Tuesday, November 1, 2011

यज्ञो वै रामः


जबलपुर में शतमुख कोटिहोमात्मक श्रीराम महायज्ञ

* डॉ. देवकुमार पुखराज

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परमेश्वर के द्वारा उत्पादित एवम् पालित सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उत्पादन मानव जीवन है, ऐसी दृढ़भावना वैदिकों तथा वेद ब्रह्मों की भी है। ब्रह्मा का अंश होने के कारण जीव विशेषकर मानव सतत विकास के लिए प्रयासरत है। विकास की चरम परिणति विकसित भोजन,मकान तथा वस्त्रादि हीं नहीं हैं अपितु श्रीराम भाव की प्राप्ति है, इससे रहित विकास की आंधी ने मानव जीवन को राक्षसी जीवन के निर्माण तक पहुंचा दिया है। विकास वरदान के बदले अभिशाप बन गया है।

सृष्टिकर्ता प्रभु ने वेदों तथा वेदानुकूल शास्त्रों को मानव विकास के लिए प्रदान किया था। हम सभी वेदानुमोदित मार्ग से अपने विकास को चरण बिन्दु तक पहुंचायें। सम्पूर्ण शास्त्रों का सार सर्वस्व है-धर्म। यहीं मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठता को वस्तुतः सार्थकता प्रदान करता है। यह धर्म हीं अभ्युदय (लौकिक उन्नति) एवं निः श्रेयस( मोक्ष) का परम साधन है। उसी धर्म की संस्थापना के लिए परम प्रभु श्रीराम जीवन धारण करते हैं । वे अपनी प्रथम यात्रा विश्वामित्र के साथ धर्म रक्षा के लिए हीं करते हैं। वैसे भी धर्म का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप यज्ञ है। भगवान वेद ने भी मानवों के लिए यज्ञ का विधान किया था। जो अतुलनीय तथा विकल्प रहित मानव जीवन की सम्पूर्णता का सर्वश्रेष्ठ साधन है ,लेकिन अज्ञान,दम्भ तथा पापों के बाहुल्य के चलते लोग उसे छोड़ते चले गये तथा कलांतर में पतन के महागर्त में अवस्थित हो गये।

परमप्रभु श्रीराम ने अपने अवतार के सम्पूर्ण 33 हजार वर्षों के एक-एक क्षण का उपयोग धर्म संस्थापना के लिए किया, जिसके माध्यम से अनादि एवं विशालतम सृष्टि में अनुपम रामराज्य प्रकट हो सका, जो संसार के लिए परम आदर्शभूत तथा प्रेरणाभूत पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा। यह निर्विवाद सत्य है कि सुख का कारण तो केवल औऱ केवल धर्म हीं है। धर्म के वगैर श्रद्धा-प्रेम-वैराग्य ज्ञानादि कोई भी कल्याणकारी भाव प्रकट हीं नहीं होते।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए रामभक्ति परंपरा और रामानंद सम्प्रदाय के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,पंचगंगा घाट,काशी ने वैदिक यज्ञों की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास तेज किया है। वर्तमान रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज देश के सभी प्रमुख शहरों और गांवों तक में श्रीराम महायज्ञ करने के लिए संकल्पित हैं। इसकी शुरूआत काशी से हुई थी। साल 2009 में चण्डीगढ़ में भव्य श्रीराम यज्ञ संपादित हुआ और इसी कड़ी में नया नाम संस्कारधानी के रूप में विख्यात जबलपुर का भी जुड़ गया है। जबलपुर के जिलेहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम में शतमुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है। मां नर्मदा के पावन तट पर 29 अक्टूबर से 4 नवम्बर तक होने वाले श्रीराम महायज्ञ को लेकर देश भर से साधु,संत, भगवद्प्रेमी श्रद्धालु जबलपुर पहुंचे हैं। जगदगुरु शंकराचार्य की परंपरा में दीक्षित परमसिद्ध संत स्वामी प्रेमानंद जी द्वारा स्थापित प्रेमानंद आश्रम अपने आरंभिक काल से हीं भगवान श्रीराम की अर्चा, रामायण गान, संतों-नर्मदा परिक्रमावासियों तथा अभ्यागतों को अन्नदान एवम् विभिन्न वैदिक तथा स्मार्त समायोजनों के द्वारा निरंतर श्रीरामभाव के सृजन में समर्पित रहा है। स्वामीजी ने अपने सत्प्रयासों से असंख्य लोगों के जीवन को राममयता प्रदान की। उसी परम मंगलमयी श्रीराम धारा को विशालतम रूप में प्रकट करने और राम राज्य को विस्तार देने के लिए श्रीराम महायज्ञ का समायोजन किया गया है।

