महाकुंभ के दौरान यूं तो विविध प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान समायोजित हुए ,लेकिन श्रीमठ,काशी पीठाधीश्वर और रामानंद संप्रदाय के प्रधान आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन समारोह अपने आप में अनूठा और यादगार बन गया। जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन वसंत पंचमी (यानि 15 फरवरी ) के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरित

प्रयाग महाकुंभ के दौरान वसंत पंचमी के दिन (15 फरवरी,2013 को) दारागंज स्थित हरित माधव मंदिर ,जो जगदगुरु रामानंदाचार्य की प्राकटय स्थली के नाम से विख्यात है,में विशेष सारस्वत समारोह का समायोजन किया गया। इस मौके पर वर्तमान जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी की ओर से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले एक लाख रुपये का जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2013 का ये पुरस्कार हिन्दी,संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य के उदभट विद्वान और काशी निवासी प्रोफेसर प्रभुनाथ द्विवेदी को सौंपा गया। इस मौके पर राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा सहित बड़ी संख्या में संत,श्रीमहंत,विद्नान और श्रद्धालु मौजूद थे।
  जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज का जन्मदिन भी वसंत पंचमी के दिन ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया गया। भक्तों के विशेष आग्रह पर स्वामीजी जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित विविध कार्यक्रमों में शामिल होने को तैयार हुए। इस निमित्त विशेष पूजा,आरती और गीत-संगीत का भी आयोजन किया गया । सुरूचिपूर्ण भंडारे के साथ भक्तजनों ने अपने पूज्य गुरुवर के जन्मदिन को यादगार बनाया। 

Wednesday, February 6, 2013

Guru Vandana in Bhojpuri

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से

गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
चरण पखरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आसन लगइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
भोगवा बनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
पनियां छनइतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से
जाहूं हम जनतीं गुरुजी हमार आएब रामा
आरती उतरतीं अपना हाथ से
गुरु चरण मिलेला बड़ी भाग से।

Friday, February 1, 2013

जगदगुरु रामानंदाचार्य प्राकट्य धाम,प्रयाग

आदि जगदगुरु स्वामी रामानंदाचार्य भक्ति के ऐसे पहले आचार्य हुए जिनका जन्म उत्तर भारत में हुआ। इससे पहले के आचार्यो जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्यवाचार्य का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। भक्ति आंदोलन के शीर्ष आचार्य का जन्म भी तीर्थराज प्रयाग में हुआ। जिस पावन स्थली पर स्वामी रामानंदाचार्य का जन्म हुआ, उसे वैरागी वैष्णव समाज स्वामी रामानंदाचार्य प्राकट्य धाम के नाम से जानता है। इलाहाबाद के संगम तट से महज एक किलोमीटर उत्तर दिशा में दारागंज स्टेशन है,वही मोरीगेट के समीप रेलवे पुल के नीचे है ये स्थान जिसे इलाके के लोग हरित माधव मंदिर के नाम से जानते हैं। यहीं वो स्थान है,जहां आज से सात सौ साल पहले स्वामी रामानंद ने एक ब्राह्मण कुल में जन्म लिया।सनातन धर्म में मान्यता है कि स्वामी रामानंद के रुप में स्वयं भगवान राम ने धरती पर अवतार लिया था। अगस्त संहिता में एक श्लोक से इसकी पुष्टि होती है -रामानंदः स्वयं रामः,प्रादुर्भूतो महीतले। बचपन से ही अत्यंत मेधावी और विल्क्षण प्रतिभा के धनी रामानंद को उनके माता-पिता ने शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ भेज दिया। वहीं स्वामी राधवानंद के सानिध्य में रहते हुए स्वामी रामानंद ने सभी शास्त्रों का अध्ययन किया और जगदगुरु रामानंदाचार्य के रुप में पूरी दुनिया में विख्यात हुए। 

