Friday, January 16, 2009

देवभूमि हरिद्वार में आकार ले रहा है विश्व का सबसे बड़ा श्रीराम मंदिर

आपको ये जानकार सुखद आनंद और आश्चर्य होगा कि देवभूमि हरिद्वार में विश्व का अद्वितीय श्रीराम मंदिर का निर्माण हो रहा है. ये मंदिर हर दृष्टिकोण से अनुपम होगा और आकार -प्रकार में दुनिया का सबसे बड़ा श्रीराम मंदिर होगा..इस मंदिर का निर्माण श्रीमठ ,पंचगंगा घाट,काशी के नियंत्रणाधीन जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्मारक सेवा न्यास के द्वारा हो रहा है..काशी का श्रीमठ -सगुण एवं निर्गुण राम भक्ति परम्परा और रामानंद सम्प्रदाय का एकमात्र मूल आचार्यपीठ है..इस अद्वितीय श्रीराम मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया है,श्रीमठ के वर्तमान पीठाधीश्वर और अनंतश्री विभूषित जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने..मंदिर का शिलान्यास सह भूमि पूजन कर्नाटक के उड्डपी स्थित पेजावर स्वामी जगद्गुरु मध्वाचार्य स्वामी श्रीविश्वेशतीर्थ जी महाराज के कर कमलों द्वारा 18 नवंबर 2005 को हुआ था..

श्रीराम मंदिर के संकल्पक जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज ने मंदिर निर्माण के उद्देश्यों पर समय-समय पर प्रकाश डाला है..आचार्यश्री के अनुसार अनादिकाल से अपने सम्पूर्ण विकास

के लिए मानवता को श्रीरामीय भावों की परमापेक्षा है,इसका कोई भी विकल्प न आज है न कभी होगा,इसे अपने-अपने साम्प्रदायिक चहारदीवारियों से निकलकर चिन्तनशील महानुभावों को स्वीकार करना हीं होगा.संसार के जो महामनीषी श्रीराम को परमेश्वर के रूप में स्वीकार नहीं करते वे भी उन्हें विश्व इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मानव तो मानते हीं हैं..कल्पना और भौतिक विकास के इस चरमोत्कर्ष काल में भी विश्व के किसी भी जाति-सम्प्रदाय और धर्म के पास श्रीराम जैसा चरित्रनायक नहीं है.जबकि सभी को अपेक्षा है. वर्तमान संसार की अखिल संस्कृतियां श्रीराम संस्कृति की हीं जीर्ण-शीर्ण-विकृत और मिश्रित स्वरूप हैं..यह संस्कृति-अनुसंघान महानायकों की प्रबलतम भावना है..ऐसे श्रीराम का मंदिर कहां नहीं होना चाहिए,अर्थात सर्वत्र होना चाहिए. संसार के सभी क्षेत्रों,कालों एवं दिशाओं में होना चाहिए. तभी मानवता का पूर्ण विकास होगा..

स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज कहते हैं कि इन्हीं भावों को ध्यान में रखकर श्रीसम्प्रदाय तथा सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ ,काशी ने हरिद्वार में अद्वितीय श्रीराममंदिर निर्माण का संकल्प श्रीरामजी की प्रेरणा एवं अनुकम्पा से किया है. श्रीसम्प्रदाय के परमाचार्य तथा परमाराध्य श्रीराम हीं हैं..

हरिद्वार में श्रीराम मंदिर क्यों--

इतिहास साक्षी है कि श्रीसम्प्रदाय के आचार्यो ने रामभक्ति -परम्परा का मुख्यतीर्थ अयोध्या को छोड़कर काशी को अपना मुख्यालय बनाया. आचार्यों की इस क्रांति ने रामभक्ति को अपूर्व तीव्रता प्रदान की और शैवों एवं वैष्णवों की कलंकभूता वैमनस्यता का समूलोच्छेद किया.अतएव हरिद्वार में श्रीराम मंदिर का निर्माण अव्यवहारिक तथा अमर्यादित नहीं है..हरिद्वार तो चारघामों में सुप्रतिष्ठित बद्रीधाम का द्वारभूत है..रामभक्ति स्वरूपा परम पावनी गंगा का प्रथम अवतरण स्थल तथा कुम्भ स्थल है..अतएव वहां तो हरि के अवतारों में पूर्णावतार भगवान श्रीराम का अतीव दिव्य मंदिर होना हीं चाहिए..