कार्तिक मास में पहली बार मां नर्मदा के पावन तट पर हो रहे इस अद्वितीय यज्ञ के लिए सात मंजिले विशाल यज्ञमंडप बनाया गया है। जिसमें सौ आहुतियों के लिये सौ कुण्ड बनाये गये हैं। वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार सौ कुण्ड और एक करोड़ आहुतियां हीं अधिकाधिक रूप में मान्य हैं। कार्तिक शुक्ल तृतीया से आरंभ होकर नवमीं तक चलने वाले महायज्ञ का आरंभ जलभरी शोभायात्रा से हुई। शाम में विशाल मंच से श्रीराम कथा का रसास्वादन उपस्थित जनसमुदाय ने किया। सुबह से हीं पूरा वातावरण वेद ऋचाओं के पाठ से गुंजायमान था। बीच-बीच में सुप्रसिद्ध शहनाई वादक भारत रत्न विस्मिलाह खान के वंशजों द्वारा बजाई जा रही शहनाई पूरे माहौल में रस घोल दे रही थी। संध्या में वाराणसी से आई चर्चित कत्थक नृत्यांगना ममता की मंडली ने अपने भक्ति गीतों और भावनृत्यों से समां बांध दिया। देर रात तक अयोध्याजी से आई श्रीरामलीला मंडली ने वातावरण को श्रीराममय बनाये रखा।

श्रीराम महायज्ञ के मुख्य यजमान अतुल तिवारी ने बताया कि एक करोड़ आहुतियों के साथ-साथ वेद की सभी शाखाओं का पाठ,सभी पुराणों तथा सभी रामायणों का पाठ, श्रीरामनाम संकीर्तन, सुप्रसिद्ध मंडली द्वारा श्रीरामलीला का मंचन, विशिष्ट विद्वानों तथा आचार्यों का सम्मेलन, संतों,श्रीमहंतों,ब्राह्मणों तथा भक्तों के लिए भण्डारा तथा श्रीराम संगीत महायज्ञ जैसे अनुष्ठान सम्पादित होने वाले हैं।

-इति--

Monday, October 24, 2011

श्रीमठ संगीत महोत्सव आरंभ

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शरद पूर्णिमा पर सुर ताल की महफिल
First Published: 01-11-10 12:08 AM
Last Updated: 01-11-10 12:13 AM
रवींद्र मिश्र
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कहते हैं भगवान की आराधना में संगीत का उद्गम मंदिरों के परिसर में हुआ। इस समय संगीत की प्राचीन सनातन परंपरा को जीवंत करने में कई धार्मिक संस्थान और मठ सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनमें वाराणसी के श्रीमठ के रामनरेशाचार्य हैं।

उन्होंने स्पीकमैके के सहयोग से भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का भव्य श्रीमठ संगीत महोत्सव बनारस के पंचगंगा घाट पर शरदपूर्णिमा की रात को आयोजित करते रहे है। चंदा की चांदनी के मुक्ताकाश में गंगा के किनारे संगीत के स्वरों और जलधारा की लहरों का जो तारतम्य जुड़ रहा था, उसके रसपान की अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं, बल्कि वहां उपस्थित रह कर ही की जा सकती है।

मंगलाचरण के रूप शंखनाद और श्लोक उच्चारण से श्रीमठ संगीत महोत्सव का आरंभ हुआ। समारोह में संगीत की शुरुआत मशहूर संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने राग मारवा से की। कश्मीर घाटी में सोपोरी परिवार का संतूर से गहरा रिश्ता है। भजन जी ने इस वादन में अपनी एक अलग शैली इजाद की है। उन्होंने इस सपाट तारों के वाद्य में ध्रुपद अंग को जोड़ने में एक उल्लेखनीय काम किया है।

राग मारवा ध्रुपद का बहुत प्रभावी राग है, उसी ध्रुपद अंग के चलन में इस राग को रंजकता से भजन सोपोरी ने प्रस्तुत किया। तीनताल में निबद्ध राग पूरिया कल्याण की दो बंदिशों को पेश करने में उनका अंदाज बड़ा सरस था। उनके साथ तबले पर अकरम ने भी अपनी थिरकती उंगलियों का जादू दिखाया।