Wednesday, January 30, 2013

काशी का श्रीमठ

वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ की ये तस्वीर है। इसे गंगा मइया की गोद से लिया गया है। यही वो श्रीमठ है,जो रामभक्ति परंपरा और रामानंद संप्रदाय का एकमात्र मूल आचार्यपीठ है। यही है स्वामी रामानंद की साधना और तपः स्थली, जो मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन के सर्वोच्च संत थे। उन्होंने नारा दिया था-जात-पात पूछे न कोई-हरि को भजे सो हरि का होई। अपने गुरु स्वामी राघवानंद के सानिध्य में इसी श्रीमठ में रहते हुए स्वामी रामानंद ने रामभक्ति की अविरल धारा प्रवाहित की। उनका पावन सानिध्य पाकर कबीर,रैदास जैसे लोग महान पुजनीय संत बन गये। स्वामी रामानंद जी सगुण और निर्गुण रामभक्ति धारा के संगम थे। उन्होंने दिगंबर,निर्वाणी, निर्मोही नामक तीन अखाड़े स्थापित किये,जिसके शौर्य और पराक्रम का विहंगम दर्शन आमजन कुंभ मेले के दौरान करते हैं। मध्यकाल में इन्हीं वैष्णव अखाड़ों ने मुगलों के आक्रमण से देश की रक्षा की और करोड़ों हिन्दुओं को इस्लाम में परावर्तित होने से रोका।स्वामी रामानंद द्वारा प्रतिपादित संप्रदाय आज रामानंद सम्प्रदाय, रामावत या वैरागी वैष्णव सम्प्रदाय कहलाता है, जो प्रकारांतर से श्रीसम्प्रदाय का ही हिस्सा हैं। देश में सबसे ज्यादा साधु-संत और मठ-मंदिर इसी संप्रदाय के हैं। जहां सीताराम मुख्य उपास्य देव हैं औऱ हनुमान जी आराध्य।

Sunday, October 7, 2012

प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

जगदगु़रु महाराज की प्रवचन पुस्तिका का लोकार्पण

भारत में रामभक्ति की अविरल धारा के जनक आचार्यश्री रामानंद जी के प्राकट्य धाम हरित माधव मंदिर, प्रयाग, इलाहाबाद में २ सितम्बर संध्या के समय अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका का लोकार्पण हुआ। रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ, वाराणसी के पीठाधीश्वर रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और देश के प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी ने के इस पुस्तिका का विमोचन किया। इस पावन अवसर पर दिल्ली से आए प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय भी मंच पर विराजमान थे।
श्रीमठ से अनेक
ग्रंथों का प्रकाशन हुआ है, किन्तु यह पुस्तिका या ग्रंथ इस मामले में एक शुरुआत है कि इसमें रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज के प्रवचन संकलित हैं। प्रवचन समकालीन समस्याओं पर केन्द्रित हैं, इसमें रामभक्ति से लेकर हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण की वैज्ञानिक खोज पर भी विस्तृत चर्चा है। इस प्रवचन ग्रंथ से यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्म क्या है? आज की समस्याओं का समाधान क्या है? दु:ख क्यों होता है? सुख कैसे होगा? कन्या भ्रूण हत्या से लेकर आतंकवाद और प्रतिशोध जैसे विषय पर भी इसमें प्रवचन संकलित हैं। 
पुस्तिका विमोचन अवसर पर प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास, ज्ञानेश उपाध्याय, रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के अध्यक्ष जटाशंकर जी और प्रसिद्ध संस्कृत समाचारवाचक बलदेवानंद सागर जी। 