निर्माणाधीन श्रीराम मंदिर की विशेषताएं--

1.ये मंदिर श्रीसम्प्रदाय के मूल आचार्यपीठ श्रीमठ,काशी के द्वारा प्रकट हो रहा है ..श्रीसम्प्रदाय सगुण एवं निर्गुण रामभक्ति परंपरा का अनादिकाल से मुख्य प्रचारक एवं प्रसारक सम्प्रदाय है.

2.यह चार धामों में सुप्रतिष्ठित बद्रीधाम के द्वारभूत हरिद्वार में निर्मित हो रहा है..कुम्भ क्षेत्र में नासिक को छोड़कर कहीं भी श्रीराम का भव्य मंदिर नहीं है..

3.यह परमपावन मां गंगा के प्रथम अवतरण स्थल हरिद्वार में निर्मित हो रहा है..मां गंगा की राम-भक्ति से तुलना की गयी है.

  1. यह सनातन धर्म की मंदिर निर्माण की समस्त मान्यताओं से पूर्ण होगा.

  2. इस मंदिर की आराधना में पूर्ण वैदिक विधि एवं भावों का सर्वांश में पालन होगा.

  3. यह विश्व का सर्वाधिक ऊंचा जोधपुर के पत्थरों द्वारा निर्मित मंदिर होगा.

  4. यह मंदिर ,मंदिर के लिए होगा,मनोरंजन का साधन नहीं होगा.केवल आराधना और श्रीरामभाव का प्रसारक केन्द्र होगा..

  5. मंदिर का निर्माण ,जनता जनार्दन से एकत्रित पवित्र धन से होगा..क्योंकि रामराज्य की संस्थापना में आचार एवं धन की पवित्रता की श्रेष्ठतम भूमिका है.

  6. श्रीराम मंदिर की लम्बाई 193 फुट,चौड़ाई 102 फुट और ऊंचाई 175 फुट होगी..

  7. श्रीराममंदिर में 5 मुख्य शिखर, 85 इंडको(मुख् शिखर के साथ छोटी शिखर की आकृति) 24 तिल्लको तथा 104 सुसज्जित स्तम्भ होंगे..

  8. मंदिर के पीछे एक सुंदर तालाब भी होगा.

  9. श्रीरामजी के वन-विहार के लिए एक रमणीय उद्यान होगा..

  10. मंदिर के दोनों दिशाओं में पूर्ण सुसज्जित शिखर के साथ भण्डार मंदिर,शयन मंदिर, स्नान मंदिर एवं संग्रह मंदिर भी होंगे..

  11. मंदिर परिसर में कोई भी लौकिक प्रवृति नहीं होगी..परिसर पूर्णत श्रीराममय होगा..

  12. मंदिर की सभी दृष्टियों से प्रधानता होगी..

    ये राममंदिर ऋषिकेश चुंगी से गंगा की ओर जाने वाले सप्तऋषि पथ पर निर्मित हो रहा है..