ध्रुपद में डागरवाणी के वरिष्ठ उस्ताद रहीम फहीमउद्दीन डागर ने राग चंद्रकौंस को आलाप में विस्तार से पेश करते राग की परत-दर-परत को बड़ी संजीदगी से खोला। इसके रागात्मक रूप में तांडव और लास्य दोनों का मर्मस्पर्शी भाव उनके गायन में प्रगट हुआ। प्रवीण आर्य की पखावज संगत पर सुर और ताल का बेजोड़ मेल इस प्रस्तुति में था। राग धमार और तोड़ी की प्रस्तुति में ध्रुपद का दुर्लभ चलन उनके गायन में दिखा।

भरतनाट्यम की सुपरिचित नृत्यांगना गीता चंद्रन का वर्चस्व नृत्य के हर पक्ष में नज़र आया। इस महोत्सव में उन्होंने अपनी शिष्याओं के साथ परंपरागत भरतनाट्यम को सरसता से प्रस्तुत किया। राग हंसध्वनि में निबद्ध मल्लारी में शिव और कृष्ण के लालित्य रूपों को नृत-नृत्य अभिनय से दर्शाने में एक सुंदर संकल्पना गीता की थी।

गीता चंद्रन द्वारा भक्तिभाव में पंचाक्षर स्त्रोत की प्रस्तुति के बाद शरद ऋतु में कृष्ण और गोपियों के महारास को इस नृत्य शैली में जिस जीवंतता और मोहकता से गीता और उनकी शिष्याओं ने प्रस्तुत किया, वह वाकई में रोमांचित करने वाला था। बनारस की गिरजा देवी ने ठेठ बनारसी रंग में ठुमरी और दादरा अपनी शिष्या मालिनी अवस्थी और शुचिता के साथ प्रस्तुत किया।

गंगा, श्रीगणेश, पार्वती की स्तुति और राग यमन कल्याण की शुद्ध रागदारी में विलंबित और छोटा खयाल गाने के बाद मिश्र खमाज में ठुमरी शुरू करते ही उन्होंने समां बांध दिया। बंदिश सांवरिया को देखे बिना नाही चैन’ गायन में नायिका के मनोभावों की अभिव्यक्ति में बनारसी बोली की चाशनी उनके स्वरों में चढ़कर बह रही थी। ताल दादरा की लहकती लय में उन्होंने दो रचनाओं को हमेशा की तरह अपने अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया।

रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खां ने अपने बेटे अली जकी हैदर के साथ बीनकारी अंग में राग दरबारी कन्हरा को अपने अनूठे अंदाज में गहराई से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन 102 साल के बुजुर्ग और प्राचीन गायकी के गवाह उस्ताद अब्दुल रशीद खां ने अपने रचित राग नर पंचम, सावनी विहाग तराना, ठुमरी, भजन आदि की प्रस्तुति से किया। गायन में उनकी एक अलग ही शैली नजर आ रही थी

श्रीमठ संगीत महोत्सव संपन्न

सुरसरि के तट पर सुरों की सरिता
( श्रीमठ संगीत महोत्सव का समापन)

वाराणसी। उत्तर और दखिण की दो संगीत धाराओं का मिलन गुरुवार की रात्रि में सुरसरि के तट पर हुआ। कश्मीर की वादियों में अखरोट की खूंटियों के स्नेहित स्पर्श से मुखर होने वाले साज संतूर से पं. शिव प्रसाद शर्मा ने सुरों की सरिता प्रवाहित की। तो इससे पहले कर्नाटक के पं. जयतीर्थ मेवुंडी ने कंठ संगीत के माध्यम से काशी के श्रोताओं को कायल किया।
यह सब हुआ श्रीमठ संगीत समारोह की समापन निशा में। गोजागरी पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय संगीत समारोह की अंतिम निशा में पं. शिवकुमार शर्मा के संतूर का जादू श्रोताओं के सिर चढ़ कर बोला। खिली चांदनी में नहाई रात में जब सुकोमल वाद्य संतूर पर पं. शिवकुमार शर्मा की अंगुलियों का जादू श्रोताओं के लिए यादगार बन गया। उन्होंने राग कौशिक कान्हड़ा से वादन की शुरुआत की। तीन बंदिशें और अंत में पहाड़ी धुन बजाई। एक बंदिश रूपक ताल में जबकि शेष दो रचनाएं तीन ताल में निबद्ध थीं। इससे पूर्व कर्नाटक के किरानिया गायक पं. जयतीर्थ मेवुंडी का गायन हुआ। उन्होंने अपने दादागुरु पं. भीमसेन जोशी द्वारा विरचित रागकलाश्री की अवतारण की। बंदिश के बोल थे धन धन भाग सुहाग तेरे...। इससे पूर्व विलंबित एक ताल में आज सुवन आए और द्रुत तीन ताल में बहुत दिन बीते सुना कर श्रोताओं को अपने वश में कर लिया। राग मिश्र पीलू में उस्ताद अब्दुल करीब खां साहब की बंदिश सोच समझ नाराद में आलापचारी और चैनदारी दोनों ही निखर कर सामने आई। उनके साथ सारंगी पर पं. संतोष मिश्र ने लहरा दिया तो तानपुरा पर सरोज शर्मा, तबला पर किशन राम डोहकर और हारमोनियम पर आशोक झा ने संगत की। जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज के सानिध्य में संपूर्ण आयोजन अपनी पूर्णता को प्राप्त हुआ।