इस अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने कहा,‘तुलसीदास जी ने कहा है, निरंतर सुनिए, निरंतर गाइए और निरंतर स्मरण कीजिए, मैं भी निरंतर बोल रहा हूं, निरंतर सुन रहा हूं, निरंतर स्मरण कर रहा हूं, किन्तु लिखने या लिखवाने का अवसर नहीं आया। लिखने का काम अब ज्ञानेश जी ने किया है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं पुस्तिका को पढ़ रहा था, मेरे मन में बार-बार प्रश्न आ रहा था, क्या यह मैंने ही कहा था या ज्ञानेश जी को ही ज्ञान हो गया और उन्होंने लिख दिया। अब विश्वास नहीं होता, ये मेरे ही शब्द हैं। किन्तु ध्यान दीजिए, गीता बस एक बार श्री कृष्ण के मुख से निकली थी। ऐसा नहीं है कि जब कहा जाए, कृष्ण गीता सुनाने लगें, एक विशेष अवसर व प्रयोजन था, जब गीता अवतरित हुई।’
डॉ. जटाशंकर जी ने कहा, ‘धर्म प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि धार्मिक आचरण, दूसरों की सेवा, दया, करुणा से व्यक्ति के दु:ख कम होते हैं।’ उन्होंने पुस्तिका में प्रवचन में उल्लिखित महर्षि वेदव्यास जी के श्लोक - को विशेष रूप से याद किया। इस श्लोक में महर्षि वेदव्यास कह रहे हैं कि मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूं, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है, अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते? जटाशंकर जी ने कहा, ‘आज वास्तव में धर्म की पुकार को सुनने की आवश्यकता है। शास्त्र हमें समाधान बता सकते हैं, हमारे दु:ख दूर करने के उपाय बता सकते हैं।’
श्री बलदेवानंद सागर जी ने पुस्तिका के शीर्षक की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘बुरे आचरण के कारण ही दु:ख होता है। यह पुस्तिका एक पावन व प्रशंसनीय प्रयास है, पुस्तिका के माध्यम से रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी के विचार मुद्रित अवस्था में लोगों तक पहुंचेंगे, जिससे समाज और देश का भला होगा।’ प्रस्तुत पुस्तिका में स्वामी रामनरेशाचार्य जी का परिचय लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय जी ने कहा, ‘रामानंद संप्रदाय अकेला ऐसा संप्रदाय है, जिसमें सभी जाति और धर्म के लोगों के लिए जगह है। यह देश के लिए एक अत्यंत उपयोगी संप्रदाय है। यह देश को एक सूत्र में पिरोने का काम कर सकता है।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह एक ऐसे सच्चे, सहज और प्रखर संत हैं, जिनसे देश को बहुत आशाएं हैं। देश में ऐसे संत बहुत कम हैं, जो वास्तव में देश और समाज के भले के लिए सोच रहे हैं।’
जयपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार व पुस्तिका के संयोजक व संपादन सेवक ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा, ‘आज के अत्यंत दुष्कर समय में महाराज स्वामी रामनरेशाचार्य जी के रूप में एक सूर्य उगा हुआ है, हमें अपने-अपने दरवाजे-झरोखे खोल लेने चाहिए और उनके प्रवचन प्रकाश को अपने भीतर उतरने देना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यह पुस्तिका एक बड़े अभाव की छोटी पूर्ति है। यह एक सिलसिले की शुरुआत है, जो राम जी और जगदगुरु के आशीर्वाद से आगे निरंतर रहेगा।’ उन्होंने स्वामी रामनरेशाचार्य जी को समकालीन समाज और पत्रकारों के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए और लोकार्पण स्थल के निकट ही बह रही गंगा जी की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘जैसे गंगा मैया की तुलना केवल गंगा मैया से हो सकती है, जैसे सागर की तुलना केवल सागर से हो सकती है, जैसे राम जी की तुलना केवल राम जी से हो सकती है, ठीक उसी प्रकार महाराज जी (स्वामी रामनरेशाचार्य जी) की तुलना केवल महाराज जी से ही हो सकती है।’
दु:ख क्यों होता है? - पुस्तिका के निर्माण में पग-पग पर सहयोगी रहे संस्कृत के जयपुरवासी रामभक्त विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास ने लोकार्पण कार्यक्रम का अत्यंत कुशल व व्यापक बहुमुखी संचालन करके इस अवसर को ऐतिहासिक और पावन बना दिया। उन्होंने पुस्तिका के मुद्रक प्रिंट ओ लैंड के स्वामी श्री सत्यनारायण अग्रवाल की भी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘यह प्रयास था कि पुस्तिका ज्यादा मोटी या कीमती न हो, ऐसी हो कि सहजता से जन-जन तक पहुंचे और रामभक्ति का प्रसार हो।’ उन्होंने कहा, ‘रामभक्ति समाधान की संभावनाओं का अनंत आकाश है, जिसके माध्यम से हमारे सारे दु:ख दूर हो सकते हैं। यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है कि महाराज जी के आशीर्वाद से इंटरनेट पर आज एक ऐसा ब्लॉग है, जिसके माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी के श्रीमुख से निकले पावन मार्गदर्शक शब्द पूरे संसार में प्रचार-प्रसार पा रहे हैं। रामभक्ति की यह यात्रा सतत रहनी चाहिए।’
वाराणसी सेआए विद्वान एवं श्रीमठ के प्रकाशन का दायित्व संभालने वाले डॉ. उदय प्रताप सिंह ने लोकार्पण के अवसर पर उपस्थित विद्वजनों, संतों और श्रद्धालुओं का आभार जताते हुए कहा, ‘पुस्तिका के रूप में एक अच्छा प्रयास सामने आया है, महाराज के प्रवचन प्रकाशित हुए हैं, यह दायित्व मेरा था, लेकिन मीडिया में होने के कारण ज्ञानेश उपाध्याय मुझसे इस मामले में आगे निकल गए हैं। उनको मेरी तरफ से बधाई है।’
लोकार्पण के अवसर पर हरित माधव मंदिर में बड़ी संख्या में संत, विद्वजन, भक्त और सेवक उपस्थित थे, सभी ने रामभक्ति धारा और पुस्तिका का आनंद लिया। लोकार्पण के उपरांत भव्य भंडारे का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में उपस्थित जनों ने प्रसाद पाया। कार्यक्रम स्थल के निकट ही ‘दु:ख क्यों होता है?’ पुस्तिका के लिए एक स्टॉल लगाई गई थी, जिस पर रखी सभी पुस्तिकाएं देखते-देखते बिक गईं। करीब ७८ पृष्ठ और २५ रुपये कीमत वाली पुस्तिका में श्री रामबहादुर राय द्वारा लिखित महाराज जी के परिचय के उपरांत महाराज जी के १३ प्रवचन अंश हैं और सबसे अंत में रामानंद संप्रदाय की मूल गद्दी वाराणसी में गंगा किनारे पंचगंगा घाट पर स्थित श्रीमठ पर लिखा गया एक फीचर है, जिसमें श्रीमठ के कल और आज के बारे में जाना जा सकता है। पुस्तिका के कवर पृष्ठ पर महाराज जी का चित्र और पिछले कवर पृष्ठ पर महाराज जी की प्रिय प्रार्थना महाकवि जयदेव रचित मंगलगीतम - श्रितकमलाकुचमण्डल. . . भी मुद्रित है।
जय श्री राम