    वास्तुकार---श्रीराजेश भाई बीनू भाई, सोमपुरा,बोरीवली बेस्ट,मुम्बई

  13. निर्माण स्थल—

    सप्तऋर्षि पथ, भूपतवाला, हरिद्वार, फोन- 01334-262452

Tuesday, January 13, 2009

स्वामी रामानंदाचार्य पर नई किताब- पायसपायी



इस धराधाम पर रामावतार के रूप में स्वामी रामानंद के प्रादुर्भाव होने के करीब सात सौ नौ वर्षों बाद रामानंद जी महाराज का वांग्मय अवतार हुआ है. इसे लिखा है हिंदी साहित्य जगत के मूर्धन्य विद्वान डॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय विजय ने. राजस्थान के कोटा निवासी डॉ विजय हिंदी के सिद्ध कवि और प्रसिद्ध लेखक है. विगत साठ वर्षों से उनकी लेखनी अविराम गति से चल रही है. जीवन के आठवें दशक की ये औपन्यासिक रचना निश्चित रूप से उनकी परिपक्वता और अनुभव की सघनता को मूर्तिमंत करती हैं. जगतगुरू रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य कहते हैं कि पायसपायी का प्राकट्य अपूर्व है. लेखक डॉ विजय की अद्भुत ज्ञानराशि, अनुपम अभिव्यक्ति क्षमता, हिंदी की व्यापक परिधि, औपन्यासिक जगत का विशिष्ट आकर्षण एवं आचार्य प्रवर के समान ही लेखक की राष्ट्रीय और मानवीय संवेदना इस ग्रंथ में अपूर्वता के साथ अभिव्यक्त हुई है. वैसे आचार्य प्रवर का संस्कृत कावात्मक अवतार श्री रामानंद दिग्विजय के रूप में पहले ही हो चुका है, जिसकी रचना जगदगुरू रामानंदाचार्य स्वामी स्वामी भगवदाचार्य जी महाराज ने की थी, जो रामभक्त परंपरा ही नहीं, अपितु संपूर्ण संस्कृत वांग्मय, हिंदी वांग्मय रूपी आकाश के अनुपम प्रकाशक थे. श्री आचार्य विजय नाम से चंपू काव्य के रूप में आचार्यश्री की जीवनगाथा प्रकट हो चुकी है, जिसके प्रणेता महामनीषी ख्यातिलब्ध रचनाकार गोस्वामी श्रीहरिकृष्ण शास्त्री थे. सुश्री अमिता शाह द्वारा भी हिंदी में काशी मार्तंड और शंखनाद के रूप में दो वांग्मय प्राकट्य आचार्यश्री का हो चुका है. इन ग्रंथों से पूर्व प्रसंग पारिजात में आचार्यश्री के संबंध में प्रमाणिक जानकारी पहले भी दी जा चुकी है.
पायसपायी में स्वामी रामानंद का सौमनस्य, साधुचरित्र, धर्म-आध्यात्म, तपश्चर्या और राष्ट्रीय चेतना की महत्ता को प्रमुखता के साथ प्रकट किया गया है. इस कृति में एक ऐसे महनीय व्यक्तित्व का आख्यान है, जिसकी प्रभविष्णुता से पूरा मध्यकाल आलोकित होता रहा है. उनकी प्रगतिशील, सर्वस्पर्शी जीवन दृष्टि, समन्वय की भावना, राष्ट्रीय एवं मानवीय चेतना तथा चमात्कारिक व्यक्तित्व तत्कालीन सम्राटों और संप्रदायों को निष्प्रभ कर दिया था. मुसलमान शासकों की हिंदुओं के प्रति क्रूर और प्रतिशोधी दृष्टि, राजाज्ञों की विसंगतियां, धर्म के नाम पर आडंबर, स्वामी जी के एक ही शंखनाद से इस उपन्यास में तिरोहित होते दिखाई देते हैं. इस प्रकार के विविध प्रसंगों की सर्जनाएं तथा स्थपनाएं उपन्यास की पठनीयता में रोचकता उत्पन्न करती है. औपन्यासिक तत्वों से भरपूर यह रचना एक प्रकार से स्वामी रामानंद का जीवन चरित ही है.
पायसपायी के लेखक के प्रेरणास्रोत रहे सारनाथ वाराणसी निवासी और संत साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ उदय प्रताप सिंह मानते हैं कि डॉ विजय ने इस पुण्य श्लोक पर लेखनी चलाकर स्वयं को जीवेम शरद: शतम कर लिया है. कहना न होगा कि आज भी शताधिक संप्रदायों और करोड़ों नागरिकों का जीवन स्वामी जी के उपदेशों और संदेशों से ही पाथेय ग्रहण कर जीवंत बना हुआ है. किसी रचना की सफलता का निकस उसके आलोकमय तथ्यों से ही निर्धारित होता है. आलोकमय जीवन का प्रतिमान उदात्त भाव के सृजन में खोजा जाना अपेक्षित है. इस दृष्टि से भी यह रचना बेजोड़ है. इस कृति की सबसे बड़ी विशिष्टता भाव एवं कथाशिल्प की समन्वयशीलता में परिलक्षित होती है. भाषा की सहजता एवं प्रवहनशीलता कथ्यों और संवादों की सार्थकता, अर्थवता, घटनाओं का संयोजन और लयात्मकता तथा स्वामीजी की वाणियों को विविध प्रसंगानुकूल संदर्भों से जोड़ने की अद्भुत निपुणता ने इस कृति को ऊंचाई प्रदान की है. रचना में पाठकीय संवेदना और कथारस की धारा समानांतर चलती है. संपूर्ण रचना पढ़ने के उपरांत मध्यकालीन भारतीय समाज का स्पष्ट चित्र उभरता है. इस बिंब में स्वामी रामानंदाचार्य का व्यक्तित्व और महत्व, धर्म-आध्यात्म का पारंपरिक प्रवाह और तत्कालीन शासन की विद्रूपताएं एकसाथ परिलक्षित होती हैं. साहित्य ऊंचाई के साथ ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुच्छेद भी इस कृति में खोजी जा सकती है. स्वामी रामनरेशाचार्य जी के शब्दों में कहें तो डॉ विजय के इस अवदान के लिए हिंदी जगत इनका सर्वदैव ऋणी रहेगा. ऐसी सेवा की प्राप्ति परम प्रभू श्रीराम तथा आचार्यवर के विशेष अनुग्रह के बिना संभव नहीं.
पायसपायी के प्रकाशक
जगदगुरू रामानंदाचार्य स्मारक सेवान्यास
श्रीमठ पंचगंगा घाट, काशी वाराणसी
पुस्तक का मूल्य- 150 रुपये मात्र