अब घाट-घाट पर बजाने का मजा मिला-पं.शिवकुमार मिश्र

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वाराणसी। अब तक काशी के कई मंदिरों में बजाया। गंगा महोत्सव में घाट पर बजाया। अब श्रीमठ के आयोजन में शामिल होने के बाद मैं कह सकता हूं कि मैंने काशी के घाट-घाट पर संतूरवादन का सुख लिया है। यह अभिव्यक्ति है पं. शिवकुमार शर्मा की जो गुरुवार को पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ की ओर से आयोजित संगीत समारोह में सहभागिता करने आए थे। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत की ओर युवाओं का रुझान कम नहीं हुआ है। स्पीक मैके के आयोजनों की तेजी से विस्तृत होती शृंखला इस बात का एक उदाहरण है। ऐसे कई उदाहरण हमारे आसपास भरे पड़े हैं। हां इतना अवश्य है कि युवा पीढ़ी में धीरज की कमी है। कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो अधिकतर में यह अभाव खटकता है। रातों रात छा जाने की तमन्नाओं को रियलिटी शो ने और भी परवान चढ़ाया है।

सौजन्य- अमर उजाला

: Friday, October 14, 2011

जबलपुर में श्रीराम महायज्ञ

रामभक्ति परंपरा और रामानंद सम्प्रदाय के एकमात्र मूल आचार्यपीठ श्रीमठ काशी यूं तो वर्षभर कोई न कोई मांगलिक आयोजन करते हीं रहता है। अभी काशी में तीन दिवसीय शरद सांस्कृतिक महोत्सव संपन्न हुए चंद दिन हीं बीते थे कि आचार्यश्री अब जबलपुर में होने जा रहे शतकोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ की तैयारी में जुट गये हैं। जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामीश्री रामनरेशाचार्यजी महाराज के पावन सानिध्य में जबलपुर के जिलहरी घाट पर होने वाले इस महायज्ञ की तैयारियां अब अंतिम चरण में हैं। मां नर्मदा के तट पर 29 अक्टूबर से आरंभ होकर ये यज्ञ 4 नवम्बर को पूर्ण होगा। एक दिन पहले यानि 28 अक्टूबर को हीं भव्य शोभायात्रा का समायोजन किया गया है। कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ में भाग लेने के लिए देश भर से साधु-संत,प्रवचनकर्ता, याज्ञिक पंडित और श्रद्धालु आने वाले हैं। आयोजकों ने इस निमित्त खास प्रबंध किये हैं।
श्रीराम महायज्ञ में कोटि देवताओं का आवाहन किया जाएगा। सामूहिक भंडारे का कार्यक्रम अनवरत ढंग से चलेगा। संत पुरुषों के श्रीमुख से ज्ञानगंगा की रसधारा बहेगी। जबलपुर और उसके आसपास के श्रीराम भक्तों और रामानंदी वैष्णव संतों को इस आयोजन का इंतजार है। उन्हें देश भर से आने वाले संत-महात्माओं के दर्शन और पूजन का एक साथ लाभ प्राप्त होगा , साथ हीं यज्ञीय कर्मकांडों में शामिल होकर जीवन को परम धन्य बनाने का सुअवसर भी प्राप्त हो जाएगा। आइए हम इस यज्ञ के सफल आयोजन के लिए परम प्रतापी प्रभु श्रीराम का आह्वान करें और इस यज्ञ में तन-मन-धन से शामिल होकर अपने जीवन को सफल बनावें..