Monday, September 17, 2012

हरतालिका तीज की कथा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला अखंड सौभाग्य की कामना का व्रत हरतालिका तीज की कथा इस प्रकार से है-
कथानुसार मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया. इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया. कई अवधि तक शूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही व्यतीत किया. माता पार्वती के इस अवस्था को देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे.
इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती के विवाह का प्रस्ताव लेकर मां पार्वती के पिता के पास पहुंचे, जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया. पिता ने जब मां पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वह बहुत दुखी हो गई और जोर-जोर से विलाप करने लगी. फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वह यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं. तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गई और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की अराधना में लीन हो गई.
भाद्रपद तृतीया शुक्ल के हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया. तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया और फिर माता के इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया.
मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वह अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं

Sunday, September 16, 2012

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी का चातुर्मास महोत्सव


जगदगुरु रामानन्दाचार्य पद पर प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज
के सान्निध्य में प्रयाग अर्थात इलाहाबाद में दिनांक ३ जुलाई २०१२ आषाढ़ पूर्णिमा से दिव्य चातुर्मास महोत्सव जारी है।इस दौरान कई तरह की मांगलिक प्रवृतियां समायोजित हो रही हैं। पूरे अनुष्ठान का विधिवत समापन ३० सितम्बर २०१२ को भाद्र पूर्णिमा के दिन होगा।
उल्लेखनीय है कि गंगा, यमुना के संगम की पावन धर्म नगरी प्रयाग आदि जगदगुरु रामानन्दाचार्य की जन्मस्थली है, अत: यहां जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के चातुर्मास का अति विशेष महत्व है। तीर्थराज प्रयाग के ठाकुर हरित माधव मंदिर, ४५/४२, मोरी दारागंज की पावन स्थली पर जिसे जगदगुरु रामानंदाचार्य जी की प्राकट्य स्थली के नाम से जाना जाता है,उसी पावन स्थान पर स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज अपनी साधु-संत मंडली के साथ ९० दिनों तक विराजमान रहेंगे। इन नब्बे दिनों के दौरान अनेक धार्मिक कार्यक्रम नियमित रूप से होंगे, तो कुछ विशेष व दुर्लभ धार्मिक आयोजन भी होंगे। हिन्दू संतों में चातुर्मास की परंपरा का एक तरह से लोप हो गया था, जिसे स्वामी रामनरेशाचार्य जी ने एक तरह से पुनजीर्वित किया है, जिसे वे पूरे भक्ति, भाव निरंतर मनाते आ रहे हैं। इस दौरान वे संतों के साथ-साथ आम जनों को भी सहज उपलब्ध होते हैं, सुबह से देर रात तक भक्तों की शंकाओं का समाधान करते, उन्हें सच्ची रामभक्ति का मार्ग बताते जगदगुरु एक अदभुत, व्यापक व दुर्लभ छवि प्रस्तुत करते हैं। पिछले वर्ष आपने इन्दौर में चातुर्मास किया था और उसके पहले वर्ष सूरत में, वे भारत में घूम-घूमकर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रामभक्ति की अलख जगाते रहे हैं। उनके चातुर्मास में देश भर से विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान भी जुटते रहे हैं।इसी कड़ी में विद्वतजन गोष्ठी और धर्माचार्य सम्मेलन, दलित सम्मेलन सरीखे कार्यक्रम भी हुए। बीते 2 सितम्बर को पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय द्वारा लिखित और संपादित पुस्तक दुख क्यों होता है का लोकार्पण भी हुआ। लोकार्पण समारोह के दौरान देश के जाने-माने पत्रकार रामबहादुर राय और प्रसिद्ध समाचार वाचक डॉ. बलदेवानंद सागर की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। दिनांक 16 सितम्बर को प्रयाग के संगम तट पर महाराजश्री के सानिध्य में श्रीमठ परिवार की ओर से महाभंडारे का आयोजन किया गया। इस मौके पर भव्य आरती और पूजन भी हुआ। आचार्यश्री ने संगम तट पर तीर्थ पुरोहितों और नाविको को दान-दक्षिणा भी प्रदान किया। जगदगुरु को अपने बीच पाकर वे अपने को गौरवान्वित महसूस करते नजर आए.