Tuesday, December 16, 2008

युग प्रवर्त्तक स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज

भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य और संस्कृति के विकास में भागवत धर्म तथा वैष्णव भक्ति से संबद्ध वैचारिक क्रांति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. वैष्णव भक्ति के महान संतों की उसी श्रेष्ठ परंपरा में आज से लगभग सात सौ नौ वर्ष पूर्व स्वामी रामानंद का प्रादुर्भाव हुआ. उन्होंने श्री सीताजी द्वारा पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत(राममय जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा रामभक्ति की धारा को मध्यकाल में अनुपम तीव्रता प्रदान की. उन्हें उत्तरभारत में आधुनिक भक्ति मार्ग का प्रचार करने वाला और वैष्णव साधना के मूल प्रवर्त्तक के रूप में स्वीकार किया जाता है. एक प्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार-

भक्ति द्रविड़ ऊपजी, लायो रामानंद.

यही नहीं, तत्कालीन समाज में विभिन्न मत-पंथ संप्रदायों में घोर वैमनस्यता और कटुता को दूर कर हिंदू समाज को एक सूत्रबद्धता का महनीय कार्य किया. स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया. उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेननाई और पीपानरेश जैसे जाति-पाति, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे तो दूसरे पक्ष में अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे. उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत महाकवि भी उत्पन्न हुआ. आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि तारक राममंत्र का उपदेश उन्होंने पेड़ पर चढ़कर दिया था ताकि सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके. उन्होंने नारा दिया था-

जाति-पाति पूछे न कोई.

हरि को भजै सो हरि का होई.

आचार्यपाद ने स्वतंत्र रूप से श्रीसंप्रदाय का प्रवर्तन किया. इस संप्रदाय को रामानंदी अथवा वैरागी संप्रदाय भी कहते हैं. उन्होंने बिखरते और नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला है-

सर्व प्रपत्तिधरकारिणो मता:

कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वरण के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया. चर्मकार जाति में जन्मे रैदास और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं.

मध्ययुगीन धर्म साधना के केंद्र में स्वामी जी की स्थिति चतुष्पथ के दीप-स्तंभ जैसी है. उन्होंने अभूतपूर्व सामाजिक क्रांति का श्रीगणेश करके बड़ी जीवटता से समाज और संस्कृति की रक्षा की. उन्हीं के चलते उत्तरभारत में तीर्थ क्षेत्रों की रक्षा और वहां सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना संभव हो सकी. उस युग की परिस्थितियों के अनुसार, वैरागिनी साधु समाज को अस्त्र-शस्र से सज्जित अनी के रूप में संगठित कर तीर्थ-व्रत की रक्षा के लिए, धर्म का सक्रिय मूर्तिमान स्वरूप खड़ा किया. तीर्थस्थानों से लेकर गांव-गांव में वैरागी साधुओं ने अखाड़े स्थापित किए. मूल्य ह्रास की इस विषम अवस्था में भी संपूर्ण संसार में रामानंद संप्रदाय के सर्वाधित मठ, संत, रामगुणगान, अखंड रामनाथ संकीर्तन आज भी व्यवस्थित हैं और सर्वत्र आध्यामिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं. वैष्णवों के बावन द्वारों में सर्वाधिक सैंतीस द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हैं।