Friday, October 7, 2011

प्रभु श्रीराम

राम सिर्फ नाम नहीं



भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार राम सिर्फ एक नाम नहीं अपितु एक मंत्र है, जिसका नित्य स्मरण करने से सभी दु:खों से मुक्ति मिल जाती है। राम शब्द का अर्थ है- मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी, पापियों का नाश करने वाला व भवसागर से मुक्त करने वाला। रामचरित मानस के बालकांड में एक प्रसंग में लिखा है-
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।।

अर्थात कलयुग में न तो कर्म का भरोसा है, न भक्ति का और न ज्ञान का। सिर्फ राम नाम ही एकमात्र सहारा हैं।
कलियुग केवल नाम आधारा, सुमिरि- सुमिरि नर उतरही पारा

स्कंदपुराण में भी राम नाम की महिमा का गुणगान किया गया है-

रामेति द्वयक्षरजप: सर्वपापापनोदक:। गच्छन्तिष्ठन् शयनो वा मनुजो रामकीर्तनात्।।

एडम निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत्।

अर्थात यह दो अक्षरों का मंत्र(राम) जपे जाने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। चलते, बैठते, सोते या किसी भी अवस्था में जो मनुष्य राम नाम का कीर्तन करता है, वह यहां कृतकार्य होकर जाता है और अंत में भगवान विष्णु का पार्षद बनता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो शक्ति भगवान की है उसमें भी अधिक शक्ति भगवान के नाम की है। नाम जप की तरंगें हमारे अंतर्मन में गहराई तक उतरती है। इससे मन और प्राण पवित्र हो जाते हैं, बुद्धि का विकास होने लगता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, मनोवांछित फल मिलता है, सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, मुक्ति मिलती है तथा समस्त प्रकार के भय दूर हो जाते हैं।

Wednesday, October 5, 2011

संस्कृत प्रेमी मेरे आचार्य


संस्कृत का संरक्षण मेरा उद्देश्य-स्वामी रामनरेशाचार्य

बारह साल की उम्र में बिहार के भोजपुर जिले के अपने गांव परसिया छोड़कर साधु बने स्वामी रामनरेशाचार्य संस्कृत में निरंतर लुप्त हो रही हजारों साल पुरानी न्याय दर्शन, वैशेषिक और वैष्णव दर्शन की परंपरा को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं। काशी की विद्वत परंपरा के विद्वान आचार्य बदरीनाथ शुक्ल से 10 वर्षो तक विद्याध्ययन करने के बाद रामनरेशाचार्य ने ऋषिकेश के कैलाश आश्रम में बिना किसी जाति-पांति व वर्ग का भेद किए हजारों विद्यार्थियों व साधुओं को न्याय दर्शन, वैशेषिक मिमांसा और वैष्णव दर्शन पढ़ाया। संस्कृत के दुर्लभ व लगभग अप्राप्त ग्रंथों का प्रकाशन कर रामनरेशाचार्य ने विलुप्त होते अनेक ग्रंथों को भी बचाया है।

अपने जीवन के छह दशक पूरे कर रहे रामनरेशाचार्य काशी में जगद्गुरू रामानंदाचार्य के मुख्य आचार्य पीठ "श्रीमठ" में 1988 से "जगद्गुरू रामानंदाचार्य" के पद पर अभिषिक्त होने के बाद भी अनेक देसी-विदेशी छात्रों को संस्कृत मे निबद्ध भारतीय दर्शन की जटिल शास्त्र प्रक्रिया को निरंतर सहज रूप से पढ़ा रहे हैं। देश के अनेक क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर रामनरेशाचार्य विद्यार्थियों को सारी सुविधाएं भी निशुल्क ही उपलब्ध करवाते हैं। आदिवासी क्षेत्र में रामनरेशाचार्य ने संस्कृत की एक ऎसी अलख जगाई है कि वहां स्थापित विद्यालयों में हजारों छात्र समान रूप से बिना किसी भेद-भाव के संस्कृत पढ़ रहे हैं। संस्कृत भाषा के रक्षक-संरक्षक के रूप में स्वामीवर का नाम पूरी दुनिया में श्रद्धा से लिया जाता है।
साभार-पत्रिका