Tuesday, February 28, 2012

हनुमान चालीसा में चालीस दोहे ही क्यों हैं?


श्रीराम के परम भक्त हनुमानजी हमेशा से ही सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवताओं में से एक हैं। शास्त्रों के अनुसार माता सीता के वरदान के प्रभाव से बजरंग बली को अमर बताया गया है। ऐसा माना जाता है आज भी जहां रामचरित मानस या रामायण या सुंदरकांड का पाठ पूरी श्रद्धा एवं भक्ति से किया जाता है वहां हनुमानजी अवश्य प्रकट होते हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए बड़ी संख्या श्रद्धालु हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हनुमान चालिसा में चालीस ही दोहे क्यों हैं?

केवल हनुमान चालीसा ही नहीं सभी देवी-देवताओं की प्रमुख स्तुतियों में चालिस ही दोहे होते हैं? विद्वानों के अनुसार चालीसा यानि चालीस, संख्या चालीस, हमारे देवी-देवीताओं की स्तुतियों में चालीस स्तुतियां ही सम्मिलित की जाती है। जैसे श्री हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा आदि। इन स्तुतियों में चालीस दोहे ही क्यों होती है? इसका धार्मिक दृष्टिकोण है। इन चालीस स्तुतियों में संबंधित देवता के चरित्र, शक्ति, कार्य एवं महिमा का वर्णन होता है। चालीस चौपाइयां हमारे जीवन की संपूर्णता का प्रतीक हैं, इनकी संख्या चालीस इसलिए निर्धारित की गई है क्योंकि मनुष्य जीवन 24 तत्वों से निर्मित है और संपूर्ण जीवनकाल में इसके लिए कुल 16 संस्कार निर्धारित किए गए हैं। इन दोनों का योग 40 होता है। इन 24 तत्वों में 5 ज्ञानेंद्रिय, 5 कर्मेंद्रिय, 5 महाभूत, 5 तन्मात्रा, 4 अन्त:करण शामिल है। सोलह संस्कार इस प्रकार है- 1. गर्भाधान संस्कार,2. पुंसवन संस्कार,3. सीमन्तोन्नयन संस्कार,४। जातकर्म संस्कार,5। नामकरण संस्कार ,6। निष्क्रमण संस्कार,7। अन्नप्राशन संस्कार ,८ चूड़ाकर्म संस्कार,9। विद्यारम्भ संस्कार ,10। कर्णवेध संस्कार,11।यज्ञोपवीत संस्कार ,12 वेदारम्भ संस्कार,13. केशान्त संस्कार ,14. समावर्तन संस्कार ,15. पाणिग्रहण संस्कार ,16. अन्त्येष्टि संस्कार

भगवान की इन स्तुतियों में हम उनसे इन तत्वों और संस्कारों का बखान तो करते ही हैं, साथ ही चालीसा स्तुति से जीवन में हुए दोषों की क्षमायाचना भी करते हैं। इन चालीस चौपाइयों में सोलह संस्कार एवं 24 तत्वों का भी समावेश होता है। जिसकी वजह से जीवन की उत्पत्ति है।

साभार-भास्कर दैनिक

Wednesday, February 15, 2012

स्वामी रामनरेशाचार्य का आलेख

असली मठ
कुछ वर्ष पहले दिल्ली मे विशाल मंदिर अक्षरधाम बना, कई बड़े-बड़े नेता आए, राष्ट्रपति आए और कहा गया कि यह देश का एक बड़ा पर्यटन स्थल होगा। यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे कोई किसी दूल्हे को कहे कि तुम्हारी नाक टेढ़ी है, तू बड़ा कुरूप लगता है, अगर दूल्हे के संग बाराती दमदार हुए, तो वे उसे बिना मारे नहीं छोड़ेंगे। दूल्हा विष्णु होता है, उसकी नाक टेढ़ी होती है क्या? यदि मैं दूल्हा होता और ऎसे कोई मुझे बोलता, तो शादी होती न होती, जेल भले चले जाता, लेकिन बिना मारे नहीं छोड़ता! नेताओं ने मंदिर को कहा कि देश का बड़ा भारी पर्यटन स्थल बन गया।