युगप्रवर्तक स्वामी रामानंदाचार्यजी महाराज शेष भाग-- इसके अतिरिक्त भी फैली इसकी शाखा, प्रशाखा और अवान्तर शाखाएं जैसे- रामस्नेही, कबीरदासी, घीसापंथी, दादूपंथ आदि नामों से इस संप्रदाय की मूलभावना की संवाहिका बनी हैं. यह स्वामी रामानंद के ही व्यक्तित्व का प्रभाव था कि हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, शैव-वैष्णव विवाद, वर्ण-विद्वेष, मत-मतांतर का झगड़ा और परस्पर सामाजिक कटुता बहुत हद तक कम हो गई. उनके ही यौगिक शक्ति के चमत्कार से प्रभावित होकर तत्कालीन मुगल शासक मोहम्मद तुगलक संत कबीरदास के माध्यम से स्वामी रामानंदाचार्य की शरण में आया और हिंदुओं पर लगे समस्त प्रतिबंध और जजियाकर को हटाने का निर्देश जारी किया. बलपूर्वक इस्लाम धर्म में दीक्षित हिंदुओं को फिर से हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए परावर्तन संस्कार का महान कार्य सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्च ने ही प्रारंभ किया. इतिहास साक्षी है कि अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हजार राजपूतों को एक ही मंच से स्वामीजी ने स्वधर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया था. ऐसे महान संत, परम विचारक, समन्वयी महात्मा का प्रादुर्भाव तीर्थराज प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था. जन्मतिथि को लेकर मतभेद होने के बावजूद रामानंद संप्रदाय में मान्यता है कि आद्य जगद्गुरू का प्राकट्य माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 1356 को हुआ था. इनके पिता का नाम पंडित पुण्य सदन शर्मा और माता का नाम सुशीला देवी था. धार्मिक संस्कारों से संपन्न पिता ने रामानंद को काशी के श्रीमठ में गुरू राघवानंद के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण के लिए भेजा. कुशाग्रबुद्धि के रामानंद ने अल्पकाल में ही सभी शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन कर प्रवीणता प्राप्त कर ली. गुरू राघवानंद और माता-पिता के दबाव के बावजूद उन्होंने गृहस्थाश्रम स्वीकार नहीं किया और आजीवन विरक्त रहने का संकल्प लिया. ऐसे में स्वामी रामानंद को रामतारक मंत्र की दीक्षा प्रदान की. रामानंद ने श्रीमठ की गुह्य साधनास्थली में प्रविष्ट हो राममंत्र का अनुष्ठान तथा अन्यान्य तांत्रिक साधनाओं का प्रयोग करते हुए घोर तपश्चर्या की. योगमार्च की तमाम गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्होंने अष्टांग योग की साधना पूर्ण की. दीर्घायुष्य प्राप्त करने के कारण जगद्गुरू राघवानंद ने अपने तेजस्वी और प्रिय शिष्ट रामानंद को श्रीमठ पीठ की पावन पीठ पर अभिषिक्त कर दिया. अपने पहले संबोधन में ही जगदगुरू रामानंदाचार्य ने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने तथा परस्पर आत्मीयता एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार के बदौलत धर्म रक्षार्थ विराट संगठित शक्ति खड़ा करने के संकल्प व्यक्त किया. काशी के परम पावन पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ, आचार्यपाद के द्वारा प्रवाहित श्रीराम प्रपत्ति की पावनधारा के मुख्यकेंद्र के रूप में प्रतिष्ठित होकर उसी ओजस्वी परंपरा का अनवरत प्रवर्तन कर रहा है. आज भी श्रीमठ आचार्यचरण की परिकल्पना के अनुरूप उनके द्वारा प्रज्ज्वलित दीप से जनमानस को आलोकित कर रहा है. यही वह दिव्यस्थल है, जहां विराजमान होकर स्वामीजी ने अपने परमप्रतापी शिष्यों के माध्यम से अपनी अनुग्रहशक्ति का उपयोग