Tuesday, October 4, 2011

जगदगुरु स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी के कार्यक्रम

आगामी यात्रायें-
६ अक्टूबर को जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज जोधपुर से चलकर सड़क मार्ग से जबलपुर पहुंचेगें, जहां के नर्मदा तट पर जिलहरी घाट स्थित प्रेमानंद आश्रम विशाल यज्ञ की तैयारी चल रही है। महाराजश्री वहां संभवतः ९ अक्टूबर तक विराजेंगे। तदुपरांत वाराणसी के लिए प्रस्थान करेंगे।
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श्रीमठ संगीत महोत्सवः
आगामी 11-12-13 अक्टूबर को काशी के प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर जगदगुरुजी के सानिध्य में शरद पूर्णिमा के पावन सुअवसर पर भव्य शास्त्रीय संगीत सभा का आयोजन होगा। जिसमें विख्यात शास्त्रीय संगीत गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र, राजन-साजन मिश्र सहित अन्य अनेक संगीतज्ञ भाग लेंगे।
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जबलपुर में श्रीराम महायज्ञः
२७ अक्टूबर को जगदगुरु
प्रेमानंदश्रम, जिलहरी घाट, जबलपुर पधारेंगे,
जहाँ २९ अक्टूबर को सत्मुख कोटि होमात्मक श्रीराम महायज्ञ प्रारंभ होगा, जो ४ नवम्बर तक चलेगा.
इस महायज्ञ के यज्ञाचार्य जयपुर के प्रकांड पंडित श्री उमाशंकर शास्त्री जी होंगे. महायज्ञ में बनारस, जयपुर सहित भारत के अनेक राज्यों के २०० से ज्यादा वैदिक एवं पौराणिक विद्वान पंडित भाग लेंगे.

Saturday, September 24, 2011

सनातन घर्म में उपनयन (जनेऊ) का महत्व

क्यों पहनते हैं जनेऊ ...

यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता। अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है। यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है। इसीलिए सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव एसका सदैव धारण करना चाहिए। शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।
यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत। अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के लिए भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान पर से उतारें। इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का हिस्सा अपवित्र माना गया है। दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है। मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है। दाएं कान को ब्रrासूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है। यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है। यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां कान ब्रrासूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है।
बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दाएं कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है। किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है। अंडवृद्धि के सात कारण हैं। मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है। दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है। इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है।

Saturday, September 17, 2011

इंदौर चातुर्मास संपन्न

का इंदौर चातुर्मास संपन्न

जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी का इंदौर चातुर्मास आज संपन्न हो गया, गीता भवन इंदौर में चातुर्मास काल में महाराज जी के दर्शन के लिए देश और विदेश से भी भक्त पधारे। हिन्दू धर्माचार्यों में स्वामी जी का चातुर्मास बहुत महत्व रखता है, आम तौर पर चातुर्मास अत्यंत कठिन और पवित्र विधान है, स्वामी जी ने चातुर्मास की परंपरा को एक तरह से पुनर्जीवन दिया है. चातुर्मास काल में स्वामी जी का सानिध्य अत्यंत लाभकारी और उर्जावान हो जाता है. वे अपनी सम्पूर्ण उपस्थिति से राम भाव का संचार करते अनुभूत होते हैं. वे ऐसे महात्मा हैं, जिनके सामने अरबपति से लेकर गरीब तक सबका समान महत्व है. इस पावन काल में न केवल उनके भक्त बल्कि देश भर के विद्वान और संत महात्मा भी जुटते हैं, ऐसे ऐसे महत्मा जुटते हैं जिनके दर्शन आम दिनों में संभव नहीं. उनके तत्वावधान में केवल ब्राहमण सभा ही नहीं होती, स्वामी जी हरिजन बस्तियों में भी जाते हैं और अपने श्रीमठ की उपयोगिता एवं परम्परा का निर्वहन करते हैं.
इस बार चातुर्मास महोत्सव के महत्वपूर्ण आयोजन निम्नलिखित हैं
गुरु पूजन - व्यास पूजन महायज्ञ, सम्पूर्ण श्रावण मास में सामूहिक रुद्राभिषेक (सोमवार को विशेष ), रास्ट्रीय संत सम्मेलन, विद्वतजन गोष्ठी, धर्माचार्य सम्मेलन, स्थानीय देवी का विशेष पूजन, हरिजन बस्तियों में सम्मेलन, राम्भावाभिशिक्त महानुभावों का अभिनन्दन एवं प्रकाशन, बालक-बालिका एवं पौढ़ महानुभावों का संस्कार शिविर, भक्तों के घरों में पधरावनी महायज्ञ, परमाराध्य श्री रामजी का राजोपचार पूजन महायज्ञ, श्री राम को छप्पन भोग व भंडारा, गायक-वादक सम्मेलन, राम जी की गीता भवन परिक्रमा. अखंड श्री रामनाम संकीर्तन महायज्ञ, प्रवचन महायज्ञ - प्रतिदिन संध्या ५ से ७ बजे तक, संतों, भक्तों और आगंतुकों हेतु पवित्र भंडारा. इत्यादि. इसके अतिरिक्त चातुर्मास काल में पड़ी २२ से ज्यादा पावन तिथियों पर विशेष आयोजन भी चातुर्मास काल में हुए हैं.
वे २००९ में जयपुर में और २०१० में सूरत में चतुर्मास कर चुके हैं, दिल्ली में उन्होंने २००४ में चातुर्मास किया था. अगला चातुर्मास संभवतः इलाहाबाद या पटना में होगा.