वो शंकराचार्य कैसे थे, जिन्होंने चार मठों की स्थापना की, जिन्हें दुनिया सबसे बड़ा मठ मानती है। विशाल बगीचा लगा देने से, खूब सजा देने से या आलीशान भवन बना देने से मठ नहीं बनते। जहां सत्य चिंतन हो, जहां संयम, नियम सिखलाया जाए और शास्त्रों का अध्ययन कराया जाए, उसे मठ कहते हैं। मठ में केवल मंदिर से नहीं चलेगा, मठ केवल गोशाला से नहीं चलेगा। मठ का अपना स्वरूप है, विद्यालय वहां न हो तो कोई बात नहीं, वहां जो बड़े संत होते हैं, उनके पास बैठकर जिज्ञासाएं शांत होती हैं, जिन्हें देखकर ही शांति मिलती है, भक्ति भाव उत्पन्न होता है, ऎसा हो, तभी मठ बनता है। जहां अध्यात्म शास्त्र के जिज्ञासुओं को रखा जाए, धर्म शास्त्र पढ़ाया-सिखाया जाए, भोजन कराया जाए, वह ही असली मठ है।
- स्वामी रामनरेशाचार्य
साभार - राजस्थान पत्रिका

swami ramnareshacharya image




गुरुवर swami ramnareshacharya की कुछ पुरानी तस्वीरें





Sunday, January 29, 2012

ज्योतिष सम्मेलन में स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज

ज्योतिष में शोधपरक कार्य की जरूरत : रामनरेशाचार्य

Updated on: Sat, 21 Jan 2012 09:16 PM (IST)
Share:

ज्योतिष में शोधपरक कार्य की जरूरत : रामनरेशाचार्य

जागरण संवाददाता, इलाहाबाद : बिना किसी औषधि के ज्योतिष के माध्यम से जटिल रोगों का किये जा रहे उपचार से सारा विश्व आश्चर्यचकित है। आज ज्योतिष के ज्ञान को सीमित दायरे से हटाकर शोधपरक करने की जरूरत है, ताकि उससे पूरे विश्व की समस्याओं का समाधान हो सके। यह विचार रामानन्दाचार्य जगद्गुरु रामनरेशाचार्य ने शनिवार को भारतीय विद्या भवन में आई कास द्वारा संचालित ज्योतिष कक्षाओं के सत्रारम्भ एवं उत्तीर्ण छात्रों के लिए आयोजित दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए।

अध्यक्षता कर रहे डीआइजी स्थापना लालजी शुक्ल ने कहा कि ज्योतिष ऐसा प्रकाश है जिससे केवल मनुष्य की समस्याएं ही नहीं बल्कि उसके अंत:करण का अज्ञान दूर होता है। देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि ज्योतिष के बिना अन्य शास्त्रों का ज्ञान भी अधूरा है। आचार्य अविनाश राय ने ग्रहों का आंकलन कर बताया कि आने वाले चुनाव में अशांतिमय की स्थिति रहेगी। आचार्य त्रिवेणी प्रसाद त्रिपाठी ने ज्योतिष के शोधपूर्ण अध्ययन पर जोर दिया। भारतीय विद्या भवन के निदेशक व आई कास के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा.रामनरेश त्रिपाठी ने ज्योतिष शिक्षा के लिए किये जा रहे कार्यो पर प्रकाश डाला। आशुतोष वाष्र्णेय ने स्वागत व संचालन ज्योतिर्विद गुंजन वाष्र्णेय ने किया। चार वर्षीय कृति वाष्र्णेय ने ग्रह नक्षत्रों की जानकारी दी। समारोह में उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

Sunday, January 22, 2012

स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज जन्मदिन जयपुर में..

रामानंद संप्रदाय के प्रमुख व देश की शास्त्र परंपरा के शिखर मनीषी जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामनरेशाचार्य जी महाराज,श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी का पावन जन्मदिन महोत्सव इस बार जयपुर में समायोजित है। वसंत पंचमी के पावन सुअवसर पर आप सादर आमंत्रित हैं।

Sunday, January 15, 2012

रामानंदाचार्य पुरस्कार वितरण समारोह के चित्र





डॉ.विवेकी राय को जगदगुरु रामानंदाचार्य पुरस्कार

वाराणसी। जगदगुरु रामानंदाचार्य जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय समारोह का श्रीगणेश शनिवार को धर्माचार्यों के सानिध्य में हुआ। प्रथम दिन पियरी स्थित श्रीमठ की शाखा श्रीविहारम परिसर में आयोजित सम्मान समारोह में हिंदी और भोजपुरी की स्वनामधन्य साहित्यकार डा. विवेकी राय को रामानंदाचार्य सम्मान से विभूषित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गई।