किया था. रामानंदाचार्च पीठ का पवित्र केंद्र सारे देश में फैले रामानंद संप्रदाय का मुख्यालय है. श्रीमठ में अवस्थित रामानंदाचार्च की चरणपादुका दुनियाभर में बिखरे रामानंदी संतों, तपस्वियों एवं अनुयायियों की श्रद्धा का अन्यतम बिंदु है. यह परम सौभाग्य और संतोष का विषय है कि श्रीमठ के वर्तमान पीठासीन आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्यजी भी स्वामी रामानंदाचार्च की प्रतिमूर्ति जान पड़ते हैं. उनकी कल्पनाएं, उनका ज्ञान, उनकी वग्मिता और सबसे अच्छी उनकी उदारता और संयोजन चेतना ऐसी है कि यह विश्वास किया जाता है कि स्वामी रामानंद का व्यक्तित्व कैसा रहा होगा. वर्तमान जगद्गुरू रामानंदाचार्च पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज के सत्प्रयासों का नतीजा है कि श्रीमठ से कभी अलग हो चुकी कबीरदासीय, रविदासीय, रामस्नेही, प्रभृति परंपराएं वैष्णव के सूत्र में बंधकर श्रीमठ से एकरूपता स्थापित कर रही है. कई परंपरावादी मठ मंदिरों की इकाईयां श्रीमठ में विलीन हो रही हैं. तीर्थराज प्रयाग के दारागंज स्थित आद्य जगद्गुरू रामनंदाचार्य का प्राकट्यधाम भी इनकी प्रेरणा से फिर भव्य स्वरूप में प्रकट हुआ है. स्वामी रामानंद को रामोपासना के इतिहास में एक युगप्रवर्तक आचार्य माना जाता है. उन्होंने श्रीसंप्रदाय के विशिष्टाद्वैत दर्शन और प्रपतिसिद्धांत को आधार बनाकर रामावत संप्रदाय का संगठन किया. श्रीवैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक अथवा षडक्षर राममंत्र को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना. बाह्य सदाचार की अपेक्षा साधना में आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया, छुआछूत, ऊंच-नीच का भाव मिटाकर वैष्णव मात्र में समता का समर्थन किया. नवधा से परा और प्रेमासक्ति को श्रेयकर बताया. साथ-साथ सिद्धांतों के प्रचार में परंपरापोषित संस्कृत भाषा की अपेक्षा हिंदी अथवा जनभाषा को प्रधानता दी. स्वामी रामानंद ने प्रस्थानत्रयी पर विशिष्टाद्वैत सिद्धांतनुगुण स्वतंत्र आनंद भाष्य की रचना की. तत्व एवं आचारबोध की दृष्टि से वैष्णवमताब्ज भास्कर, श्रीरामपटल, श्रीरामार्चनापद्धति, श्रीरामरक्षास्त्रोतम जैसी अनेक कालजयी मौलिक ग्रंथों की रचना की. स्वामी रामानंद के द्वारा दी गई देश-धर्म के प्रति इन अमूल्य सेवाओं ने सभी संप्रदायों के वैष्णवों के हृदय में उनका महत्व स्थापित कर दिया. भारत के सांप्रदायिक इतिहास में परस्पर विरोधी सिद्धांतों तथा साधना-पद्धतियों के अनुयायियों के बीच इतनी लोकप्रियता उनके पूर्व किसी संप्रदाय प्रवर्तक को प्राप्त न हो सकी. महाराष्ट्र के नाथपंथियों ने ज्ञानदेव के पिता विट्ठल पंत के गुरू के रूप में उन्हें पूजा, अद्वैत मतावलंबियों ने ज्योतिर्मठ के ब्रह्मचारी के रूप में उन्हें अपनाया. बाबरीपंथ के संतों ने अपने संप्रदाय के प्रवर्तक मानकर उनकी वंदना की और कबीर के गुरू तो वे थे ही, इसलिे कबीरपंथियों में उनका आदर स्वाभाविक है. स्वामी-रामानंद के व्यक्तित्व की इस व्यपाकता का रहस्य, उनकी उदार एवं सारग्राही प्रवृति और समन्वयकारी विचारधारा में निहित है. निश्चय हीं उनके विराट व्यक्तित्व एवं व्यापक महत्ता के अनुरूप कतिपय आर्षग्रंथ एवं संत-साहित्य में उल्लेखित उनके रामावतार होने का वर्णन अक्षरश: प्रमाणित होता है. रामनंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महीतले

Saturday, December 13, 2008

सुस्वागतम

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