Sunday, August 21, 2011

श्रीशैलममल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

श्रीशैलम (श्री सैलम नाम से भी जाना जाता है) नामक ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाड़ी पर स्थित है. यहां शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है. मंदिर का गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नहीं जा सकते. इस कारण यहां दर्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होती है. स्कंद पुराण के श्री शैल काण्ड में इस मंदिर का वर्णन है. कहते हैं आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी. महाभारत, शिव पुराण तथा पद्मपुराण में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है.

पुराणों के अनुसार एक बार भगवान शंकर के दोनों पुत्र श्रीगणेश और श्री कार्तिकेय विवाह के लिए परस्पर झगड़ने लगे. प्रत्येक का आग्रह था कि पहले मेरा विवाह किया जाए. उन्हें झगड़ते देखकर भगवान शंकर और मां भवानी ने कहा कि तुम लोगों में से जो पहले पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर यहां वापस लौट आएगा उसी का विवाह पहले किया जाएगा. माता-पिता की यह बात सुनकर श्री कार्तिकेय तत्काल पृथ्वी परिक्रमा के लिए दौड़ पड़े. लेकिन श्रीगणेश जी के लिए तो यह कार्य बड़ा कठिन था. एक तो उनकी काया स्थूल थी, दूसरे उनका वाहन भी मूषक (चूहा) था. भला वह दौड़ में स्वामी कार्तिकेय की सामना कैसे कर पाते. उनकी काया जितनी स्थूल थी, बुद्धि उसी के अनुपात में तीक्ष्ण थी. उन्होंने अविलंब पृथ्वी की परिक्रमा का एक सुगम उपाय खोज निकाला. सामने बैठे माता-पिता का पूजन करने के पश्चात उनके सात चक्कर लगाकर उन्होंने पृथ्वी परिक्रमा का कार्य पूरा कर लिया. उनका यह कार्य शास्त्रानुमोदित था. पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर कार्तिकेय जब तक लौटे तब तक गणेश जी का सिद्धि और बुद्धि नामक दो कन्याओं के साथ विवाह हो चुका था और उन्हें क्षेम तथा लाभ नामक दो पुत्र प्राप्त हो चुके थे. यह सब देखकर कार्तिकेय अत्यंत रुष्ट होकर क्रौन्च पर्वत पर चले गए. माता पार्वती वहां उन्हें मनाने पहुंची. पीछे शंकर भगवान वहां पहुंचकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. कहते हैं सर्वप्रथम इनकी अर्चना मिल्लका पुष्पों से की गयी थी, इस कारण उनका नाम मल्लिकार्जुन पड़ा. तभी से भगवान शिव यहां मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रख्यात हुए.