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य एवं गोपाल मंदिर के षष्ठपीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज के सानिध्य में साहित्यसेवी डा. विवेकी राय को सम्मानित किया गया। स्वामी रामनरेशाचार्य ने उनका तिलक कर एक लाख की राशि का चेक प्रदान किया तो श्याममनोहर महाराज ने उन्हें प्रशस्तिपत्र प्रदान किया।

जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कार्य करने वाले नगर के 22 साहित्यसेवियों का भी समारोह में अभिनंदन किया गया। इनमें प्रो. बलराम पांडेय, डा. राममूर्ति चतुर्वेदी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डा. जितेंद्रनाथ मिश्र, डा. रणजीत सिंह, डा. जगदीश त्रिपाठी, डा. जगदीश प्रसाद मिश्र, परमानंद आनंद, प्रो. अरविंद पांडेय, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डा. पवनकुमार शास्त्री, डा. बलबीर सिंह, डा. समुन जैन, डा. ऋचा सिंह, बृजेश पांडेय के अलावा इटैलियन युवती दानिएला बेवीलाकुवा शामिल हैं। समारोह में संतद्वय के आशीर्वचन से पूर्व प्रो. युगेश्वर, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. बंशीधर त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए।समारोह का संचालन डा. यूपी सिंह ने किया।


साहित्यकार होने का अहंकार है मुझे
वाराणसी। मैं गरीब साहित्यकार हूं। मेरे पास कार नहीं है लेकिन साहित्यकार होने का अहंकार जरूर है। किंतु आज इस सभा में उस अहंकार को भी गाजीपुर में ही छोड़ कर आया हूं। यह बातें सम्मान से अभिभूत डा. विवेकी राय ने शनिवार को श्रीविहारम में आयोजित समारोह में कहीं। उन्होंने पुराने संस्मरण भी सुनाए। बताया, मुझे याद आता है दिल्ली का वह समारोह जब श्रीरामनरेशाचार्य महाराज के सानिध्य मेें समारोह हो रहा था। उनके आदेश पर पहले मुझे रामनामी ओढ़ाई गई। कुछ देर बाद ही रामनामी की जगह एक कीमती शाल ओढ़ा दी गई। मुझे लगा, शायद अभी मैं वैराग्य के योग्य नहीं हुआ हूं। पूरी तरह संसारी हूं इसलिए रामनामी लेकर शाल दी गई है। अब आप फिर मुझे माया सौंप रहे हैं। कम से कम अब तो मुझे राम नाम का महामंत्र दे ही दीजिए।

Tuesday, November 1, 2011

यज्ञो वै रामः


जबलपुर में शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ

* डॉ. देवकुमार पुखराज

--------------------------------------------------------------------------------------

परमेश्वर के द्वारा उत्पादित एवम् पालित सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उत्पादन मानव जीवन है, ऐसी दृढ़भावना वैदिकों तथा वेद ब्रह्मों की भी है। ब्रह्मा का अंश होने के कारण जीव विशेषकर मानव सतत विकास के लिए प्रयासरत है। विकास की चरम परिणति विकसित भोजन,मकान तथा वस्त्रादि हीं नहीं हैं अपितु श्रीराम भाव की प्राप्ति है, इससे रहित विकास की आंधी ने मानव जीवन को राक्षसी जीवन के निर्माण तक पहुंचा दिया है। विकास वरदान के बदले अभिशाप बन गया है।

सृष्टिकर्ता प्रभु ने वेदों तथा वेदानुकूल शास्त्रों को मानव विकास के लिए प्रदान किया था। हम सभी वेदानुमोदित मार्ग से अपने विकास को चरण बिन्दु तक पहुंचायें। सम्पूर्ण शास्त्रों का सार सर्वस्व है-धर्म। यहीं मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता को वस्तुतः सार्थकता प्रदान करता है। यह धर्म हीं अभ्युदय (लौकिक उन्नति) एवं निः श्रेयस( मोक्ष) का परम साधन है। उसी धर्म की संस्थापना के लिए परम प्रभु श्रीराम जीवन धारण करते हैं । वे अपनी प्रथम यात्रा विश्वामित्र के साथ धर्म रक्षा के लिए हीं करते हैं। वैसे भी धर्म का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप यज्ञ है। भगवान वेद ने भी मानवों के लिए यज्ञ का विधान किया था। जो अतुलनीय तथा विकल्प रहित मानव जीवन की सम्पूर्णता का सर्वश्रेष्ठ साधन है ,लेकिन अज्ञान,दम्भ तथा पापों के बाहुल्य के चलते लोग उसे छोड़ते चले गये तथा कलांतर में पतन के महागर्त में अवस्थित हो गये।

परमप्रभु श्रीराम ने अपने अवतार के सम्पूर्ण 33 हजार वर्षों के एक-एक क्षण का उपयोग धर्म संस्थापना के लिए किया, जिसके माध्यम से अनादि एवं विशालतम सृष्टि में अनुपम रामराज्य प्रकट हो सका, जो संसार के लिए परम आदर्शभूत तथा प्रेरणाभूत पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा। यह निर्विवाद सत्य है कि सुख का कारण तो केवल औऱ केवल धर्म हीं है। धर्म के वगैर श्रद्धा-प्रेम-वैराग्य ज्ञानादि कोई भी कल्याणकारी भाव प्रकट हीं नहीं होते।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए रामभक्ति परंपरा और रामानंद सम्प्रदाय के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी ने वैदिक यज्ञों की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास तेज किया है। वर्तमान रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज देश के सभी प्रमुख शहरों और गांवों तक में श्रीराम महायज्ञ करने के लिए संकल्पित हैं। इसकी शुरूआत काशी से हुई थी। साल 2009 में चण्डीगढ़ में भव्य श्रीराम यज्ञ संपादित हुआ और इसी कड़ी में नया नाम संस्कारधानी के रूप में विख्यात जबलपुर का भी जुड़ गया है। जबलपुर के जिलेहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम में शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है। मां नर्मदा के पावन तट पर 29 अक्टूबर से 4 नवम्बर तक होने वाले श्रीराम महायज्ञ को लेकर देश भर से साधु,संत, भगवद्प्रेमी श्रद्धालु जबलपुर पहुंचे हैं। जगदगुरु शंकराचार्य की परंपरा में दीक्षित परमसिद्ध संत स्वामी प्रेमानंद जी द्वारा स्थापित प्रेमानंद आश्रम अपने आरंभिक काल से हीं भगवान श्रीराम की अर्चा, रामायण गान, संतों-नर्मदा परिक्रमावासियों तथा अभ्यागतों को अन्नदान एवम् विभिन्न वैदिक तथा स्मार्त समायोजनों के द्वारा निरंतर श्रीरामभाव के सृजन में समर्पित रहा है। स्वामीजी ने अपने सत्प्रयासों से असंख्य लोगों के जीवन को राममयता प्रदान की। उसी परम मंगलमयी श्रीराम धारा को विशालतम रूप में प्रकट करने और राम राज्य को विस्तार देने के लिए श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है।

कार्तिक मास में पहली बार मां नर्मदा के पावन तट पर हो रहे इस अद्वितीय यज्ञ के लिए सात मंजिले विशाल यज्ञमंडप बनाया गया है। जिसमें सौ आहुतियों के लिये सौ कुण्ड बनाये गये हैं। वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार सौ कुण्ड और एक करोड़ आहुतियां हीं अधिकाधिक रूप में मान्य हैं। कार्तिक शुक्ल तृतीया से आरंभ होकर नवमीं तक चलने वाले महायज्ञ का आरंभ जलभरी शोभायात्रा से हुई। शाम में विशाल मंच से श्रीराम कथा का रसास्वादन उपस्थित जनसमुदाय ने किया। सुबह से हीं पूरा वातावरण वेद ऋचाओं के पाठ से गुंजायमान था। बीच-बीच में सुप्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न विस्मिलाह खान के वंशजों द्वारा बजाई जा रही शहनाई पूरे माहौल में रस घोल दे रही थी। संध्या में वाराणसी से आई चर्चित कत्थक नृत्यांगना ममता की मंडली ने अपने भक्ति गीतों और भावनृत्यों से समां बांध दिया। देर रात तक अयोध्याजी से आई श्रीरामलीला मंडली ने वातावरण को श्रीराममय बनाये रखा।

श्रीराम महायज्ञ के मुख्य यजमान अतुल तिवारी ने बताया कि एक करोड़ आहुतियों के साथ-साथ वेद की सभी शाखाओं का पाठ,सभी पुराणों तथा सभी रामायणों का पाठ, श्रीरामनाम संकीर्तन, सुप्रसिद्ध मंडली द्वारा श्रीरामलीला का मंचन, विशिष्ट विद्वानों तथा आचार्यों का सम्मेलन, संतों,श्रीमहंतों,ब्राह्मणों तथा भक्तों के लिए भण्डारा तथा श्रीराम संगीत महायज्ञ जैसे अनुष्ठान सम्पादित होने वाले हैं।

-इति--