Source: Raftaar Live

‘सनातन धर्म’

हिन्दू धर्म किसी व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित किया गया नहीं है। यह पुराने समय से चले आ रहे अलग-अलग मतों और आस्थाओं से मिलकर बना है। समय के साथ-साथ इस धर्म में ऐसे नए विश्वास और मत जुड़ते गए, जो समय की कसौटी पर खरे थे। इसलिए ही हिन्दू धर्म को एक विकासशील धर्म कहा जाता है। हिन्दू धर्म के मूल तत्वों में सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और दान मुख्य हैं और इन सबका विशेष महत्त्व है। इसलिए अपने मन, वचन और कर्म से हिंसा से दूर रहने वाले मनुष्य को हिन्दू कहा गया है। हिन्दू धर्म का इतिहास वेदकाल से भी पहले का माना गया है और वेदों की रचना 4500 ई।पू। शुरू हुई। हिन्दू इतिहास ग्रंथ महाभारत और पुराणों में मनु (जिसे धरती का पहला मानव कहा गया है) का उल्लेख किया गया है। पुराणों के अनुसार हिन्दू धर्म सृष्टि के साथ ही पैदा हुआ। पुराना और विशाल होने के चलते इसे ‘सनातन धर्म’ के नाम से भी जाना जाता है।
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Friday, August 19, 2011

इंदौर में रामानादाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी का चातुर्मास

इंदौर में रामानादाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी का चातुर्मास चल रहा है । इसका आरम्भ गुरुपूर्णिमा यानि १५ जुलाई से हुआ ।

Saturday, April 2, 2011

नववर्ष शुभकामना

4 अप्रैल.2011 बेहद खास दिन है। विक्रम संवत्सर 2068 का पहला दिन है।वासंतिक नवरात्र आरंभ हो रहा है। गुडी पड़वा, उगादी पर्व भी है। सृष्टि की रचना का दिन है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार, गौतम ऋषि की जयन्ती है। आर्य समाज की स्थापना और शिवाजी के राज्याभिषेक का दिन भी है। इस पावन तिथि पर अपने मित्रों, शुभचिंतकों और देशवासियों को शुभकामना देना न भूलें। नववर्ष के सुअवसर पर हमारी भी शुभकामनाएं स्वीकार करें।

Saturday, March 12, 2011



जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज
स्वामीजी


स्वामी रामवल्लभ शरण, कन्याकुमारी


रामेश्वरम के रामानंद आश्रम में महाराजश्री
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स्वामीजी के साथ भगवानदास, हरिद्वार


मीनाक्षी मंदिर, मदुरै में


हरिद्वार के श्री महंत कन्याकुमारी में


स्वामीजी मंडली के साथ


स्वामीजी


स्वामीजी

श्रीरंगम मंदिर से बाहर आते हुए स्वामीजी

Friday, March 11, 2011

साउथ इंडिया की यात्रा

अपने पूज्य गुरुदेव जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सानिध्य में हम ७५ भक्तो ने दक्षिण भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों का दौरा किया। सबसे पहले सभी भक्त १ मार्च को चेन्नई पहुंचे , दुसरे दिन दो बसों पर सवार होकर तिरुपति के लिए प्रस्थान किये। भगवान् बाला जी का अगले दिन दर्शन हुआ । भोजन के बाद हमारा कारवां कांचीपुरम के लिए रवाना हुआ। बीच में हम वेल्लूर गए ,जहाँ गोल्डेन टेम्पल को भी देखा। इस भव्य मंदिर को देख सब अभिभूत हो गए। रात्रि विश्राम कांचीपुरम में करने के बाद हमारा सफ़र मंदिर दर्शन का शुरू हुआ। हम प्रसिद्ध कामाक्षी देवी मंदिर गए , फिर दुसरे मंदिरों को भी देखा। उसी दिन हमारी यात्रा रामेश्वरम के लिए प्रस्थान की। रात १२ बजे हम भगवान रामनाथ के शहर में थे। दिन भर दर्शन -पूजन के बाद हम उसी दिन कन्याकुमारी के लिए रवाना हुए। रात्रि विश्राम भी वहीं हुआ। साथ में हरिद्वार, अयोध्या, काशी, चित्रकूट, प्रयाग से आये संत और श्रीमहंत भी थे। आगे की यात्रा मदुरै की थी । हम रात में वहां पहुँच गए, प्रातः काल माता कामाक्षी के मंदिर गए, गुरुवर ने विधि -विधान से पूजन किया , हम भक्तों ने माँ के दर्शन किये। श्री रंगम में भगवान रंगनाथ का दर्शन करके हमारा सफ़र चेन्नई के लिए रवाना हुआ। आठ मार्च की सुबह हम सब चेन्नई में थे , वहीं से सभी अपने -अपने शहर को रवाना ओ गए। पूज्य गुरुवर के आशीर्वाद और भगवान श्रीराम की कृपा से दक्षिण के चार धमो की यात्रा पूरी हुई ।